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TRP का दुष्चक्र-1: बाज़ार से आया टीआरपी का ‘राक्षस’

मुंबई पुलिस ने जब प्रेस कॉन्फ़्रेंस कर दावा किया कि उसने 'टीआरपी घोटाले' का भंडाफोड़ किया है और उसमें रिपब्लिक सहित तीन चैनलों के नाम लिए तो टीवी की दुनिया में हंगामा मच गया? सवाल उठा यह टीआरपी घोटाला क्या है? इसे किसने पैदा किया या मजबूरी क्या है? इसका क्या नुक़सान है? सत्य हिंदी इस विवाद पर एक शृंखला प्रकाशित कर रहा है। पेश है, इसकी पहली कड़ी।
मुकेश कुमार

पिछले डेढ़-दो दशकों से पत्रकारों और आम अवाम के बीच टीआरपी एक अति-निंदनीय शब्द बना हुआ है। हर मंच से, हर सभा-सेमिनार में और आम बातचीत में जब भी न्यूज़ चैनलों का ज़िक्र होता है, टीआरपी एक खलनायक की तरह उपस्थित हो जाती है। टीआरपी को एक दैत्य की तरह देखा जाता है, उसे टेलीविज़न की हर बुराई के लिए कोसा जाता है और कामना की जाती है कि इसका वध हो जाए तो दुनिया सुखद हो जाएगी।

लेकिन क्या ऐसा है, क्या सचमुच में टीआरपी ही वह राक्षस है जो टेलीविज़न की तमाम अच्छाइयों का भक्षण कर जाती है और उसके सिवा कोई दूसरा गुनहगार नहीं है?

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अगर हम ऐसा मानकर चल रहे हैं तो हम धोखे में जी रहे हैं। दरअसल, कुछ सतही जानकारियों के अलावा हम जानते ही नहीं हैं कि टीआरपी क्या है और वह क्यों है। हमने मान लिया है कि टीआरपी चैनलों की रेटिंग बताती है और विज्ञापनदाता उसके आधार पर विज्ञापन देने का फ़ैसला लेते हैं। चूँकि चैनलों की साँसें विज्ञापनों से चलती हैं इसलिए वे टीआरपी की होड़ में लगे रहते हैं और इसीलिए तमाम कीचड़ में गोते लगाने से परहेज नहीं करते। 

हाँ, मुनाफ़ाखोरी की बढ़ती लिप्सा या अपने कारोबार का आकार-प्रकार बढ़ाने की महत्वाकांक्षी योजनाएँ भी उन्हें इस ओर धकेलती हैं और वे सहर्ष इसे स्वीकार कर लेते हैं। उन्हें कोई वैचारिक या नैतिक परेशानी इसमें नहीं होती। वे इसके लिए लोकतंत्र, संविधान, नियम-क़ानून और पत्रकारिता की आचरण संहिता को धता बताने से भी परहेज़ नहीं करते।

इसके बावजूद यह अर्धसत्य है, तसवीर का एक छोटा सा हिस्सा भर है। अगर हमने अपने चिंतन को यहीं तक सीमित कर लिया तो हम कभी भी पूरी सचाई को नहीं जान पाएँगे। वास्तविकता यह है कि टीआरपी बाज़ार का एक औज़ार है, हथियार है जिसका इस्तेमाल करके वह टेलीविज़न के ज़रिए अपने उत्पादों का प्रचार-प्रसार ही नहीं करता, बल्कि उसके लिए अनुकूल वातावरण का निर्माण भी करता है। वह टीआरपी के ज़रिए अपने बाज़ार की खोज भी करता है और उसका निर्माण भी। 

यानी बात इतनी सीधी सी नहीं रह जाती है कि टीवी चैनल विज्ञापनदाताओं को समय बेचते हैं और उसके एवज़ में उन्हें धनराशि मिलती है। इस रिश्ते में ऊपरी तौर पर दिखलाई देने वाले इस आर्थिक लेन-देन के भीतर कई परतें होती हैं, जो हमें और भी कई चीज़ों के बारे में बताती हैं।

