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प्रशांत भूषण केस में पूर्व जजों का ज़िक्र क्यों, कोर्ट ने क्यों कहा- इस पर बहस न करें

अदालत की अवमानना का सामना कर रहे प्रशांत भूषण का समर्थन करने के लिए क्या हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज भी क्या अवमानना के दायरे में आ जाएँगे? यह वह सवाल है जब प्रशांत भूषण की सज़ा को लेकर गुरुवार को सुनवाई के दौरान प्रशांत भूषण के वकील की तरफ़ से उठाया गया। आख़िर इन पूर्व न्यायाधीशों ने अवमानना मामले या फिर सुप्रीम कोर्ट के बारे में ऐसा क्या कह दिया है कि उनका ज़िक्र कोर्ट में हुआ? उन्होंने प्रशांत भूषण का समर्थन क्यों किया?

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दरअसल, यह मामला गुरुवार को सुनवाई के दौरान तब आया जब प्रशांत भूषण की तरफ़ से पेश वकील राजीव धवन पक्ष रख रहे थे। दलील देने के दौरान उन्होंने पूर्व न्यायाधीशों के बयानों का ज़िक्र किया। इसमें जस्टिस आर एम लोढ़ा, जस्टिस मदन बी लोकुर, जस्टिस ए पी शाह और कुरियन जोसफ़ शामिल हैं। इन्होंने प्रशांत भूषण पर कोर्ट की अवमानना का केस चलाने और दोषी ठहराए जाने तक पर सवाल उठाए हैं। इसी को लेकर राजीव धवन ने कहा कि प्रशांत भूषण का समर्थन करने के लिए क्या ये पूर्व जज भी अवमानना दायरे में आएँगे? इस पर सुनवाई करने वाली बेंच में शामिल जस्टिस अरुण मिश्रा ने कहा कि 'कृपया उस पर हमारी टिप्पणी न माँगे। कृपया इस सब पर बहस न करें।'

सवाल है कि आख़िर राजीव धवन ने इन पूर्व न्यायाधीशों का ज़िक्र क्यों किया? क्या इन न्यायाधीशों के बयानों से प्रशांत भूषण का पक्ष मज़बूत हुआ? पढ़िए, अपने बयानों में क्या कहा है इन न्यायाधीशों ने-

जस्टिस कुरियन जोसेफ़

20 अगस्त की सुनवाई से पहले एक बयान में सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस कुरियन जोसेफ़ ने कहा था कि प्रशांत भूषण के ख़िलाफ़ अवमानना ​​मामलों की सुनवाई संविधान पीठ द्वारा की जानी चाहिए क्योंकि इसमें क़ानून का एक बड़ा सवाल शामिल है।

जस्टिस जोसेफ़ ने कहा कि अदालत को यह भी जाँचना चाहिए कि क्या सुप्रीम कोर्ट द्वारा स्वत: संज्ञान में लेकर दोषी ठहराए जाने वाले के लिए कोर्ट के अंदर ही अपील की व्यवस्था नहीं होनी चाहिए।

इसके लिए जस्टिस जोसेफ़ ने आपराधिक मामलों का हवाला देते हुए कहा कि चूँकि अन्य सभी स्थितियों में आपराधिक मामलों में दोषी ठहराए जाने के बाद दोषी एक अपील का अवसर मिलने का हक़दार है।

जस्टिस जोसेफ़ ने कहा, 'न्यायमूर्ति सीएस कर्णन के ख़िलाफ़ मुक़दमा दायर करने के मामले में सर्वोच्च न्यायालय की पूर्ण अदालत की सामूहिक समझदारी थी कि इस मामले को कम से कम सात वरिष्ठतम न्यायाधीशों वाली बेंच सुने। वर्तमान के अवमानना ​​मामले केवल एक या दो व्यक्तियों से जुड़े मामले नहीं हैं; बल्कि न्याय से संबंधित देश की अवधारणा और न्यायशास्त्र से जुड़ा बड़ा मुद्दा है। इस तरह के महत्वपूर्ण मामलों को फीजिकल सुनवाई में ही विस्तृत रूप से सुना जाना चाहिए जहाँ व्यापक चर्चा और व्यापक भागीदारी की गुंजाइश होती है।'

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जस्टिस मदन बी लोकुर और ए पी शाह

