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पड़ोसी जिनकी मौत कोरोना से हुई, वे जासूसों के हेड थे

उन्हें आतंकवादियों के ख़िलाफ़ जासूसी नेटवर्क तैयार करने और उनकी पहचान करने में माहिर माना जाता था। फ़ुर्सत के समय वो अपना संस्मरण बड़े चाव से सुनते थे। वह कई बार यह भी बताते थे कि किन बड़े आतंकवादी नेताओं को आईबी की सूचना के आधार पर गिरफ़्तार किया गया या फिर वो मुठभेर में मारे गए। हर बार याद दिलाते थे कि कुछ भी लिखना या छापना नहीं। आईबी का काम हमेशा गुप्त रहता है।
शैलेश

नब्बे के दशक की बात है। कश्मीर में आतंकवाद बड़ी तेज़ी से बढ़ रहा था। पाकिस्तान ने बड़ी संख्या आतंकवादियों को आधुनिक हथियारों के साथ घुसपैठ करा दिया था। इनमें काफ़ी संख्या में तालिबान और पाकिस्तान के दूसरे आतंकवादी समूहों से जुड़े हुए थे, जिन्हें अफगानिस्तान में कम्युनिस्ट सेना से लड़ने के लिए सैनिकों की तरह प्रशिक्षित किया गया था। विदेशी आतंकवादी गुरिल्ला युद्ध में पारंगत थे। 1989 में अफगानिस्तान से सोवियत सेना की वापसी के बाद उनका मनोबल काफ़ी बढ़ा हुआ था।

पाकिस्तानी सेना के सहयोग से वे कश्मीर में घुस आए थे और स्थानीय आतंकवादी और अलगाववादी गुटों के सहयोग से उन्होंने कश्मीर पर क़ब्ज़ा करने की कोशिश शुरू कर दी थी। भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती थी पाकिस्तानी आतंकवादियों की पहचान करके उन्हें ख़त्म करना। यह काम आसान नहीं था क्योंकि पाकिस्तानी आतंकवादी आम जनता में घुल मिल गए थे और उन्हें स्थानीय लोगों का समर्थन मिल रहा था।

आतंकवादी कमान्डरों का सफ़ाया

विदेशी आतंकवादियों की पहचान की ज़िम्मेदारी मुख्य तौर पर इंटेलिजेन्स ब्युरो (आईबी ) पर थी। इसी दौर में कश्मीर में आईबी के प्रमुख के रूप में जे. एन. राय को तैनात किया गया। राय ने पाकिस्तानी आतंकवादियों की पहचान के लिए जासूसी का एक बड़ा नेटवर्क तैयार किया, जिसमें आईबी के जासूसों के अलावा स्थानीय राष्ट्रवादी लोगों को भी शामिल किया गया। 

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बहुत जल्दी ही आतंकवादियों की पहचान शुरू हो गयी। सेना और पुलिस ने उनका सफ़ाया शुरू कर दिया। इसी दौर में पाकिस्तान में प्रशिक्षित कई ख़ूँख़ार आतंकवादी कमांडर मारे गए। धीरे धीरे आतंकवाद के पहले दौर पर क़ाबू शुरू हो गया। जे. एन. राय के काम की हर जगह सराहना की गयी। 

राय ने इसी तरह का इंटेलिजेन्स नेटवर्क उत्तर पूर्व के राज्यों में भी तैयार किया था। उन्हें आतंकवादियों के ख़िलाफ़ जासूसी नेटवर्क तैयार करने और उनकी पहचान करने में माहिर माना जाता था। फ़ुर्सत के समय वो अपना संस्मरण बड़े चाव से सुनते थे।

वह कई बार यह भी बताते थे कि किन बड़े आतंकवादी नेताओं को आईबी की सूचना के आधार पर गिरफ़्तार किया गया या फिर वो मुठभेर में मारे गए। हर बार याद दिलाते थे कि कुछ भी लिखना या छापना नहीं। आईबी का काम हमेशा गुप्त रहता है। इसलिए उनके जाने के बाद भी मैं बहुत सी बातें लिख नहीं सकता।

