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उप सभापति महोदय! आप ग़लत थे, सही होते तो चाय की ज़रूरत नहीं थी!

भारत सहित दुनिया के केन्द्रीय विधायिकाओं में एक परम्परा रही है कि अगर बिल पर एक भी सदस्य ने मतदान के अवसर पर हाथ खड़ा कर आवाज दे कर 'लॉबी डिवीज़न' यानी स्पष्ट मतदान की मांग की है तो पीठासीन अधिकारी को उसे मानना पड़ता है। पिछले कुछ सालों में उत्तराखंड जैसे कुछ राज्य विधायिकाओं में स्पीकरों ने अविश्वास प्रस्ताव के दौरान इसकी खुली अनदेखी की, पर संसद के सदनों में इसे संसदीय आचार के खिलाफ माना गया।
एन.के. सिंह

जब राज्यसभा के उप सभापति हरिवंश धरने पर बैठे सदन के निलम्बित सदस्यों को समझाने स्वयं चाय ले कर गए तो देश के सभी प्रजातांत्रिक संस्थाओं में अटूट विश्वास रखने वालों को अच्छा लगा। उनमें गांधीवादी 'अशत्रुता' और गीता का 'रागद्वेषविमुक्ति' का भाव दिखा। लेकिन तर्क की एक सबसे बड़ी कमज़ोरी है कि शब्दों के मायने सन्दर्भ-स्वच्छंद नहीं होते, लिहाज़ा सत्य की खोज के लिए तर्क-वाक्यों को हमेशा संभाषण के सभी तत्कालीन सन्दर्भों (यूनिवर्स ऑफ़ डिस्कोर्स) में देखा जाना चाहिए। सेलेक्टिव अप्रोप्रिएशन ऑफ़ फैक्ट्स से तर्क-वाक्य बनाना दोष माना जाता है।    
भारत सहित दुनिया के केन्द्रीय विधायिकाओं में एक परम्परा रही है कि अगर बिल पर एक भी सदस्य ने मतदान के अवसर पर हाथ खड़ा कर आवाज दे कर 'लॉबी डिवीज़न' यानी स्पष्ट मतदान की मांग की है तो पीठासीन अधिकारी को उसे मानना पड़ता है। पिछले कुछ सालों में उत्तराखंड जैसे कुछ राज्य विधायिकाओं में स्पीकरों ने अविश्वास प्रस्ताव के दौरान इसकी खुली अनदेखी की, पर संसद के सदनों में इसे संसदीय आचार के ख़िलाफ़ माना गया।
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सदन में क्या हुआ था?

लेकिन इस बार राज्यसभा में भी ऐसा ही कुछ देखने को मिला। पहले तर्क दिया गया कि सदस्य अपनी सीटों पर नहीं थे (मांग करने के लिए सीट से आवाज देना होता है) पर उस समय का वीडियो साफ़ दिखा रहा है कि डिवीज़न यानी मतदान की मांग करने वाले तीनों सदस्य तिरुची शिवा, रागेश और डेरेक ओ ब्रायन अपनी सीट पर थे। 'तीन दशक तक संसद में रहने के बाद यह आधारभूत तथ्य हम सब जानते हैं', इनमें से एक सदस्य ने कहा। 

आक्रोश तब शुरू हुआ जब इन मांगों की अनदेखी कर दोनों विधेयकों को ध्वनि-मत से पारित करने की प्रक्रिया जारी रखी गयी। तर्क-ब्लाक में से अगर एक भी वाक्य ग़लत होता है तो पूरा ब्लाक ही ग़लत मान लिया जाता है। बहरहाल जब मीडिया के एक भाग ने उप-सभापति का पहला तर्क ग़लत क़रार दिया और काउंटर (टाइम) और मांग के समय उनकी सीट पर मौजूदगी दिखाते हुए तसवीर छापी तो अगले दिन उप-सभापति ने एक वक्तव्य में कहा कि डिवीज़न (वोटिंग) करने के लिए दो स्थितियाँ अपरिहार्य हैं –पहला, सदस्य द्वारा इसकी मांग और दूसरा व्यवस्थित सदन। वक्तव्य में कहा गया कि तिरुची की मांग से पहले ही कुछ सदस्य रूल-बुक फाड़ते हुए आसन तक पहुँच गए जो कि अव्यवस्था का चरम था। 

उप सभापति ने क्या किया?

