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रिज़र्व बैंक बोर्ड की स्वायत्तता सरकार की मंशा पर निर्भर

रिज़र्व बैंक बोर्ड, उसके गवर्नर और वित्त मंत्रालय या सरकार के बीच रिश्ते अब कैसे होंगे? रिज़र्व बैंक कितना स्वायत्त रहेगा या नहीं रहेगा? 19 नवम्बर की बैठक के बाद अब क्या बदल गया है?इस पर चर्चा से पहले यह जान लेना चाहिए कि नेहरू सरकार से लेकर अब तक बहुत-सी सरकारों और रिज़र्व बैंक के बीच आर्थिक प्रबन्धन को लेकर बड़े-छोटे मतभेद अकसर होते रहे हैं। सबसे ज़्यादा समय तक रिज़र्व बैंक के गवर्नर रहे बेनेगल रामा राउ (1949-1957) को नेहरू सरकार के वित्त मंत्री टी. टी. कृष्णामाचारी से गम्भीर मतभेदों के बाद पद छोड़ना पड़ा था।
Why is the government keeping an eye on autonomy of the Reserve Bank? - Satya Hindi
और हाल में सबसे ताज़ा मामला यूपीए के वित्त मंत्री पी. चिदम्बरम का है, जब अक्तूबर 2013 में तत्कालीन गवर्नर सुब्बाराव ने ब्याज दरों में कटौती करने से इनकार कर दिया था, तब चिदम्बरम ने कहा था, 'मुद्रास्फीति जितनी बड़ी चुनौती है, विकास भी उतनी ही बड़ी चुनौती है। और अगर सरकार को विकास के रास्ते पर अकेले ही चलना पड़े, तो वह अकेले ही चलेगी।' (और याद रखिए यह 2014 के लोकसभा चुनाव से ठीक छह महीने पहले की बात है जब चिदम्बरम अपनी खीझ व्यक्त कर रहे थे। और आज पाँच साल बाद फिर लोकसभा चुनाव के पाँच महीने पहले रिज़र्व बैंक केन्द्र सरकार के निशाने पर है।)ख़ुद पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने अपनी किताब में कहा है कि रिज़र्व बैंक और सरकार के बीच कुछ लेना और कुछ देना तो चलता ही रहता है। वह जब रिज़र्व बैंक के गवर्नर थे तो सरकार को विश्वास में लेकर चलते थे। मनमोहन सिंह ने यह भी साफ़-साफ़ कहा है कि रिज़र्व बैंक का गवर्नर देश के वित्त मंत्री से ऊपर नहीं होता और अगर वित्त मंत्री किसी फ़ैसले को ज़रूरी समझता हो तो गवर्नर उसे मना नहीं कर सकता, यदि वह पद छोड़ने पर ही आमादा न हो।मनमोहन सिंह की इस बात से साफ़ है कि अगर गवर्नर और सरकार में विवाद हो, असहमति हो तो अन्तिम निर्णय किसका चलेगा। ज़ाहिर है कि किसी लोकतांत्रिक व्यवस्था में नीतिगत फ़ैसले लेने का काम सरकार का ही होता है। लेकिन इसके साथ ही लोकतंत्र की एक दूसरी शर्त भी है कि फ़ैसले 'जनहित' में हों, न कि वोटों की तात्कालिक राजनीति के हित में।सवाल यह है कि अगर कोई सरकार कोई ऐसा फ़ैसला ले, जिसके बारे में गवर्नर मानता हो कि यह आर्थिक प्रबन्धन की ज़रूरतों की अनदेखी करता है और इस फ़ैसले के पीछे नीतिगत सोच या 'जनहित' न हो कर केवल 'जनप्रियता' हो, तब क्या हो? क्या तब गवर्नर को आँखें मूँद कर सरकार की जी-हुज़ूरी करनी चाहिए? और अगर कोई गवर्नर ऐसा करता है तो क्या वह अपनी ज़िम्मेदारी वाक़ई निभा रहा है? और क्या ऐसा होना लोकतंत्र के स्वास्थ्य के लिए हानिकारक नहीं होगा?दूसरी बात यह कि रिज़र्व बैंक की स्थापना से लेकर अब तक सरकारों और रिज़र्व बैंक के गवर्नरों के बीच चाहे जैसे मतभेद रहे हों, किसी सरकार ने गवर्नर की शक्तियों को कम करने की बात नहीं सोची, चाहे वह सरकारें हाहाकारी बहुमत से चुन कर क्यों न आई हों।इसलिए रिज़र्व बैंक का मौजूदा विवाद पहले के तमाम विवादों से बिलकुल अलग है। 19 नवम्बर की बैठक के बाद रिज़र्व बैंक के फ़ैसलों में सरकार का परोक्ष हस्तक्षेप यक़ीनन बढ़ जाएगा। एक तरह से कहें कि सरकार जिधर हाँकेगी, बैंक को उधर ही जाना पड़ेगा। क्योंकि रिज़र्व बैंक का बोर्ड अब तक सलाहकार की भूमिका में था, लेकिन अब वह निर्देशक और निगरानी की भूमिका में होगा। बोर्ड के निर्देशों को गवर्नर लागू करेगा।वैसे इसमें कुछ भी ग़लत नहीं है, कुछ भी ग़ैरक़ानूनी नहीं है। रिज़र्व बैंक क़ानून की धारा 7 (2) कहती है कि बैंक का केन्द्रीय निदेशक मंडल उसके सारे कामकाज को निर्देशित करेगा और उसकी निगरानी करेगा। तो फिर इस पर अब हाय-तौबा क्यों? मोदी सरकार ने तो कुछ ग़लत नहीं किया। असल में मुद्दा बहुत महीन है। मुद्दा है नीयत और मंशा का। सरकार ने एक नीतिगत सुधार के लिए ऐसा किया होता, तो सवाल नहीं उठते। जैसे जब 2016 में यह तय हुआ था कि मौद्रिक नीति केवल गवर्नर अकेले तय नहीं करेगा, बल्कि छह सदस्यों की एक कमिटी तय करेगी, जिसमें तीन प्रतिनिधि सरकार के भी होंगे, तब सरकार की मंशा को लेकर सवाल नहीं उठे थे। लेकिन इस बार सरकार ने एक तरह से रिज़र्व बैंक को 'औक़ात बताने' और साथ-साथ अपने राजनीतिक हितों को साधने के लिए गवर्नर उर्जित पटेल और उनकी टीम के कान मरोड़े हैं। इसलिए सरकार की नीयत साफ़ नहीं मानी जा सकती। और अगर भविष्य में सरकार की नीयत साफ़ न रही तो इसके बड़े जोखिम हो सकते हैं।

