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जेएनयू : वैचारिक विशेषाधिकार बनाम राष्ट्रवाद

सत्तारूढ़ दल को लगता है कि लोकतांत्रिक रूप से चुनी गई सरकार पर हमले को सब्सिडी देना जनता के पैसे का दुरुपयोग है। संघ परिवार यह नहीं पचा पा रहा है कि जेएनयू एक मात्र शैक्षणिक संस्थान है, जहाँ इसके सबसे प्रखर विरोधी कम्युनिस्ट बड़ी तादाद में हैं।
प्रभु चावला

बौद्धिकता हमेशा उस जगह जैसी ही नहीं होती, जहाँ से वह निकलती है। उदाहरण के लिए 50 साल पुराने जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय को ही लें, जो वामपंथी विचारधारा का किला, अलगाववाद का गढ़ और दिमाग में मार्क्स और अजेंडे पर कश्मीर लेकर चलने वाले फ़ैशनेबल विचारधारा मानने वालों की भीड़ का अंतिम आश्रय स्थल है। देश के 400 विश्वविद्यालयों में शायद ही कोई विश्वविद्यालय है, जो विचारधारा से प्रेरित होकर किसी का विरोधी बन गया हो, लेकिन जेएनयू किसी भी सत्ता प्रतिष्ठान का सबसे ज़बरदस्त विरोधी है जो कई स्तरों पर असंतुलन को ठीक करने की कोशिश करता है।

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की रिपोर्टों के अनुसार, जेएनयू हर छात्र पर हर साल 2.50 लाख रुपये खर्च करता है, जबकि दूसरे विश्वविद्यालय एक हज़ार रुपये खर्च करते हैं। जेनएयू के छात्र सड़कों पर उतर कर प्रदर्शन कर रहे हैं क्योंकि विश्वविद्यालय ने उनसे कहा है कि वे शिक्षा और लगभग मुफ़्त मिलने वाली आवासीय सुविधा पर थोड़ा ज़्यादा खर्च करें। उनका गुस्सा वित्तीय मामलों तक ही सीमित नहीं रहा। राजनीतिक नारे लगाए गए, मानो लेनिन अभी ही बैटलशिप पोटेमकिन से निकल कर बाहर आए हों। 

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लगभग मुफ़्त शिक्षा

जेएनयू शायद दुनिया का अकेला सरकारी विश्वविद्यालय है, जहाँ छात्र होस्टल रूम का 20 रुपये महीना चुकाते हैं। पीएच.डी की फ़ीस 240 रुपये सालाना है तो एमए, एमएससी, एमसीए, बीसीए, बीए (ऑनर्स) की फ़ीस 216 रुपये है। छात्रों के आक्रामक आन्दोलन को देखते हुए सरकार ने बढ़ी हुई फ़ीस का बड़ा हिस्सा वापस ले लिया। पर छात्र अपनी लड़ाई विश्वविद्यालय परिसर से संसद तक ले गए और केंद्रीय मानव संसाधन मंत्री रमेश पोखरियाल निशंक का घेराव किया। 

बीजेपी की अगुआई वाली केंद्र सरकार और जेएनयू के बीच के टकराव को बड़े राष्ट्रीय बहस के परिप्रेक्ष्य में देखा जाना चाहिए। सत्तारूढ़ दल को लगता है कि लोकतांत्रिक रूप से चुनी गई सरकार पर हमले को सब्सिडी देना जनता के पैसे का दुरुपयोग है।
संघ परिवार यह नहीं पचा पा रहा है कि जेएनयू एक मात्र शैक्षणिक संस्थान है, जहाँ इसके सबसे प्रखर विरोधी कम्युनिस्ट बड़ी तादाद में हैं। बीजेपी ज़ोर देकर कहती है कि जेनएनयू राष्ट्र-विरोधी तत्वों को प्रश्रय देता है, विश्वविद्यालय के पैरोकारों का दावा है कि यह अकेला संस्थान है, जहाँ अभिव्यक्ति की आज़ादी और शैक्षणिक उत्कृष्टता दोनों ही साथ-साथ हैं।
यह ऐसी जगह है जहाँ वे ‘इंटरनेशनल’ (कम्युनिस्टों का अंतरराष्ट्रीय गीत) के भुला दिए गए धुन के साथ ताल मिला सकते हैं। 

फ़ीस बढ़ोतरी का विरोध क्यों?

