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बैंकों का कितना पैसा है डूबने के कगार पर, वसूली के लिए क्या कर रही है सरकार?

यस बैंक के डूबने की ख़बर जब फैली और यह भी कि रिज़र्व बैंक ने हस्तक्षेप किया और अधिकतम रकम निकालने की एक सीमा तय कर दी है तो यह सवाल भी उठा कि ऐसा क्यों हुआ। रिज़र्व बैंक ने अपनी जाँच में पाया है कि 2018-19 के दौरान यस बैंक ने 3,299 करोड़ रुपए के जो क़र्ज़ दे रखे थे, वे एनपीए यानी नॉन परफॉर्मिंग असेट बन गए।
इसका मतलब यह कि इन कर्ज़ों पर बैंक को ब्याज मिलना बंद हो गया। इस वजह से ही बैंक डूबने के कगार पर पहुँच गया है।

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कितना पैसा फंसा हुआ है?

इसके साथ ही यह सवाल भी उठा कि क्या दूसरे बैंकों के साथ भी यह समस्या है, क्या दूसरे बैंक भी एनपीए की समस्या से इस जूझ रहे हैं कि वे भी डूब सकते हैं? इसके साथ ही यह सवाल उठना लाज़िमी था कि आख़िर पूरे बैंकिंग क्षेत्र में कितनी रकम इस तरह फंसी हुई है और उसे निकालने की क्या कोशिश सरकार कर रही है या इस मामले में सरकार की क्या नीति है।
एक मोटे अनुमान के अनुसार, 31 मार्च, 2018 को सभी बैंकों का कुल 10.35 लाख करोड़ रुपए का एनपीए हो गया था। इसमें 85 प्रतिशत हिस्सा सरकारी बैंकों का था और सिर्फ 15 प्रतिशत एनपीए निजी बैंकों का था।
इसे एक उदाहरण से समझा जा सकता है कि अकेले स्टे बैंक का एनपीए 2.23 लाख करोड़ रुपए था। 

क्या होता है एनपीए?

जब किसी क़र्ज़ पर लगातार तीन किश्त यानी 90 दिनों तक बैंक को पैसे नहीं मिलते हैं तो इसे एनपीए कहा जाता है। इसका मतलब यह हुआ कि यह बैंक की वह संपत्ति है, जो काम नहीं कर रही है, यानी यह संपत्ति तो है, पर उससे बैंक को कुछ मिल नहीं रहा है। चालू भाषा में इसे ‘बैड लोन’ भी कहते हैं। 
यह पाया गया है कि 31 मार्च, 2019 को कुल एनपीए 9.4 लाख करोड़ रुपए था। उम्मीद की जाती है कि 31 मार्च, 2020, को इसके घट कर 9.10 लाख करोड़ रुपए होने की संभावना है।
दिलचस्प बात यह है कि इन डूबे हुए पैसों का बड़ा हिस्सा बड़े कॉरपोरेट घराने के पास फंसा हुआ है। नेशनल कंपनी लॉ ट्राइब्यूनल ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि 5.40 करोड़ रुपए कॉरपोरेट जगत के पास पड़ा हुआ है।

क्यों डूबता है क़र्ज़

  • क़र्ज लेने वाली कंपनी का कारोबार चल नहीं पाता है, उसे घाटा होता है।
  • कंपनियाँ कई बार क़र्ज़ लेकर किसी दूसरे व्यवसाय में वह पैसा लगा देती है, मूल व्यवसाय से पैसे मिलते नहीं हैं।
  • कई बार कंपनी या उसके आला अफ़सर धोखाधड़ी करते हैं, पैसे मार लेते हैं, जान बूझ कर भुगतान नहीं करते। 
  • पूरी अर्थव्यवस्था में मंदी आने से भी यह संकट पैदा होता है, जैसा अभी चल रहा है। 
  • कई बार कंपनियों में आपसी प्रतिस्पर्द्धा ज़्यादा होती है, वे उस होड़ में विरोधी को पछाड़ने के लिए क़र्ज़ ले लेती हैं और उस प्रतिस्पर्द्धा में टिक नहीं पाती हैं। जैसे दूरसंचार कंपनियेो के साथ हुआ।
  • कई बार बैंक या वित्तीय कंपनियों के आला अफ़सर क़र्ज़ लेने वाले से मिलीभगत कर लेते हैं और जान बूझ कर नियम क़ानूनों का उल्लंघन या अनदेखी कर क़र्ज़ दे देते हैं। 

क्या असर होता है?

  • क़र्ज़ देने वाले बैंक का मुनाफ़ा कम हो जाता है।
  • कई बार बैंक मुनाफ़ा ठीक रखने के लिए ब्याज दर बढ़ा देते हैं, ख़ामियाजा क़र्ज़ लेने वाले भुगतते हैं।
  • बैंक उस सेक्टर को क़र्ज़ नहीं देते , जिसमें पैसे फंस जाते हैं।बैंक क़र्ज़ देने से बचते हैं, भले ही उनके पास फालतू पैसे पड़े हों।
  • बैंकों का बैलंश शीट ख़राब होता है क्योंकि उन्हें उसमें दिखाना पड़ता है कि इतने पैसे एनपीए हैं।

क़र्ज़ उगाही के उपाय?

