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अमित शाह (फ़ाइल फ़ोटो)

एनआरसी पर दहाड़ने वाले अमित शाह एनपीआर पर आख़िर क्यों झुके?

पूरे देश में एनआरसी लागू करने की बात कहकर दहाड़ने वाले गृह मंत्री अमित शाह अब नेशनल पॉपुलेशन रजिस्टर यानी एनपीआर पर क्यों झुक गए हैं? आख़िर संसद में उन्हें क्यों यह कहना पड़ा कि एनपीआर के लिए न तो किसी को कोई काग़ज़ दिखाने की ज़रूरत होगी और न ही किसी को संदिग्ध (डाउटफ़ुल या 'डी') श्रेणी में रखा जाएगा? क्या सरकार पर आम लोगों का दबाव है? क्या बीजेपी के ही सहयोगी दलों के विरोध का नतीजा है या इस मामले में मोदी-शाह की जोड़ी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बढ़ते दबाव को झेल नहीं पा रही है?

इन सवालों के जवाब तब आसानी से मिल जाएँगे जब नागरिकता क़ानून यानी सीएए, राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर यानी एनआरसी व एनपीआर के ख़िलाफ़ विरोध-प्रदर्शन और सरकार के रवैये को समझ लें। सरकार दावा करती रही है कि ये तीनों आपस में जुड़े नहीं रहे हैं। लेकिन सच्चाई है कि ये आपस में जुड़े रहे हैं। गृह मंत्री के शब्दों में ही समझें तो वह पहले ही कह चुके हैं कि 'आप क्रोनोलॉजी समझिए, पहले नागरिकता क़ानून आएगा, फिर एनआरसी आएगी'। उनके इस बयान का साफ़ मतलब था कि एनआरसी और नागरिकता क़ानून जुड़े हुए हैं। यह इससे भी साफ़ है कि जब एनआरसी से लोग बाहर निकाले जाएँगे तो नागरिकता क़ानून के माध्यम से पाकिस्तान, अफ़ग़ानिस्तान और बाँग्लादेश के हिंदू, सिख, पारसी, जैन, बौद्ध और ईसाई धर्म के लोगों को भारत की नागरिकता दी जाएगी। 

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जब नागरिकता क़ानून पास हो गया तो इस पर ज़बरदस्त विरोध हुआ। दो दर्जन से ज़्यादा लोगों की जानें चली गईं। पूरे देश भर में प्रदर्शन हुए। अंंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी दबाव बना। बीजेपी के सहयोगी दलों ने ही आपत्ति दर्ज करानी शुरू कर दी। सरकार ने एनआरसी से साफ़-साफ़ किनारा कर लिया और कह दिया कि एनआरसी लाने की चर्चा तक नहीं हुई है। हालाँकि विरोध-प्रदर्शन तब भी नहीं रुका। 

इसी विरोध के बीच जब पहली बार एनपीआर को अपडेट करने के लिए 3941 करोड़ रुपये के बजट की ख़बर आई तब इस पर नये सिरे से विवाद खड़ा हो गया। कहा जाने लगा कि सरकार एनआरसी को पीछे के दरवाजे से लागू कराना चाहती है। तब सूत्रों के हवाले से ख़बर आई कि एनपीआर के लिए सभी लोगों से 21 प्वाइंट में जानकारियाँ माँगी गईं। इससे पहले 2010 में सिर्फ़ 15 प्वाइंट में सूचनाएँ माँगी गई थीं और उस समय कोई बाध्यता नहीं थी। इस बार छह और प्वाइंट जोड़े गए। इसमें आवेदन करने वाले का नाम, पिता का नाम, माता का नाम जैसी जानकारियाँ शामिल थीं। इस बार पिछली बार के तीन प्वाइंट- माँ का नाम, पिता का नाम और पति-पत्नी का नाम को एक प्वाइंट बना दिया गया।

इस बार नयी जानकारियाँ माँगी गईं-

  • माता-पिता के जन्म की तारीख़ और जगह
  • मौजूदा आवास का पता
  • पासपोर्ट नंबर
  • परमानेंट एकाउंट नंबर यानी पैन
  • आधार (यदि हो तो) 
  • मतदाता पहचान पत्र संख्या
  • ड्राइविंग लाइसेंस नंबर
  • मोबाइल नंबर
ऐसे में एनपीआर पर संदेह वाजिब है और चिंता भी। चिंता की वजह इसलिए कि माता-पिता के जन्म की तारीख़ और जगह बता पाना बड़ी संख्या में लोगों के लिए आसान नहीं होगा।

वह भी तब जब पहले की पीढ़ी के अधिकतर लोगों के पास जन्म प्रमाण पत्र होना मुश्किल है। यानी यदि संबंधित व्यक्ति के माता-पिता के जन्म की तारीख़ और जगह की जानकारी नहीं हो तो एनपीआर में करोड़ों लोग संदिग्ध लोगों की सूची में आ जाएँगे। नागरिकता क़ानून 2003 के नियम 4 और उपनियम 4 के तहत यदि किसी की नागरिकता पर संदेह होगा तो उसको चिन्हित किया जाएगा और उसको अपनी नागरिकता साबित करनी होगी। यदि वह साबित नहीं कर पाया तो उस पर 1000 रुपये का जुर्माना भी लगाया जाएगा।

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वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण क्या कहते हैं?

