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एमजीआर-एनटीआर जैसा करिश्मा कर पाएँगे रजनीकांत, कमल?

दक्षिण की राजनीति में एक बार फिर फ़िल्मी सितारों की धूम है। बड़े-बड़े नामचीन कलाकारों के राजनीति में आने से स्थिति ऐसी बनती लग रही है कि सत्ता एक बार फिर फ़िल्मी सितारों के ईद-गिर्द घूमेगी। रजनीकांत, कमल हासन, पवन कल्याण, प्रकाश राज, उपेंदर जैसे कलाकार राजनीतिक दंगल में कूद पड़े हैं। मलयालम फ़िल्मों के सुपरस्टार मोहनलाल के भी राजनीति में आने के संकेत दिखाई देने लगे हैं। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या ये फ़िल्मी सितारे एम.जी. रामचंद्रन (एमजीआर) या एन.टी. रामा राव (एनटीआर) की तरह करिश्मा कर पाएँगे?

सवाल और भी कई हैं। मसलन, क्या रजनीकांत और कमल हासन अपने दम पर अपनी पार्टी को चुनाव जिताकर ख़ुद मुख्यमंत्री बनने की क्षमता रखते हैं? क्या पवन कल्याण अपने बड़े भाई ‘मेगास्टार’ चिरंजीवी के राजनीति में कोई धमाल न मचा पाने के सच को पीछे छोड़कर नया इतिहास लिखने की ताक़त रखते हैं? क्या प्रकाश राज में वाकई राजनीति बदलने और एक नया विकल्प देने की ताक़त है? क्या मोहनलाल राजनीति के दंगल में कूदेंगे और अगर वह राजनीति में आते हैं तो वह केरल में बीजेपी के लिए बड़ा जनाधार खड़ा कर पाएँगे? इन सभी सवालों का जवाब समय देगा, लेकिन इतना तय है कि आने वाले लोकसभा चुनाव और दक्षिण के पाँच राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनावों में फ़िल्मी सितारों की भूमिका बड़ी होगी।

  • फ़िल्मी सितारों ने सबसे ज्यादा धूम तमिलनाडु में मचाई है। तमिलनाडु की राजनीति और फ़िल्मी दुनिया का रिश्ता बहुत ही गहरा और तगड़ा है। राजनीति को एक नयी दशा और दिशा देने वाले पहले फ़िल्मी कलाकार थे तमिलनाडु के सुपरस्टार एमजीआर।
एमजीआर के अभिनय का जादू लोगों के सर चढ़कर बोलता था। वह इतने लोकप्रिय थे कि कई लोग उन्हें भगवान मानते थे और उनकी पूजा करते थे। एमजीआर की राजनीतिक पारी की शुरुआत द्रविड़ आंदोलन से हुई थी। 'पेरियार' के नाम से मशहूर ईवीके रामास्‍वामी ने धार्मिक रूढ़िवादिता, सामाजिक कुरीतियों, अंधविश्वासों, जाति के नाम पर भेदभाव आदि के ख़िलाफ़ द्रविड़ आंदोलन की शुरुआत की थी। उस ज़माने के बड़े-बड़े राजनेता, अभिनेता और दूसरी बड़ी हस्तियाँ इस आंदोलन से जुड़ीं। द्रविड़ आंदोलन से जुड़ने वालों में राजनेता अन्‍नादुरै, मशहूर पटकथा लेखक और रचनाकार करूणानिधि और सुपरस्टार एमजीआर भी शामिल थे। कुछ मुद्दों पर मतभेद की वजह से अन्‍नादुरै पेरियार से अलग हुए। 
  • अन्नादुरै ने साल 1949 में द्रविड़ मुन्नेत्र कड़गम (डीएमके) नाम से एक राजनीतिक दल बनाया। साल 1967 में वह मद्रास राज्य के पहले गैर-कांग्रेसी मुख्यमंत्री बने। साल 1969 में जब मद्रास राज्य का नाम बदलकर तमिलनाडु किया गया तब उन्हें तमिलनाडु के पहले मुख्यमंत्री होने का गौरव हासिल हुआ।

