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‘राम’ की राजनीति में ‘सीता’ का क्या काम है!

अब यह यक़ीन गहरा हो चला है कि हम एक घोर स्त्री विरोधी देश और माहौल में जी रहे हैं। पिछले दिनों जब स्वयंसेवक संघ के एक हिस्से  ने संभावित प्रधानमंत्री के तौर पर मोदी के बजाय नितिन गडकरी का नाम उछाला तब से स्त्रियों की दुनिया में खलबली मच गई है। राजनीति में वैसे भी महिलाएँ कम हैं। जो हैं, वे धीरे-धीरे किनारे की जा रही हैं, ठीक वैसे ही जैसे मीडिया या अन्य क्षेत्रों में उन्हें किनारे लगा दिया जाता है। या उनके ऊपर ग्लास सीलिंग लगा दी जाती है जिससे टकरा-टकरा कर वे लहूलूहान होती हुईं अपने दड़बों में वापस लौट जाती हैं। इससे पुरुषों के लिए सत्ता का मार्ग निष्कंटक हो जाता है। 

इस समय प्रधानमंत्री पद के लिए सबसे प्रबल दावेदार सुषमा स्वराज हो सकती हैं लेकिन उन्होंने सक्रिय राजनीति से अनिच्छा जाहिर कर दी और संघ या पार्टी ने भी उनका नाम आगे बढ़ाने में कोई रुचि नहीं ली। उसी वक्त चर्चित लेखिका शोभा डे ने ट्वीट करके सवाल उठाया था - गडकरी क्यों, सुषमा स्वराज क्यों नहीं।

बेईमानी है उम्मीद करना

जिस पार्टी या जिस विचारधारा की मूल आत्मा में ही स्त्री विरोध भरा हो, जिसकी राजनीति की धुरी एक ऐसे भगवान हों जिनका पूरा जीवन स्त्री-विहीन रहा हो, स्त्री-विरोधी काम रहे हों, स्त्री का निषेध रहा हो। जो स्त्री को अपनी सत्ता और मर्यादा की बलि चढ़ा दे, वैसी विचारधारा से वर्तमान समय में क्या उम्मीद कर सकते हैं। 
यहाँ कार्ल मार्क्स की एक बात याद आती है - ‘इतिहास के किसी दौर में समाज की प्रगति की असलियत जाननी है तो उस समाज में औरतों की स्थिति का पता लगाइए।’ उनके भगवान का त्रेतायुग देखिए, इस युग में कहाँ हैं सीता... जब देखिए तब जंगल-जंगल भटक रही हैं। सुख उनके क़रीब आकर भी छीन लिया जाता है। रामराज्य की स्थापना का मूल आधार ही सीता-निर्वासन है। 
महिलाओं के लिए सत्ता में कोई स्थान नहीं है। उन्हें सिर्फ़ शोभा के लिए आगे बढ़ाया जाता है, पुरुषों को उनका आगे बढ़ते देखना बर्दाश्त नहीं होता।
सत्ता क़ायम रखने के लिए जो भगवान या जो राजा अपनी पत्नी का त्याग कर दे, वह कैसे किसी विचारधारा का पोषक हो सकता है? उसके फ़ॉलोअर किस तरह के लोग होंगे, कैसा समाज बनाएंगे! अपने अतीत का गुनाह, आतंक छुपाने की कितनी भी कोशिश करें, वर्तमान में इनकी हरकतें सारा आतंक खोलती हैं। 

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रामभक्तों ने सीता के निष्कासन पर अनेक तर्क गढ़ कर राम का बचाव किया है और उत्तर कांड से कई उदाहरण उठा कर इसकी अपने ढंग से व्याख्या की है कि राम कितने निर्दोष और भले हैं कि जानबूझ कर सीता को निष्कासित किया। 

मुझे घोर आश्चर्य होता है कि स्त्री समुदाय सब कुछ जानते हुए भी रामभक्ति में कैसे मग्न है। अग्निपरीक्षा, सूर्पणखा का नासिकोच्छेदन, सीता निष्कासन, कोई स्त्री कैसे भूल सकती है। जो समाज किसी लड़की से सीता-सावित्री बनने की उम्मीद करता हो, स्त्री जाति पर प्राचीन नैतिकताएँ थोपता हो और स्त्री से उसी शुचिता का आग्रही हो, वैसे समाज के आतंक को स्त्रियाँ कैसे भूल जाती हैं! 

