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अमित शाह की मान लें तो पूरी दुनिया से ख़त्म हो जाएगा आतंकवाद?

इंटरनेट और सोशल मीडिया के प्रसार के कारण आतंकवाद आज वैश्विक आयाम ले चुका है। सीरिया में बैठा आईएसआईएस केरल के युवकों को प्रभावित कर रहा है तो दुबई में बैठा पाकिस्तानी आईएसआई का हैंडलर भारत सहित दुनिया के किसी भी कोने में धमाका करा सकता है। ऐसे में क्या एक मज़बूत केंद्रीय एजेंसी की ज़रूरत नहीं है?
एन.के. सिंह

लोकसभा में एनआईए क़ानून पेश करते हुए गृहमंत्री अमित शाह ने कहा कि अगर पोटा क़ानून ख़त्म न किया गया होता तो मुंबई हमला भी न होता। गृहमंत्री नए हैं और शायद आतंकवाद की प्रकृति, बदलते आयाम और भारत की अन्य एजेंसियों और संस्थाओं जैसे न्यायपालिका, कार्यपालिका और संविधान के संघीय ढाँचे के बारे में अभी पूरी तरह वाक़िफ़ नहीं हैं। महज क़ानून बनाने से अगर दुनिया की इतनी बड़ी समस्या पर काबू हो सकता तो क़रीब 45 देश जो इस दंश को झेल रहे हैं, कब से मुक्ति पा चुके होते।

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एक गणना के अनुसार विश्व में कोई तीन करोड़ तीस लाख क़ानून हैं लेकिन न तो बलात्कार की घटनाएँ रुकी हैं और न ही हत्याएँ कम हुई हैं। पोटा के पहले का क़ानून टाडा भी यही कह कर ख़त्म किया गया था। हक़ीक़त यह है कि टाडा के तहत अपराधियों को सज़ा दिलाने की दर 5 फ़ीसदी भी नहीं है। दरअसल, ग़लती पुलिस की नहीं, बल्कि अभियोजन की गुणवत्ता की थी क्योंकि राज्यों की पुलिस एक ऐसे अपराध को रोकने या उसकी जाँच करने में सक्षम नहीं थी जिसका आयाम वैश्विक हो, जिसका जनक किसी शत्रु देश में बैठा हो और जो आतंकवाद के तरीक़े को लगातार बदल रहा हो। आज जब साइबर, इंटरनेट और फ़ेसबुक मैसेंजर से सीरिया में बैठा आईएसआईएस केरल के युवकों को गुमराह कर रहा हो और इंडॉक्ट्रिनेशन (धार्मिक उन्माद) पैदा करने के लिए किसी धार्मिक स्थल का नहीं नेट का इस्तेमाल कर रहा हो, इस पर प्रभावी अंकुश लगाना मुश्किल होता है।

आतंकवाद की समस्या चीन में नहीं हो सकती, पाकिस्तान में नहीं हो सकती (अगर वहाँ इच्छा शक्ति हो), यहाँ तक कि अमेरिका में भी नहीं हो सकती, लेकिन भारत इसके लिए फ़िलहाल सबसे उपजाऊ ज़मीन हो सकती है। उदार प्रजातंत्र, संविधान में तत्कालीन परिस्थितियों को साधने की मजबूरी में किये गए समझौते, निम्न सामाजिक चेतना, अभेद्य ग़रीबी, तर्क-शक्ति और वैज्ञानिक सोच का आदतन अभाव और धार्मिक और जातिगत आधार पर ज़बरदस्त पारस्परिक सामाजिक दुराव। पुलवामा में फिदायीन हमले में कई चीज़ें नई थीं। मसलन, पुलवामा में पहली बार पुलवामा के ही एक कश्मीरी फिदायीन ने इसे अंजाम दिया, आरडीएक्स की बड़ी मात्रा के साथ आईईडी विस्फोटक तैयार कर फिदायीन हमला किया। साथ ही फिदायीन ने सॉफ्ट टारगेट यानी भीड़ वाला बाज़ार या ट्रेन न होकर अर्ध-सैनिक बल के जवानों से भरी बसों के क़ाफ़िले को चुना। कल्पना कीजिए अगर यह हमला दिल्ली के भीड़ वाले रेलवे स्टेशन, कनाट प्लेस में या त्यौहार के दिन हुआ होता तो क्या स्थिति होती? 