विश्वविद्यालय ने जब ट्यूशन फ़ीस से लेकर होस्टल फ़ीस तक बढ़ा दी, छात्रों ने बढ़ती हुई महँगाई दर के बराबर की बढ़ोतरी का भी विरोध किया। जेएनयू का बजट 260 करोड़ रुपये से ज़्यादा का है, जहाँ 1,000 एकड़ में फैले परिसर में 650 शिक्षक 9,000 छात्रों को पढ़ाते हैं। क्या हरे-भरे अच्छे परिवेश और मनमर्जी से होने वाले कक्षाओं की वजह से जेएनयू विद्रोह और परिवर्तन का आरामदायक रिसॉर्ट बन चुका है? इसका उत्तर तो इसके बौद्धिक जीन्स में छिपा हुआ है। इसका वामपंथी चरित्र इसलिए बचा हुआ है कि इसके दाखिले और शिक्षकों की भर्ती की प्रक्रिया इस तरह की है कि इसमें वामपंथी रुझान रखने वालों को तरजीह मिलती है। 

शुरू से वामपंथियों का कब्जा

जेएनयू की स्थापना 1969 में हुई, वामपंथी विचारों वाले मूनिस रज़ा इसके पहले अध्यक्ष और रेक्टर थे। प्रखर वामपंथी नुरुल हसन 1972 में शिक्षा मंत्री बने और उन्होंने यहाँ कम्युनिस्टों को मजबूत किया। जेएनयू में वामपंथी और उनसे सहानुभूति रखने वाले भरे हुए हैं, इसलिए जो शिक्षक उनसे असहमत होते हैं, उनका कैरियर जेएनयू-शैली के बहुमतवाद से चलने वाले आतंक की बलि चढ़ जाता है। ख़ास स्थान और विशेषाधिकार की वजह से भारत के बौद्धिक जगत में जेएनयू का ऊँचा स्थान है, इसलिए यह जम्मू-कश्मीर का विस्तार बन गया है। 
प्रशंसकों का कहना है कि जेएनयू अकेला विश्वविद्यालय है, जहाँ ग़रीब छात्रों को बहुत ही अधिक सब्सिडी पर अच्छी शिक्षा मिलती है और जहाँ 90 प्रतिशत छात्र दूसरे राज्यों के हैं। जब बीते दिनों फ़ीस बढ़ाई गई तो छात्र नेताओं ने दावा किया कि 43 प्रतिशत विद्यार्थी ग़रीब परिवारों के हैं, जिनकी सालाना आय 4 लाख रुपये से कम है।
पर वे ख़ास रियायत सिर्फ़ ग़रीब छात्रों के लिए नहीं माँग रहे थे। बढ़ी फ़ीस वापस लेने का फ़ायदा उन्हें भी मिलेगा जो वहाँ एक दशक से भी ज़्यादा समय से रह रहे हैं। इसके अलावा 25 प्रतिशत छात्र बिहार, उत्तर प्रदेश और पूर्वोत्तर के संपन्न घरों से हैं। इनमें बड़ी तादाद ताक़तवर राजनीतिक नेताओं, अफ़सरों और अकादमिक जगत के बड़े लोगों के बच्चों की है। ये वे लोग हैं जो बड़ी आसानी से उन ग़रीब बच्चों की फ़ीस भर सकते हैं, जिनके लिए इनके अपने बच्चे लड़ रहे हैं। 

स्कॉलरशिप और स्टाइपेंड

जेएनयू में दाख़िले के समय समाज के सभी तबकों के छात्रों को शामिल करने की हर कोशिश को वामपंथी-नियंत्रित तत्व बड़ी आसानी से नाकाम कर देते हैं। अकादमिक उत्कृष्टता में मानव संसाधन मंत्रालय की सूची में यह दूसरे नंबर पर है, पर इसका चरित्र कुल मिला कर अर्द्ध-राजनीतिक है। जेएनयू भारत का अकेला विश्वविद्यालय है, जहाँ 60 प्रतिशत से अधिक छात्र स्कॉलरशिप और स्टाइपेंड पर एम. फिल और पीएच.डी कर रहे हैं।
यह दिलचस्प बात है कि इसके छात्र और शिक्षक जेएनयू का ठप्पा लगाए रहते हैं, हालाँकि वे अपना ज़्यादातर समय क्लास रूम के बजाय राजनीतिक गतिविधियों में बिताते हैं। कांग्रेस ने जेएनयू के प्रबंधन और उसकी राजनीति में ज़्यादा दिलचस्पी नहीं ली, नतीजतन वहाँ से सीताराम येचुरी, प्रकाश करात और कन्हैया कुमार जैसे वामपंथी निकले। 

