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बैंड, बाजा, बारात...

तक़रीबन 20 साल पहले देहरादून में पोस्टिंग के दौरान हमारे सीनियर और दोस्त मरहूम तेजिन्दर सिंह गगन ने एक कहानी का ज़िक्र किया था। कहानी थी 'शामिल बाजा' जो उनके कथाकार साथी शशांक ने लिखी थी। गगन ने हमें शामिल बाजा का मतलब ये समझाया था कि बारातों में बजने वाले ब्रास बैंड में एक 'डमी' बाजा होता है जिसका कोई राग नहीं होता। बस ज़ोर से फूंक मारने पर एक ही स्वर निकालता है और उसकी ब्रास बैंड में महज़ एक शिरकत भर होती है। तेजिन्दर गगन ने ये भी बताया कि अक्सर ये बाजा ट्रेनीज़ के हवाले होता है जो अमूमन बच्चे होते हैं। इस लिहाज़ से बाजे के साथ शामिल बच्चों को भी 'शामिल बाजा' कहा जाना चाहिए! 

बात आई गई हो गई। हम दिल्ली चले आए और गगन अहमदाबाद, चेन्नई चले गए। बीच में उनसे कई बार मिलना हुआ। फ़ोन पर बातें होती रहीं पर 'शामिल बाजा' का कभी कोई ज़िक्र नहीं हुआ। 

लेकिन इस दौरान 'शामिल बाजा ' बराबर हॉन्ट करता रहा! जब कभी भी किसी बारात में गए या छज्जे पर खड़े होकर सड़क पर जाती किसी बारात को देखा तो आंखें 'शामिल बाजा' को बराबर तलाशती रहीं! 

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कुछ महीने पहले शशांक की कहानी 'शामिल बाजा' पढ़ने का मन किया लेकिन कहीं उपलब्ध ही नहीं दिखी लिहाज़ा शशांक जी को तलाश कर उनसे वाट्सऐप पर कहानी मंगवाई। कहानी छोटी है। चार पेज की। जिसमें घर के एक बच्चे का क़द्र शामिल बाजा से बेहतर नहीं है।  

इधर कुछ समय से हमने शाम को टहलना शुरू किया है। उसकी वजह दिल्ली एनसीआर का सुबह का पॅल्यूशन है। ईवनिंग वॉक के रास्ते में दो तीन ब्रास बैंड वालों की दुकानें हैं। एक दिन बस यूं ही एक ब्रास बैंड वाले से गुफ़्तगू के लिए दुकान पर चढ़ गया। दरयाफ़्त करने पर पता लगा कि 'शामिल बाजा' की रवायत अब ख़त्म होती जा रही है। इसकी एक वजह तो एकनॉमिक है जिसमें ज़्यादा लोगों को बैंड पार्टी में शामिल करना अब मुमकिन नहीं और दूसरी लोगों की पसंद अब कन्वेंशनल मार्चिंग बैंड से हट कर डीजे या स्टैंडिंग परफॉर्मेंस होती जा रही है। बारातें अब लम्बी दूरी तक चलती नहीं हैं। अगर चलती भी हैं तो आम तौर पर बड़े बैंड के बजाए लोग अब कहीं कम लागत में ढोल प्रिफ़र करने लगे हैं।

दरयाफ़्त करने पर मालूम हुआ कि एक मार्चिंग शादी के बैंड पार्टी में ग्यारह लोग होते हैं जिनमें एक बैंड मास्टर। बैंड पार्टी के साथ छह बत्तियां होती हैं और उनकी पूरे समय (पूरी शाम) की फ़ीस अगर आस पास का मोहल्ला है तो 15 से 20 हज़ार है। लांग डिस्टेंस में ट्रैवेल का ख़र्चा अलग! घोड़ी के साथ फ़ीस 10 से 15 हज़ार बढ़ जाती है। स्पॉटलेस सफ़ेद घोड़ी की फ़ीस आम घोड़ियों से अलग है। दिल्ली का सिंधी हीरा नंद घोड़ी वाला इस कारोबार में 1950 से हैं और उसकी एक स्पॉटलेस घोड़ी की फ़ीस 40 - 50 हज़ार से शुरू होकर किसी भी हद तक जा सकती है।
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आम तौर एर अगर दो घोड़ों की बग्घी चाहिए तो कुल फ़ीस 35 से 40 हज़ार तक पहुंचती है! ये रेट नॉन प्रीमियम रेट हैं। 

दिल्ली के बड़े नामी गिरामी बैंड कुछ भी चार्ज कर सकते हैं। पहले बरातों में 11 बजाने वाले हुआ थे, अब 121 तक हो गए हैं। सवाल बरात की रौनक पर है। दिल्ली का चावला बैंड एक स्टैण्डर्ड परफ़ॉर्मेंस का 40 से 50 हज़ार चार्ज करता है। कुछ समय पहले दिल्ली की एक शादी में 300 परफॉर्मर की बैंड टीम उतारी गई थी जिसके लिए 11 लाख चार्ज किया गया था। 