यहाँ प्रश्न है पीठासीन-अधिकारी की भूमिका क्या होती है? सदन सुचारू रूप से चलाना और उसके लिए सहयोग का वातावरण तैयार करना या जब अव्यवस्था हो तभी ध्वनि मत से इतने गंभीर बिल पास करा लेना?अगर पहले अव्यवस्था हुई तो उसे बेहतर करने का क्या प्रयास पीठासीन अधिकारी द्वारा किया गया और अगर मत-विभाजन की मांग सुनने के बाद हुआ तो सदन को व्यवस्थित करने के क्या उपक्रम हुए? 
ऐसे समय सदन को आर्डर में लाना ज़रूरी था या मांग अनसुनी कर अव्यवस्था के नाम पर एक गंभीर मुद्दे पर बिल ध्वनि- मत से पारित घोषित करना?
क्या प्रजातंत्र और संसदीय व्यवस्था में यह उचित नहीं होता कि ऐसे गंभीर विषय पर विपक्ष की मांग मानते हुए बिल को संसद की सेलेक्ट समिति को भेज दिया जाता? साथ ही अगर अव्यवस्था के कारण एक परम्परा (मांग हो तो मतदान कराने की) टूट रही है तो अव्यवस्था दूर करने के प्रयास होने चाहिए या फौरी तौर पर गरिमामय सदन की परम्परा ही ताक पर रख देना चाहिए। तर्क तब सबसे कमज़ोर माना जाता है जब अकाट्य तर्क-वाक्यों की जगह भावना का सहारा लिया जाता है। 

अविश्वास प्रस्ताव ख़ारिज  

सदन के उपसभापति के ख़िलाफ़ विपक्ष का अविश्वास प्रस्ताव यह कह कर ख़ारिज करना कि 14 दिनों का नोटिस नहीं दिया गया, भी उतना ही अतार्किक था। प्रक्रियात्मक त्रुटि के आधार पर इसे ख़ारिज करना, एक विवादस्पद फ़ैसला था। यह प्रस्ताव तो मात्र आवेदन के रूप में था, जो नोटिस तो स्वीकार होने का बाद बनता। 

तब दो प्रश्न उठते- 14 दिन के नोटिस के रूप में इसे लेने का और दूसरा तब तक उप सभापति को सदन के संचालन से वंचित करने की परम्परा और नियम का। विपक्ष का कहना है कि अविश्वास प्रस्ताव इस आधार पर तत्काल ख़ारिज नहीं किया जा सकता कि सदन स्वयं इसके पहले सत्रावसान में जा रहा है। जहाँ तक दूसरा प्रश्न है, इसके स्वीकार किये जाने के बाद उप सभापति सदन के पीठासीन अधिकारी के रूप में सत्रावसान तक भाग नहीं ले सकते थे। 

अविश्वास प्रस्ताव का मतलब!

इसे और गहराई से सोचें। किसी पीठासीन अधिकारी या सरकार के अविश्वास प्रस्ताव का क्या मतलब होता है? इसे इसलिए संसदीय प्रक्रिया में बड़ा मकाम दिया गया है कि किसी सदन का उस व्यक्ति या सरकार पर उसके किसी कार्य- या नीति-विशेष के कारण विश्वास ख़त्म हो गया है।
इसका मतलब तो यह हुआ कि सदन में अगर सत्रावसान के 14 दिन के बीच कोई पीठासीन अधिकारी या सरकार चाहे कुछ भी करे, अविश्वास प्रस्ताव महज इसलिए ख़ारिज हो जाएगा कि यह प्रस्ताव सत्रावसान के 14 दिन पहले नहीं दिया गया लिहाज़ा वह स्वतः 'निष्फल' (इन्फ्रक्चुअस) हो जाएगा।
उसी तरह अगर सदस्य निश्चित सीट पर नहीं था तो उसके लिए प्रस्ताव ग्रहण कर सदस्यों से अपनी जगह पर बैठने का आग्रह किया जा सकता था।
आइंस्टीन ने जब सापेक्षतावाद का सिद्धांत (थ्योरी ऑफ़ रिलेटिविटी) प्रतिपादित किया तो दुनिया के 100 वैज्ञानिकों ने उस सिद्धांत को ग़लत क़रार देते हुए एक बुकलेट निकाला जिसका शीर्षक था 'हंड्रेड अगेंस्ट आइंस्टीन'। इस पर आइंस्टीन की टिप्पणी थी 'अगर मैं गलत हूँ तो क्या एक से काम नहीं चलता'?

चाय, सत्याग्रह, सभापति और  राष्ट्रपति को अपने 'आहत' होने का पत्र और प्रधानमंत्री सहित विश्लेषकों के बीच सकारात्मक 'छवि' की ज़रूरत ही नहीं थी, अगर फ़ैसला तर्क-सम्मत होता।      

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