पुलवामा हमले के बाद यह कहा जा सकता है कि पाकिस्तान की ‘फ़ौजी’ ख़ुफ़िया एजेंसी आईएसआई का भारत में उपद्रव का यह पाँचवाँ और शायद सबसे ख़तरनाक चरण है।

पाक आतंकियों का बदलता रूप

पहला चरण 1980 के दशक में ‘पिटीपीएम’ यानी पाक-ट्रेंड-पाक-मिलिटेंट (पाकिस्तान में ही प्रशिक्षित पाकिस्तानी उग्रवादी) का था लेकिन जब भारत में वह घटना करता था और अगर पकड़ा जाता था तो पाकिस्तान की दुनिया में किरकिरी होती थी। लिहाज़ा नब्बे के दशक तक आते-आते पीटीआईएम यानी पाक-ट्रेंड-इंडियन-मिलिटेंट (भारतीय आतंकवादी जिसकी ट्रेनिंग पाकिस्तान में हुई) का सिलसिला शुरू हुआ। लेकिन इसमें भी पाकिस्तान को तब दिक़्क़त होती थी जब पकड़े जाने पर वह यह कबूल करता था कि उसकी ट्रेनिंग किसने और पाकिस्तान के किस ट्रेनिंग कैंप या शहर में दी थी। तीसरा चरण सन 2000 से ‘स्लीपर सेल्स’ का था जिसमें तीन-से पाँच सदस्य होते थे जो भारत के नागरिक थे और उसे कभी-कभी अचानक किसी एक कार्य के लिए आदेश मिलता था। मसलन, केरल के किसी सेल को आदेश होता था- उत्तर भारत के अमुक शहर में किसी धर्मस्थल के पास रात में कोई कटा जानवर रखने का ताकि सुबह उस धर्मस्थल के अनुयायिओं में आक्रोश पैदा हो। इस सेल का काम बस इतना ही था। अगला स्लीपर सेल जो हज़ारों किलोमीटर में था और उनको आदेश होता था- अमुक धार्मिक स्थल के बगल के मोहल्ले या आसपास के शहर में किसी समुदाय विशेष के संभ्रांत व्यक्ति को गोली मार देना या किसी धर्म के ख़िलाफ़ आग उगलने वाले मजमून की पर्चियाँ बाँटना। तीसरे सेल से उसी दिन किसी परम्परागत उपद्रव वाले मोहल्ले में हथियार की सप्लाई करना। जब अदालत में केस जाता था तो अलग-अलग शहरों में अलग-अलग जज मामले को देखते थे और अगर केरल का स्लीपर सेल पकड़ा भी गया तो जज को यह समझ में नहीं आता था कि केरल के किसी इदरीस ने मेरठ के दीनदयाल को क्यों मारा। लिहाज़ा आतंक की घटनाओं में सज़ा की दर काफ़ी गिर जाती थी। आरोप लगता था कि पुलिस सांप्रदायिक विद्वेष से ग़लत लोगों को फंसाती है। टाडा क़ानून ख़त्म करने के पीछे यही कारण था।

