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इमरजेंसी के 45 साल- सुप्रीम कोर्ट से कैसे बच गयी थीं इंदिरा गाँधी?

माना जाता है कि प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी ने आपात काल लगाने के लिए तैयारी बहुत पहले ही कर ली थी। क्या वह हर व्यवस्था को अपने काबू में रखना चाहती थीं? इसे समझने के लिए दो साल पीछे जाना पड़ेगा। 25 जून 1975 को देश में इमरजेंसी लगी थी उससे पहले इंदिरा गाँधी के ख़िलाफ़ न्यायपालिका में केस चल रहा था। 
विजय त्रिवेदी

25 जून 1975 से पहले इलाहाबाद हाईकोर्ट के फ़ैसले पर सुप्रीम कोर्ट ने प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी को राहत दे दी यानी वो प्रधानमंत्री बनी रह सकती थीं, लेकिन यह राहत आधी अधूरी थी। 24 जून 1975 के इस फ़ैसले के रास्ते से ही इंदिरा गाँधी ने सरकार में बने रहने की तैयारी पूरी कर ली।

कुछ लोग मानते हैं कि इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस सिन्हा के 12 जून के फ़ैसले की वजह से श्रीमती गाँधी ने 25 जून 1975 को इमरजेंसी लगाई, जबकि उस आदेश पर तो सुप्रीम कोर्ट ने 24 जून को स्टे ऑर्डर दे दिया था। हाइकोर्ट के फ़ैसले के ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट में पैरवी के लिए मशहूर वकील एन पालखीवाला को बुलाया गया। उस समय सुप्रीम कोर्ट में गर्मियों की छुट्टियाँ चल रही थीं, इसलिए अपील वैकेशन जज जस्टिस वी आर कृष्णा अय्यर के सामने रखी गई। जस्टिस अय्यर ने इस पर  आंशिक स्थगन आदेश दे दिया। जस्टिस अय्यर ने अपने फ़ैसले में कहा कि इंदिरा गाँधी संसद की कार्यवाही में तो शामिल हो सकती हैं, लेकिन वोट नहीं दे सकतीं। यानी क़ानूनी तौर पर वे सांसद बने रह सकती थीं, लेकिन नैतिकता के आधार पर उनका प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बने रहना मुश्किल हो गया था।

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इमरजेंसी की याद

देश और दुनिया को सब कुछ सामान्य लगता रहे, इसके लिए इस फ़ैसले के बाद संसद का सत्र बुलाया गया था लेकिन संसद के इस सत्र में संसद की सामान्य कार्रवाई पर रोक लगा दी गई थी, यानी प्रश्न काल, ध्यानाकर्षण प्रस्ताव और किसी दूसरे प्रस्ताव को रखने की इजाज़त नहीं थी। इस पर विपक्षी सांसदों ने ख़ासतौर से प्रधानमंत्री श्रीमती गाँधी को परेशान करने का एक रास्ता निकाल लिया। सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के मुताबिक़ श्रीमती गाँधी संसद की कार्यवाही में तो हिस्सा ले सकती थीं, लेकिन वोटिंग में शामिल नहीं हो सकती थीं। इसका फ़ायदा उठाते हुए विपक्षी सांसद हर प्रस्ताव पर भाषण देते, व्यवस्था आदि का प्रश्न उठाते और हर बार वोटिंग की माँग करते। वोटिंग के मौक़े पर हर बार श्रीमती गाँधी को सदन छोड़कर बाहर जाना पड़ता था। तब वे लोग उन पर टिप्पणी करते और मज़ाक़ उड़ाते। 

इसके बाद विपक्षी सांसदों ने एक बैठक कर तय किया कि एक दो दिन वे सरकारी प्रस्तावों का विरोध करेंगे और फिर वॉकआउट करेंगे और ऐसा ही किया। इमरजेंसी के एलान का प्रस्ताव लोकसभा में 336 वोटों से पास हो गया, इसके ख़िलाफ़ 59 वोट पड़े जबकि राज्यसभा में इसके विरोध में केवल 33 वोट पड़े।

