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प्रेमचंद 140 : आठवीं कड़ी :  प्रेमचंद की गंगा के प्रति अंतहीन ममता

वैज्ञानिक दृष्टि, तर्कशीलता के हामी प्रेमचंद जैसे गंगा की जो तारीफ में कलम तोड़ देते हैं। गंगा को वे जनता की निगाह से देख रहे हैं और इस निगाह के प्रति उनकी ममता का अंत नहीं है। गंगा के प्रति नेहरू का भाव भी जनता का भाव ही है। गंगा पर फ़िल्म बनाने के एडवर्ड थॉमसन के इरादे पर नेहरू उन्हें बताते हैं कि किस कदर गंगा भारत के ज़िंदगी के हर गोशे में समाई हुई है, उसके इतिहास, उसके लोगों के विश्वास, उनकी जीवन दृष्टि से वह अभिन्न है।... प्रेमचंद के 140 साल पूरे होने पर सत्य हिन्दी की विशेष श्रृंखला, आठवीं कड़ी। 
अपूर्वानंद

हुस्न का मेयार बदलना होगा, प्रेमचंद की यह पुकार अक्सर उनके बारे में किसी भी चर्चा में गूँज उठती है। लेकिन प्रेमचंद की माँग थी ज़िंदगी का मेयार बदलने की। उनका दौर ही ऐसा था। कह सकते हैं कि लोग महत्त्वाकांक्षी थे। अंग्रेज़ी हुक़ूमत से छुटकारा मिल जाए, इतनी छोटी इच्छा न थी। 

इंसान का कद ऊँचा हो, एक ग़ुलाम मुल्क़ में आज़ादख़याल और आज़ादाना तबीयत के ख़ुदमुख़्तार लोग बसा करते हैं, किसी तरह के हीनता बोध से मुक्त, यह दिखलाया जा सका था। एक नाम था मोहनदास करमचंद गाँधी का जो अपने लोगों से यही माँग कर रहा था। किसी बाहरी ताक़त को इसकी इजाज़त न दो कि वह तुम्हें परिभाषित करे। आप मेरी देह पर कब्जा कर सकते हैं, मेरी रूह पर नहीं।

साहित्य से और खबरें

श्रेष्ठताबोध के अहंकार से आज़ादी 

हिंदुस्तान से गाँधी के रिश्ते पर बात करते हुए उनके दोस्त, सहकर्मी और शिष्य जवाहरलाल नेहरू ने लिखा कि जो सबसे बड़ी बात उन्होंने की वह यह कि इतने सारे लोगों के जीवन की सतह उन्होंने इतनी ऊँची कर दी, उन सबको एक उदात्त स्तर पर प्रतिष्ठित कर दिया और काफी लम्बे वक़्त तक इस उदात्त स्तर पर इतने सारे लोगों को वे रख सके। 

गाँधी ने यह जो आदर्श पेश किया, उसने कई लोगों को चिढ़ा भी दिया। क्या आप एक साथ हिन्दू और मुसलमान और ईसाई हो सकते हैं? क्या आप श्रेष्ठताबोध के अहंकार से ख़ुद को आज़ाद कर सकते हैं?
क्या आप बिना नफ़रत किए अन्याय के ख़िलाफ़ संघर्ष कर सकते हैं? ग़ुलामी से, शोषण से लड़ना इस वजह से है कि हम इंसान से बहैसियत इंसान नहीं मिल पाते। और यह हमें कितना कम कर देता है, कितना छोटा बना देता है!
हीनता बोध से मुक्त होना जितना बड़ा संघर्ष है, उतना ही श्रेष्ठताबोध से मुक्त होना। मैं किसी को आज़ाद कर सकता हूँ, यह ख्याल ही श्रेष्ठताबोध भरने लगता है। मैं निगाह हूँ और दूसरा देखे जानेवाली वस्तु, इस विचार से मुक्त होना आसान नहीं था। गाँधी ने भारत आने के बाद कांग्रेसके नेताओं को इसी अहं से मुक्त किया। 
अनपढ़, अशिक्षित कहे जानेवाली जनता के पास एक दिल है, उनके पास सोचने की ताक़त है, उनके जीवन के आदर्श हैं, उनका एक दर्शन है। उसमें काफी खर-पतवार है लेकिन उनकी जिंदगियों में शामिल हुए बग़ैर, उन्हें दिलचस्पी से देखे और सुने बग़ैर उन्हें आज़ाद करने का विचार घोर अहंकार है।
नेहरू ने मथुरा के एक प्रसंग का वर्णन अपनी बेटी इंदिरा को लिखे अपने ख़त में किया है, जिसमें जनता के प्रति इस गाँधी-दृष्टि की झलक मिलती है।   