सीता ने अंतिम बयान दिया था- ‘‘हे राजाराम, आपने राजधर्म निभाया, परंतु पतिधर्म का निर्वाह नहीं कर सके। पति-पत्नी का संबंध राजधर्म का विषय नहीं है। यह मन और विश्वास का संबंध है। राजधर्म की ओट लेकर आप अपने मन का कलुष छुपा नहीं सकते। अत: आज इस सभा में समस्त समाज के समक्ष, जनकनंदिनी जानकी आपका परित्याग करती है...।’’ (साभार - मैं जनकनंदिनी, आशा प्रभात)

सचेत हो जाएँ स्त्रियाँ

सो स्त्रियों, सत्ता में तुम्हारे लिए कोई स्थान नहीं। शोभा के लिए आगे बढ़ाया, शिखर पर देखना गँवारा नहीं। तुम उनकी डाल पर फूलों की तरह शोभायमान रहो। संस्कृति साहित्य में एक जगह स्त्रियों को मनोविनोद करने वाली बताया गया है। मनोविनोद तक ही रह गई, आगे बढ़ी तो नाक काट ली गई। यह स्त्रियों के सचेत होने का समय है। आँखें खोल कर विचारने का समय है। आँखें मूँद कर धार्मिक मान्यताओं को स्वीकारते चलना, अपने शोषण के लिए औजार तैयार करना है। 

आजकल एक बार फिर सत्ता में आने के लिए 'राम' के बहाने जोर-शोर से पितृसत्तात्मक हिन्दुत्व की सुप्त राजनीतिक चिनगारी को सुलगाया जा रहा है और सबको तथाकथित हिन्दू अस्मिता की दुहाई दी जा रही है; पर किसी को यह सोचने-समझने व चिन्तन की ज़रूरत नहीं कि इस तथाकथित हिन्दुत्व की आड़ में सोची-समझी मानसिकता के तहत वे अपने श्रेष्ठतावादी सामंती पुरुषवादी वर्चस्व की ही राजनीति को परवान चढ़ा रहे हैं।

नहीं तो, क्या बात है कि इस हिन्दुत्व की राजनीति की आड़ में हिन्दू स्त्रियों को सिर्फ़ बच्चा जनने की मशीन मानते हुए रूढ़ियों, रीति-रिवाजों व परम्पराओं को ढोने का सारा बोझ उन्हीं पर डाले रखना चाहते हैं और उन्हें सत्ता, सम्पत्ति और निर्णय में कोई अधिकार नहीं देना चाहते। 'राम' (आदि-पुरुष) के प्रसंग व राजनीति में 'सीता' (आदि-स्त्री) के अब तक अनुत्तरित सवाल व सम्मान भी शामिल है, इसका कोई भी ज़िक्र नहीं कर रहा। 

'सीता' को नहीं करते याद 

'सीता' के सवाल आज भी जस के तस हैं। यौन-शुचिता के मानदंड क्यों सिर्फ़ स्त्री तक सीमित कर के रखे गए हैं? क्यों 'सीता' को ही 'अग्निपरीक्षा' देनी पड़ती है? 'सीता' को ही बार-बार क्यों घर-निकाला दिया जाता है? सबको 'राम' (पुरुष) की ही पड़ी है, 'सीता' (स्त्री) की याद किसी को क्यों नहीं आती? रामकथा सब सुनते हैं, उसमें 'सीता' की पीड़ा कोई नहीं सुनता। 

'सीता' ने जो सवाल उठाए थे, उसका जवाब आज तक हमारी राजनीति क्यों नहीं दे पाई? आखिर भारतीय राजनीति में 'स्त्री' के अधिकार व सम्मान का सवाल कमोबेश सबने मिलकर बंद बस्ते में डाल रखा है। भारतीय संसद में महिलाओं के 33 प्रतिशत प्रतिनिधित्व के सवाल का क्या हुआ? अपने को देवी व मातृ-पूजक कहने व मानने वाले लोगों की राजनीतिक मंशा का क्या हुआ?

