loader

तिरंगा घर-घर तो पहुँचा, पर अनजाने में आप अपमान तो नहीं कर रहे?

क्या आपने तिरंगा फहरा लिया? यदि आज नहीं तो कभी तो फहराया होगा! तो आपको बता दें कि तिरंगा फहराएँ या न फहराएँ, पर इसका सम्मान करना ज़रूरी है। अपमान का तो सवाल ही नहीं उठता। लेकिन क्या आपको तिरंगे को सम्मान देने का नियम पता है? यदि नहीं तो अनजाने में ही कहीं आप इसका अपमान तो नहीं कर रहे?

कुछ सवालों के जवाब से आप ख़ुद तय कर सकते हैं कि आप इसका सम्मान करते हैं या नहीं। जैसे, फहराने के बाद तिरंगे को उतारकर आपने क्या किया? यदि मैला हो गया तो क्या किया? झंडा फट या क्षतिग्रस्त हो गया तो आपने क्या किया? 

जब झंडा क्षतिग्रस्त है या मैला हो गया है तो उसे अलग या अपमानजनक तरीक़े से नहीं रखना चाहिए। झंडे की गरिमा के अनुरूप विसर्जित या जला देना चाहिए। तिरंगे को नष्ट करने का सबसे अच्छा तरीक़ा है, उसका गंगा में विसर्जन करना या उचित सम्मान के साथ दफ़ना देना।

तिरंगे को सम्मान देने के लिए वैसे तो काफ़ी लंबे-चौड़े नियम-क़ायदे हैं, लेकिन मोटे तौर पर हम इसे ऐसे समझ सकते हैं।

क्या करना ज़रूरी है

  • राष्ट्रीय ध्वज को शैक्षिक संस्थानों में ध्वज को सम्मान की प्रेरणा देने के लिए फहराया जा सकता है। 
  • सभी नागरिकों को अपने परिसरों में ध्वज फहराने का अधिकार देना स्‍वीकार किया गया है।
  • खुले में झंडा फहराया जा रहा है तो हमेशा सूर्योदय पर फहराया जाना चाहिए और सूर्यास्त पर उतार देना चाहिए।
  • कुछ विशेष परिस्थितियों में ध्वज को रात के समय सरकारी इमारत पर फहराया जा सकता है।

यह नहीं कर सकते

  • इस ध्वज को ज़मीन या पानी से स्‍पर्श नहीं कराया जाना चाहिए। इसे वाहनों के हुड, ऊपर और बगल या पीछे, रेलों, नावों या वायुयान पर लपेटा नहीं जा सकता।
  • किसी अन्‍य ध्वज या ध्वज पट्ट को राष्ट्रीय ध्वज से ऊँचे स्‍थान पर नहीं लगाया जा सकता है। 
  • उसका प्रयोग मेजपोश के रूप में, या मंच पर नहीं ढँका जा सकता है।
  • झंडे को जानबूझकर उल्टा नहीं किया जा सकता, किसी में डुबाया नहीं जा सकता, या फूलों की पंखुडियों के अलावा अन्य चीज नहीं रखी जा सकती। 
  • इसे वर्टिकल रूप में लटकाया भी नहीं जा सकता। झंडे को बुरी और गंदी स्थिति में प्रदर्शित करना भी अपमान है।

2005 से पहले घर-घर नहीं था तिरंगा

क्या आपको पता है कि साल 2002 से पहले आम लोग केवल गिने-चुने राष्ट्रीय त्योहारों को छोड़कर सार्वजनिक रूप से राष्ट्रीय ध्वज नहीं फहरा सकते थे। एक उद्योगपति, नवीन जिंदल ने दिल्ली उच्च न्यायालय में, इस प्रतिबंध को हटाने के लिए जनहित में एक याचिका दायर की और कोर्ट में लड़ाई लड़ी। इसके बाद भारतीय झंडा संहिता में 26 जनवरी 2002 को संशोधन किया गया। इसमें आम जनता को वर्ष के सभी दिनों झंडा फहराने की अनुमति दी गयी और ध्वज की गरिमा, सम्मान की रक्षा करने को कहा गया।

क्या तिरंगे को पहन भी सकते हैं?

साल 2005 तक तिरंगे को पोशाक के रूप में या वर्दी के रूप में प्रयोग नहीं किया जा सकता था। पर 5 जुलाई 2005, को भारत सरकार ने संहिता में संशोधन किया और ध्वज को एक पोशाक के रूप में या वर्दी के रूप में प्रयोग किये जाने की अनुमति दी। हालाँकि इसका प्रयोग कमर के नीचे वाले कपड़े के रूप में नहीं किया जा सकता है। राष्ट्रीय ध्वज को तकिये के रूप में या रूमाल के रूप में करने की मनाही है।

इनको गाड़ियों पर तिरंगा लगाने की छूट

वाहनों पर राष्ट्रीय ध्वज लगाने के लिए विशेषाधिकार होते हैं, राष्ट्रपति, उप राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, राज्यपाल और उपराज्यपाल, मुख्यमंत्री, मंत्रीमंडल के सदस्य जैसे जन प्रतिनिधि, सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों और जल सेना, थल सेना और नौ सेना के अधिकारिकयों को ही यह अधिकार है।

  • राष्ट्रीय शोक के समय झंडे को आधा झुका होना चाहिए। इसके अलावा राज्य के अवसरों, सेना, केन्द्रीय अर्ध सैनिक बलों की अन्तेय्ष्टि पर, झंडे के केसरिया पट्टी को शीर्ष पर रखकर टिकटी या ताबूत को ढँक देना चाहिए। ध्वज को कब्र में नीचे नहीं उतारना चाहिए या चिता में जलाना नहीं चाहिए।

तिरंगे का मतलब क्या है?