अगर आप टीआरपी नापने के लिए बनाए गए मानकों का अध्ययन करें तो यह बात समझ में आ जाएगी। टीआरपी नापने के लिए बार-ओ-मीटर या पीपुल्स मीटर का इस्तेमाल किया जाता है। ये मीटर लगाने के लिए घरों का चयन कुछ आधार पर किया जाता है। एक तो मोटे-मोटे सामाजिक आधार मसलन, उम्र, लिंग, शिक्षा वगैरह होते हैं। दूसरे, आर्थिक पैमाने होते हैं, जिनमें घरों की आर्थिक हैसियत देखी जाती है। उदाहरण के लिए उसकी आय कितनी है, वह टू व्हीलर, फोर व्हीलर, एसी, फ्रिज आदि क्या-क्या इस्तेमाल करता है। इससे उसकी क्रय शक्ति का अंदाज़ा मिल जाता है। इन आधारों पर दर्शकों की श्रेणियाँ बना ली जाती हैं और फिर एक विशेष अनुपात में पैनल होम का निर्धारण कर लिया जाता है। 

विज्ञापनदाताओं की भूमिका

बेशक इन पैनल होम में उच्च वर्ग, उच्च मध्यवर्ग, मध्यवर्ग, निम्न मध्यवर्ग सभी की हिस्सेदारी होती है। मगर यह समझना मुश्किल नहीं है कि विज्ञापनदाताओं की दिलचस्पी किनमें होती है और वे किन्हें टारगेट करके अपना विज्ञापन बनाते हैं और फिर उन्हीं चैनलों में दिखाते हैं जिनमें उनके खरीदार मिलेंगे। महँगे प्रोडक्ट वाले विज्ञापनदाता उन चैनलों पर नहीं जाएँगे जिन्हें कमज़ोर आर्थिक वर्ग के लोग देखते हों, भले ही उनकी लोकप्रियता कितनी ही क्यों न हो। 

ज़ाहिर है कि महँगे प्रोडक्ट के विज्ञापनदाता विज्ञापनों की अच्छी दरें देने को तैयार होते हैं बशर्ते उन्हें उनके मन मुताबिक़ दर्शक मिलें। ऐसे में सभी चैनल उन्हीं दर्शकों को लुभाने में जुट जाते हैं और इसके लिए उन्हीं की रुचियों के हिसाब से कंटेंट बनने लगता है। वे फिर किसानों-मज़दूरों की परवाह नहीं करते, ग्रामीण इलाक़ों में रहने वालों की चिंता नहीं करते। इस तरह वे विज्ञापनदाताओं को उनकी ज़रूरत के हिसाब से बाज़ार तलाश कर देते हैं। 

अब बाज़ार टीआरपी का इस्तेमाल करके मीडिया के ज़रिए दर्शकों की मानसिकता को कैसे बदलते हैं, इस पर ग़ौर करें। बाज़ार के लिए इतना ही काफी नहीं है कि उन्हें उनके उपभोक्ता उपलब्ध हो जाएँ, वह ये भी चाहते हैं कि चैनल ऐसा वातावरण बनाएँ जिसमें वे खरीदारी करने के बारे में सोचें यानी कंटेंट में सकारात्मकता भरी होनी चाहिए। 

कुछ समय पहले फील गुड फैक्टर आया था और पूरा मीडिया जगत इसको लेकर पगलाया हुआ था। यह फील गुड दरअसल विज्ञापन जगत की ही देन थी।

विज्ञापन जगत का कहना था कि नकारात्मक ख़बरों और कार्यक्रमों से दर्शकों एवं पाठकों का मन खरीदारी से उचटता है इसलिए फील गुड चीज़ें प्रस्तुत कीजिए। लिहाज़ा चैनल उनके इस निर्देश का पालन करने में जुट गए।