रिज़र्व बैंक के बोर्ड में कुल 21 सदस्य हो सकते हैं। अभी 18 हैं। बोर्ड में गवर्नर, चार डिप्टी गवर्नर और केन्द्र सरकार के मनोनीत दो सदस्य होते हैं। चार सदस्य रिज़र्व बैंक के स्थानीय बोर्डों से आते हैं और दस सदस्यों को केन्द्र सरकार नियुक्त कर सकती है। डिप्टी गवर्नरों और मनोनीत सदस्यों को वोट देने का अधिकार नहीं होता। यदि किसी विषय पर बोर्ड में गहरा मतभेद हो और पक्ष-विपक्ष में बराबर-बराबर वोट पड़ें तो गवर्नर का वोट निर्णायक होगा।

नियुक्ति का नहीं है कोई पैमाना

ज़ाहिर-सी बात है कि बोर्ड में सरकार का प्रतिनिधित्व काफ़ी ज़्यादा है और वह जब चाहे, बोर्ड से अपने मनोनुकूल फ़ैसले करा सकती है। आमतौर पर अभी तक किसी सरकार ने गवर्नर पर बोर्ड का दबाव बनाने की कोशिश नहीं की थी। इसलिए चीज़ें चलती रहीं। दूसरी बात यह कि बोर्ड में सरकार किनको नियुक्त करेगी और नियुक्ति का आधार क्या होगा, इसका कोई पैमाना नहीं है। सरकार द्वारा नियुक्त किए गए बोर्ड के सदस्य अगर कुछ मुद्दों पर सरकार की हाँ में हाँ मिलाने लगे, तो फ़ैसले वही होंगे, जो सरकार चाहेगी। फिर रिज़र्व बैंक की स्वायत्तता का क्या अर्थ है?

यह सवाल पहले इसलिए नहीं उठा कि इसके पहले तक बोर्ड आमतौर पर सलाहकार की भूमिका में होता था और मामला सीधे रिज़र्व बैंक गवर्नर और सरकार के बीच होता था। अगर दोनों में तालमेल अच्छा रहा और नज़रिये में बहुत अलगाव न हुआ तो चीज़ें आराम से चलती रहीं। कुछ मतभेद हुए तो अख़बारों के ज़रिये सामने आते रहे।लेकिन अब बोर्ड फ़ैसले लेगा और गवर्नर उसे लागू करेगा। बोर्ड के सदस्यों को केन्द्र सरकार से कहलवाया और समझाया जा सकता है कि उन्हें क्या करना है। यह इस पर निर्भर है कि कैसे लोग बोर्ड में नियुक्त किए जाते हैं। ए. पी. जे. अब्दुल कलाम जैसे लोग पहले बोर्ड में रह चुके हैं। ऐसे क़द्दावर लोगों को कोई सरकार प्रभावित कर पाए, यह सम्भव नहीं। यानी बोर्ड सरकार के कहे पर चलेगा या अपनी समझ से काम करेगा, यह इस पर निर्भर है कि किस तरह के लोग बोर्ड में आते है? तो सरकार की जैसी नीयत होगी, वैसे लोगों को वह बोर्ड में भेजेगी। और उसी से तय होगा कि रिज़र्व बैंक कितना स्वायत्त रहेगा?

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