प्रशांत भूषण अवमानना मामले में सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस मदन बी लोकुर और दिल्ली व मद्रास हाई कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश ए पी शाह का भी बयान आया था। 

कॉमनवेल्थ मानवाधिकार इनिशियटिव यानी सीएचआरआई के बोर्ड मेंबर जस्टिस लोकुर और एपी शाह ने बयान जारी कर कई सवाल उठाए थे। सीएचआरआई के इस बयान में कहा गया कि यह फ़ैसला 'देश में बोलने की आज़ादी की स्थिति में गिरावट' का संकेत है।

बयान में कहा गया है कि भले ही अवमानना के लिए दोषी ठहराए गए भूषण के ट्वीट 'अनुचित' हैं, इसके लिए ऐसा निर्णय देकर सुप्रीम कोर्ट ने आलोचना की क़ीमत चुकाने का संदेश दे दिया है।

बयान में यह भी कहा गया, 'न्यायपालिका में जनता का विश्वास लोगों के अधिकारों को सुरक्षित रखकर बनाए रखा जाता है न कि महामारी के दौरान अवमानना ​​के क़ानून का उपयोग करके मानवाधिकारों के संरक्षक प्रशांत भूषण को उनकी अभिव्यक्ति की आज़ादी के लिए दोषी ठहराकर। वह भी तब जब अदालत का कामकाज रुका हुआ है, जब अन्य महत्वपूर्ण मामलों को नहीं सुना जा रहा है।'

बयान में यह भी कहा गया कि यह मौजूदा आपराधिक अवमानना क़ानून को ख़त्म किए जाने की माँग का समर्थन करता है। इसने यह भी कहा कि यह 'औपनिवेशिक निशानी है जहाँ विरोध की आवाज़ को अपराध बनाया गया था।'

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पूर्व सीजेआई आर. एम. लोढ़ा

भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश आर. एम. लोढ़ा इसपर आश्चर्यचित हुए कि सुप्रीम कोर्ट ने महामारी के बीच एक वर्चुअल अदालत में सुनवाई कर प्रशांत भूषण के ख़िलाफ़ मुकदमे की सुनवाई के लिए तेज़ी दिखाई।

जस्टिस लोढ़ा ने शुक्रवार को 'द हिंदू' को दिए एक इंटरव्यू में कहा कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता की तत्काल सुनवाई और सुरक्षा के लिए शुरू की गई वर्चुअल अदालत प्रणाली 'वास्तव में किसी की स्वतंत्रता को बाधित कर रही थी'। उन्होंने कहा,

यह वास्तव में आश्चर्यजनक है कि इस तरह का मामला एक महामारी के दौरान उठाया गया है और जब अदालत में फीजिकल सुनवाई नहीं हो रही है। यह मामला तब जल्द से जल्द उठाया जा सकता था जब कोर्ट में फीजिकल सुनवाई बहाल हो गई होती। यह मेरे लिए थोड़ा परेशान करने वाला है।


आर. एम. लोढ़ा, पूर्व मुख्य न्यायाधीश

जस्टिस लोढ़ा ने कहा कि आपराधिक अवमानना ​​मामले में न्याय देने के लिए वर्चुअल अदालत की सुनवाई एक उचित प्रणाली नहीं है। उन्होंने कहा, 'एक आपराधिक अवमानना ​​मामला अदालत और एक पक्षकार के बीच है। कोई तीसरा पक्ष शामिल नहीं है। इसलिए, पक्षकार को पूरी तरह से आश्वस्त किया जाना चाहिए कि उसे प्रक्रियात्मक निष्पक्षता और पूरी सुनवाई के साथ प्रदान की जा रही है। एक वर्चुअल कोर्ट इन मापदंडों को पूरा नहीं करता है।'

बता दें कि अवमानना मामले में दोषी ठहराए गये प्रशांत भूषण को सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को 2 दिन की मोहलत देते हुए अपना जवाब दाखिल करने को कहा है। इस बीच अटार्नी जनरल के.के. वेणुगोपाल ने सुप्रीम कोर्ट से आग्रह किया है कि प्रशांत भूषण को अवमानना करने पर सज़ा न दी जाए। मामले पर सुप्रीम कोर्ट में सोमवार को अगली सुनवाई हो सकती है। 

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