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ग़रीबी कम करने का कौन-सा फ़ॉर्मूला दिया अभिजीत बनर्जी ने

भारतीय मूल के और अमेरिका में बसे प्रोफ़ेसर अभिजीत बनर्जी को 2019 के अर्थशास्त्र के नोबेल पुरस्कार के लिए चुना गया है। अभिजीत मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी (एमआईटी) में प्रोफ़ेसर हैं, एमआईटी में प्रोफ़ेसर उनकी पत्नी एस्थर डुफ्लो भी और हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में अर्थशास्त्र के प्रोफ़ेसर माइकल क्रेमर को भी नोबेल पुरस्कार दिया गया है। इन तीनों को यह पुरस्कार ग़रीबी के कारणों पर शोध करने के लिए दिया जाएगा। अभिजीत से पहले हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में अर्थशास्त्र के प्रोफ़ेसर अमर्त्य सेन को 1998 में यह सम्मान दिया गया था। आइए, अभिजीत बनर्जी के जीवन के बारे में कुछ जानते हैं। 

नोबेल पुरस्कार देने वाली रॉयल स्वीडिश अकादमी ऑफ़ साइसेंज ने इस साल के नोबेल पुरस्कार की घोषणा करते हुए कहा कि इन्हें अंतरराष्ट्रीय ग़रीबी को कम करने के लिए किए गए प्रयोगों की वजह से नोबेल पुरस्कार के लिए चुना गया है। 

51 साल के अभिजीत जब साल 2012 में कोलकाता आये थे तब ‘द टेलीग्राफ़’ ने उनसे बात की थी। अभिजीत के पिता दीपक और माँ निर्मला बनर्जी भी अर्थशास्त्र के जाने-माने टीचर थे।  अभिजीत कलकत्ता के एक अच्छे स्कूल में पढ़ते थे लेकिन उनके दोस्त ऐसे थे जो स्कूल नहीं जाते थे। अभिजीत ने देखा कि उनके दोस्तों में से अधिकतर छोटे घरों में रहते थे, वे बहुत ज़्यादा खेलते थे और अभिजीत को किसी भी खेल में हरा सकते थे। इन दोस्तों के व्यवहार ने अभिजीत के मन में कई सवाल पैदा कर दिए थे। बाद में अभिजीत प्रेसीडेंसी कॉलेज में अर्थशास्त्र के छात्र बने और उसके बाद जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से होते हुए हार्वर्ड विश्वविद्यालय तक पहुंचे। 

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पिछले 15 सालों से ज़्यादा समय से अभिजीत दुनिया भर के कई देशों में घूमे और ग़रीबों के जीवन स्तर को समझा और इसका असर यह हुआ कि उन्होंने अपनी पत्नी के साथ ‘पुअर इकॉनामिक्स’ नाम की किताब लिखी। यह किताब बहुत प्रसिद्ध हुई थी। अभिजीत बताते हैं कि वह और उनकी पत्नी इस बात से बेहद ख़ुश हैं कि कि उन्होंने इस किताब को लिखा। 

अभिजीत बनर्जी जीवन भर इस सवाल का जवाब तलाशते रहे कि विश्व स्तर पर ग़रीबी का मुक़ाबला कैसे किया जा सकता है और ग़रीबों के जीवन स्तर को कैसे बेहतर बनाया जा सकता है।

अभिजीत ने ‘द टेलीग्राफ़’ को बताया था कि उन्होंने इंडियन स्टैस्टिकल इंस्टीट्यूट में बी.स्टेट प्रोग्राम में एडमिशन लिया था लेकिन कुछ क्लास लेने के बाद ही वह इससे पीछे हट गये। तब उनके सामने सवाल था कि वह आगे क्या करेंगे। इसके बाद वह किसी प्रतियोगी परीक्षा में नहीं बैठे और आईआईटी-जेईई को चुना। 

अभिजीत ने बातचीत में बताया था कि उनके माता-पिता ने उन्हें सीधे ही अर्थशास्त्र पढ़ाना शुरू नहीं किया था। अभिजीत के मुताबिक़, उनके पिता ने उनसे कहा था कि उन्हें ऐसा विषय चुनना चाहिए, जहां गणित का कुछ इस्तेमाल हो सके। अभिजीत को फ़िजिक्स में भी बहुत ज़्यादा रुचि नहीं थी और बाद में उन्होंने अर्थशास्त्र विषय को अपने लिए चुना। 

खाना बनाना है पसंद 

बातचीत में अभिजीत ने कहा कि खाना बनाना उनकी रुचि है और यह उन्हें बचपन से ही पसंद है। वह ख़ुद को एक कुक मानते हैं। अभिजीत ने कहा था कि लगभग हर दिन वह कुछ खाना बनाते हैं। उन्होंने कहा था कि बहुत बिजी रहने के बाद भी उनकी माँ कई तरह का खाना बनाती थीं और यह उनसे बात करने का सबसे अच्छा मौक़ा होता था। 

अभिजीत ने बताया था कि वह खाना बनाने में अपनी माँ की मदद किया करते थे और यहीं से यह उनकी आदत बन गयी। अभिजीत ने बताया था कि वह बंगाली खाने को बहुत पसंद करते हैं और हफ़्ते में दो से तीन बार इसे ज़रूर खाते हैं।

अभिजीत ने बातचीत में यह भी बताया था कि प्रेसीडेंसी यूनिवर्सिटी के लिए किये गये अच्छे कामों की वजह से वह पहले दो वाइस चांसलर्स (अमिता चटर्जी और मालाबिका सरकार) से बेहद प्रभावित रहे थे। उनके मुताबिक़, इसलिये ही प्रेसीडेंसी यूनिवर्सिटी का नाम हो सका। 

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अभिजीत बनर्जी के बारे में यह भी कहा जा रहा है कि उन्होंने राहुल गाँधी की न्याय योजना को तैयार किया था। इसकी पुष्टि ख़ुद राहुल गाँधी ने भी की है और ट्वीट कर कहा है कि अभिजीत ने न्याय योजना को तैयार किया था। न्याय योजना के तहत देश के 5 करोड़ ग़रीब परिवारों को हर महीने 6 हज़ार रुपये देने का वादा किया गया था। कांग्रेस ने न्याय योजना के दम पर दावा किया था कि इसमें ग़रीबी को ख़त्म करने और भारतीय अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने की क्षमता है। 
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