उन्होंने ग़रीबी, बेरोज़गारी, किसानों की आत्महत्याएँ, आर्थिक पतन, अपराध और इसी तरह की ख़बरों को बाहर का रास्ता दिखाना शुरू कर दिया। चैनलों पर विलासितापूर्ण जीवन की तसवीरें छाने लगीं। हर जगह सफलता की कहानियों की बाढ़ आ गई। एंकर-रिपोर्टर और भी चॉकलेटी, जवान, ख़ूबसूरत रखे जाने लगे। मनोरंजन हर ओर छा गया। गंभीर ख़बरों को भी कैसे मनोरंजक बनाकर दिखाया जा सकता है उसके हथकंडे खोज लिए गए। सिनेमा, क्रिकेट, क्राइम, सेलेब्रिटी और कंट्रोवर्सी (स्कैंडल) का पाँच सी वाला फ़ॉर्मूला छा गया। इस फील गुड की मार साहित्य, संस्कृति और कलाओं पर भी पड़ी। वे या तो मनोरंजन के लिए ही परदे पर दिखते थे या फिर पुरस्कार, निधन जैसी किसी बड़ी घटना के मौक़े पर।

वीडियो में आशुतोष से समझिए टीवी रेटिंग में गड़बड़ी को

आर्थिक उदारवाद की रुचि

यह पूरा दर्शन आर्थिक उदारवाद का था जो बाज़ार मीडिया के ज़रिए फैला रहा था। वह इस उपभोगवादी, विलासी जीवन को प्रचारित कर रहा था ताकि एक ऐसा समाज बने जिसे अपने सुख के अलावा किसी की चिंता न हो, जो आत्मकेंद्रित हो, वैभव और विलासिता की अपनी दुनिया में जिए। उदारवाद ने बीस करोड़ का मध्यवर्ग बनाकर बड़े बाज़ार का लक्ष्य जल्दी ही हासिल कर लिया। उसने उन्हें नागरिक से उपभोक्ता में तब्दील कर दिया, उनकी नागरिक चेतना को कुंद करके, उनका मानसिक परिवर्तन करके बाज़ार का शिकार बना दिया। और फिर इसी उपभोक्ता वर्ग के लिए हमारे चैनल कंटेंट बनाने लगे। इसी वर्ग के सुख-दुख चैनलों के लिए कंटेंट निर्माण के पैमाने बन गए। इसी वर्ग की टीआरपी चैनलों के लिए महत्व रखती है। 

मीडिया विशेषज्ञ मैक्वेल की एक थ्योरी है जिसके अनुसार चैनल विज्ञापनदाताओं को दर्शक बेचते हैं, ख़ास तरह के दर्शक बड़ी संख्या में उपलब्ध करवाकर कहते हैं हम आपको विज्ञापन के एवज़ में इन्हें परोस सकते हैं। उनका यह दावा टीआरपी के ज़रिए पुष्ट किया जाता है और फिर तय किया जाता है कि उन्हें कितने और किस क़ीमत पर विज्ञापन दिए जाएँ।

स्पष्ट है कि जो न्यूज़ कंटेंट हम देख रहे हैं वह बाज़ारवाद की कोख से जन्मा है और ये उसके डीएनए में लिखा हुआ है। बाज़ार ने टीआरपी का इस्तेमाल इस कंटेंट का डीएनए तैयार करने के लिए किया है बस। इसलिए अगर मीडिया और ख़ास तौर पर न्यूज़ चैनलों का चरित्र देखना-समझना है तो टीआरपी के पीछे जो ताक़तें खड़ी हैं उनकी शिनाख़्त कीजिए, उनसे लड़िए, वर्ना आपकी लड़ाई कहीं पहुँचेगी नहीं। 

(लेखक ने टीआरपी और टेलीविज़न के संबंधों पर डॉक्टरेट की है। इस विषय पर उनकी क़िताब टीआरपी, टेलीविज़न न्यूज़ और बाज़ार काफ़ी चर्चित रही है।)

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