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फागुन के रंग झमकते हों, तब देख बहारें होली की 

स्त्रियों की होली इस मामले में विशेष होती है कि आज के दिन न ऊँच-नीच का चलन रहता है न भेद-भाव का बर्ताव। चलन यह भी है कि इस साल में जिन जिन के यहाँ कोई गमी हो जाती है सबसे पहले रंग के छींटे डालने उनके ही घर जाना होता है और उन्हें अपने साथ लेकर चलते हैं और माना जाता है कि आज से इस घर का शोक समय ख़त्म हुआ।
मैत्रेयी पुष्पा

'फागुन के रंग झमकते हों, तब देख बहारें होली की।'

ऊपर लिखी पंक्तियाँ शायर नज़ीम अकबरावादी की हैं। ये पंक्तियाँ बसन्त के मधुमय दिनों में अनायास ही तुम्हारी-हमारी ज़ुबानों पर मचलने लगती हैं। फागुन महीना नशीला होता है, ऐसा माना ही नहीं जाता, महसूस भी किया जाता है। माना तो यह भी जाता है कि ब्रज जैसी फगुनई हवा कहीं नहीं बहती। जमुना जैसी नदी कहाँ मिलेगी? कृष्ण की भूमि प्रीति में रची बसी है, सो बस ब्रजभूमि में मनाई जाने वाली होली भी अपने आप में असीम आनन्ददायिनी होती है। क्या यही बात है कि आस पास के इलाक़ों में फैले राज रजवाड़ों ने भी ब्रज के असर में होली मनाई और शायरों ने फागुन के गीत गाये?

मनमोहक होली

हमारे गाँवों में जम कर होली होती है। रंग अबीर की ऐसी बरसात की जाती है कि धरती सतरंगी नज़र आये। होली तो शहरों, नगरों और महानगरों में भी हुआ करती है, लेकिन गाँवों के ढंग मनमोहक और निराले ही होते हैं। 
यह किसानों की नई फ़सल के आने का शुभ मुहूरत होता है। तभी तो गेंहूँ की बालियाँ भूनकर आपस में बाँटने के चलन से दिन की शुरुआत होती है। क्या आपस में जौ बाँटने का काम सिर्फ़ हिन्दुओं के बीच होता है? हमारे गाँवों में मुसलिम आबादी भी है और होली सबकी होती है।

तभी तो अमीर खुसरो लिख गये हैं -

'आज रंग है हो माँ रंग है री / मेरे महबूब के घर रंग है री।'

रिवाजों तो बहुत हैं, बहुत अच्छी हैं। अच्छी से अच्छी हैं। हमारे गाँव की खेरापतिन दादी सब से पहले लोटे में रंग भर कर अपने घर से निकलतीं। सफ़ेद साड़ी सलूका में सफ़ेद बालों वाली खेरापतिन दादी। बस उनके पीछे पीछे तमाम बहुएँ बिटियाएँ। फिर किसान और किसानियों का गीत चलता -

समहे की लाज गहो गोरी , समहे की

झुमका बाली मो पै हति नायें , तौ क्या रे पहरि खेलूँ होरी / समहे की

अब के तौ गोरी तुम यों ही हँसि खेलौ , फिर के गढाय दऊं दो जोड़ी / समहे की

(गोरी तुम इस समय की लज्जा रख लो। फ़सल आने पर अगली बार दो जोड़ी झुमका बाली गढ़वा दूँगा )

स्त्रियों की होली

स्त्रियों की होली इस मामले में विशेष होती है कि आज के दिन न ऊँच-नीच का चलन रहता है न भेद-भाव का बर्ताव। चलन यह भी है कि इस साल में जिन जिन के यहाँ कोई गमी होजाती है, सबसे पहले रंग के छींटे डालने उनके ही घर जाना होता है और उन्हें अपने साथ लेकर चलते हैं और माना जाता है कि आज से इस घर का शोक समय ख़त्म हुआ। हमने नहीं देखा कि कोई घर इसलिये छोड़ दिया जाये कि उसमें मुसलमान रहते हैं। यह बात मुझे क्यों याद आयी? इसलिये कि इनदिनों हमारे सामने हिन्दू-मुसलमान के नाम पर बडे ख़ौफ़नाक मंज़र गुज़रे हैं। हम डरते रहते हैं ।

याद आने लगे शायर खय्यामी -

'ईमान को ईमान से मिलाओ / इंसान से इंसान को मिलाओ

गीता और क़ुरान को मिलाओ / दैर -ओ- हरम में हो न जंग

होली खेलो हमारे संग'

प्यार का पर्व , रंगों का त्यौहार !