'एक दिन प्रभात वेला में हमारे दल के कुछ लोग बगल के एक कुँवें पर नहाने गए।।।।। वहाँ बड़ी चमड़े की बाल्टी इस्तेमाल की जाती है जिसे मोट कहते हैं। जब पहली बाल्टी ऊपर आई तो हमारे लोग नहाने को तत्पर हुए, लेकिन किसान ने उन्हें इंतज़ार करने को कहा क्योंकि पहला पानी कन्हैयाजी ( कितना मधुर नाम है यह!) को अर्पित किया जाता है। उसने बताया कि अमूमन वह कन्हैयाजी और अन्य प्रिय देवी देवताओं के नाम पाँच बाल्टी निकालता है, लेकिन किसी भी हालत में पहली बाल्टी तो नहीं ही छुई जानी चाहिए। हमारे लोगों ने कहा कि उनका कोई इरादा पुरानी रीत में छेड़छाड़ करने का नहीं है। वे कांग्रेसजन हैं और कांग्रेस और किसानों के बीच सुमति है। हाँ, किसान ने कहा और फौरन तुलसीदास की एक प्रसिद्ध उक्ति दोहराई, 'जहँ सुमति तहँ सम्पति नाना।' जहाँ सद्भाव और सहकार है, वहाँ संपत्ति में विविधता और समृद्धि है।'

नेहरू ने दूसरी जगह लिखा, 

'।।।।कृषक समाज इस प्राचीन संस्कृति और परंपरा से कितना संपृक्त है! बातचीत के दौरान वे (किसान) अनायास ही कोई पुरानी कथा या तुलसीदास की कोई उक्ति उद्धृत कर बैठते हैं। (इससे) उनमें एक किस्म का ठहराव और एक तरह की विशेषता आ गई है।'

'यह समाज सुधारक की वह दृष्टि नहीं है जो जनता को हीन और सुधारे जाने योग्य मानता है। ग़रीब लोग, जनता को सिर्फ दर्शन का विषय नहीं माना जा सकता, उनके पास खुद जीवन-जगत् के प्रति एक दार्शनिक रवैया है। प्रेमचंद ने ठीक यही किया। रामवृक्ष बेनीपुरी ने उनके बारे में लिखा, 

।।।इस प्रथम कलाकार ने ही अपनी कला को कितनी मोहक, आकर्षक और रंगीन बना पाया।।। जिन्हें हम गूँगा मूक  समझते थे, उन्हें उसने जुबान दी, जिन्हें हम अंधा सूर समझते थे, उनकी आँखों को उसने नूर बख्शा। झोपड़ियों की कौन बात, खेत की मेड़ पर बनी मड़ैयों तक को उसने बोलना, हँसना, प्यार करना, रोना सिखलाया।'

बेनीपुरी आगे इसे स्पष्ट करते हैं, 

'हमारे विविधता-पूर्ण समाज की इस निचली तह में विविधता की कमी नहीं, प्रेमचंद की कला ने स्पष्ट कर दिया। उनकी कहानियाँ देखिए, पता चल जाएगा। उनकी अंतिम रचना 'गोदान' के एक-एक पात्र—स्त्री और पुरुष –इसके प्रत्यक्ष प्रमाण हैं। ग़रीबों के भी दिल होते हैं, वे भी प्रेम करते हैं, प्रेम के लिए कुर्बानियाँ करते हैं; उनमें भी सहानुभूति और समवेदना होती है, जो धनियों की सहानुभूति और समवेदना की तरह उथली, केवल जुबान की नहीं होती। उनमें भी मान-सम्मान का ख्याल होता है और उसपर आघात किया जाए, तो जान लड़ाकर भी उसकी रक्षा वे करेंगे। हाँ, जिन्हें हम नर-कंकाल समझते हैं, उनमें भी जोश है, गरम खून है, लड़ने की ताकत है, बलिदान का माद्दा है—इत्यादि बातें आप प्रेमचंद की कला में भरी पड़ी पायेंगे।'

