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मालेगाँव पार्ट- 3 : पुरोहित ने प्रज्ञा को बताया था धमाकों का ज़िम्मेदार

दिग्विजय सिंह के ख़िलाफ़ चुनाव में उतरने की घोषणा के साथ ही साध्वी प्रज्ञा सिंह एक बार फिर ख़बरों में हैं। वे मालेगाँव धमाका मामले में मुख्य अभियुक्त हैं, अदालत ने उनके ख़िलाफ़ मुक़दमा चलाने को कहा है। प्रज्ञा फ़िलहाल ज़मानत पर हैं। सत्य हिन्दी ने मालेगाँव कांड पर एक शृंखला शुरू की है। इसकी पहली और दूसरी कड़ी पहले प्रकाशित की जा चुकी है। अब पेश है इसकी तीसरी कड़ी। 
नीरेंद्र नागर

पिछली किस्त में हमने पढ़ा कि आर्मी को जब आईबी से यह सूचना मिली कि उसका एक अधिकारी जो पँचमढ़ी में अरबी सीख रहा है, उसका नाम मालेगाँव धमाकों में आया है तो दिल्ली से एक अधिकारी कर्नल आर. के. श्रीवास्तव को, जो तब काउंटर इंटेलिजेंस विभाग में डायरेक्टर थे, पँचमढ़ी भेजा गया।

कर्नल श्रीवास्तव अगले दिन की फ़्लाइट पकड़कर दिल्ली से भोपाल पहुँचे। भोपाल से पँचमढ़ी पहुँचते-पहुँचते उनको रात हो गई। पहुँचते ही उन्होंने आर्मी एजुकेशन कोर ट्रेनिंग कॉलेज ऐंड सेंटर (एईसी) के विभिन्न कोर्सों में भाग ले रहे इंटेलिजेंस विभाग के सभी अधिकारियों को बुलाया और सबसे एक-एक करके बात की ताकि किसी को भनक नहीं लगे कि वे किस काम के लिए आए हैं। कर्नल श्रीवास्तव ने पुरोहित को सबसे अंत में बुलाया। यह बातचीत ब्रिगेडियर संदीप कुमार के कार्यालय में हुई जो एईसी ट्रेनिंग स्कूल के कमांडेंट थे और वे ख़ुद भी सारी बातचीत के दौरान मौजूद थे।

मालेगाँव पार्ट-1 और 2

कर्नल श्रीवास्तव ने छूटते ही पूछा, ‘जंगलों में आपने कितने आतंकवादियों को ट्रेन किया है, पुरोहित?’ पुरोहित इस सवाल से अवाक रह गए। उन्होंने कहा, ‘मैंने ऐसा कुछ नहीं किया है।’ उसके बाद अगला सवाल था कि मालेगाँव ब्लास्ट के बारे में आप क्या जानते हो? पुरोहित ने कहा, ‘मालेगाँव धमाकों के बारे में मैं जो कुछ जानता हूँ, वह जबलपुर की लायज़न यूनिट को बता दिया है। उन्होंने 15 अक्टूबर 2008 के उस हस्तलिखित ख़त का हवाला दिया जो उन्होंने इंटेलिजेंस अधिकारी मेजर भगीरथ दे को लिखा था। पुरोहित ने यह भी बताया कि ‘मैंने कर्नल विनय पँचपोरे और मेजर प्रवीण खानज़ोडे को भी 13 अक्टूबर को फ़ोन पर जानकारी दी थी।’ कर्नल पँचपोरे सदर्न कमांड की लायज़न यूनिट के कमांडिंग ऑफ़िसर थे और प्रवीण खानज़ोडे उसी की देवलाली यूनिट में इंटेलिजेंस अधिकारी थे।

रात 1 बजे तक चली पूछताछ

इसके बाद रात 1 बजे के बाद तीनों एईसी के मेस में गए और पूछताछ चलती रही। मेस में ब्रिगेडियर संदीप और दो अन्य अफ़सर थे जिनके सामने भागीरथ दे से फ़ोन करके पूछा गया कि क्या उन्हें ले. कर्नल पुरोहित ने कोई चिट्ठी भेजी थी। मेजर दे ने बताया कि हाँ, चिट्ठी मिली थी जो उनके पास है।’ कर्नल श्रीवास्तव ने मेजर दे से पूछा कि उस चिट्ठी में क्या लिखा था और उन्होंने उसके आधार पर क्या कार्रवाई की।

मेजर भागीरथ दे ने बताया कि उस चिट्ठी में पुरोहित ने ब्लास्ट के लिए प्रज्ञा ठाकुर को ज़िम्मेदार ठहराया है और उसमें आरएसएस नेता इंद्रेश की भी भूमिका बताई है।

