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सात बार हुई थी गाँधीजी की हत्या की कोशिश

महात्मा गाँधी के हत्यारे गिरोह के सरगना नाथूराम गोडसे को महिमामंडित करने के जो प्रयास इन दिनों किए जा रहे हैं, वे नए नहीं हैं। गोडसे का संबंध राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से बताया जाता रहा है और इसीलिए गाँधीजी की हत्या के बाद देश के तत्कालीन गृह मंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल ने संघ पर प्रतिबंध लगा दिया था। हालाँकि संघ गोडसे से अपने संबंधों को हमेशा नकारता रहा है और अपनी इस सफ़ाई को पुख्ता करने के लिए वह गोडसे को गाँधी का हत्यारा भी मानता है और उसके कृत्य को निंदनीय करार भी देता है। लेकिन सवाल उठता है कि आख़िर क्या वजह है कि केंद्र में भारतीय जनता पार्टी के सत्तारूढ़ होने के बाद ही गोडसे को महिमामंडित करने का सिलसिला तेज़ हो गया? इस सिलसिले में एकाएक उसका मंदिर बनाने के प्रयास शुरू हो गए। उसकी 'जयंती’ और 'पुण्यतिथि’ मनाई जाने लगी। उसे 'चिंतक’ और यहाँ तक कि 'स्वतंत्रता सेनानी’ और 'शहीद’ भी बताया जाने लगा।

गाँधीजी के जिस हत्यारे को इस तरह महिमामंडित किया जा रहा है, उसके बारे में यह जानना दिलचस्प है कि वह गाँधी की हत्या से पहले तक क्या था? क्या वह चिंतक था, ख्याति प्राप्त राजनेता था, हिंदू महासभा का ज़िम्मेदार पदाधिकारी या स्वतंत्रता सेनानी था? 

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दरअसल, नाथूराम गोडसे कभी भी इतनी ऊॅंचाइयों के दूर-दूर तक भी नहीं पहुँच पाया था। पुणे शहर के उसके मोहल्ले सदाशिवपेठ के बाहर उसे कोई नहीं जानता था, जबकि तब वह चालीस वर्ष की आयु के समीप था। नाथूराम स्कूल से भागा हुआ छात्र था। नूतन मराठी विद्यालय में मिडिल की परीक्षा में फ़ेल हो जाने पर उसने पढ़ाई छोड़ दी थी। उसका मराठी भाषा का ज्ञान कामचलाऊ था। अंग्रेज़ी का ज्ञान होने का तो सवाल ही नहीं उठता। उसके पिता विनायक गोडसे डाकखाने में बाबू थे, जिनकी मासिक आय पाँच रुपए थी। नाथूराम अपने पिता का लाडला था क्योंकि उसके पहले जन्मे उनके सभी पुत्र मर गए थे। इसीलिए अंधविश्वास के वशीभूत होकर माँ ने नाथूराम की परवरिश बेटी की तरह की। उसे नाक में नथ पहनाई जिससे उसका नाम नाथूराम हो गया।

नाथूराम के बाद उसके माता-पिता को तीन और पुत्र पैदा हुए थे जिनमें एक था गोपाल, जो नाथूराम के साथ गाँधी-हत्या में सहअभियुक्त था। नाथूराम की युवावस्था किसी खास घटना अथवा विचार के लिए नहीं जानी जाती। उस समय उसके हमउम्र लोग भारत में क्रांति का अलख जगा रहे थे, जेल जा रहे थे, शहीद हो रहे थे। स्वाधीनता संग्राम की इस हलचल से नाथूराम का ज़रा भी सरोकार नहीं था। अपने नगर पुणे में वह रोज़ी-रोटी के ही जुगाड़ में लगा रहता था। इस सिलसिले में उसने सांगली शहर में दर्जी की दुकान खोल ली थी। उसके पहले वह बढ़ई का काम भी कर चुका था और फलों का ठेला भी लगा चुका था।

हिंदुत्ववादी और गोडसे पूजक अक्सर यह दलील देते रहते हैं कि गाँधी ने भारत के बँटवारे को रोकने का कोई प्रयास नहीं किया, उनकी वजह से ही पाकिस्तान बना और उन्होंने ही पाकिस्तान को 55 करोड़ रुपये दिलवाए, जिससे क्षुब्ध होकर गोडसे ने गाँधी की हत्या की। यह दलील बिल्कुल बेबुनियाद और बकवास है। दरअसल, गाँधीजी की हत्या के प्रयास 1934 से शुरू हो गए थे, जब पाकिस्तान नाम की कोई चीज क्षितिज पर थी ही नहीं, किसी ने पाकिस्तान का नाम ही नहीं सुना था, क्योंकि पाकिस्तान बनाने की चर्चा तो 1938 में शुरू हुई थी। इस संबंध में औपचारिक प्रस्ताव 1940 में लाहौर में हुए मुसलिम लीग के अधिवेशन में पारित हुआ था।

