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राम का मंदिर तो बन जाएगा पर राम को खो कर!

प्रीति सदा सज्जन संसर्गा।

तृन सम बिषय स्वर्ग अपबर्गा।।

भगति पच्छ हठ नहिं सठताई।

दुष्ट तर्क सब दूरि बहाई।।

ये पंक्तियाँ हिंदी क्षेत्र के सबसे बड़े रामभक्त कवि तुलसीदास के प्रसिद्ध काव्य रामचरितमानस की हैं। प्रसंग है कि ‘रामराज्य’ स्थापित हो चुका है और राम जनता को संबोधित कर रहे हैं। इस संबोधन में राम यह बता रहे हैं कि कौन लोग उन्हें प्रिय हैं। राम का कहना है कि वैसे लोग उन्हें प्रिय हैं जिन्हें सज्जनों के संसर्ग से प्रीति है, जिसके लिए सभी विषय (भोग–विलास) यहाँ तक कि स्वर्ग तथा मोक्ष भी तृण के समान है, जो भक्ति के पक्ष में हठ करता है, शठता (धोखाधड़ी एवं कुटिलता) नहीं करता और जिसने सभी कुतर्कों को दूर बहा दिया है।

राम द्वारा अपने प्रिय पात्र होने की यह कसौटी उस कवि के राम ने तय की है जिसने अपना सारा जीवन राम नाम के गुणगान में समर्पित कर दिया। राम की इस कसौटी में शठता नहीं करना और सभी कुतर्कों को बहा देना, अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। क्या यह सिर्फ़ विडंबना है कि इसी राम के नाम पर बननेवाले मंदिर के लिए 5 अगस्त 2020 ई. को भूमि पूजन हुआ जिसकी बुनियाद ही ‘शठता’ पर टिकी है?

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जिस राम मंदिर निर्माण के लिए भूमि – पूजन हुआ है उसकी पूरी प्रक्रिया को ‘अयोध्या विवाद’ के नाम से जाना जाता है। 1885 ई. से लेकर 2019 ई. तक यह मामला अदालतों में चलता रहा। 1500 वर्ग गज की इस भूमि ने भारत की आत्मा को हिला कर रख दिया। मामला यह था कि इसी भूमि पर 6 दिसंबर 1992 ई. तक एक मसजिद हुआ करती थी जिसे बाबरी मसजिद कहा जाता था। कहा जाता है कि इस मसजिद का निर्माण मुग़ल साम्राज्य के संस्थापक बाबर के निर्देश पर उसके सेनानायक मीर बाक़ी ने किया था। 

अयोध्या के कुछ महंतों और दूसरे लोगों का यह विश्वास है कि इसी ज़मीन पर राम का जन्म हुआ था और मसजिद निर्माण से पहले वहाँ एक मंदिर था जिसे ध्वस्त कर के मसजिद बना दी गई। इसी विश्वास के फलस्वरूप 1949 ई. में जाड़े के मौसम में इस मसजिद में कुछ मूर्तियाँ जबरन रख दी गईं। 

इस विश्वास, भारतीय हिंदू जनता में राम के प्रति व्याप्त आकर्षण एवं इसके राजनीतिक इस्तेमाल का फ़ायदा भारतीय जनता पार्टी तथा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े संगठनों ने उठाया और धार्मिक हिंदू जनता को आक्रामक राजनीतिक हिंदू में बदल कर 6 दिसंबर 1992 ई. को उक्त बाबरी मसजिद ढहा दी गई।

इधर अदालत में मामला चलता रहा। 30 सितंबर 2010 ई. को इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने इससे संबंधित 4304 पृष्ठों का फ़ैसला सुनाया। भारत की अदालतों की एक बड़ी कमज़ोरी यह है कि इनके फ़ैसले काफ़ी विस्तृत होते हैं। इससे सामान्य जनता तक फ़ैसले का सच नहीं पहुँच पाता है। इस फ़ैसले से बात नहीं बनी और मामला भारत की सर्वोच्च अदालत में पहुँचा। 9 नवंबर 2019 ई. को सर्वोच्च न्यायालय ने फ़ैसला सुनाया जिसके अनुसार वह भूमि हिंदू पक्षों को दे दी गई और मुसलिम पक्ष को जैसे सांत्वना पुरस्कार देते हुए यह कहा गया कि उन्हें अयोध्या में ही पाँच एकड़ ज़मीन दी जाएगी।