इसके बाद 7 नवम्बर 1975 को सुप्रीम कोर्ट ने जब इंदिरा गाँधी को बरी करने का फ़ैसला सुनाया तो कई सवाल भी खड़े हुए, बहुत से क़ानूनविदों ने इस बात पर भी शक किया कि कहीं इसकी वज़ह ज्यूडिशियरी का प्रधानमंत्री श्रीमती गाँधी के प्रभाव में होना तो नहीं है, लेकिन इस बात का यहाँ ज़िक्र कर देना ठीक होगा। इस बेंच के एक जज जस्टिस एच आर खन्ना ने ही इमरजेंसी के दौरान मौलिक अधिकारों से जुड़े एक मामले में गाँधी सरकार के ख़िलाफ़ अपनी राय रखी थी जबकि उस बेंच में जस्टिस खन्ना के अलावा दूसरे चार जजों ने सरकार के पक्ष में फ़ैसला दिया था। यह भी है कि इंदिरा गाँधी ने सीनियर जजों की अनदेखी कर जस्टिस रे और जस्टिस बेग़ को प्रमोशन दिया था, मुख्य न्यायाधीश बनाया था। लेकिन इन्हीं जजों में से एक जस्टिस वाई वी चन्द्रचूड़ को जनता पार्टी की सरकार ने मुख्य न्यायाधीश बनाया। 

जस्टिस चन्द्रचूड़ के वक़्त में ही सुप्रीम कोर्ट ने इंदिरा गाँधी के बेटे संजय गाँधी को जेल भेजा था। जस्टिस चंद्रचूड़ को न्यायपालिका की स्वतंत्रता की लड़ाई लड़ने और इसके लिए इंदिरा सरकार से टकराव मोल लेने के लिए जाना जाता है।

दरअसल, हाई कोर्ट के फ़ैसले और सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले में जो फर्क आता है वो केस के तकनीकी पक्षों के कारण होता है। जिस गजटेड ऑफ़िसर यशपाल कपूर पर इल्जाम था कि सरकारी कर्मचारी रहते हुए वो इंदिरा गांधी का चुनाव देख रहे थे, उन्होंने अपने पद से इस्तीफ़ा दे दिया था। तकनीकी पेंच यह था कि उन्होंने इस्तीफ़ा कब दिया? उसे स्वीकार कब किया गया? सरकारी गजट में इसे कब छापा गया? वगैरह वगैरह। हाई कोर्ट में यह मानकर केस लड़ा गया था कि 1970 के नवंबर-दिसंबर में जब कभी इंदिरा गाँधी ने कहा था कि वह अपना चुनाव क्षेत्र नहीं बदलेंगी, तभी से उन्हें रायबरेली से उम्मीदवार मान लिया गया था। जबकि उस समय तो औपचारिक तौर पर चुनाव आयोग ने आम चुनाव का एलान भी नहीं किया था। तब यशपाल कपूर इंदिरा गाँधी के ओएसडी (अफ़सर ऑन स्पेशल ड्यूटी) के तौर पर सरकारी कर्मचारी थे। हालाँकि बाद में यह व्यवस्था बनी कि नॉमिनेशन की तारीख़ से उम्मीदवारी मानी जाएगी। 

जिन तकनीकी पहलुओं पर हाई कोर्ट ने इंदिरा गाँधी को चुनाव में दोषी माना था उन्हीं आधारों पर सुप्रीम कोर्ट में वह बरी हो गई थीं। वोटरों को पैसे देकर प्रभावित करने के भ्रष्टाचार के राज नारायण के आरोपों को तो हाई कोर्ट ने भी खारिज कर दिया था।

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इंदिरा, इमरजेंसी और न्यायपालिका