अन्नादुरै के निधन के बाद डीएमके की कमान करूणानिधि की हाथों में आई। इस समय एमजीआर भी डीएमके में ही थे। लेकिन, कुछ समय बाद करूणानिधि और एमजीआर के बीच मतभेद उभरे और थोड़े ही समय में चरम पर पहुँच गए। एमजीआर ने डीएमके से नाता तोड़कर अपनी ख़ुद की पार्टी बनाई और उसका नाम रखा ऑल इंडिया अन्ना द्रविड़ मुन्नेत्र कड़गम (एआईएडीएमके)। एमजीआर ने जिस समय पार्टी बनाई थी उस समय वह लोकप्रियता के शिखर पर थे। लेकिन सत्ता में आने के लिए एमजीआर को पाँच साल का इंतज़ार करना पड़ा। साल 1977 में हुए विधानसभा चुनाव में एआईएडीएमके भारी बहुमत से जीत हासिल की और एमजीआर मुख्यमंत्री बने। अपनी मृत्यु तक वह मुख्यमंत्री रहे। उनके निधन के बाद उनकी पत्नी जानकी और मशहूर फ़िल्म अभिनेत्री जयललिता में वर्चस्व को लेकर जंग हुई। इस जंग में कामयाबी जयललिता को ही मिली और एआईएडीएमके की कमान भी उन्हीं के हाथों में आई। आगे चलकर जयललिता भी मुख्यमंत्री बनीं और लम्बे समय तक सत्ता में रहीं। साल 2016 में जयललिता का निधन हुआ और 2018 में करूणानिधि की मृत्यु। 

फ़िल्मी हस्तियों- करूणानिधि, एमजीआर और जयललिता ही पिछले पाँच दशकों यानी पूरे पचास साल सत्ता के केंद्र में बने रहे, राजनीति भी इन्हीं तीनों के इर्द-गिर्द ही घूमती रही। शिवाजी गणेशन, विजयकांत भी राजनीति के दंगल में कूदे पर क़ामयाब नहीं रहे।

रजनीकांत

  • पिछले दो दशकों से यह अटकलें थीं कि सुपरस्टार रजनीकांत राजनीति में आएँगे लेकिन वह परोक्ष रूप से राजनीति में नहीं आए। लेकिन, जयललिता की मृत्यु के बाद उन्हें लगा कि एक तमिलनाडु में वह अपनी राजनीतिक ज़मीन तलाश सकते हैं।

अब तक जो संकेत मिले हैं उससे यही लगता है कि रजनीकांत की नज़र एआईएडीएमके के कार्यकर्ताओं और नेताओं पर है, क्योंकि जयललिता के निधन के बाद से ही इन्हें एक दमदार नेता की तलाश है। मुख्यमंत्री पलानीसामी और उपमुख्यमंत्री पन्नीरसेल्वम - दोनों में से किसी में पार्टी को चुनाव जिताने की ताक़त नहीं है। रजनी की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से तगड़ी दोस्ती है, इसी वजह से यह भी तय माना जा रहा है कि वह किसी के भी ख़िलाफ़ जा सकते हैं लेकिन बीजेपी के ख़िलाफ़ नहीं।

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कमल हासन 

अगर बात कमल हासन की करें तो लोकप्रियता के मामले में वह रजनीकांत से पीछे हैं। कमल ने संकेत दिए हैं कि वह किसी के भी साथ जाने को तैयार हैं लेकिन बीजेपी के साथ नहीं। युवा अभिनेता विशाल भी राजनीति के दंगल में हैं लेकिन उनकी चमक रजनी और कमल के सामने फीकी है।