'सिर्फ़ एक आवाज़'

'सिर्फ़ एक आवाज़' कहानी एक पारंपरिक धर्मनिष्ठ, बल्कि कर्मकांडी ठाकुर साहब और उनकी ठकुराइन के चंद्र-ग्रहण के दिन गंगा-स्नान के लिए जाने के आयोजन के वर्णन से शुरू होती है:

'सुबह का वक्त था। ठाकुर दर्शन सिंह के घर में एक हंगामा बरपा था। आज रात को चन्द्रग्रहण होने वाला था। ठाकुर साहब अपनी बूढ़ी ठकुराइन के साथ गंगाजी जाते थे इसलिए सारा घर उनकी पुरशोर तैयारी में लगा हुआ था। एक बहू उनका फटा हुआ कुर्ता टाँक रही थी, दूसरी बहू उनकी पगड़ी लिए सोचती थी, कि कैसे इसकी मरम्मत करूँ, दोनों लड़कियॉँ नाश्ता तैयार करने में तल्लीन थीं। जो ज्यादा दिलचस्प काम था और बच्चों ने अपनी आदत के अनुसार एक कुहराम मचा रक्खा था क्योंकि हर एक आने-जाने के मौके पर उनका रोने का जोश उमंग पर होता था। जाने के वक़्त साथ जाने के लिए रोते, आने के वक़्त इसलिए रोते कि शीरीनी का बाँट-बखरा मनोनुकूल नहीं हुआ।'
लेखक इस तैयारी को दिलचस्पी से देख रहा है और उसका आनंद भी ले रहा है। सास स्नान के लिए जाने के पहले बहुओं को चेता रही हैं, 
'देखो खबरदार ! जब तक उग्रह न हो जाय, घर से बाहर न निकलना। हँसिया, छुरी, कुल्हाड़ी, इन्हें हाथ से मत छूना। समझाये देती हूँ, मानना चाहे न मानना। तुम्हें मेरी बात की परवाह है। मुँह में पानी की बूंदे न पड़ें। नारायण के घर विपत पड़ी है। जो साधु—भिखारी दरवाजे पर आ जाय उसे फेरना मत। बहुओं ने सुना और नहीं सुना। वे मना रहीं थीं कि किसी तरह यह यहाँ से टलें। फागुन का महीना है, गाने को तरस गये। आज खूब गाना-बजाना होगा।'

इस वर्णन में इस वाक्य को न भूलिए : बहुओं ने सुना और नहीं सुना। सास जाएँ तो वे गाना बजाना करें! 

ठाकुर साहब धर्मपरायण हैं। उनका 'कोई ग्रहण गंगा-स्नान के बगैर नहीं छूटा।' कड़कमिजाज़ हैं:

'मजाल न थी कि कोई उनकी तरफ सीधी आँख से देख सके। सम्मन लानेवाले एक चपरासी को ऐसी व्यावहारिक चेतावनी दी थी जिसका उदाहरण आस-पास के दस-पाँच गाँव में भी नहीं मिल सकता।'

कमी सिर्फ एक है और इसे इस तरह बता प्रेमचन्द ही सकते थे, 

'हाँ, कमजोरी इतनी थी कि अपना आल्हा भी आप ही गा लेते और मजे ले-लेकर क्योंकि रचना को रचनाकार ही खूब बयान करता है!'

क्या यह कहानी इस घिसीपिटी लोकप्रथा पर चोट करने वाली है? आखिर प्रेमचंद सामाजिक कुरीतियों और रूढ़ियों पर आक्रमण करनेवाले लेखक ठहरे! चंद्रग्रहण के अवसर पर गंगा-स्नान तो एक अंधविश्वास है! लेकिन देखिए तो, प्रेमचंद नज़ारे का मज़ा लूट रहे हैं:

