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कोरोना फैलने का ख़तरा है तो मांसाहार से क्यों न बचें?

शाकाहार मनुष्य का स्वाभाविक भोजन है, यह उसके दाँत और आँत से पता चलता है। दुनिया के किसी भी धर्मशास्त्र- वेद, जिंदावस्ता, त्रिपिटक, बाइबिल, कुरान, गुरु ग्रंथ साहब आदि में कहीं भी नहीं लिखा है कि मांस खाए बिना मुक्ति नहीं मिलेगी और मांसाहार यदि हमें कोरोना के कराल गाल में ठूँसता है तो हम इससे क्यों न बचें?
डॉ. वेद प्रताप वैदिक

विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के भोजन-सुरक्षा विशेषज्ञ पीटर एंवारेक ने कहा है कि मांसाहार से कोरोना के फैलने का ख़तरा ज़रूर है लेकिन हम लोगों को यह कैसे कहें कि आप मांस, मछली, अंडे मत खाइए? चीन के वुहान शहर में कोरोना विषाणु को फैलाने में इन मांसाहारी वस्तुओं की भूमिका पर सभी इशारा कर रहे हैं लेकिन दुनिया के करोड़ों लोगों का खाना और रोज़गार मांसाहार के दम पर ही चल रहा है। 

एंवारेक का यह तर्क दक्षिण एशिया के देशों के साथ-साथ सारे संसार के संपन्न देशों पर लागू होता है, ख़ास तौर से यूरोप और अमेरिका के देशों पर, क्योंकि इन देशों की बहुत कम जनता आजकल खेती पर निर्भर रहती है। वहाँ खेती का काम काफ़ी हद तक यंत्रीकरण हो गया है लेकिन भारत-जैसे दक्षिण एशियाई और अफ्रीकी देशों में अभी भी करोड़ों लोग खेती और बागवानी पर निर्भर हैं। 

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यदि संपन्न देशों के लोग मांसाहार बंद कर दें तो वहाँ तुरंत आर्थिक संकट खड़ा हो सकता है। तात्कालिक दृष्टि से तो यही होगा लेकिन यदि हम थोड़ा गहरे में उतरें और अर्थशास्त्र के छात्र की तरह थोड़ी जोड़-तोड़ करें और थोड़ा गुणा-भाग करें तो उसके नतीजे एकदम चमत्कारी होंगे। इस मामले में हम क्या करेंगे? हमसे कहीं ज़्यादा खोज-पड़ताल अमेरिकी और ब्रिटिश वैज्ञानिकों ने कर रखी है। उनका कहना है कि यदि दुनिया के लोग मांसाहार बंद कर दें तो सारी दुनिया हर साल 20 से 30 ट्रिलियन डाॅलर (20 लाख से 30 लाख करोड़ रुपये) बचा सकती है। 

उनके अनुसार एक किलो मांस पैदा करने में जितना ख़र्च होता है, उतने पैसे में 10 किलो अनाज पैदा होता है। एक किलो गेहूं के लिए 1500 लीटर पानी लगता है और उतने ही गोमांस के लिए दस गुना ज़्यादा यानी 15000 लीटर पानी ख़र्च होता है। 

अमेरिका में मांसाहार के कारण लगभग 3 लाख 20 हज़ार लोगों की मौत हर साल होती है। मोटापा, मधुमेह, हृदयरोग आदि बीमारियों को मांसाहार से बढ़ावा मिलता है। मांस के कारण गंदी गैस और बदबू भी बड़ा नुक़सान करती है। यदि अमेरिकी लोग सिर्फ़ गोमांस खाना बंद कर दें तो अमेरिका की 42 प्रतिशत ज़मीन खेती के लिए बच सकती है। 

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पेड़-पौधों से फ़सलें तो कई बार ली जाती हैं लेकिन पशुओं का मांस तो सिर्फ़ एक बार ही हाथ लगता है, जबकि उन्हें महीनों-वर्षों खिलाते रहना पड़ता है। शाकाहार मनुष्य का स्वाभाविक भोजन है, यह उसके दाँत और आँत से पता चलता है। दुनिया के किसी भी धर्मशास्त्र- वेद, जिंदावस्ता, त्रिपिटक, बाइबिल, कुरान, गुरु ग्रंथ साहब आदि में कहीं भी नहीं लिखा है कि मांस खाए बिना मुक्ति नहीं मिलेगी और मांसाहार यदि हमें कोरोना के कराल गाल में ठूँसता है तो हम इससे क्यों न बचें?

(डॉ. वेद प्रताप वैदिक के ब्लॉग www.drvaidik.in से साभार)

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डॉ. वेद प्रताप वैदिक
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