आईबी में तैनाती

मूल रूप से उत्तर प्रदेश के ग़ाज़ीपुर के निवासी राय साहब मध्य प्रदेश कैडर के 1960 बैच के आईपीएस अधिकारी थे। लेकिन मध्य प्रदेश में उन्होंने बहुत कम काम किया। युवा अवस्था में ही उन्हें आईबी में तैनात कर दिया गया। और फिर वे आईबी के ही होकर रह गए। नौकरी के आख़िरी दिनों में उन्हें नागरिक उड्डयन सुरक्षा का महानिदेशक बनाया गया।

रिटायर होने के बाद कुछ समय तक वो गृह मंत्रालय के सलाहकार भी रहे। उनके मित्र और सीबीआई के पूर्व संयुक्त निदेशक एन के सिंह बताते हैं कि राय साहब एक शानदार अधिकारी थे। कश्मीर में आतंकवाद के पहले उभार को ख़त्म करने में उन्होंने यादगार काम किया।

रणनीति के विश्लेषण में महारत

जे. एन. राय के जीवन का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू भी था। वह उच्च कोटि के रणनीतिक विश्लेशक ( स्ट्रेटेजिक ऐनलिस्ट) थे। उन्हें एक बड़ा थिंक टैंक माना जाता था। भारत - मध्य एशिया फ़ाउंडेशन के संस्थापक सदस्यों में वो भी शामिल थे। ये संगठन एक थिंक टैंक है जो भारत और मध्य एशिया के देशों जैसे कजाकस्तान, तजिकिस्तान, उज़बेकिस्तान और इस क्षेत्र के अन्य देशों के साथ सम्बंधों पर नज़र रखता है।

आस्था भारती नाम के एक एनजीओ से वे 1999 से ही जुड़े हुए थे। ये भी एक थिंक टैंक है जो ख़ास तौर पर पूर्वोत्तर भारत की गतिविधियों पर नज़र रखता है। ये संगठन दो वैचारिक पत्रिकाएँ छापता है। ये हैं अंग्रेज़ी में डायलाँग और हिंदी में "चिन्तन -सृजन" ।

आस्था भारती का रजिस्टर्ड ऑफ़िस जे. एन. राय का निवास स्थान है और पड़ोस में ही एक किराए के मकान में दोनों पत्रिकाओं का संपादकीय कार्यालय है। राय साहब आस्था भारती के संस्थापक सदस्य, कोषाध्यक्ष, डायलॉग के सलाहकार संपादक और पत्रिकाओं के प्रकाशक भी थे। जहाँ तक याद है 2002/ 2003 में राय साहब से मेरी मुलाक़ात हुई। तब से ये दोनों पत्रिकाएँ लगातार मुझे मिलती रहीं।

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पत्रिकाओं के संपादक बी. बी. कुमार हैं, लेकिन राय साहब संपादकीय विभाग से लगातार जुड़े रहे। इनमें साहित्य समीक्षा और आलोचना, इतिहास समालोचना, स्त्री विमर्स और आध्यात्म से लेकर समसामयिक विषयों पर प्रकाशित खोजपूर्ण लेख समाज को एक नयी दृष्टि देते हैं। राय साहब के एक अन्य मित्र और 'न्यूयॉर्क टाइम्स' के रिपोर्टर हरि कुमार याद करते हैं कि राय साहब में घटनाओं के विश्लेषण की अदभुत क्षमता थी।

कहाँ चूक हुई?

राय साहब की उम्र 80 साल से ज़्यादा थी लेकिन अब भी वो पूरी तरह से सक्रिय थे। उनके सहायक ने बताया कि मई के शुरू में उन्हें तेज़ खाँसी होने लगी तो उन्होंने परिवार के सात सदस्यों का दिल्ली के एक नामी अस्पताल से आरटी - पीसीआर टेस्ट कराया।

अस्पताल ने सभी लोगों की रिपोर्ट निगेटिव बताया। राय साहब और उनकी पत्नी को खाँसी हो रही थी इसलिए उन्होंने रिपोर्ट पर विश्वास नहीं किया और दोबारे जाँच के लिए कहा। इस बार उन्हें, उनकी पत्नी और एक अन्य सदस्य को पॉज़िटिव बताया गया। 3 मई को वो अस्पताल में भर्ती हो गए लेकिन उन्हें बचाया नहीं जा सका। जाँच की लंबी प्रक्रिया के बीच संभवतः उनकी बीमारी काफ़ी बढ़ गयी थी।

उनकी पत्नी जो बहुत छोटे बच्चों के लिए स्कूल चलाती थीं, अब भी अस्पताल में हैं। राय साहब के दो पुत्र हैं।

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