'जब दोपहर होते-होते ठाकुर-ठाकुराइन गाँव से चले तो सैंकड़ों आदमी उनके साथ थे और पक्की सड़क पर पहुँचे, तो यात्रियों का ऐसा ताँता लगा हुआ था कि जैसे कोई बाज़ार है। ऐसे-ऐसे बूढ़े लाठियाँ टेकते या डोलियों पर सवार चले जाते थे जिन्हें तकलीफ देने की यमराज ने भी कोई ज़रूरत न समझी थी। अन्धे दूसरों की लकड़ी के सहारे कदम बढ़ाये आते थे। कुछ आदमियों ने अपनी बूढ़ी माताओं को पीठ पर लाद लिया था। किसी के सर पर कपड़ों की पोटली, किसी के कन्धे पर लोटा-डोर, किसी के कन्धे पर काँवर। कितने ही आदमियों ने पैरों पर चीथड़े लपेट लिये थे, जूते कहाँ से लायें। मगर धार्मिक उत्साह का यह वरदान था कि मन किसी का मैला न था। सबके चेहरे खिले हुए, हँसते-हँसते बातें करते चले जा रहे थें कुछ औरतें गा रही थी:

चाँद सूरज दूनो लोक के मालिक

एक दिना उनहूँ पर बनती

हम जानी हमहीं पर बनती

ऐसा मालूम होता था, यह आदमियों की एक नदी थी, जो सैंकड़ों छोटे-छोटे नालों और धारों को लेती हुई समुद्र से मिलने के लिए जा रही थी।'

इस वर्णन को भी रुक रुककर पढ़िए। प्रेमचंद का परिचित विनोदभाव तो है ही (ऐसे-ऐसे बूढ़े लाठियाँ टेकते या डोलियों पर सवार चले जाते थे जिन्हें तकलीफ देने की यमराज ने भी कोई जरूरत न समझी थी।) इस गरीब धर्मप्राण जनता के ऊर्जा के अपव्यय पर कोई झुंझलाहट नहीं है। है अगर कुछ तो आदर ही। चीथड़े लपेटे इन लोगों को इस समय देखकर दीनता का कोई भाव मन में नहीं आता:  

'।।।धार्मिक उत्साह का यह वरदान था कि मन किसी का मैला न था।'

निश्छल सामूहिकता

चाँद और सूरज पर आई यह आफत क्या सिर्फ उन्हीं पर आई है, वह हम पर भी है। होगी यह धार्मिक, सामाजिक रूढ़ि, लेकिन यह निश्छल सामूहिकता किसे अछूता छोड़ सकती है?:

'ऐसा मालूम होता था, यह आदमियों की एक नदी थी, जो सैंकड़ों छोटे-छोटे नालों और धारों को लेती हुई समुद्र से मिलने के लिए जा रही थी।'

अपनी किताब 'भारत की खोज' में जवाहरलाल नेहरू इस पवित्रता और सामूहिकता का संगम अपने शहर इलाहाबाद में अक्सर देखते हैं, 

'अपने शहर इलाहाबाद या हरिद्वार में मैं विराट स्नान-उत्सवों में जाता रहा हूँ, जैसे कुंभ मेला, और सैंकड़ों-हज़ार लोगों को वहाँ आते देखता, जहाँ पूरे भारत से उनके पुरखे हजारों वर्षों से गंगा-स्नान को आते रहे हैं। मुझे तेरह सौ साल पहले के चीनी मुसाफिरों और तीर्थयात्रियों के लिखे इन उत्सवों के वर्णन याद आते हैं और तब भी ये मेले प्राचीन ही थे और एक अजाने पुरातन की धुंध में खोए हुए थे। आखिर क्या था यह अगाध विश्वास जो हमारे लोगों को अनगिनत पीढ़ियों से भारत की प्रसिद्ध नदी की और खींचता रहा?' 

प्रेमचंद की इस कहानी में गंगा-स्नान का यह वर्णन पढ़ते हुए अनायास ही 'ईदगाह' कहानी में ईदगाह को जाने ग्रामीणों के उत्साह की याद आ जाती है। जैसे सामूहिक नमाज़ का उदात्त प्रभाव वहाँ था -  'इन ग्रामीणों ने भी वजू किया और पिछली पंक्ति में खड़े हो गए। कितना सुन्दर संचालन है, कितनी सुन्दर व्यवस्था! लाखों सिर एक साथ सिजदे में झुक जाते हैं, फिर सबके सब एक साथ खड़े हो जाते हैं, एक साथ झुकते हें, और एक साथ खड़े हो जाते हैं, एक साथ खड़े हो जाते हैं, एक साथ झुकते हें, और एक साथ खड़े हो जाते हैं, कई बार यही क्रिया होती है, जैसे बिजली की लाखों बत्तियाँ एक साथ प्रदीप्त हों और एक साथ बुझ जाएँ, और यही क्रम चलता, रहे। कितना अपूर्व दृश्य था, जिसकी सामूहिक क्रियाएँ, विस्तार और अनंतता हृदय को श्रद्धा, गर्व और आत्मानंद से भर देती थीं, मानों भ्रातृत्व का एक सूत्र इन समस्त आत्माओं को एक लड़ी में पिरोए हुए हैं।'