यह भी भारतीय न्याय व्यवस्था की विडंबना ही कही जाएगी कि सर्वोच्च अदालत ने यह माना कि 1949 ई. में मसजिद में मूर्तियाँ रखना ग़ैर क़ानूनी था और 6 दिसंबर 1992 ई. को मसजिद का ढहाया जाना भी आपराधिक कृत्य था, फिर भी न्याय के स्थल से ही इस विवादित ‘स्थल’ से मुसलिम पक्ष को ‘देश निकाला’ दे दिया गया।

सर्वोच्च न्यायालय के फ़ैसले के फलस्वरूप ही राम मंदिर का निर्माण होने जा रहा है। इस भूमि –पूजन में प्रधानमंत्री भी शामिल हुए। इसके लिए ख़ूब तैयारियाँ की गयीं। प्रसाद के लिए 1 लाख 11 हज़ार लड्डू बनाए गए। चाँदी की ईंट लाई गई। राम मंदिर बनाने में 300 करोड़ और आसपास की ज़मीन को विकसित करने के लिए 1000 करोड़ रुपए ख़र्च होंगे। यानी कुल 1300 करोड़ रुपए इसमें लगेंगे।

6 दिसंबर 1992 को एक उन्माद 

6 दिसंबर 1992 ई. को एक उन्माद के तहत बाबरी मसजिद को ढहाए जाने की घटना ने भारत के वास्तविक धार्मिक लोगों और राम को सच में माननेवालों को स्तब्ध कर दिया था। हालाँकि इस उन्माद के निर्माण में 1987 ई. में रामानंद सागर निर्मित प्रसिद्ध धारावाहिक ‘रामायण’ ने भी मनोवैज्ञानिक भूमिका निभाई थी। भारतीय हिंदू जनता में राम के प्रति जो आकर्षण था उसका प्रमाण इसी बात से लग जाता है कि उस समय गाँवों में रामायण देखने के लिए एकाध – दो लोगों के पास टेलीविजन हुआ करता था जिनके यहाँ रामायण प्रसारण के दिन ज़बरदस्त भीड़ जुटती थी। इतना ही नहीं, धारावाहिक में राम और सीता की भूमिका निभा रहे क्रमशः अरुण गोविल एवं दीपिका के पोस्टर को लोगों ने घरों में ला कर पूजना भी शुरू कर दिया था।

हिंदुओं के अनुसार राम परम ब्रह्म के सगुण रूप विष्णु के अवतार हैं। हिंदुओं के मुताबिक़ परम ब्रह्म सर्वोच्च सत्ता है। इसी सर्वोच्च सत्ता के अवतार राम हैं। क्या आज यह सवाल निरर्थक माना जाएगा कि जो राम परम ब्रह्म के अवतार हैं उनकी सीमा वह 1500 वर्ग गज की ज़मीन कैसे हो गई? दूसरा सवाल यह भी है कि राम तो एक मिथकीय चरित्र हैं जिनके अनेक रूप भारतवर्ष में फैले हुए हैं। शास्त्रीय एवं काव्यात्मक कथाओं से लेकर लोक गीतों तक। इन सब में राम का एक ही रूप नहीं है। 

ऐसे में यह दावा तो नहीं ही सिद्ध हुआ कि उसी ज़मीन पर राम का जन्म हुआ था। इससे स्पष्ट है कि राम मंदिर का मुद्दा धार्मिक नहीं बल्कि शुद्ध राजनीतिक है। साथ ही ‘शठता’ और कुतर्कों से ओत–प्रोत भी। इसीलिए 6 दिसंबर 1992 ई. को बाबरी मसजिद ढहाये जाने की घटना राम के नाम पर राम से दूर जाने का खंडहर है।

उर्दू के प्रसिद्ध शायर कैफ़ी आज़मी (1918–2002 ई.) ने इसी बात को कहते हुए ‘दूसरा बन-बास’ नज़्म लिखी जो हमें आज भी याद रखनी चाहिए: 