मेजर दे के अनुसार पुरोहित ने उस चिट्ठी में इंद्रेश कुमार को आईएसआई का एजेंट बताया था। उस चिट्ठी के बारे में हम आगे विस्तार से चर्चा करेंगे क्योंकि इस चिट्ठी का हवाला पुरोहित ने अदालत में भी दिया है।

कर्नल श्रीवास्तव को संदेह हुआ कि कहीं पकड़े जाने के डर से पुरोहित आत्महत्या न कर लें इसलिए उन्होंने निर्देश दिया कि पुरोहित के पास जो भी हथियार थे, उनको ज़ब्त कर लिया जाए। पुरोहित के पास चार हथियार पाए गए जो सबके-सब मालख़ाने में जमा करवा दिए गए।

अगले दिन श्रीवास्तव को मेजर जन. रावत का दिल्ली से फ़ोन आया। उन्होंने श्रीवास्तव से अब तक की रिपोर्ट ली और कहा कि पुरोहित के मोबाइल ज़ब्त कर लो और देखो कि वे किसी को कॉल न तो कर पाएँ और न ही उनमें से कुछ डिलीट कर पाएँ। संभवतः उनके पास मुंबई से कुछ और सूचनाएँ मिली होंगी। वे कर्नल श्रीवास्तव को कुछ दिन इंतज़ार करने को कहते हैं।

मेजर जनरल रावत के निर्देश के मुताबिक़ कर्नल श्रीवास्तव ने पुरोहित के फ़ोन ले लिए। अगले कुछ दिन उन्होंने कुछ नहीं किया। कोई पूछताछ नहीं, कोई कार्रवाई नहीं। हाँ, इस बीच दोनों की दो-तीन मुलाक़ातें अवश्य होती हैं।

पुरोहित को मुंबई ले जाने का निर्देश

28 अक्टूबर को कर्नल श्रीवास्तव के पास दिल्ली से फिर फ़ोन आया और उनसे कहा गया कि पुरोहित से फिर पूछो। यदि वे अपनी भूमिका मान जाते हैं तो दिल्ली ले आओ, नहीं मानते तो मुंबई ले जाओ। यह 29 अक्टूबर 2008 की बात है। दो टिकट कटे - एक दिल्ली के लिए, दूसरा मुंबई के लिए। लेकिन इसकी जानकारी पुरोहित को नहीं थी। पुरोहित को यही बताया गया था कि उनको दिल्ली में Integrated HQ of Army (MOD) जाना है और वहाँ एमआई-20 से मिलना है। दोनों पँचमढ़ी से भोपाल के लिए निकले। निकलने से पहले पुरोहित का फ़ोन जमा कर लिया गया। कर्नल श्रीवास्तव ने एक और आदमी को साथ ले लिया ताकि कहीं पुरोहित रास्ते में उनको चकमा न दे दें।

भोपाल एयरपोर्ट में चेक-इन के बाद पुरोहित को पता चला कि वे दिल्ली नहीं, मुंबई ले जाए जा रहे हैं। पुरोहित ने पूछा कि जब मूवमेंट ऑर्डर दिल्ली के लिए है तो वे मुंबई क्यों जा रहे हैं। श्रीवास्तव ने उनको बताया कि वे मुंबई होकर दिल्ली जाएँगे। पुरोहित ने कहा कि मैं पत्नी से बात करना चाहता हूँ ताकि इस बदले हुए प्लान की जानकारी दे सकूँ। लेकिन उन्हें कहा गया कि आधे घंटे के बाद बात कर लेंगे।

मुंबई के प्लेन में बैठने से पहले सिक्युरिटी में कर्नल श्रीवास्तव ने पुरोहित से फिर पूछा कि आप ब्लास्ट में अपना हाथ स्वीकार कर लो। लेकिन उन्होंने स्वीकार नहीं किया और दोनों प्लेन से रात साढ़े दस के आसपास मुंबई पहुँचे। 

मुंबई में आईबी इनके स्वागत के लिए खड़ी थी। आईबी की गाड़ी उन दोनों को लेकर लोनावाला पहुँची जहाँ एटीएस का गेस्ट हाउस था। 

पुरोहित को आर्मी के कोलाबा स्थित कार्यालय में न ले जाकर एटीएस के गेस्ट हाउस में इसलिए ले जाया गया ताकि मीडिया या किसी को इस बात की भनक न लगे कि आर्मी के किसी अधिकारी से मालेगाँव कांड में पूछताछ चल रही है क्योंकि तब तक यह पुष्ट नहीं हुआ था कि पुरोहित की वास्तव में ब्लास्ट में क्या भूमिका है।