गाँधी की हत्या का पहला प्रयास 25 जून, 1934 को उस वक़्त किया गया था जब वे पूना में एक सभा को संबोधित करने जा रहे थे। गाँधीजी की मोटर को निशाना बनाकर बम फेंका गया था लेकिन चूँकि गाँधीजी पीछे वाली मोटर में थे, इसलिए बच गए थे।

बम फेंकने वाले के जूते में गाँधी और नेहरू के चित्र पाए गए थे, ऐसा पुलिस रिपोर्ट में दर्ज है।

गाँधीजी की हत्या का दूसरा प्रयास 1944 मे पंचगनी में किया गया। जुलाई 1944 में गाँधीजी बीमारी के बाद आराम करने के लिए पंचगनी गए थे। तब पूना से 20 युवकों का एक गुट बस लेकर पंचगनी पहुँचा था। दिनभर वे गाँधीजी के ख़िलाफ़ नारेबाज़ी करते रहे। इस गुट के नेता नाथूराम गोडसे को गाँधीजी ने बात करने के लिए बुलाया, मगर नाथूराम ने गाँधीजी से मिलने से इनकार कर दिया। शाम को प्रार्थना सभा में नाथूराम हाथ में छुरा लेकर गाँधीजी की तरफ़ लपका था, लेकिन पूना के सूरती-लॉज के मालिक मणिशंकर पुरोहित और भिलारे गुरुजी नाम के युवक ने नाथूराम को पकड़ लिया था। पुणे में मई 1910 में जन्मे नाथूराम के जीवन की पहली खास घटना थी। उसके जीवन की दूसरी बड़ी घटना थी एक वर्ष बाद यानी 1945 की, जब ब्रिटिश वायसराय ने भारत की स्वतंत्रता पर चर्चा के लिए राजनेताओं को शिमला आमंत्रित किया था। तब नाथूराम 'अग्रणी’ पत्रिका के संवाददाता के रूप मे वहाँ उपस्थित था।

1944 में तीसरी बार मारने का प्रयास

गाँधीजी की हत्या का तीसरा प्रयास भी इसी साल यानी 1944 के सितंबर महीने में वर्धा में हुआ था, जब वह भारत के विभाजन को रोकने के लिए मुहम्मद अली जिन्ना से बातचीत करने के लिए बंबई जाने वाले थे। गाँधीजी बंबई न जा सके, इसके लिए पूना से हिंदू महासभा के नेता लक्ष्मण गणेश थट्टे की अगुवाई में एक समूह वर्धा पहुँचा था। चौंतीस वर्षीय नाथूराम थट्टे के सहयोगी प्रदर्शनकारियों में शरीक था। उसका इरादा खंजर से बापू पर हमला करने का था, लेकिन आश्रमवासियों ने उसे पकड़ लिया था। पुलिस रिपोर्ट के मुताबिक़ उस युवक ने अपने बचाव में बयान दिया था कि यह खंजर गाँधीजी की मोटर के टायर पंक्चर करने के लिए लाया गया था। 

इस घटना के संबंध में गाँधीजी के सचिव रहे प्यारेलाल ने लिखा है: ''आज सुबह मुझे टेलीफ़ोन पर ज़िला पुलिस सुपरिंटेंडेंट से सूचना मिली कि आरएसएस के स्वयंसेवक गंभीर शरारत करना चाहते हैं, इसलिए पुलिस को मजबूर होकर ज़रूरी कार्रवाई करनी पड़ेगी। पुलिस से मिली इस सूचना के बाद बापू ने कहा कि मैं उन लोगों के बीच अकेला जाऊँगा और वर्धा रेलवे स्टेशन तक पैदल चलूँगा। अगर आरएसएस के स्वयंसेवक ख़ुद ही अपना विचार बदल लें और मुझे मोटर में आने को कहें तो दूसरी बात है। बापू के रवाना होने से ठीक पहले पुलिस-सुपरिंटेंडेंट आए और बोले कि धरना देने वालों को हर तरह से समझाने-बुझाने का जब कोई हल न निकला तो चेतावनी देने के बाद उन्हें गिरफ़्तार कर लिया गया है। धरना देने वालों का नेता बहुत ही उत्तेजित स्वभाववाला, अविवेकी और अस्थिर मन का आदमी मालूम होता था, इससे कुछ चिंता होती थी। गिरफ़्तारी के बाद तलाशी में उसके पास एक बड़ा छुरा निकला।’’

