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क्या हिटलर के जर्मनी की ओर बढ़ रहा है भारत?

यह वही भीड़ है जो जेएनयू के बाहर गेट पर सिविल सोसायटी और मीडिया को धमकाती है और पुलिस की मौजूदगी में कहती है -’देश के ग़द्दारों को, गोली मारों सालों को।’ गोली लोकतंत्र में नहीं मारी जाती है। फ़ायरिंग स्क्वैड तो हिटलर की जर्मनी और स्टालिन के सोवियत संघ में थे।
आशुतोष

पाँच जनवरी को देश में लोकतंत्र की मौत हो गयी। यह दुखद है, लेकिन सच है। हिंसा का जो तांडव देर रात जेएनयू में हुआ, उस पर मेरे पास कहने के लिये इस से ज़्यादा असरदार शब्द नहीं है। जो हुआ, देश ने देखा। लाइव टीवी पर इसकी तसवीरें सब के पास पँहुचीं। सोशल मीडिया पर वाइरल हुईं और हम जैसे नागरिक बेबस बस देखते रहे। ऐसी बेबसी का एहसास शायद ही कभी महसूस किया हो।

छात्र-शिक्षक पिटते रहे, पुलिस देखती रही

अंदर दर्जनों नक़ाबपोश गुंडे एक हॉस्टल से दूसरे हॉस्टल छात्रों, शिक्षकों को लाठियों, डंडों, हॉकी स्टिकों और लोहे के रॉड से पीटते रहे। यह तांडव तक़रीबन दो घंटे तक चला। पौने सात बजे शाम को यह शुरू हुआ। नौ बजे रात तक कैंपस के अंदर लठ्ठ बजती रही, सिर फटते रहे, हड्डियाँ टूटती रही, ख़ून बहता रहा और बाहर पुलिस खड़ी तमाशा देखती रही। लोग पुलिस से कहते रहे कि आप अंदर जाइये, लोगों को बचाइये। पर उनका छोटा सा जवाब था, हमे अंदर जाने की इजाज़त नहीं है। विश्वविद्यालय ने इजाज़त नहीं दी है। यह अलग बात है कि यही पुलिस बिना इजाज़त कुछ समय पहले जामिया मिलिया इसलमिया में घुस गयी थी, लाइब्रेरी में घुस कर छात्रों को पीटा था।
यह पुलिस नहीं थी, यह गुंडों की मददगार थी। यह पुलिस छात्रों के साथ नहीं थी, यह बाहर और अंदर के गुंडों के साथ थी।
अंदर छात्र पिट रहे थे और बाहर मीडिया और सिविल सोसायटी के लोग पिट रहे थे, पुलिस के सामने। उनकी मौजूदगी में। पुलिस तब अंदर गयी जब गुंडे ग़ायब हो चुके थे और एक भी पकड़ में नहीं आया। लोकतंत्र में ऐसा नहीं होता है। 

लोकतंत्र में लट्ठ नहीं चलते, बहस होती है

लोकतंत्र में पुलिस नागरिकों के साथ होती है। लोकतंत्र में कानून का शासन होता है। लोकतंत्र में इकतरफ़ा न्याय नहीं होता है। लोकतंत्र में विचारों के झगड़े हिंसा से नहीं निपटते। लोकतंत्र में लठ्ट नहीं चलते, आपसी बातचीत से सुलह होती है। संस्थायें निष्पक्ष फ़ैसले करती हैं। जेएनयू में बीती रात जो हुआ, उसने हमसे ये कहने का अधिकार छीन लिया कि भारत एक लोकतांत्रिक देश है। हमारे यहाँ संविधान से सरकारें चलती हैं। संवैधानिक संस्थाएं न्याय पसंद हैं। 

जेएनयू में मैंने आठ साल गुज़ारे हैं। जो कुछ हूँ, सब जेएनयू की देन है। जेएनयू ने मुझे जैसे छोटे शहर के गँवार को संस्कार दिये। आत्मविश्वास दिया। दुनिया और समाज को समझने का नज़रिया दिया और ये भरोसा दिया कि आपसी झगड़े और विवाद आपस में बैठ कर सुलझ सकते हैं। ये सोच दी कि जीवन सिर्फ अपने लिये जीने का नाम नहीं है। जीवन की सार्थकता ईमानदारी से जीने में है, समाज के लिये सोचने में है।
पर पाँच जनवरी की रात लगता है जेएनयू ने आख़िरी सांसें ले ली हैं। अब वह मरणासन्न पड़ा है, हमसे आपसे सवाल कर रहा है। वह पूछ रहा है, ‘जिन्हें हिंद पर नाज है, वे कहाँ है।’ 

जेएनयू की हिंसा सिर्फ एक विश्वविद्यालय में हुई हिंसा नहीं है। यह उन मूल्यों पर हिंसा है, जो हमारी आज़ादी की लडाई से निकले, पुष्पित और पल्लवित हुये।

भारतीय संस्कारों की मौत!