राम बन-बास से जब लौट के घर में आए

याद जंगल बहुत आया जो नगर में आए

रक़्स-ए-दीवानगी आँगन में जो देखा होगा

छे दिसम्बर को श्री राम ने सोचा होगा

इतने दीवाने कहाँ से मिरे घर में आए

जगमगाते थे जहाँ राम के क़दमों के निशाँ

प्यार की काहकशाँ लेती थी अंगड़ाई जहाँ

मोड़ नफ़रत के उसी राहगुज़र में आए

धर्म क्या उन का था, क्या ज़ात थी, ये जानता कौन

घर न जलता तो उन्हें रात में पहचानता कौन

घर जलाने को मिरा लोग जो घर में आए

शाकाहारी थे मेरे दोस्त तुम्हारे ख़ंजर

तुम ने बाबर की तरफ़ फेंके थे सारे पत्थर

है मिरे सर की ख़ता, ज़ख़्म जो सर में आए

पाँव सरजू में अभी राम ने धोए भी न थे

कि नज़र आए वहाँ ख़ून के गहरे धब्बे

पाँव धोए बिना सरजू के किनारे से उठे

राम ये कहते हुए अपने द्वारे से उठे

राजधानी की फ़ज़ा आई नहीं रास मुझे

छे दिसम्बर को मिला दूसरा बन-बास मुझे

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हो सकता है कि कुछ ‘भक्त’ लोग कैफ़ी आज़मी को ‘विधर्मी’ मान लें और यह सोचें कि ये जानबूझकर मुसलमान होने के कारण ‘दूसरा बन–बास’ कह रहे हैं तो उन के लिए प्रस्तुत है ज्ञानपीठ पुरस्कार प्राप्त कवि कुँवर नारायण, जो वामपंथी भी नहीं हैं, की कविता ‘अयोध्या, 1992’ :

हे राम,

जीवन एक कटु यथार्थ है

और तुम एक महाकाव्य!

तुम्हारे बस की नहीं

उस अविवेक पर विजय

जिसके दस बीस नहीं

अब लाखों सिर – लाखों हाथ हैं

और विभीषण भी अब

न जाने किसके साथ है।

इससे बड़ा क्या हो सकता है

हमारा दुर्भाग्य

एक विवादित स्थल में सिमट कर

रह गया तुम्हारा साम्राज्य

अयोध्या इस समय तुम्हारी अयोध्या नहीं

योद्धाओं की लंका है,

‘मानस’ तुम्हारा ‘चरित’ नहीं

चुनाव का डंका है!

हे राम, कहाँ यह समय

कहाँ तुम्हारा त्रेता युग,

कहाँ तुम मर्यादा पुरुषोत्तम

और कहाँ यह नेता – युग!

सविनय निवेदन है कि प्रभु कि लौट जाओ

किसी पुराण –– किसी धर्मग्रन्थ में

सकुशल सपत्नीक ...

अबके जंगल वो जंगल नहीं

जिनमें घूमा करते थे वाल्मीक!

ऊपर की दोनों कविताएँ हमें यह स्पष्ट करती हैं कि 6 दिसंबर 1992 ई. को भारतीय हिंदू जनता राम से कितनी दूर चली गई थी?  रामचरितमानस में राम ने अपने प्रिय होने की कसौटी जो बतलाई है क्या उसके आधार पर इस राम मंदिर से जुड़े लोग राम को सच में प्रिय हो सकते हैं? 

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने एक भावुक पत्र लिखा है जिसे उन्होंने रामचरितमानस के उत्तरकांड की पंक्तियों से आरंभ किया है और यह कहा है कि ‘यह युग रामराज्य का है।’ ऊपर रामचरितमानस की जो पंक्तियाँ दी गई हैं वे भी उत्तरकांड की ही हैं। क्या योगी आदित्यनाथ अपने को राम की कसौटी पर ख़ुद को जाँच कर अपने को ही भरोसा दिला सकते हैं कि वे सच्चे रामप्रेमी हैं? इन बातों से यह निश्चित है कि 6 दिसंबर 1992 ई. को बाबरी मसजिद का विध्वंस राम से दूर जाने की घटना थी तो अब राम मंदिर का निर्माण राम को पूरी तरह खो देने की। क्या भारत के हिंदू सच में अपने राम को खो देना चाहते हैं?

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योगेश प्रताप शेखर
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