वैसे, माना जाता है कि प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी ने आपात काल लगाने के लिए तैयारी बहुत पहले ही कर ली थी। क्या वह हर व्यवस्था को अपने काबू में रखना चाहती थीं? इसे समझने के लिए दो साल पीछे जाना पड़ेगा। इलाहाबाद हाईकोर्ट में राज नारायण की याचिका पर सुनवाई चल रही थी। प्रधानमंत्री श्रीमती गाँधी को अदालत में अपने पक्ष में फ़ैसला आने की संभावना कम दिख रही थी। साल 1973 में श्रीमती गाँधी की सरकार ने तीन जजों की वरिष्ठता को नज़रअंदाज़ करते हुए जस्टिस ए एन रे को सुप्रीम कोर्ट का मुख्य न्यायाधीश बनाने का फ़ैसला किया। जस्टिस रे, सिद्धार्थ शंकर रे के नज़दीकी बताए जाते थे। जस्टिस जे एम शेलत, जस्टिस के एस हेगड़े और जस्टिस ए एन ग्रोवर, जस्टिस रे से वरिष्ठ थे लेकिन श्रीमती गाँधी अपने लिए भरोसेमंद न्याय व्यवस्था चाहती थीं जो ज़रूरत पड़ने पर उनके पक्ष में खड़ी हो सके। 

जिन तीन जजों की वरिष्ठता को नज़रअंदाज़ किया गया था, उन्होंने संपत्ति संबंधी मौलिक अधिकार को ख़त्म करने वाले विधानों को संविधान के ख़िलाफ़ मान कर रद्द कर दिया था।

राष्ट्रपति वी वी गिरी ने ज्यूडिशियरी को लेकर सरकार के इस फ़ैसले पर आपत्ति ज़ाहिर की थी लेकिन प्रधानमंत्री ने उसे नज़रअंदाज़ किया। इलाहाबाद हाईकोर्ट के फ़ैसले से नौ दिन पहले 3 जून को क़ानून मंत्री एच के गोखले ने प्रधानमंत्री से मुलाक़ात की, इसके बाद जस्टिस रे से सलाह मशवरा किया गया। बताया जाता है कि क़ानून मंत्री गोखले को कहा गया कि यदि इलाहाबाद हाईकोर्ट का फ़ैसला श्रीमती गाँधी के ख़िलाफ़ भी आता है तब भी सुप्रीम कोर्ट को उस पर रोक लगाने में कोई ख़ास परेशानी नहीं होगी।

विचार से ख़ास

इसी दौरान एक और अहम फ़ैसला हुआ। कंवरलाल गुप्त ने अपने विजयी विरोधी उम्मीदवार अमर नाथ चावला के ख़िलाफ़ निर्धारित सीमा से ज़्यादा पैसा चुनाव में ख़र्च करने को लेकर याचिका दायर की थी। इस पर सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस पी एन भगवती ने फ़ैसला सुनाया कि उम्मीदवार के लिए उसके पक्ष में किया गया ख़र्च भी उम्मीदवार के खर्च में जोड़ा जाना चाहिए। इस आधार पर उन्होंने चावला का चुनाव निरस्त कर दिया। उसी समय इंदिरा गाँधी के चुनाव का मामला भी इलाहाबाद हाइकोर्ट में चल रहा था। श्रीमती गाँधी पर भी इस मामले में चुनाव में निर्धारित सीमा से ज़्यादा पैसा ख़र्च करने का आरोप था। कोर्ट में कांग्रेस की तरफ़ से शपथ-पत्र देकर यह स्वीकार कर लिया गया था कि कांग्रेस ने इंदिरा गाँधी के चुनाव में साढ़े तीन लाख रुपए ख़र्च किए थे यानी जस्टिस भगवती के फ़ैसले के आधार पर उनका चुनाव भी रद्द होना तय ही था। तब श्रीमती गाँधी ने अपने बचाव के लिए क़ानून ही बदल दिया। 

राष्ट्रपति ने एक अध्यादेश निकाला। इस अध्यादेश में जन-प्रतिनिधित्व अधिनियम,1951 की धारा 77 में यह जोड़ दिया गया कि पार्टी या किसी व्यक्ति या व्यक्तियों के समूह की ओर से किया गया ख़र्च उम्मीदवार का ख़र्च नहीं माना जाएगा। इस अध्यादेश में यह भी कहा गया था कि वह अदालत में पहले से चल रहे मामलों पर भी लागू होगा। सरकार ने इसे संसद में पेश करके 21 दिसम्बर, 1974 को क़ानून की शक्ल दे दी और यह तो सबके फ़ायदे की बात थी।

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