1944 के सितम्बर में भी पाकिस्तान की बात उतनी ही दूर थी, जितनी जुलाई में थी।

गाँधीजी की हत्या का चौथा प्रयास 29 जून, 1946 को किया गया था, जब वे विशेष ट्रेन से बंबई से पूना जा रहे थे। उस समय नेरल और कर्जत स्टेशनों के बीच रेल पटरी पर बड़ा पत्थर रखा गया था, लेकिन उस रात को ट्रेन ड्राइवर की सूझ-बूझ के कारण गाँधीजी बच गए।

दूसरे दिन, 30 जून की प्रार्थना-सभा में गाँधीजी ने पिछले दिन की घटना का उल्लेख करते हुए कहा : ''परमेश्वर की कृपा से मैं सात बार अक्षरश: मृत्यु के मुँह से सकुशल वापस आया हूँ। मैंने कभी किसी को दुख नहीं पहुँचाया। मेरी किसी के साथ दुश्मनी नहीं है। फिर भी मेरे प्राण लेने का प्रयास इतनी बार क्यों किया गया, यह बात मेरी समझ में नहीं आती। मेरी जान लेने का कल का प्रयास भी निष्फल गया।’’

नाथूराम गोडसे उस समय पूना से 'अग्रणी’ नाम की मराठी पत्रिका निकालता था। गाँधीजी की 125 वर्ष जीने की इच्छा ज़ाहिर होने के बाद 'अग्रणी’ के एक अंक में नाथूराम ने लिखा- 'पर जीने कौन देगा?’ यानी 125 वर्ष आपको जीने ही कौन देगा? गाँधीजी की हत्या से डेढ़ वर्ष पहले नाथूराम का लिखा यह वाक्य है। यह वाक्य साबित करता है कि कुछ लोग गाँधीजी की हत्या के लिए बहुत पहले से प्रयासरत थे।

1946 के जून में पाकिस्तान बन जाने के आसार तो दिखायी देने लगे थे, लेकिन 55 करोड़ रुपए देने का तो उस समय कोई सवाल ही पैदा नहीं हुआ था।

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1948 में बच निकला था गोडसे

इसके बाद 20 जनवरी 1948 को नाथूराम गोडसे ने मदनलाल पाहवा के साथ मिलकर नई दिल्ली के बिड़ला भवन पर बम फेंका था, जहाँ गाँधीजी दैनिक प्रार्थना सभा कर रहे थे। बम का निशाना चूक गया था। पाहवा पकड़ा गया था, मगर नाथूराम भागने में सफल होकर मुंबई में छिप गया था।

दस दिन बाद वह अपने अधूरे काम को पूरा करने करने के लिए फिर दिल्ली आया था। नाथूराम को उसके प्रशंसक एक धर्मनिष्ठ हिंदू के तौर पर भी प्रचारित करते रहे हैं लेकिन तीस जनवरी की ही शाम की एक घटना से साबित होता कि नाथूराम कैसा और कितना धर्मनिष्ठ था। गाँधीजी पर पर तीन गोलियाँ दागने के पूर्व वह उनका रास्ता रोककर खड़ा हो गया था। पोती मनु ने नाथूराम से एक तरफ़ हटने का आग्रह किया था क्योंकि गाँधीजी को प्रार्थना के लिए देरी हो गई थी। धक्का-मुक्की में मनु के हाथ से पूजा वाली माला और आश्रम भजनावाली ज़मीन पर गिर गई थी। लेकिन नाथूराम उसे रौंदता हुआ ही आगे बढ़ गया था 20वीं सदी का जघन्यतम अपराध करने।

जो लोग नाथूराम गोडसे से ज़रा भी सहानुभूति रखते हैं उन्हें इस निष्ठुर हत्यारे के बारे में एक और प्रमाणित तथ्य पर ग़ौर करना चाहिए। 

