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क्या ममता, मायावती और पटनायक पर डोरे डाल रहे हैं मोदी?

बिहार, यूपी और झारखंड में गठबंधन तथा मध्य प्रदेश, राजस्थान और छतीसगढ़ में मिली हार के बाद हर तरफ़ बीजेपी और मोदी का क़द ‘कुछ कम’ होने की चर्चा है तो बंगाल और ओडिशा को छोड़कर लगभग हर राज्य में विपक्ष की सीटें बढ़ने का अनुमान लगाया जा रहा है।
अरविंद मोहन

जैसे ही चुनावी झमाझम हिन्दी पट्टी में घुसा है, अचानक लड़ाई का स्वर बदलता लग रहा है। पहली चीज तो साफ़ दिखते वह प्रयास हैं जो चुनाव बाद सरकार बनाने के लिए बीच चुनाव में शुरू हो गए हैं। इसका मतलब यह है कि दोनों या तीनों पक्षों को अपने किए पुरुषार्थ से अलग नतीजे आते दिख रहे हैं। मोदी जी ममता और नवीन पटनायक पर ही नरम नहीं पड़े हैं, शरद पवार की बेटी के चुनाव क्षेत्र में भी जाने से वह बचे हैं। ममता उनको रसगुल्ला और कुर्ता भेजती हैं, इस सूचना ने सही असर किया हो या नहीं, पर नवीन बाबू को चक्रवात प्रभावित इलाक़े में विमान में साथ घुमाने, उनके काम की तारीफ़ करने और हज़ार करोड़ रुपये के अनुदान से ज़्यादा उनकी तसवीरों का खेल चला है।
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उधर, मायावती को चुनाव लड़ने का संकेत देना पड़ा तो कांग्रेस भी हमलावर हुई है। तीसरी ओर, चन्द्रशेखर राव द्रमुक नेता स्टालिन के साथ कुमारस्वामी और जगन मोहन रेड्डी से बात कम कर रहे हैं और उसका प्रचार ज़्यादा। शरद पवार भी ख़ुद को बूढ़ा बताने पर नाराज होते हैं तो मुलायम अस्पताल से लौट कर ख़ुद को तरोताज़ा बताते हैं।
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राजनैतिक विश्लेषण में ही नहीं नेताओं के सुर में भी जाति ज़्यादा प्रमुख हो गई है और प्रधानमंत्री ने ठीक उसी समय अपने पिछड़ा ही नहीं अति पिछड़ा होने की घोषणा की जब चुनाव उत्तर प्रदेश के पूरब की तरफ़ बढ़ने लगा। इस बार तो किसी तरफ़ से यह उकसावा भी नहीं था। पिछली बार भी प्रियंका गाँधी ने किसी बात पर गुस्सा होकर कहा था कि वे इतनी नीच राजनीति नहीं कर सकतीं। नरेन्द्र मोदी ने उसे नीच जाति की राजनीति और फिर अपनी ‘नीच’ जाति तक उतार दिया और प्रियंका चुप्पी साध गईं।

मोदी को नकली पिछड़ा बताने में जुटे

इस बार बसपा और सपा के नेता, गठबंधन के चलते प्रधानमंत्री को अति पिछड़ा और पिछड़ा ही नहीं नकली पिछड़ा बताने में जुट गए। किसकी बात जनता ने मानी, यह नतीजा निकालने की जल्दबाज़ी न करें तब भी यह लगता है कि उत्तर प्रदेश में सपा और बसपा के सामाजिक आधार में मेल बना हुआ है तो बिहार में यादव और मुसलमान का ‘माय’ ही नहीं निषादों के आने से ‘मुनिया’ (मुसलमान, निषाद और यादव) नामक नया सूत्र बन रहा है। 
होने को तो उत्तर प्रदेश और बिहार में पहले फ़ेज से ही चुनाव जारी है लेकिन पश्चिमी उत्तर प्रदेश का मुक़ाबला ठीक वैसा नहीं है जैसा पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार ही नहीं राजस्थान, मध्य प्रदेश और हरियाणा का है। जाति का खेल तो इन राज्यों में बिहार और उत्तर प्रदेश से भी ज़्यादा चलता है। पश्चिम उत्तर प्रदेश में मुसलमानों का अनुपात ज़्यादा है, यादव कम हैं और दलितों में जाटव ज़्यादा हैं।

कई सीटों पर तो सपा और बसपा के हाथ मिलाने से अगर उनके कोर वोटर साथ आ जाएँ तो उनके उम्मीदवार को जीत मिलने में मुश्किल नहीं हो सकती और बीसेक साल बाद अगर सपा-बसपा साथ आए हैं तो यह नेतृत्व की मजबूरी से ज़्यादा निचले स्तर के कार्यकर्ताओं का दबाव था, जो दो बार की मोदी लहर में उत्तर प्रदेश की राजनीति के हाशिए पर आ गए थे। ऐसे में इस गठजोड़ से बने सामाजिक समीकरण को साम्प्रदायिकता ही काट सकती थी। 