कुछ वैसा ही यहाँ भी है:

'जब यह लोग गंगा के किनारे पहुँचे तो तीसरे पहर का वक्त था लेकिन मीलों तक कहीं तिल रखने की जगह न थी। इस शानदार दृश्य से दिलों पर ऐसा रोब और भक्ति का ऐसा भाव छा जाता था कि बरबस ‘गंगा माता की जय’ की सदायें बुलन्द हो जाती थीं। लोगों के विश्वास उसी नदी की तरह उमड़े हुए थे और वह नदी! वह लहराता हुआ नीला मैदान! वह प्यासों की प्यास बुझानेवाली! वह निराशों की आशा! वह वरदानों की देवी! वह पवित्रता का स्रोत! वह मुट्ठी भर खाक को आश्रय देनेवीली गंगा हँसती-मुस्कराती थी और उछलती थी। क्या इसलिए कि आज वह अपनी चौतरफा इज्जत पर फूली न समाती थी या इसलिए कि वह उछल-उछलकर अपने प्रेमियों के गले मिलना चाहती थी जो उसके दर्शनों के लिए मंजिल तय करके आये थे! और उसके परिधान की प्रशंसा किस जबान से हो, जिस सूरज से चमकते हुए तारे टॉँके थे और जिसके किनारों को उसकी किरणों ने रंग-बिरंगे, सुन्दर और गतिशील फूलों से सजाया था।'

जनता की निगाह से

वैज्ञानिक दृष्टि, तर्कशीलता के हामी प्रेमचंद जैसे गंगा की जो तारीफ में कलम तोड़ देते हैं। गंगा को वे जनता की निगाह से देख रहे हैं और इस निगाह के प्रति उनकी ममता का अंत नहीं है। गंगा के प्रति नेहरू का भाव भी जनता का भाव ही है। गंगा पर फ़िल्म बनाने के एडवर्ड थॉमसन के इरादे पर नेहरू उन्हें बताते हैं कि किस कदर गंगा भारत के ज़िंदगी के हर गोशे में समाई हुई है, उसके इतिहास, उसके लोगों के विश्वास, उनकी जीवन दृष्टि से वह अभिन्न है। वह जन्म से लेकर मृत्यु तक, हर घड़ी भारतीय मनुष्य की साक्षी है। फिल्म बनाते वक्त भले ही उससे जुड़े अन्धविश्वासों अपर उतना जोर न दिया जाए, लेकिन शिव के जटाजूट पर गिरती गंगा की छवि को कैसे भुलाया जा सकता है?

नेहरू गंगा को  'भारत की नदी' कहते हैं और उम्मीद करते हैं, 

'आप इसके लिए 'गैंजेज़' नाम का इस्तेमाल नहीं करेंगे। मैं इसे नापसंद करता हूँ। गंगा नाम की ध्वनि इससे हज़ार गुना सुंदर है। जाने कैसे हमारे पूर्वजों ने इतने खूबसूरत नाम को यों बिगाड़ दिया।'  

यह विषयांतर है लेकिन यह उस युग के उन लोगों के सोचने के तरीके और जनता से उनके जुड़ाव को समझने में हमारी मदद करता है। प्रेमचंद गाँधी से छोटे थे और नेहरू से थोड़े बड़े। गांधी फिर भी जनता के गुरु हैं लेकिन नेहरू उसके संगी। प्रेमचंद की निगाह आखिरकार एक अफसानानिगार की है जो अपने लोगों की दिलचस्पियों को शुष्क दृष्टि से नहीं देखता।

तो ठाकुर साहब अपने संगियों के साथ मेला देखने निकलते हैं, लेकिन वे ठहरे ठाकुर साहब! मेढ़ों की भिड़ंत और मदारियों के खेल का खेल है तो हुआ करे,

'उनकी हिम्मत ने गवारा न किया कि इन बाज़ारू दिलचस्पियों में शरीक हों।'  

