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मुसलमानों की जनसंख्या वृद्धि दर में हो रही है कमी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वतंत्रता दिवस के मौके पर लाल किले की प्राचीर से भाषण देते हुए जनसंख्या विस्फोट पर चिंता जताई। उन्होंने सीधे इसे देशभक्ति से जोड़ दिया और कहा कि छोटा परिवार रखना भी देशभक्ति है। 
इसके बाद मुख्यधारा की मीडिया और सोशल मीडिया पर इस मुद्दे पर बहस छिड़ गई। यह सवाल उठाया जाने लगा कि जनसंख्या बढ़ते रहने के लिए कौन ज़िम्मेदार है। कुछ लोगों ने इस बहस में मुसलमानों को निशाना बनाया और कहा कि उनकी जनसंख्या बहुत ही तेज़ी से बढ़ रही है। कुछ लोगों ने तो यहाँ तक कह दिया कि जल्द ही मुसलमानों की संख्या हिन्दुओं से ज़्यादा हो जाएगी।
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जनगणना 2011 की रिपोेर्ट के आधार पर कहा जा सकता है कि देश की आबादी में मुसलमानों का हिस्सा बढ़ गया है। 2001 में कुल आबादी में मुसलमान 13.4 प्रतिशत थे, जो 2011 में बढ़ कर 14.2 प्रतिशत हो गये! असम, पश्चिम बंगाल, जम्मू-कश्मीर, केरल, उत्तराखंड, हरियाणा और यहाँ तक कि दिल्ली की आबादी में भी मुसलमानों का हिस्सा पिछले दस सालों में काफ़ी बढ़ा है! असम में 2001 में क़रीब 31 प्रतिशत मुसलमान थे, जो 2011 में बढ़ कर 34 प्रतिशत के पार हो गये। पश्चिम बंगाल में 25.2 प्रतिशत से बढ़ कर 27, केरल में 24.7 प्रतिशत से बढ़ कर 26.6, उत्तराखंड में 11.9 प्रतिशत से बढ़ कर 13.9, जम्मू-कश्मीर में 67 प्रतिशत से बढ़ कर 68.3, हरियाणा में 5.8 प्रतिशत से बढ़ कर 7 और दिल्ली की आबादी में मुसलमानों का हिस्सा 11.7 प्रतिशत से बढ़ कर 12.9 प्रतिशत हो गया।

क्या हुआ बांग्लादेशियों का?

बाक़ी देश के मुक़ाबले असम और पश्चिम बंगाल में मुसलिम आबादी में हुई भारी वृद्धि के पीछे बांग्लादेश से होनेवाली घुसपैठ भी एक बड़ा कारण है। हर जनगणना के बाद यह सवाल उठता रहा है कि मुसलमानों की आबादी बाक़ी देश के मुक़ाबले ज़्यादा तेज़ क्यों बढ़ रही है? और क्या एक दिन मुसलमानों की आबादी इतनी बढ़ जायेगी कि वह हिन्दुओं से संख्या में आगे निकल जायेंगे? ये सवाल आज से नहीं उठ रहे हैं।
आज से सौ साल से भी ज़्यादा पहले 1901 में जब अविभाजित भारत में आबादी के आँकड़े आये और पता चला कि 1881 में 75.1 प्रतिशत हिन्दुओं के मुक़ाबले 1901 में उनका हिस्सा घट कर 72.9 प्रतिशत रह गया है, तब बड़ा बखेड़ा खड़ा हुआ था।
उसके बाद से लगातार यह बात उठती रही है कि मुसलमान तेज़ी से अपनी आबादी बढ़ाने में जुटे हैं, वह चार शादियाँ करते हैं, अनगिनत बच्चे पैदा करते हैं, परिवार नियोजन को ग़ैर-इसलामी मानते हैं और अगर उन पर अंकुश नहीं लगाया गया तो एक दिन भारत मुसलिम राष्ट्र हो जायेगा!
क्या सचमुच ऐसा हो जाएगा? क्या है जनसंख्या वृद्धि का सच? हम इसकी पड़ताल करेंगे। 

मुसलमान: मिथ और सच्चाई!