कितने रिश्ते, कितने नाते रंगों में रंग जाने की मंशा के साथ ही जुड़ जाते हैं। राधा-कृष्ण का नाता, गोपिकाओं और गोपों का रिश्ता। सारे मलाल रंगों की धारों के साथ बह जाते हैं। रंजिशें जौ की बालियों के साथ ख़त्म होजाती हैं। बाँहें प्रेम की गलबहिंयों के लिये उठती हैं। इतना सब होने पर हम क्यों भूल जाते हैं आज के दिन उठाये साझा संकल्प को। कौन से स्वार्थ उठ खडे होते हैं कि लोग ख़ून ख़राबे पर उतर आते हैं ? क्या वे ही ये लोग हैं जो आज के दिन ढफ-ढोल बजाकर फागें गारहे थे , क्या वे ही लोग जो हर एक दरबाजे पर जाकर फगुआ लेरहे थे? नहीं नहीं! 

ख़ून ख़राबे वाली करतूतें दूर शहर से आती हैं। साज़िशें नेता लोग पैदा करते हैं। कारण कि उनको राज चाहिये और राज करने के लिये बहुत से ग़ुलाम चाहिये। ग़ुलाम दहशत दिखाकर ही तो बनते हैं।
नेता लोगों के होली का नहीं, हक़ों के हनन महत्व होता है। हक़ छीन कर ही आदमी को कमज़ोर बनाया जा सकता है और इसमें सफल होने के लिये षड्यंत्र ज़रूरी हो जाते हैं। नहीं तो हम होली-दिवाली या ईद-बक़रीद हिन्दू मुसलमानों में नफ़रतों की बातें क्यों सुन रहे हैं? हमारी मुहब्बत के त्यौहारों को क्या राजनीति निगल रही है? नहीं, हम तो अपने लोकतंत्र पर अटूट विश्वास रखते हैं जिसके तहत हर नागरिक को बराबर के अधिकार है और वहाँ घृणा की कोई जगह नहीं है। घृणा के बिना तो दुश्मनी हो नहीं सकती। ऐसे समय में हम अपने होली दिवाली या ईद बक़रीद को याद क्यों नहीं करते?

'उठो यारों , भरो रंगों से जाली'

होली अमीर ग़रीब में और बादशाह तथा जनता में भेद नहीं करती क्योंकि यहाँ मोहर अशर्फ़ियाँ और ख़ज़ाने नहीं चाहिये। थोड़ा सा रंग और एक मुट्ठी गुलाल में मुहब्बत ही मोहब्बत के ख़ज़ाने खुल जाते हैं। हँसी-मुस्कान और आपसी दिलफरेब ठिठोलियों की क़तारें सज जाती हैं। यह कैसा दिल मिलउआ त्यौहार है। राम करे पूरे बरस रहता रहे कि जन जन के मन राधा कृष्ण हो उठें।

इतिहास कहता है कि अकबर और जोधाबाई ने आपस में होली खेली। नूरजहाँ और जहांगीर भी रंगों से परस्पर सराबोर हुये। ये उदाहरण मैं क्यों दे रही हूँ? इसलिये कि होली का जादू हर दिल पर चलता है। यह सर्वथा धर्म निरपेक्ष त्यौहार है। आदमी से आदमी को मिलाने का नायाब जश्न। हमारी संस्कृति का सिरमौर उत्सव।

होली की आप सब को बधाई। होली आप सबको मुबारक।

मैत्रेयी पुष्पा
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