एनपीआर प्रक्रिया पर सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील और सामाजिक कार्यकर्ता प्रशांत भूषण कहते हैं, 'कोई स्थानीय अधिकारी आएगा, कुछ पूछताछ करेगा, कोई कागजात माँगेगा और यदि वह संतुष्ट नहीं हुआ तो आपके नाम के आगे डाउटफुल यानी संदिग्ध लिख देगा। ज़िला मजिस्ट्रेट के पास वह सूची जाएगी, वह भी आपसे पूछेगा और उसको लगा कि आप नहीं हैं नागरिक तो वह भी उस पर लिख देगा। उसका क्या आधार होगा क्या नहीं, एक ज़िला मजिस्ट्रेट कैसे तय कर देगा कि कोई देश का नागरिक है या नहीं? इसके बाद एनआरसी में आपका नाम नहीं आएगा। इसके बाद फ़ोरेन ट्रब्युनल में आप अपील कर सकते हैं। यदि असम में जिस तरह से फ़ोरेन ट्रिब्युनल बने हैं उसी तरह के बनेंगे तो फिर प्रक्रिया कैसे चलेगी।' वह कहते हैं कि असम में फ़ोरेन ट्रिब्युनल में जज को होना चाहिए, लेकिन उसमें ब्यूरोक्रेट्स को रखा गया है। कई तरह की गड़बड़ियाँ आ चुकी हैं। 

आम लोगों की इन चिंताओं का असर यह हुआ कि सरकार को सफ़ाई देनी पड़ी। सरकार ने इसको खारिज कर दिया और कहा कि एनपीआर और एनआरसी में कोई जुड़ाव नहीं है। अमित शाह ने इसी बात को दोहराते हुए कहा कि एनपीआर के डाटा को कभी भी एनआरसी के लिए इस्तेमाल नहीं किया जाएगा

लेकिन सच्चाई यह है कि सरकार ही पहले कम से कम 9 बार संसद में कह चुकी है कि एनआरसी और एनपीआर जुड़े हुए हैं और एनपीआर के डाटा का इस्तेमाल एनआरसी के लिए किया जाएगा। नागरिकता क़ानून 2003 में भी इसका ज़िक्र किया गया है।

प्रदर्शन शुरू हुआ नागरिकता क़ानून के ख़िलाफ़ लेकिन बाद में इसमें एनआरसी और एनपीआर का मुद्दा भी शामिल हो गया। लोगों के विरोध को देखते हुए बीजेपी भी बैकफ़ुट पर आती हुई दिखी। विपक्षी दलों ने तो पहले से ही मोर्चा खोला हुआ था, बीजेपी के सहयोगी दल भी विरोध में उतर आए। बीजेपी बिहार में गठबंधन सरकार में शामिल है फिर भी नीतीश कुमार ने एनपीआर को 2010 के प्रारूप को लागू करने का विधानसभा में प्रस्ताव पारित कर दिया। विपक्षी दलों द्वारा शासित केरल जैसे राज्यों ने भी प्रस्ताव पारित कर दिया है। एनआरसी के ख़िलाफ़ भी पंजाब, पश्चिम बंगाल, बिहार, केरल, ओडिशा, मध्य प्रदेश, राजस्थान, तेलंगाना जैसे राज्यों ने प्रस्ताव पारित कर दिया है।

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एक के बाद एक कई राज्यों में चुनाव हारती जा रही बीजेपी के लिए एनपीआर पर अडिग रहना शायद मुश्किल है। पहले मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और फिर महाराष्ट्र, झारखंड व दिल्ली में बीजेपी की हार हुई। हरियाणा में भी उसका अच्छा प्रदर्शन नहीं रहा। बीजेपी के सहयोगी दल भी एनआरसी-एनपीआर से खफा हैं। अब सरकार के सामने मुश्किल यह है कि उसके पास समय की कमी है। 2020 तक एनपीआर को तैयार कर लेना है। यानी बीजेपी कुछ तिकड़म भी लगाती तो इसके लिए उसे समय चाहिए होता। ऐसे में यह अंदाज़ा लगाना मुश्किल नहीं है कि अमित शाह ने संसद में एनपीआर पर यह क्यों कहा, 'किसी दस्तावेज़ को जमा कराने की ज़रूरत नहीं होगी। आपके पास जो काग़ज़ मौजूद हैं, उनसे जुड़ी जानकारियाँ दें और दूसरे सवालों को रिक्त छोड़ दें।'
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