यह उन भारतीय संस्कारों की मौत है, जो महान दार्शनिक शंकराचार्य को अपने पूर्ववर्ती दार्शनिकों को वाद-विवाद में परास्त कर अद्वैत की स्थापना के लिये प्रेरित करती है, जो मंडन मिश्र जैसे प्रकांड विद्वान से शास्त्रार्थ करती है और मंडन मिश्र हारने के बाद अपने से आधे उम्र के शंकराचार्य का शिष्यत्व स्वीकार कर लेते हैं। 

शंकराचार्य ने हिंसा के बल पर अपने दर्शन को स्थापित नहीं किया था। वह ज्ञानमार्गी थे। लठ्ठ उनका हथियार नहीं था, विवेक और मेधा उनके संस्कार थे। इस महान परंपरा को अपनाने का दावा करने वाले आज सरकार में हैं। पुलिस, प्रशासन और सेना आज उनके इशारों पर चलती है। वेद और पुराण पर अपने कॉपीराइट का दावा करते हैं। राम और कृष्ण को अपना आराध्य मानते हैं। 
राम विनयशील हैं। मृदु है। क्रोध उनका आवरण नहीं हैं। वे सीता हरण के बाद युद्ध के लिये विवश होते हैं पर रावण के  लिये उनमें नफ़रत नहीं है। रावण को हराने के बाद वह लक्ष्मण से कहते हैं कि’ जाओ उनसे राजनीति का ज्ञान गृहण करो।’ कृष्ण महाभारत में गीता का ज्ञान अर्जुन को देते हैं पर नफ़रत करना नहीं सिखाते।
जेएनयू में हिंसा करने वालों की विचारधारा नफ़रत पर टिकी है। वह इसलाम से, ईसाइयत से और वामपंथ से नफ़रत करना सिखाती है। वह हिंसा की वकालत करती है।

विचारधारा का रौद्र रूप?

यह विचारधारा हिंदू धर्म के मूल बिंदु - प्रेम, करुणा, सत्य, अहिंसा, विनयशीलता और सहकार की भावना को ‘विकृत सदगुण’ कह उसके तिरष्कार और बहिष्कार का तर्क देती है। गाँधी और सम्राट अशोक की अहिंसा और ‘अहिंसा परमोधर्म’ को वे कायरता का प्रतीक क़रार देते हैं। इनके मुख्यमंत्री अपने ही नागरिकों से ‘बदले’ की बात करते हैं। और संन्यासी का चोला धारण करने के बाद भी ‘रौद्र रूप’ में अपने अहं की तुष्टि तलाशते हैं। तो क्या जेएनयू से बदला लिया गया है क्योंकि वे उनकी विचारधारा को अंगीकार नहीं करता? उसको अपनी विचारधारा का रौद्र रूप दिखाया गया है? 

गांधी सही मायनों में हिंदू थे। वे कहते थे उनका धर्म सारे धर्मों में जो अच्छा है, उसका निचोड़ है। वह रोज़ अपनी प्रार्थना में ‘ईश्वर-अल्लाह’ को याद करते थे । हिंदू-मुस्लिम एकता उनके लिये महज़ एक राजनीतिक मंत्र नहीं था, उनके जीवन का सार था, उनके होने का एहसास था।
वे, नक़ाबपोश गुंडे जिन्होंने जेएनयू में वामपंथी और मुसलमानों पर चुन-चुन कर हमले किये, की तरह किसी भी धर्म और विचार से नफ़रत नहीं करते थे । उन्होंने अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ आंदोलन किया, देश को आज़ादी दिलाई पर, अंग्रेज़ों से नफ़रत करना नहीं सिखाया। वे कहते थे, ‘पाप से घृणा करो, पापी से नहीं।’ वे हर व्यक्ति में ईश्वर खोजते थे। वे कबीर की वाणी कहते थे, जो कहते थे - ‘वे ही महादेव, वे ही मुहम्मद, ब्रह्मा आदम कहिये, को हिंदू के तुरुक कहावे, एक जिमी पर रहिये।’

जो विचारधारा गाँधी के जन्मदिवस की 150वीं वर्षगाँठ मनाने की बात करे और उनके क़ातिल को देशभक्त कहने वालों को सोशल मीडिया पर फ़ॉलो करे और उनको प्रोत्साहित करे, उससे आप क्या उम्मीद कर सकते है!
जेएनयू पर हमला एक कथानक नहीं है। यह एक पूरी सभ्यता को संदेश है। यह संदेश है कि जब लोकतंत्र कमज़ोर होता है तब फासीवाद अपने पंजे फैलाता है। और यह विचारधारा राष्ट्रवाद, सेना-पुलिस और सड़कछाप मवालियों की आड़ में इस विचारधारा को पूरे विचारतंत्र पर डंडे की ज़ोर से हावी करना चाहती हैं।
इस विचार का मूल है - जो हमारे साथ नहीं है वो देशद्रोही है, ग़द्दार है और यह वही भीड़ है जो जेएनयू के बाहर गेट पर सिविल सोसायटी और मीडिया को धमकाती है और पुलिस की मौजूदगी में कहती है -’देश के ग़द्दारों को, गोली मारों सालों को।’ गोली लोकतंत्र में नहीं मारी जाती है। फ़ायरिंग स्क्वैड तो हिटलर की जर्मनी और स्टालिन के सोवियत संघ में थे। 

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