गाँधीजी को मारने के दो सप्ताह पहले नाथूराम ने काफ़ी बड़ी राशि का अपने जीवन के लिए बीमा करवा लिया था ताकि उसके पकड़े और मारे जाने पर उसका परिवार आर्थिक रूप से लाभान्वित हो सके। एक कथित ऐतिहासिक मिशन को लेकर चलने वाला व्यक्ति बीमा कंपनी से हर्ज़ाना कमाना चाहता था।

मृत्युदंड से बचने के लिए अजीब दलील

अदालत में मृत्युदंड से बचने के लिए नाथूराम के वकील ने दो चश्मदीद गवाहों के बयानों में विरोधाभास का सहारा लिया था। उनमें से एक ने कहा था कि पिस्तौल से धुआँ नहीं निकला था। दूसरे ने कहा था कि गोलियाँ दगी थीं और धुआँ निकला था। नाथूराम के वकील ने दलील दी थी कि धुआँ नाथूराम की पिस्तौल से नहीं निकला, अत: हत्या किसी और की पिस्तौल से हो सकती है। माजरा कुछ मुंबइया फ़िल्मों जैसा रचने का एक भौंडा प्रयास था। मक़सद था कि नाथूराम संदेह का लाभ पाकर छूट जाए।

नाथूराम का मक़सद कितना पैशाचिक रहा होगा, इसका अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि गाँधीजी की हत्या के बाद पकड़े जाने पर खाकी निकर पहने नाथूराम ने अपने को मुसलमान बताने की कोशिश की थी। 

इसके पीछे उसका मक़सद देशवासियों के रोष का निशाना मुसलमानों को बनाना और उनके ख़िलाफ़ हिंसा भड़काना था। ठीक उसी तरह जैसे इंदिरा गाँधी की हत्या के बाद सिखों के साथ हुआ था। पता नहीं किन कारणों से राष्ट्र के नाम अपने संबोधन में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने हत्यारे के नाम का उल्लेख नहीं किया लेकिन उनके संबोधन के तुरंत बाद गृह मंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल ने आकाशवाणी भवन जाकर रेडियो पर देशवासियों को बताया कि बापू का हत्यारा एक हिंदू है। ऐसा करके सरदार पटेल ने मुसलमानों को अकारण ही देशवासियों का कोपभाजन बनने से बचा लिया।

नाथूराम का भाई भी हत्या में शामिल

गाँधीजी की हत्या का षडयंत्र रचने में नाथूराम का भाई गोपाल गोडसे भी शामिल था, जो अदालत में जिरह के दौरान ख़ुद को गाँधी-हत्या की योजना से अनजान और बेगुनाह बताता रहा। अदालत ने उसे आजीवन कारावास की सज़ा सुनाई थी। गोपाल जेल में हर साल गाँधी जयंती के कार्यक्रम में बढ़-चढ़कर शिरकत करता था। ऐसा वह प्रायश्चित के तौर पर नहीं बल्कि अपनी सज़ा की अवधि में छूट पाने के लिए करता था, क्योंकि जेल के नियमों के मुताबिक़ ऐसा करने पर सज़ा की अवधि में छूट मिलती है। तो इस तरह गोपाल गोडसे अपनी सज़ा की पूरी अवधि के पहले ही रिहाई पा गया था। 

नाथूराम के साथ जिस दूसरे अभियुक्त को फाँसी दी गई थी वह था नारायण आप्टे। नाथूराम का सबसे घनिष्ठ दोस्त और सहधर्मी। ब्रिटिश वायुसेना में नौकरी कर चुका आप्टे पहले-पहले गणित का अध्यापक था। शराबप्रेमी आप्टे ने गाँधी हत्या से एक दिन पूर्व यानी 29 जनवरी, 1948 की रात पुरानी दिल्ली के एक वेश्यालय में गुज़ारी थी और उस रात को उसने अपने जीवन की यादगार रात बताया था। यह तथ्य उससे संबंधित अदालती दस्तावेज़ों में दर्ज है।

विचार से ख़ास

चौथा अभियुक्त हथियारों का तस्कर

गाँधी हत्याकांड का चौथा अभियुक्त विष्णु रामकृष्ण करकरे हथियारों का तस्कर था। उसने अनाथालय में परवरिश पाई थी। गोडसे से उसका परिचय हिंदू महासभा के कार्यालय में हुआ था। एक अन्य अभियुक्त दिगम्बर रामचंद्र बडगे जो सरकारी गवाह बना और क्षमा पा गया, पुणे में शस्त्र भण्डार नामक दुकान चलाता था। नाटे, साँवले और भेंगी आँखों वाले बडगे ने अपनी गवाही में विनायक दामोदर सावरकर को हत्या की साज़िश का सूत्रधार बताया था लेकिन पर्याप्त सबूतों के अभाव में सावरकर बरी हो गए थे।