एक जगह एक भाषण चल रहा है। शिक्षित, सुसंस्कृत जान पड़नेवालों की सभा में एक मधुरभाषी वक्ता बोल रहा है। ठाकुर साहब वहीं आसन जमाते हैं,

'ठाकुर साहब ने अपने साथियों को एक किनारे खड़ा कर दिया और खुद गर्व से ताकते हुए फर्श पर जा बैठे क्योंकि उन्हें विश्वास था कि यहाँ उन पर देहातियों की ईर्ष्या--दृष्टि पड़ेगी और सम्भव है कुछ ऐसी बारीक बातें भी मालूम हो जायँ तो उनके भक्तों को उनकी सर्वज्ञता का विश्वास दिलाने में काम दे सकें।'

भाषण कैसा है?

'भाषण दिलचस्प मालूम पड़ता था। वज़न ज़्यादा था और चटखारे कम, इसलिए तालियाँ नहीं बजती थीं।'

यह एक नैतिक अनुष्ठान है। अस्पृश्यता के विरुद्ध मात्र सैद्धांतिक समर्थन नहीं, बल्कि उसे ख़त्म करने का व्यावहारिक संकल्प कौन करेगा? वक्ता श्रोताओं को फटकार नहीं रहा, 

'(इस) लज्जाजनक सांस्कृतिक स्थिति का ज़िम्मेदार हमारे सिवा और कौन हो सकता है? अब इसके सिवा और कोई इलाज नहीं हैं कि हम उस घृणा और उपेक्षा को; जो उनकी तरफ से हमारे दिलों में बैठी हुई है, धोयें और खूब मलकर धोयें। यह आसान काम नहीं है। जो कालिख कई हज़ार वर्षो से जमी हुई है, वह आसानी से नहीं मिट सकती। जिन लोगों की छाया से हम बचते आये हैं, जिन्हें हमने जानवरों से भी जलील समझ रक्खा है, उनसे गले मिलने में हमको त्याग और साहस और परमार्थ से काम लेना पड़ेगा।'

व्यावहारिक प्रस्ताव

यह संन्यासी कौन है? विवेकानंद, दयानंद या गांधी? वह जनता से एकबारगी क्रान्ति की आशा नहीं रखता। वह उनकी मानवता की इच्छा का व्यावहारिक प्रस्ताव करता है,

'मैं यह नहीं कहता कि आप आज ही उनसे शादी के रिश्ते जोड़ें या उनके साथ बैठकर खायें-पियें। मगर क्या यह भी मुमकिन नहीं है कि आप उनके साथ सामान्य सहानुभूति, सामान्य मनुष्यता, सामान्य सदाचार से पेश आयें? क्या यह सचमुच असम्भव बात है?' 

न्यूनतम सभ्याचार की अपेक्षा है लेकिन क्या उसका उत्तर मिलेगा? 

'हम क्या इतना भी नहीं कर सकते कि अपने अछूत भाइयों से हमदर्दी का सलूक कर सकें? क्या हम सचमुच ऐसे पस्त-हिम्मत, ऐसे बोदे, ऐसे बेरहम हैं? इसे खूब समझ लीजिए कि आप उनके साथ कोई रियायत, कोई मेहरबानी नहीं कर रहें हैं। यह उन पर कोई एहसान नहीं है। यह आप ही के लिए जिन्दगी और मौत का सवाल है।'

सवाल 'अछूत' जन के उद्धार का नहीं, अपनी आत्मा को शुद्ध करने का है और उनके लिए नहीं, अपने लिए 'ज़िंदगी और मौत का सवाल है।'

संन्यासी को कोई उत्तर नहीं मिलता। जिन्हें वे अस्पृश्य मानते हैं, उनके साथ तीज त्यौहार मनाने, उन्हें गले लगाने के प्रस्ताव से किसी का दिल नहीं पिघलता,

'वह पत्थर के दिल थे जिसमें दर्द और घुलावट न थी, जिसमें सदिच्छा थी मगर कार्य-शक्ति न थी, जिसमें बच्चों की सी इच्छा थी मर्दों का–सा इरादा न था।'

सदिच्छा और कार्यशक्ति, इच्छा और इरादा, दोनों में बहुत दूरी है।

गँवार ठाकुर इस खामोश मजमे की अकर्मण्य सभ्यता को गौर से देख रहे हैं। वे कोई क्रांतिकारी नहीं हैं,