चावला बैंड कई बॉलीवुड फिल्मों में परफॉर्म कर चुका है। जिनमें' स्पेशल 26`,' राजमा चावल`, 'वीरे दी वेडिंग` शामिल हैं। चावला बैंड  IPL डेल्ही कैपिटल का ऑफ़िशियल स्पांसर भी रहा है।

वहीं शिव मोहन बैंड अपने आप को दिल्ली का सबसे सुपीरियर बैंड मानता है। शिव मोहन बैंड 1963 से इस व्यापार में है और अब तक 89 हज़ार शादियों में परफॉर्म करने का दावा करता है। शिव मोहन बैंड के स्टोर में 8 हज़ार इंस्ट्रूमेंट हैं!

जब ये पूछा कि बैंड कौन कौन से गाने या धुन बजाता है तो पता लगा कि पुराने नये दोनों तरह के बॉलीवुड सांग्स! लेकिन बारातियों की पसंद आज भी ओल्ड बॉलीवुड सांग्स ही हैं। बारात की शुरुआत 'आज मेरे यार की शादी है' से होती है फिर 'आए हम बाराती बारात लेके…', 'झूम बराबर झूम शराबी…', 'पल्लो लटके, म्हारो पल्लो लटके…' , 'राजा की आएगी बारात…' ! लड़की के घर पहुंचते ही - 'ये देश है वीर जवानों का, अलबेलों का मस्तानों का…' और 'बहारों फूल बरसाओ मेरा महबूब आया है' तक! बीच में अगर कोई और फ़रमाइश होती है तो चलते गाने को रोक कर पूरी की जाती है।

ब्रास बैंड प्राइमेरली मिलिट्री बैंड है। जिनका काम जंग में सोल्जर्स के इंटरटेनमेंट के साथ उनकी हौसला अफ़ज़ाई हुआ करता था। मिलिट्री बैंड के पहले पहल एक्ज़ाम्पिल तेरहवीं सदी के ऑटोमन एम्पायर में मिलते हैं। ऑटोमन एम्पायर का बैंड 'मेहतरन बैंड' कहलाता था जो लड़ाई में मार्शल धुनें बजाता था और जवानों को संदेश भी भेजता था। टर्किश मिलट्री बैंड ट्रेडिशन यूरोप के बाक़ी मुल्क़ों में पहुंचा और बिट्रिशर्स ने इस ट्रेडिशन को अपनी फ़ौज में अपनाया। बिट्रिश हुक़ूमत के दौरान ही इंडियन रॉयल्टी ने इसी कोलोनियल रिवायत को अपनाया। धीरे-धीरे इसे आम हिन्दुस्तानियों, ख़ास तौर से नॉर्थ इंडियन मिडिल क्लास ने अपनी शादी ब्याह और सेरिमनीज़ पर ख़ुशी और फ़तेह के इज़हार के तौर पर अपनाया।

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हिन्दुस्तान में ब्रास बैंड ख़ास तौर से शादियों के मार्चिंग ब्रास बैंड का कोई ख़ास डॉक्यूमेंटेशन नहीं है।

महज़ एक ऑथेंटिक रिसर्च है' Brass Baja: Stories from the World of Indian Wedding Bands' जिसका ऑथर ग्रेगरी डी बूथ हैं। 

शादियों में बारातें हमने कम अटैंड की हैं। कोशिश यही रहती है कि सीधे वेन्यू पर पहुंच जाया जाए। अब रिश्तेदारी की कोई शादी हो तो ज़ाहिर तौर पर बारात प्रोसेशन में शामिल होना पड़ता है।

पहले बरातों में बेहूदगी नहीं होती थी। नाच गाना ज़रूरी शग़ल था। लड़की के दरवाज़े पर बैंड दोनों तरफ़ खड़ा हो जाता था और बारात बड़ी शाइस्तग़ी से अंदर दाख़िल हो जाया करती थी। 

बारात के बैंड का जहां तक ताल्लुक़ है तो हर शहर का अपना मिज़ाज है। रिवायत तो शहनाई की ही हुआ करती थी जो बारात के आगे आगे चलती थी।

वहीं अब इनटरटेनमेंट के नए और बेहतर इनोवेशंस आ गए हैं जो ट्रेडिशनल मार्चिंग ब्रास बैंड से ज़्यादा अट्रैक्टिव माने जाने लगे हैं!

(रमन हितकारी के फ़ेसबुक पेज से)

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रमन हितकारी
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