  • तिरंगे की लम्बाई और चौड़ाई का अनुपात हमेशा 3:2 का होना चाहिए।
  • तिरंगे की ऊपरी पट्टी में केसरिया रंग है जो देश की शक्ति और साहस को दर्शाता है।
  • बीच की पट्टी का श्वेत धर्म चक्र के साथ शांति और सत्य का प्रतीक है।
  • निचली हरी पट्टी उर्वरता, वृद्धि और भूमि की पवित्रता को दर्शाती है। 
  • सफ़ेद पट्टी पर बने चक्र को धर्म चक्र कहते हैं। इस चक्र में 24 तीलियाँ हैं, जिसका अर्थ है कि दिन-रात 24 घंटे जीवन गति‍शील है।
  • इस चक्र को तृतीय शताब्दी ईसा पूर्व मौर्य सम्राट अशोक द्वारा बनाए गए सारनाथ की लाट से लिया गया है।

तिरंगे की लंबी यात्रा

तिरंगे की जड़ गाँधी जी के विचारों में ढूंढी जा सकती है। गाँधी जी ने सबसे पहले 1921 में कांग्रेस के अपने झंडे की बात की थी। हालाँकि, इस झंडे को पिंगली वेंकैया ने डिजाइन किया था। इसमें दो रंग थे। लाल रंग हिन्दुओं के लिए और हरा रंग मुस्लिमों के लिए। बीच में एक चक्र था। बाद में इसमें अन्य धर्मों के लिए सफेद रंग जोड़ा गया। स्वतंत्रता प्राप्ति से कुछ दिन पहले संविधान सभा ने राष्ट्रध्वज को संशोधित किया। इसमें चरखे की जगह अशोक चक्र ने ले ली। इसे 22 जुलाई, 1947 को भारतीय संविधान-सभा की बैठक में अपनाया गया था और पहली बार 15 अगस्त 1947 को फहराया गया।

खादी का ही होना चाहिए राष्ट्रीय ध्वज 

भारतीय मानक ब्यूरो ने 1951 में पहली बार राष्ट्रध्वज के लिए कुछ नियम तय किए। फिर 1968 में तिरंगा निर्माण के मानक तय किए गए। ये नियम काफ़ी कड़े हैं। राष्ट्रीय झंडा नियमों के अनुसार खादी में ही बनना चाहिए। यह एक विशेष प्रकार से हाथ से काते गए कपड़े से बनता है जो महात्मा गाँधी द्वारा लोकप्रिय बनाया गया था। इसे केवल पूरे देश के एक दर्ज़न से भी कम लोग जानते हैं। धारवाण के निकट गदग और कर्नाटक के बागलकोट में ही खादी की बुनाई की जाती है। जबकी 'हुबली' एक मात्र लाइसेंस प्राप्त संस्थान है जहाँ से झंडा उत्पादन व सप्लाई की जाती है।

'सत्य हिन्दी'
की ताक़त बनिए

गोदी मीडिया और विशाल कारपोरेट मीडिया के मुक़ाबले स्वतंत्र पत्रकारिता का साथ दीजिए और उसकी ताक़त बनिए। 'सत्य हिन्दी' की सदस्यता योजना में आपका आर्थिक योगदान ऐसे नाज़ुक समय में स्वतंत्र पत्रकारिता को बहुत मज़बूती देगा। याद रखिए, लोकतंत्र तभी बचेगा, जब सच बचेगा।

नीचे दी गयी विभिन्न सदस्यता योजनाओं में से अपना चुनाव कीजिए। सभी प्रकार की सदस्यता की अवधि एक वर्ष है। सदस्यता का चुनाव करने से पहले कृपया नीचे दिये गये सदस्यता योजना के विवरण और Membership Rules & NormsCancellation & Refund Policy को ध्यान से पढ़ें। आपका भुगतान प्राप्त होने की GST Invoice और सदस्यता-पत्र हम आपको ईमेल से ही भेजेंगे। कृपया अपना नाम व ईमेल सही तरीक़े से लिखें।
सत्य अनुयायी के रूप में आप पाएंगे:
  1. सदस्यता-पत्र
  2. विशेष न्यूज़लेटर: 'सत्य हिन्दी' की चुनिंदा विशेष कवरेज की जानकारी आपको पहले से मिल जायगी। आपकी ईमेल पर समय-समय पर आपको हमारा विशेष न्यूज़लेटर भेजा जायगा, जिसमें 'सत्य हिन्दी' की विशेष कवरेज की जानकारी आपको दी जायेगी, ताकि हमारी कोई ख़ास पेशकश आपसे छूट न जाय।
  3. 'सत्य हिन्दी' के 3 webinars में भाग लेने का मुफ़्त निमंत्रण। सदस्यता तिथि से 90 दिनों के भीतर आप अपनी पसन्द के किसी 3 webinar में भाग लेने के लिए प्राथमिकता से अपना स्थान आरक्षित करा सकेंगे। 'सत्य हिन्दी' सदस्यों को आवंटन के बाद रिक्त बच गये स्थानों के लिए सामान्य पंजीकरण खोला जायगा। *कृपया ध्यान रखें कि वेबिनार के स्थान सीमित हैं और पंजीकरण के बाद यदि किसी कारण से आप वेबिनार में भाग नहीं ले पाये, तो हम उसके एवज़ में आपको अतिरिक्त अवसर नहीं दे पायेंगे।
सर्वाधिक पढ़ी गयी खबरें

अपनी राय बतायें

देश से और खबरें

ताज़ा ख़बरें

सर्वाधिक पढ़ी गयी खबरें