  • 1991 में तत्कालीन वित्त मंत्री मनमोहन सिंह ने रिज़र्व बैंक के पूर्व गवर्नर एम. एल. नरसिम्हन की अगुआई में एक कमेटी गठन किया, जिसे डूबे पैसों की उगाही के लिए सुझाव देने को कहा गया।
  • 1993 में क़र्ज उगाही ट्राइब्यूनल की स्थापना की गई।
  • 2001 में लोक अदालत की स्थापना की गई, इसमें 5 लाख रुपए तक के क़र्ज़ की सुनवाई की व्यवस्था की गई, ताकि मुक़दमा बग़ैर ही उगाही हो जाए।
  • 2001 कम्प्रोमाइज सेटलमेंट, इसके तहत 10 करोड़ रुपए तक के क़र्ज़ की उगाही का तरीका निकाला गया।
  • 2002 में केंद्र सरकार ने एक क़ानून पारित किया, इसमें व्यवस्था की गई कि नोटिस के बाद भी पैसे न मिलने पर क़र्ज़ लेने वाली कंपनी का प्रबंधन क़र्ज़ देने वाला बैंक अपने हाथ में ले लेगा।
  • 2002 में आरबीआई ने 14 असेट रीकंस्ट्रक्शन कंपनियों की स्थापना की गई। ये कंपनियां डूबे क़र्ज़  खरीद लेती हैं, क़र्ज़ देने वाले को कुछ पैसे देकर ख़ुद वसूली करती है। 
  • 2005 के तहत कॉरपोरेट डेट रीस्ट्रक्चर की व्यवस्था की गई, यानी क़र्ज़ लेने वाले के साथ बैठ कर बात की जाए, उसे मुहलत दी जाए और उससे पैसे किश्तों में लिए जाएं, उसे कुछ छूट दे दी जाए। 
  • 2014 ज्वायंट लेंडर्स फ़ोरम-क़र्ज़ देने वाले बैंकों का समूह बनाया गया, उन्होंने यह फैसला किया कि क़र्ज लेकर नहीं चुकाने वालों को दूसरे बैंक क़र्ज़ न दें। 
  • 2015 मिशन इंद्रधनुष : इसे मोदी सरकार ने शुरू किया, इसके तहत बड़े एनपीए वाले सरकारी बैंकों को मजबूत करने की योजना बनाई गई। इसमें यह भी शामिल था कि उनमें पूंजी निवेश किए जाएं।
  • 2015 स्ट्रैटेजिक लोन रीस्ट्रक्चर : इसके तहत यह व्यवस्था की गई कि पैसे नहीं चुकाने वाली कंपनी का इक्विटी क़र्ज़ देने वाले बैंक को आंशिक रूर से या पूरा दे दिया जाएगा।
  • 2016 इनसॉलवेन्सी एंड बैंक्रप्सी कोड एक्ट, इसके तहत पैसे न चुकाने वाली कंपनी को किस तरह दिवालिया घोषित किया जाए और उससे जुड़ी दूसरी कंपनियों या उसके प्रमोटरों और उनकी दूसरे कंपनियों के साथ क्या सलूक किया जाए, यह तय किया गया। 
  • 2017 में आरबीआई के डिप्टी गवर्नर विरल आचार्य की अगुआई में एक कमेटी बनाई गई, जिसने इस मुद्दे पर कई सुझाव दिए। 

इतना सबकुछ होने के बाद यदि आपको यह पता चले कि अभी भी 9.10 लाख करोड़ रुपए का क़र्ज़ डूबा हुआ है तो आपको कैसा लगेगा, यह सोचिए।
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण स्टेट बैंक पर दबाव बना रही हैं कि वह यस बैंक का कम से कम 49 प्रतिशत हिस्सा खरीद ले और इस डूबते बैंक को बचा ले। समझा जाता है कि वह ऐसा कर लेगा। 

लेकिन सवाल यह है कि यदि यस बैंक बच भी गया तो भी उन पैसों का क्या होगा, जो फंसे हुए हैं। क्या स्टेट बैंक उन पैसों की उगाही कर लेगा? वह यह काम कैसे करेगा? या पहले के कई उदाहरणों पर चलते हुए वह इस क़र्ज़ को भी राइट ऑफ़ कर देगा, यानी बट्टे खाते में डाल देगा? 

अब तक वित्त मंत्री ने ऐसी किसी योजना का एलान नहीं किया है जिससे यह पता चले कि डूबे पैसे वापस मिल जाएंगे। यस बैंक के बचने से इसके जमाकर्ताओं को पैसे मिल जाएंगे, सही है।
पर जो पैसे राइट ऑफ़ कर दिए जाएंगे वह भी तो करदाताओं के ही हैं। उनका क्या होगा? इस यक्ष प्रश्न का उत्तर जेएनयू से राजनीतिक विज्ञान पढ़ने वाली वित्त मंत्री के पास होगा या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पास, जो कहते हैं, ‘सब चंगा सी।’ 

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प्रमोद मल्लिक
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