‘होम ग्रोन टेररिज़्म’ का दौर

चौथा चरण आईएसआई का था ‘होम ग्रोन टेररिज़्म’ का यानी भारत में ही आतंकवादियों की पौध तैयार करना उन्हें आर्थिक और हथियार की मदद देकर। अब उनके प्रशिक्षण की जगह भी पाकिस्तान न होकर नेपाल और बांग्लादेश कर दी गयी। अगर आतंकी पकड़ा भी गया तो पाकिस्तान किसी आरोप से साफ़ बच जाता था यह कह कर कि आतंकी भारत का, ट्रेनिंग किसी ग़ैर-मुल्क़ में, लिहाज़ा भारत झूठे आरोप लगा रहा है। कश्मीर में पूर्व में कुछ आत्मघाती हमले हुए लेकिन फिदायीन अफ़ग़ानिस्तान या उत्तर वजीरिस्तान और फाटा (फेडरली एडमिनिस्टर्ड ट्राइबल एरियाज) क्षेत्र में तैयार किये जाते थे जहाँ यह कुटीर उद्योग की मानिंद है और जहाँ से फिदायीन और आत्मघाती जैकेट कुछ लाख रुपये में मिल जाते हैं।

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इंटरनेट के दौर में वैश्विक आतंकवाद

इंटरनेट और सोशल मीडिया के प्रसार के कारण आतंकवाद आज वैश्विक आयाम ले चुका है। सीरिया में बैठा आईएसआईएस केरल के युवकों को प्रभावित कर रहा है तो दुबई में बैठा पाकिस्तानी आईएसआई का हैंडलर भारत सहित दुनिया के किसी भी कोने में धमाका करा सकता है। ऐसे में भारत की कम से कम एक एजेंसी को पूरी तरह सशक्त करना ज़रूरी बनता जा रहा है। लोकसभा में नेशनल इन्वेस्टिगेशन एजेंसी (एनआईए) क़ानून में संशोधन पारित करने में लगभग सभी दलों की सहमति इस आसन्न संकट के प्रति राजनीतिक दलों की संवेदनशीलता दिखाता है। राज्यसभा में भी यही संवेदनशीलता दिखी और साथ ही राज्य की सरकारें भी संविधान के संघीय ढाँचे की दुहाई दे कर इसे अपने अधिकारों का हनन या एजेंसी पर केंद्र के इशारे पर मनमानी करने का आरोप लगाकर विरोध नहीं की तो यह बिल क़ानून बन जाएगा।

आतंकवाद के नए आयामों की समझ रखने वाले यह जानते हैं कि अभी तक यह केन्द्रीय एजेंसी अपेक्षित क्षमता नहीं विकसित कर पाई है, भले ही यह कुछ राज्यों की सक्षम एजेंसियों का इनपुट लेकर श्रेय ले लेती हो।

तेलंगाना की एसआईटी सीमित साधनों के बावजूद साइबर ट्रैकिंग और भारत में आतंकवादियों की नयी पौध पर लगातार नज़र बनाये हुए है। दरअसल, यह काम इस केन्द्रीय एजेंसी को करना था। विदेश में भी जाँच करने और साइबर आतंकवाद, विस्फोटक पदार्थ क़ानून, परमाणु-ऊर्जा क़ानून के तहत जाँच करने के अधिकार मिलने से इसके कार्य क्षेत्र का विस्तार होगा। बेहतर होता कि इज़रायल की मोसाद जैसी उत्कृष्ट ख़ुफ़िया एजेंसियों से भी यह कुछ प्रशिक्षण हासिल करे।

एक उदार प्रजातंत्र में बगैर जन-संचरण ही नहीं, मौलिक अधिकारों को सख़्ती से बाधित किये बिना इस नयी समस्या से जूझना सुरक्षा बलों और ख़ुफ़िया एजेंसियों के लिए नयी चुनौती होगी। भूलना न होगा कि 9/11 की घटना के बाद अमेरिकी सरकार ने होमलैंड सिक्योरिटी एक्ट बनाया जिसके तहत किसी भी नागरिक की निजता पुलिस चाहे तो भंग कर सकती है लेकिन किसी एक नागरिक ने भी चूँ तक नहीं किया था। क्या भारत में भी ऐसा होगा?

एन.के. सिंह
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