'वह अपने मार्मिक विश्वासो में चाहे कट्टर हो या न हों, लेकिन सांस्कृतिक मामलों में वे कभी अगुवाई करने के दोषी नहीं हुए थे। इस पेचीदा और डरावने रास्ते में उन्हें अपनी बुद्धि और विवेक पर भरोसा नहीं होता था। यहॉं तर्क और युक्ति को भी उनसे हार माननी पड़ती थी। इस मैदान में वह अपने घर की स्त्रियों की इच्छा पूरी करने ही अपना कर्त्तव्य समझते थे और चाहे उन्हें खुद किसी मामले में कुछ एतराज भी हो, लेकिन यह औरतों का मामला था और इसमें वे हस्तक्षेप नहीं कर सकते थे क्योंकि इससे परिवार की व्यवस्था में हलचल और गड़बड़ी पैदा हो जाने की जबरदस्त आशंका रहती थी।।।।।यह उनके लिए तिलिस्म की घाटी थी जहाँ होश-हवास बिगड़ जाते थे और अन्धे अनुकरण का पैर बँधी हुई गर्दन पर सवार हो जाता था।'

सांस्कृतिक कायरता

लेकिन यहाँ की सांस्कृतिक कायरता से वे भी विचलित हो उठते हैं, 

'ऐसे मौके पर वे नतीजे और मसलहत से बगावत कर जाते थे और उनके इस हौसले में यश के लोभ का उतना दखल नहीं था जितना उनके नैसर्गिक स्वभाव का। वर्ना यह असम्भव था कि एक ऐसे जलसे में जहाँ ज्ञान और सभ्यता की धूम-धाम थी।।।वहाँ एक देहाती किसान को जबान खोलने का हौसला होता। ठाकुर ने इस दृश्य को गौर और दिलचस्पी से देखा। उसके पहलू में गुदगुदी-सी हुई। जिन्दादिली का जोश रगों में दौड़ा। वह अपनी जगह से उठा और मर्दाना लहजे में ललकारकर बोला-मैं यह प्रतिज्ञा करता हूँ और मरते दम तक उस पर कायम रहूँगा।'

हैरान निगाहें उसकी तरफ उठ गईं:

'इतना सुनना था कि दो हजार आँखें अचम्भे से उसकी तरफ ताकने लगीं। सुभानअल्लाह, क्या हुलिया थी-गाढ़े की ढीली मिर्जई, घुटनों तक चढ़ी हुई धोती, सर पर एक भारी-सा उलझा हुआ साफा, कन्धे पर चुनौटी और तम्बाकू का वजनी बटुआ, मगर चेहरे से गम्भीरता और दृढ़ता स्पष्ट थी। गर्व आँखों के तंग घेरे से बाहर निकला पड़ता था। उसके दिल में अब इस शानदार मजमे की इज्जत बाकी न रही थी।'

कौन है यह देहाती शख्स और क्यों यह पुकार उसके दिल के पार चली गई?

'वह पुराने वक्तों का आदमी था जो अगर पत्थर को पूजता था तो उसी पत्थर से डरता भी था, जिसके लिए एकादशी का व्रत केवल स्वास्थ्य-रक्षा की एक युक्ति और गंगा केवल स्वास्थ्यप्रद पानी की एक धारा न थी। उसके विश्वासों में जागृति न हो, लेकिन दुविधा नहीं थी। यानी कि उसकी कथनी और करनी में अन्तर न था और न उसकी बुनियाद कुछ अनुकरण और देखादेखी पर थी, मगर अधिकांशत: भय पर, जो ज्ञान के आलोक के बाद वृत्तियों के संस्कार की सबसे बड़ी शक्ति है। गेरुए बाने का आदर और भक्ति करना इसके धर्म और विश्वास का एक अंग था। संन्यास में उसकी आत्मा को अपना अनुचर बनाने की एक सजीव शक्ति छिपी हुई थी और उस ताकत ने अपना असर दिखाया।'

कहानी का शीर्षक दुबारा पढ़ लें: सिर्फ एक आवाज़।

वह सिर्फ एक आवाज़ है, भीतर बैठी वह नन्हीं आवाज़, जिसकी दस्तक सुनकर गांधी हर तर्क को ठुकरा देते थे। क्या यह वही नन्हीं आवाज़ है? क्यों कुछ ही लोगों के पास इसे सुनने की शक्ति है?  

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