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पवन कल्याण

आंध्रप्रदेश में इस बार सभी की नज़र 'पावरस्टार' पवन कल्याण पर टिकी हैं। पवन ने 2014 के चुनाव में मोदी-चंद्रबाबू की जोड़ी का साथ दिया था। मोदी और चंद्रबाबू की जोड़ी टूट चुकी है और पवन भी अब इन दोनों के विरोधी हैं। पवन की पार्टी जनसेना वामपंथियों के साथ मिलकर चुनाव लड़ सकती है। पवन सुपरस्टार चिरंजीवी के छोटे भाई हैं। चिरंजीवी ने प्रजा राज्यम पार्टी बनाई थी और 2009 का चुनाव लड़ा था। वाईएसआर की लहर में कांग्रेस के हाथों हार के बाद चिरंजीवी ने अपनी पार्टी का विलय कांग्रेस में कर दिया था और उन्हें इसके लिए मनमोहन सिंह सरकार में मंत्री बनाया गया था। कांग्रेस में प्रजा राज्यम चिरंजीवी के छोटे भाई पवन ने अपनी नयी पार्टी बना ली थी। पवन का मुकाबला चंद्रबाबू की तेलुगु देशम पार्टी और जगन मोहन रेड्डी की वाईएसआर कांग्रेस से है। आंध्र की राजनीति में पवन का असर तो होगा लेकिन उनसे यह कोई भी उम्मीद नहीं कर रहा है कि वह एनटीआर जैसा करिश्मा कर पाएँगे। साल 1983 में सुपरस्टार एनटीआर ने 'तेलुगु स्वाभिमान' का नारा देकर कांग्रेस के ख़िलाफ़ तेलुगु देशम पार्टी बनाई थी और पार्टी बनाने के 8 महीने बाद ही चुनाव जीतकर मुख्यमंत्री बन गए थे। एनटीआर भी एमजीआर की तरह ही पूजे जाते थे। आंध्र में एनटीआर ने फ़िल्मी दुनिया और राजनीति में जो लोकप्रियता हासिल की उनकी किसी अन्य को नहीं मिली। कृष्णा, जमुना, चिरंजीवी जैसे बड़े फ़िल्मी स्टार भी राजनीति में आए लेकिन एनटीआर के सामने फीके ही रहे। जयप्रदा ने राजनीति की शूरुआत तेलुगु देशम से की थी, लेकिन चंद्रबाबू से मतभेदों के कारण वे दक्षिण की साइकिल छोड़कर उत्तर की साइकिल पर सवार हो गईं, यानी समाजवादी पार्टी में शामिल हो गई थीं।

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मोहनलाल

केरल में सभी को इंतज़ार है सुपरस्टार मोहनलाल के फ़ैसले का। अटकलें हैं कि मोहनलाल बीजेपी में जा सकते हैं और बीजेपी उन्हें अपना मुख्यमंत्री उम्मीदवार बना सकती है। मोहनलाल केरल के बेहद लोकप्रिय फ़िल्मी कलाकार हैं। वैसे तो फिल्म स्टार सुरेश गोपी पहले से ही बीजेपी में हैं, लेकिन वे पार्टी का जनाधार बढ़ाने में क़ामयाब नहीं रहे हैं। मोहनलाल में केरल में कांग्रेस और वामपंथियों का खेल बिगाड़ने की क्षमता है।

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प्रकाश राज

एक और शख्सियत जो दक्षिण की राजनीति में धमाल मचा सकती है वो प्रकाश राज है। प्रकाश राज सुपरस्टार नहीं हैं लेकिन किसी सुपर स्टार से कम भी नहीं हैं। प्रकाश राज उच्च कोटि के कलाकार हैं और अलग-अलग किरदारों के ज़रिये उन्होंने लाखों लोगों के दिल में अपनी ख़ास जगह बनाई है। उनके भी कई दीवाने हैं। प्रकाश राज ने अगला लोकसभा चुनाव निर्दलीय के रूप में लड़ने का फ़ैसला किया है। उनकी अब तक की बातों से साफ़ है कि वह भी बीजेपी के ख़िलाफ़ ही रहेंगे, यानी कर्नाटक में बीजेपी को नुकसान पहुँचाने की पूरी कोशिश करेंगे।

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अम्बरीश के निधन के बाद कोई बड़ी फ़िल्मी हस्ती कन्नड़ राजनीति में दिखाई नहीं दे रही थी और प्रकाश राज ने अब इस खालीपन को पूरा कर दिया है। कुछ समय से फ़िल्म स्टार उपेंदर भी अपनी पार्टी 'उत्तम प्रजाकीय पार्टी' के साथ राजनीति में हैं, लेकिन कोई ख़ास असर दिखा पाने में क़ामयाब नहीं हो पाए हैं। दक्षिण में कमाल-धमाल की उम्मीद रजनी और मोहनलाल से ही ज़्यादा है।

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