एटीएस गेस्ट हाउस में पूछताछ

एटीएस गेस्ट हाउस में पहले से ही चार बड़े अधिकारी पुरोहित से पूछताछ के लिए मौजूद थे। ये थे - एटीएस प्रमुख हेमंत करकरे, एटीएस के डीआईजी परमवीर सिंह और सुखविंदर सिंह तथा आईबी के एक शीर्ष अधिकारी। कर्नल श्रीवास्तव भी उनमें शामिल हो गए। एक बड़े से कमरे में ले. कर्नल पुरोहित से बातचीत शुरू हुई। उसी कमरे की एक दीवार में बड़ा-सा स्क्रीन भी था जो टीवी का काम करता था लेकिन टीवी ऑफ़ हो तो वह कैमरे का रोल भी निभाता था। यानी उस पूछताछ की पूरी रिकॉर्डिंग हो रही थी।

पुरोहित ने वहाँ भी वही बात बताई जो पँचमढ़ी में कही थी कि उन्होंने सीनियर्स को बताया था कि इसमें प्रज्ञा का हाथ है। उन्होंने एटीएस से अपने पुराने रिश्तों की बात भी बताई कि कैसे वे एटीएस में भाषण देने जाते थे। दो घंटों तक सबकुछ बहुत अच्छा चलता रहा।

दो घंटे की बातचीत के बाद एक कॉफ़ी ब्रेक हुआ और उसके बाद अचानक करकरे की आवाज़ का टोन बदल गया। अब तक वे दोस्ताना लहज़े में बात कर रहे थे लेकिन अचानक उनकी आवाज़ में तल्ख़ी आ गई। उन्होंने पुरोहित से कहा, ‘सच-सच बताओ, क्या मामला है।’

करकरे के पूछने के ढंग से पुरोहित आश्चर्यचकित रह गए लेकिन उन्होंने वही बात दोहराई जो पहले कही थी कि इसमें प्रज्ञा ठाकुर का हाथ है और यह बात वे अपने सीनियर्स को बता चुके हैं।

करकरे ने कहा - उसको ले आओ

हेमंत करकरे ने तब किसी से कहा, ‘उसको ले आओ।’ सभी सोचने लगे कि एटीएस चीफ़ किसको बुलवा रहे हैं। देखा कि दाईं तरफ़ से किसी का कमरे में प्रवेश हुआ। वे थीं प्रज्ञा ठाकुर। प्रज्ञा को देखकर पुरोहित अवाक रह गए और अपनी नज़रें नीची कर लीं तथा ज़मीन की ओर ताकते रहे।

करकरे ने कहा, ‘इनको जानते हैं आप? कौन हैं ये’

पुरोहित ने कुछ नहीं कहा। बस आँखें ज़मीन पर गड़ाए रहे। करकरे ने फिर पूछा, ‘आप इनको जानते हैं?’ उन्होंने तीन-चार बार पूछा, ‘आप नीचे मत देखिए। सामने देखकर बताइए, आप इन्हें जानते हैं?’  

हेमंत करकरे एक रणनीति के तहत पुरोहित को नाम लेकर संबोधित नहीं कर रहे थे क्योंकि वे अगला सवाल प्रज्ञा से करने वाले थे और जानना चाहते थे कि वे पुरोहित के बारे में क्या कहती हैं।

जब पुरोहित ने चार-पाँच बार पूछे जाने पर भी कुछ नहीं कहा तो करकरे ने प्रज्ञा से पूछा, ‘आप इनको जानती हैं?’

प्रज्ञा ने छूटते ही कहा, ‘हाँ, जानती हूँ। ये वही कर्नल हैं।’

इसके बाद अजय राहिरकर और राकेश धावड़े का प्रवेश हुआ। अजय राहिरकर पर धमाकों के लिए पैसे और धावड़े पर हथियार जुटाने का संदेह था। दोनों ने कर्नल पुरोहित को पहचाना लेकिन कर्नल पुरोहित बुत बनकर बैठे रहे। आख़िरकार रात साढ़े तीन बजे के आसपास इंटरोगेशन ख़त्म हुआ।

क्या ले. कर्नल पुरोहित ने अपना अपराध कबूला या वे अपने इस स्टैंड पर क़ायम रहे कि इस कांड में प्रज्ञा का ही हाथ था। ले. कर्नल पुरोहित ने सेना अधिकारियों को लिखे पत्र में आरएसएस के किन नेताओं का हाथ बताया था, यह हम जानेंगे अगली कड़ी में।

नीरेंद्र नागर
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