अपनी सत्ता को बनाए रखने के लिए राम ने सीता को छोड़ दिया। सीता विवाह के बाद भी जंगल-जंगल भटकती रही। रामराज्य की स्थापना का मूल आधार ही सीता-निर्वासन है।

यह तो काफ़ी हद तक सही है कि 'अयोध्या' में भला 'सीता' का महत्व कहाँ? वैसे 'अयोध्या' राजधानी है, राजनीति की दूरभिसंधि में कोई 'स्त्री कहाँ! एक बात और...सोनिया गाँधी के विदेशी मूल के होने पर जिन्हें बहुत आपत्ति है, वे सामाजिक संरचना को नहीं समझ पाए हैं अभी तक। भारतीय समाज में स्त्रियाँ विस्थापित नागरिक होती हैं। उनका कोई स्थायी घर नहीं होता। मायका उनका पराया घर होता है, वे शादी के बाद पराई हो जाती हैं। फिर कहाँ होता है उनका घर... जहाँ वे ब्याह कर जाती हैं। 

संपत्ति पर नहीं है हक़

पुरखों की जमीन पर स्त्रियों का क़ानूनी हक भी नहीं है। सिर्फ़ पिता की संपत्ति में उन्हें हक़ मिल सकता है, उसमें भी सामाजिक संरचना और सोच बाधक है। स्त्री जहाँ पैदा होती है, पलती है, पोसाती है, आधा जीवन बिताती है, वह घर उनका नहीं होता, वह घर उनका होता है जहाँ वे ब्याह कर जाती हैं, तब ऐसे में स्त्री चाहे किसी देश की हो, घर तो उसका ससुराल ही होता है न। हमें किसी को विदेशी मूल का ठहरा कर अस्वीकार करने से पहले भारतीय सामाजिक संरचना की समझ जुटा लेनी चाहिए। इस आधार पर देखें तो सीता जी वर्तमान में भारतीय नहीं, नेपाली मानी जाएंगी।

सीता भारतीय थीं या नेपाली?

'सुगौली-संधि' (यह संधि ईस्ट इंडिया कंपनी और नेपाल के राजा के बीच हुई थी। 2 दिसंबर, 1815 में हस्ताक्षर हुए, 4 मार्च, 1816 को इसका अनुमोदन किया गया। इस संधि के तहत मिथिला क्षेत्र का एक हिस्सा भारत से अलग होकर नेपाल के अधिकार क्षेत्र में चला गया।)  के बाद ही नेपाल के सीमा-क्षेत्र का निर्धारण हुआ, पहले  'जनकपुर' तो मिथिला-क्षेत्र ही रहा है। सीता के जन्म का रहस्य ही सुलझा लें पहले, फिर तय हो कि सीता भारतीय थीं या नेपाली।

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भौगौलिक आधार पर क्या सीता जी अब नेपाली हुईं? क्या इसीलिए उनका ससुराल उन्हें हमेशा निष्कासित करता रहा। क्या इसीलिए रामकथा बाँचने वालों ने कभी अलग से सीताकथा का वाचन नहीं किया। कथावाचक जानते हैं कि सीता का दुख उनसे बाँचा न जा सकेगा। हजारीप्रसाद द्विवेदी ने लिखा है कि स्त्री के दुख इतने गंभीर होते हैं कि उसके शब्द उसका दशमांश भी नहीं कह सकते। स्त्री का दुख बाँचा नहीं जा सकता। भौगोलिक आधार पर स्त्री को मत आँकिए, अतीत का कलंक धुला नहीं, वर्तमान का आतंक हावी हो जाएगा। 

गीताश्री
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