इन दिनों कुछ सिरफिरे और अज्ञानी लोग योजनाबद्ध तरीक़े से नाथूराम गोडसे को उच्चकोटि का चिंतक, देशभक्त और अदम्य नैतिक ऊर्जा से भरा व्यक्ति प्रचारित करने में जुटे हुए हैं। यह प्रचार सोशल मीडिया के माध्यम से चलाया जा रहा है।

उनके इस प्रचार का आधार नाथूराम का वह दस पृष्ठीय वक्तव्य है जो बडेही युक्तिसंगत, भावुक और ओजस्वी शब्दों में तैयार किया गया था और जिसे नाथूराम ने अदालत में पढ़ा था। इस वक्तव्य में उसने बताया था कि उसने गाँधीजी को क्यों मारा। कई तरह के झूठ से भरे इस वक्तव्य में दो बड़े और हास्यास्पद झूठ थे। एक यह कि गाँधीजी गोहत्या का विरोध नहीं करते थे और दूसरा यह कि वे राष्ट्रभाषा के नहीं, अंग्रेज़ी के पक्षधर थे। दरअसल, यह वक्तव्य ख़ुद गोडसे का तैयार किया हुआ नहीं था। वह कर भी नहीं सकता था, क्योंकि न तो उसे मराठी का भलीभाँति ज्ञान था, नहीं हिंदी का, अंग्रेज़ी का तो बिल्कुल भी नहीं। अलबत्ता उस समय दिल्ली में ऐसे कई हिंदूवादी थे जिनका हिंदी और अंग्रेज़ी पर समान अधिकार और प्रवाहमयी शैली का अच्छा अभ्यास था। इसके अलावा वे वैचारिक तार्किकता में भी पारंगत थे। माना जा सकता है कि उनमें से ही किसी ने नाथूराम की ओर से यह वक्तव्य तैयार कर जेल में उसके पास भिजवाया था। 

फाँसी से पहले खौफ में क्यों था गोडसे?

आप्टे की फाँसी के दिन (15 नवम्बर 1949) अम्बाला जेल के दृश्य का आँखों देखा हाल न्यायमूर्ति जीडी खोसला ने अपने संस्मरणों में लिखा है, जिसके मुताबिक़ गोडसे तथा आप्टे को उनके हाथ पीछे बांधकर फाँसी के तख्ते पर ले जाया जाने लगा तो गोडसे लड़खड़ा रहा था। उसका गला रूँधा था और वह भयभीत और विक्षिप्त दिख रहा था। आप्टे उसके पीछे चल रहा था। उसके भी माथे पर डर और शिकन साफ़ दिख रही थी। तो ऐसे 'बहादुर’, 'चरित्रवान’ और 'देशभक्त’ थे ये हिंदू राष्ट्र के स्वप्नदृष्टा, जिन्होंने एक निहत्थे बूढ़े, परम सनातनी हिंदू और राम के अनन्य-आजीवन भक्त का सीना गोलियों से छलनी कर दिया। ऐसे हत्यारों को प्रतिष्ठित करने के प्रयास तो शर्मनाक हैं ही, ऐसे प्रयासों पर सत्ता में बैठे लोगों की चुप्पी भी कम शर्मनाक और ख़तरनाक नहीं।

(यह लेख महात्मा गाँधी की हत्या के सह अभियुक्त और नाथूराम गोडसे के छोटे भाई गोपाल गोडसे की पुस्तक 'गाँधी वध क्यों?’, महात्मा गाँधी के निजी सचिव रहे प्यारेलाल की पुस्तक 'महात्मा गाँधी: पूर्णाहुति’ (प्रथम खंड), गाँधी हत्या की पुलिस में दर्ज प्रथम सूचना रिपोर्ट (एफ़आईआर), गाँधी हत्याकांड के अभियुक्तों पर मुक़दमे की कार्यवाही, गाँधी हत्याकांड में सह अभियुक्त और बाद में सरकारी गवाह बने रामचंद्र बडगे के कोर्ट में दिए गए बयान, मुक़दमे की सुनवाई करने वाले जज न्यायमूर्ति जीडी खोसला की संस्मरणात्मक पुस्तक 'द मर्डर ऑफ़ महात्मा’ में दी गई जानकारियों पर आधारित है।)

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अनिल जैन
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