loader

हिंदुओं को अल्पसंख्यक का दर्जा देने में केंद्र का रुख बदला: सुप्रीम कोर्ट

कुछ राज्यों व केंद्र शासित प्रदेशों में हिंदुओं को अल्पसंख्यक का दर्जा देने के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को कहा कि ऐसा लगता है कि केंद्र का रवैया पहले से बदल गया है। इसने केंद्र द्वारा सोमवार को दायर हलफनामे को लेकर कहा कि 25 मार्च को दाखिल किए गए हलफनामे से कुछ हद तक वह पीछे हट गया है। अदालत ने कहा है कि यह ठीक नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट के बार-बार जोर दबाव देने के बाद केंद्र ने 25 मार्च के हलफनामे में यह कहते हुए अपनी ज़िम्मेदारी से बचने की कोशिश की थी कि समवर्ती सूची की शक्तियाँ राज्यों को भी अल्पसंख्यक का दर्जा देने का अधिकार देती हैं। जबकि 9 मई को दायर नए हलफनामे में केंद्र ने कह दिया है कि 'अल्पसंख्यकों को अधिसूचित करने की शक्ति केंद्र के पास है'। अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रालय ने कहा कि इस मामले के दूरगामी प्रभाव होंगे और राज्य सरकारों और अन्य हितधारकों के साथ चर्चा के लिए और समय चाहिए।

ताज़ा ख़बरें
इससे ऐसा लगता है कि केंद्र के दोनों हलफनामों में विरोधाभासी दावे किए गए। और इसी को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने नाराजगी जताई है। केंद्र के बदलते रुख पर न्यायमूर्ति एस के कौल ने कहा, 'वे पलट गए हैं ... मैं जो समझ नहीं पा रहा हूं वह यह है कि भारत संघ यह तय करने में सक्षम नहीं है कि वह क्या करना चाहता है। यह सब विचार पहले दिया जाना चाहिए था...यह एक अनिश्चितता पैदा करता है। और आप जानते हैं कि यह सब अपने स्वभाव से ही सार्वजनिक डोमेन में आ जाता है, इससे पहले कि हम इस पर अपनी नज़रें डालें…। '

सुप्रीम कोर्ट इस मामले पर इसलिए सुनवाई कर रहा है क्योंकि दिल्ली बीजेपी के नेता और अधिवक्ता अश्विनी उपाध्याय ने याचिका दायर की है। याचिका में इस मुद्दे पर केंद्र से स्टैंड लेने के लिए कहा गया है। उपाध्याय की याचिका भारत की 2011 की जनगणना पर आधारित थी, जिसके अनुसार लक्षद्वीप, मिजोरम, नागालैंड, मेघालय, जम्मू और कश्मीर, अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर और पंजाब में हिंदू अल्पसंख्यक हैं।

उपाध्याय ने पहली बार 2017 में सुप्रीम कोर्ट का अल्पसंख्यकों की पहचान के लिए उचित दिशा-निर्देशों के लिए दरवाजा खटखटाया था।

केंद्र ने शुरुआत में यह कहते हुए याचिका को खारिज करने की मांग की थी कि 'यह बड़े पैमाने पर सार्वजनिक या राष्ट्रीय हित में नहीं है'। 

देश से और ख़बरें

बहरहाल, राज्यों के साथ चर्चा के लिए और समय देने की प्रार्थना पर अदालत ने कहा, 'यदि आप राज्यों से परामर्श करना चाहते हैं तो आपको एक कॉल लेना होगा...।' 'द इंडियन एक्सप्रेस' की रिपोर्ट के अनुसार कोर्ट ने केंद्र से कहा कि 'आप तय करें कि आप क्या करना चाहते हैं। यदि आप परामर्श करना चाहते हैं, परामर्श करें; आपको परामर्श करने से कौन रोक रहा है।'

जस्टिस एस के कौल और जस्टिस एम एम सुंदरेश की पीठ ने चर्चा के लिए समय देने के केंद्र के अनुरोध की अनुमति दी और मामले की सुनवाई के लिए 30 अगस्त की तारीख तय की।

सत्य हिन्दी ऐप डाउनलोड करें

गोदी मीडिया और विशाल कारपोरेट मीडिया के मुक़ाबले स्वतंत्र पत्रकारिता का साथ दीजिए और उसकी ताक़त बनिए। 'सत्य हिन्दी' की सदस्यता योजना में आपका आर्थिक योगदान ऐसे नाज़ुक समय में स्वतंत्र पत्रकारिता को बहुत मज़बूती देगा। याद रखिए, लोकतंत्र तभी बचेगा, जब सच बचेगा।

नीचे दी गयी विभिन्न सदस्यता योजनाओं में से अपना चुनाव कीजिए। सभी प्रकार की सदस्यता की अवधि एक वर्ष है। सदस्यता का चुनाव करने से पहले कृपया नीचे दिये गये सदस्यता योजना के विवरण और Membership Rules & NormsCancellation & Refund Policy को ध्यान से पढ़ें। आपका भुगतान प्राप्त होने की GST Invoice और सदस्यता-पत्र हम आपको ईमेल से ही भेजेंगे। कृपया अपना नाम व ईमेल सही तरीक़े से लिखें।
सत्य अनुयायी के रूप में आप पाएंगे:
  1. सदस्यता-पत्र
  2. विशेष न्यूज़लेटर: 'सत्य हिन्दी' की चुनिंदा विशेष कवरेज की जानकारी आपको पहले से मिल जायगी। आपकी ईमेल पर समय-समय पर आपको हमारा विशेष न्यूज़लेटर भेजा जायगा, जिसमें 'सत्य हिन्दी' की विशेष कवरेज की जानकारी आपको दी जायेगी, ताकि हमारी कोई ख़ास पेशकश आपसे छूट न जाय।
  3. 'सत्य हिन्दी' के 3 webinars में भाग लेने का मुफ़्त निमंत्रण। सदस्यता तिथि से 90 दिनों के भीतर आप अपनी पसन्द के किसी 3 webinar में भाग लेने के लिए प्राथमिकता से अपना स्थान आरक्षित करा सकेंगे। 'सत्य हिन्दी' सदस्यों को आवंटन के बाद रिक्त बच गये स्थानों के लिए सामान्य पंजीकरण खोला जायगा। *कृपया ध्यान रखें कि वेबिनार के स्थान सीमित हैं और पंजीकरण के बाद यदि किसी कारण से आप वेबिनार में भाग नहीं ले पाये, तो हम उसके एवज़ में आपको अतिरिक्त अवसर नहीं दे पायेंगे।
सर्वाधिक पढ़ी गयी खबरें

अपनी राय बतायें

देश से और खबरें

ताज़ा ख़बरें

सर्वाधिक पढ़ी गयी खबरें