पहला फ़ेज हिन्दुत्व मिश्रित राष्ट्रवाद का बनाने की कोशिश की गई। वही फ़ॉर्मूला पूरब में और अन्य इलाक़ों में नहीं चल सकता इसलिए सुर बदले हैं।।
मोदी जी ने अपनी जाति और हर गाँव में एक-दो घर होने की बात करके पिछड़े ही नहीं अति पिछड़ी जमात को आकर्षित करने की कोशिश की जो मंडल, दलित आरक्षण और मुसलमान ‘तुष्टिकरण’ वग़ैरह से भी अछूती रह गयी थी और बिहार में पचपनिया या पंचफोड़न नाम से गोलबन्द होकर नीतीश कुमार की जीत में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है।

अचानक अब हर विश्लेषण और गिनती में अति पिछड़ों का हिसाब लगने लगा है जिनकी संख्या हर क्षेत्र में 15-16 फ़ीसदी से लेकर 30-35 फ़ीसदी तक है। काफ़ी सारे लोग इसकी गिनती इसी अन्दाज में करते हैं जैसे यह उसी तरह मोदी का वोटर है जैसे ब्राह्मण-बनिया या फिर सपा-बसपा-राजद के लिए यादव-मुसलमान और दलित।सो, अब बीजेपी की सारी उम्मीदें उस पट्टी में इस जमात से हों तो कोई हैरानी नहीं, जहाँ बीजेपी का स्टाइक रेट पिछली बार नब्बे फ़ीसदी से लेकर शत-प्रतिशत था।

बिहार, यूपी और झारखंड में गठबंधन तथा मध्य प्रदेश, राजस्थान और छतीसगढ़ में मिली हार के बाद हर तरफ़ बीजेपी और मोदी का क़द ‘कुछ कम’ होने की चर्चा है तो बंगाल और ओडिशा को छोड़कर लगभग हर राज्य में विपक्ष की सीटें बढ़ने का अनुमान लगाया जा रहा है।
पिछली बार अगर शरद पवार और मुलायम सिंह को ‘बिकाऊ’ मानकर इंडिया शाइनिंग का नारा देने वाले एक बार फिर अटल सरकार का नारा दे रहे थे तो इस बार भी नवीन पटनायक, जगन मोहन रेड्डी, मायावती और ममता बनर्जी के प्रति यह शक-शुबहा पैदा करने की कोशिश हो रही है। साम, दाम, दंड और भेद सब कुछ आजमाया जा रहा है और इसमें घटिया बयानों से लेकर हर संस्था का दुरुपयोग करने की कोशिश हो रही है। बंगाल में अगर बीजेपी केन्द्रीय बलों के ‘सहारे’ लोकतंत्र बचाने का नाटक कर रही है तो ममता राज्य की पुलिस और शासन के लोगों के बल से ऐसा कर रही हैं। और इसका नतीजा है कि बंगाल में चुनाव का कोई चरण बिना हिंसा के नहीं हुआ है।
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बीजेपी की असली दिक़्क़त है कार्यकर्ताओं की कमी या निराशा। संघ भी संभवत: बचकर खेलने लगा है। वह ख़ुद को मोदी की जय-पराजय से अलग दिखाना चाहता है। इसलिए इस बार पन्ना प्रमुख और अर्द्ध पन्ना प्रमुख जैसे नाटक नहीं चल रहे हैं बल्कि काफ़ी सारी जगहों पर तो कार्यकर्ता चुनाव बूथ की जगह चाय की दुकान पर दिख रहे हैं। ये भी वजहें हैं कि तीसरा फेज़ आते-आते मुद्दे तक बदलने लगे थे।

नरेन्द्र मोदी द्वारा पिछड़ा राग अलापना और भोपाल से आतंकी कार्रवाई में मुक़दमा और जेल झेलने वाली साध्वी प्रज्ञा ठाकुर को उतारना बता रहा है कि बीजेपी के लिए चुनावी चुनौती हल्की नहीं है। सिर्फ़ हल्की का मामला भी नहीं है, कहीं न कहीं पुलवामा और बालाकोट से माइलेज लेने की कोशिश भी ज़्यादा असर करती नहीं दिखती है। पर सब से घूम-फिर कर पार्टी फिर उसी के सहारे दिख रही है। माइलेज लेने का चौतरफ़ा प्रयास होते होते प्रधानमंत्री ने सीधे चुनावी भाषण में उस नाम पर वोट माँग लिया औऱ अयोध्या जाकर भी वह राम लला का दर्शन करने नहीं गए।

इस बदली लड़ाई में बीजेपी के उम्मीदवारों को मोदी जी के नाम के अलावा कोई सहारा दिखता नहीं लगता। अधिकांश बीजेपी सांसदों से काफ़ी नाराज़गी है और बीजेपी नेतृत्व ने भी उम्मीद के अनुसार ज़्यादा सांसदों को टिकट से बेदख़ल नहीं किया पर वे लड़ाई सिर्फ़ और सिर्फ़ मोदी के नाम पर लड़ रहे हैं और मतदाता भी उनकी नालायकी की चर्चा करते हुए अभी भी मोदी की काबिलियत पर भरोसा बनाए हुए हैं। लेकिन लगता है कि अब मोदी जी को उनका भरोसा नहीं रहा तभी ममता, मायावती और नवीन बाबू याद आने लगे, उनको पटाने के तरीक़े सूझने लगे और इसकी कोशिश शुरू हो गई है।
अरविंद मोहन
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