यह सही है कि मुसलमानों की आबादी हिन्दुओं या और दूसरे धर्मावलम्बियों के मुक़ाबले ज़्यादा तेज़ी से बढ़ी है। 1961 में देश में केवल 10.7 प्रतिशत मुसलमान और 83.4 प्रतिशत हिन्दू थे, जबकि 2011 में मुसलमान बढ़ कर 14.2 प्रतिशत हो गये और हिन्दुओं के घट कर 80 प्रतिशत से कम रह जाने का अनुमान है। लेकिन फिर भी न हालत उतनी 'विस्फोटक' है, जैसी उसे बनाने की कोशिश की जा रही और न ही उन तमाम 'मिथों' में कोई सार है, जिन्हें मुसलमानों के बारे में फैलाया जाता है। सच यह है कि पिछले दस-पन्द्रह सालों में मुसलमानों की आबादी की बढ़ोत्तरी दर लगातार गिरी है।
1991 से 2001 के दस सालों के बीच मुसलमानों की आबादी 29 प्रतिशत बढ़ी थी, लेकिन 2001 से 2011 के दस सालों में यह बढ़त सिर्फ़ 24 प्रतिशत ही रही. हालाँकि कुल आबादी की औसत बढ़ोत्तरी इन दस सालों में 18 प्रतिशत ही रही। उसके मुक़ाबले मुसलमानों की बढ़ोत्तरी दर 6 प्रतिशत अंक ज़्यादा है, लेकिन फिर भी उसके पहले के दस सालों के मुक़ाबले यह काफ़ी कम है।
एक रिसर्च रिपोर्ट (हिन्दू-मुसलिम फ़र्टिलिटी डिफ़्रेन्शियल्स: आर. बी. भगत और पुरुजित प्रहराज) के मुताबिक़ 1998-99 में दूसरे राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के समय जनन दर (एक महिला अपने जीवनकाल में जितने बच्चे पैदा करती है) हिन्दुओं में 2.8 और मुसलमानों में 3.6 बच्चा प्रति महिला थी. 2005-06 में हुए तीसरे राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (Vol 1, Page 80, Table 4.2) के अनुसार यह घट कर हिन्दुओं में 2.59 और मुसलमानों में 3.4 रह गयी थी।
नेशनल फ़ैमिली हेल्थ सर्वे यानी एनएफ़एचएस 2015-16 के सर्वे में पाया गया है कि हिन्दुओं और मुसलमानों के प्रजनन दर में अंतर पहली बार कम हुआ है।
प्रजनन दर का मतलब है कोई औरत अपने जीवन काल में औसतन कितने बच्चे पैदा करती है। एनएफएचएस 2005-06 में पाया गया था कि मुसलमानों की प्रजनन दर 3.4 थी जबकि हिन्दुओं में यह 2.6 बच्चे थी। इस तरह दोनों समुदायों के बीच 30.8 प्रतिशत का अंतर पाया गया था। लेकिन 2015-16 के सर्वे में यह अंतर 23.8 प्रतिशत हो गया।

प्रजनन दरों के अंतर में कमी

चालीस साल में पहली बार ऐसा हुआ है कि दोनों समुदायों के बीच प्रजनन दर के अंतर में कमी आई है। आज़ादी के समय मुसलमानों की प्रजनन दर हिन्दुओं के प्रजनन दर से 10 प्रतिशत अधिक थी। यह अंतर 1970 के दशक में बढ़ने लगी कि क्योंकि हिन्दुओं में गर्भ निरोधक उपाय किए जाने लगे। हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच प्रजनन दर में अंतर 1990 के दशक में 30 प्रतिशत था। जनगणना और एनएफएचएस सर्वे दोनों  से ही यह साफ़ है कि हिन्दुओं और मुसलमानों के प्रजनन दर में अंतर यहीं रुक गया। 
लेकिन इसके बाद यह अंतर कम होने लगा। हिन्दुओं और मुसलमानों दोनों के ही प्रजनन दर में कमी आई, पर मुसलमानों में यह कमी हिन्दुओं के प्रजनन दर में कमी से  ज्यादा है। जब किसी देश की जनसंख्या बदलती है तो अमूमन यह होता है कि पहले बड़ी आबादी वालों में प्रजनन दर में कमी आती है, उसके बाद छोटी आबादी वालों में प्रजनन दर गिरती है और दोनों के बीच अंतर कम होता जाता है। दोनों जहाँ लगभग एक समान हो जाते हैं, उसे रीप्लेसमेंट फर्टिलिटी रेट कहते हैं। यह वह प्रजनन दर है, जिस पर आकर जनसंख्या स्थिर हो जाती है। भारत में यह दर 2.1 है, यानी यदि हर औरत अपने जीवनकाल में औसतन 2.1 बच्चे पैदा करेगी तो भारत की जनसंख्य बढनी रुक जाएगी। 

स्थिर जनसंख्या!

एनएफएचएस 2015-16 से पता चलता है कि हिन्दू समुदाय का प्रजनन दर उस स्तर पर पहुँच चुका है, जहाँ उसकी जनसंख्या स्थिर हो जाएगी। लेकिन हिन्दू-मुसलमान प्रजनन दर में अभी भी अंतर है, मुसलमानों में प्रजनन दर ज़्यादा है। इससे साफ़ है कि 2021 जनसंख्या रिपोर्ट में मुसलमानों की प्रजनन दर हिन्दुओं के प्रजनन दर से ज्यादा होगा, लेकिन दोनों में अंतर पहले के अंतर से कम होगा। 
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