इलाहाबाद विश्वविद्यालय, बीएचयू और एएमयू वगैरह से राष्ट्रीय नेता निकले हैं जो कांग्रेस और बीजेपी में छाए हुए हैं। केंद्रीय मंत्री निर्मला सीतारमण और एस. जयशंकर दुर्घटनावश भगवा कैंप में आ गए, उन्हें वैचारिक रूप से वैसा बनाया नहीं गया है।
एक वामपंथी शिक्षक ने जेएनयू की उत्कृष्टता की चर्चा करते हुए बहुत ही गौरव से कहा, ‘यदि हम अफ़सरों, पत्रकारों, कलाकारों, अनुवादकों, लेखकों, प्रतिबद्ध कार्यकर्ताओं, प्रोफ़ेसरों, वाइस चांसलरों, राजनेताओं और महत्वपूर्ण संस्थानों के प्रमुखों की सूची बनाएँ तो उनमें जेएनयू से निकले छात्रों का प्रतिनिधित्व अच्छा-ख़ासा होगा।’
यह यूं ही नहीं है कि बीते दो साल में इंटेलीजेन्स ब्यूरो, रॉ, सीबीआई के अलावा विदेश और कैबिनेट सचिव जेएनयू से निकले हुए हैं। वे मुझे राष्ट्रद्रोही नहीं लगते। इसमें कोई शक नहीं कि कई संवेदनशील जगहों पर जेएनयू से निकले लोग हैं, हालाँकि उन्हें ‘टुकड़े-टुकड़े गैंग’ से कोई सहानुभूति नहीं है। 

भारत के सत्ता प्रतिष्ठान पर दिल्ली, चेन्नई, मुंबई और विदेशों में स्थित कुलीन और बड़े कॉलेजों से निकलने छात्रों का दबदबा है। जेएनयू में फैली अशांति महत्वपूर्ण इसलिए है कि देश का कोई दूसरा विश्वविद्यालय इस तरह और बार-बार सरकार से टकराव मोल नहीं लेता है। मोदी और वे तमाम चीजें जिनसे वे जुड़े हुए हैं, उनका विरोध करना जेएनयू के हरे-भरे प्रांगण और विचारधारा के लिए उर्वरक बने होस्टल में रहने वाले छात्रों का मुख्य काम है। जेएनयू के छात्रों ने अफ़ज़ल गुरु को फ़ाँसी पर चढ़ाए जाने का ज़बरदस्त विरोध लोकतंत्र की हत्या कह कर किया था। 
वे अनुच्छेद 370 को ख़त्म करने के लिए लोकतांत्रिक रूप से लिए गए फ़ैसले को कश्मीरियत पर हमला क़रार देते हैं, जबकि आतंकवादियों द्वारा किए गए जिहादी क़त्लेआम को वे आज़ादी के आन्दोलन का एक और नाम मानते हैं। जेएनयू देश के अकादमिक तालिबान के रूप में बचा हुआ है क्योंकि उससे सांठगांठ रखने वाले लोग व्यवस्था के अंदर घुसे हुए हैं और सरकारी पैसे पर पल-बढ़ रहे हैं। वहाँ चल रहा टकराव हेनरी किसिंजर के मशहूर शब्दों की याद दिलाता है, ‘विश्वविद्यालय की राजनीति इतनी कुत्सित इसलिए है कि उससे जुड़ी हुई चीजें इतनी तुच्छ हैं।’ जेएनयू में वामपंथी विरोध पर कैरियर खड़ा करने की कोशिश का प्रदर्शन वह मामला है, जिस वजह से फ़ीस यकायक इतनी बड़ी वजह बन गई है। 

('द न्यू इंडियन एक्सप्रेस' से साभार)
प्रभु चावला
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