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जेएनयू: आरोपियों को गिरफ़्तार कर सच क्यों नहीं उगलवाती पुलिस? हीला-हवाली क्यों?

जेएनयू में हुई हिंसा की देश ही नहीं दुनिया भर में निंदा हो रही है। भारत का सामान्य नागरिक भी इस पर भरोसा नहीं कर पा रहा है कि देश की इतनी प्रतिष्ठित और राजधानी में स्थित यूनिवर्सिटी में नक़ाबपोश गुंडे घुसे, कहर मचाकर चले गए और पुलिस को इसका पता भी नहीं चला। घटना के 8 दिन बाद भी पुलिस ने अब तक इस मामले में किसी को गिरफ़्तार करना तो दूर, हिरासत में लेकर पूछताछ तक शुरू नहीं की है। जबकि इस घटना के वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हैं। अंग्रेजी न्यूज़ चैनल ‘इंडिया टुडे’ के स्टिंग ऑपरेशन में दिखे दो शख़्स दावा कर चुके हैं कि वे हमला करने वाली भीड़ में शामिल थे। एक नक़ाबपोश लड़की का फ़ोटो वायरल है जिसका नाम कोमल शर्मा बताया गया है, लेकिन उसे भी पुलिस अब तक बस जाँच में शामिल होने का नोटिस ही भेज सकी है।

दिल्ली पुलिस को भारत की सबसे बेहतर पुलिस माना जाता है। इसमें काम करने वाले पुलिस अफ़सरों के पास राजधानी की सुरक्षा व्यवस्था के साथ ही संसद, सुप्रीम कोर्ट, सांसदों, तमाम बड़ी हस्तियों, व्यवसायियों के अलावा यहां रहने वालों करोड़ों लोगों की सुरक्षा का जिम्मा है। पुलिस से उम्मीद यह की जाती है कि वह मुस्तैदी दिखाते हुए किसी भी घटना को जल्द से जल्द सुलझाएगी। लेकिन जेएनयू मामले में हो बिलकुल उल्टा रहा है। ऐसे में पुलिस की भूमिका पर लगातार सवाल खड़े हो रहे हैं। 

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घटना वाले दिन के बारे में मीडिया में ख़बरें आ चुकी हैं कि उस दिन 4 घंटे के भीतर 23 बार दिल्ली पुलिस को कॉल की गई। जेएनयू छात्र संघ की अध्यक्ष आइशी घोष ने दिन में दोपहर 3 बजे पुलिस को बताया था कि हाथों में डंडे लिए कुछ लोग कैंपस में घुस आए हैं और पुलिस से कैंपस में आने के लिए कहा था लेकिन वह नहीं आई। 

पुलिस ने जो प्रेस कॉन्फ़्रेंस की है, उसमें भी उसका रवैया पक्षपातपूर्ण दिखा है। उसने यह बताने की कोशिश है कि जेएनयू में हुई हिंसा में वामपंथी छात्र संगठनों का हाथ है। जिस लड़की के सिर से ख़ून बहता हुआ दुनिया ने देखा, पुलिस ने उसी के ख़िलाफ़ एफ़आईआर भी दर्ज कर ली और कहा कि हिंसा में वह भी शामिल है। 

जेएनयू में हुई हिंसा के बाद वॉट्सऐस ग्रुप ‘फ़्रेंड्स ऑफ़ आरएसएस’ का स्क्रीनशॉट वायरल हुआ था, जिसमें हमले की योजना बनाने की और हिंसा को लेकर बातें कही गईं थीं। इसके अलावा भी कई और ग्रुप थे जिसमें हुई चैट में इस हिंसा पर ख़ुशी जताई गई थी। ऐसे ही एक ग्रुप ‘यूनिटी अगेन्स्ट लेफ़्ट’ को लेकर पुलिस ने दावा किया है कि उसने वॉट्सऐप ग्रुप के 60 में से 37 लोगों की पहचान कर ली है। लेकिन पहचान करके ही काम चल जाएगा क्या? इन लोगों से सच भी तो उगलवाने की जिम्मेदारी पुलिस की है। इसे वह कब करेगी, इस बारे में कुछ पता नहीं है। 

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लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि पुलिस इतनी हीला-हवाली क्यों कर रही है। पुलिस को करना यह चाहिए कि इतनी बड़ी घटना को लेकर जिन लोगों पर भी उसे शक है, उन्हें बुलाए, पूछताछ करे, ज़रूरत पड़ने पर सच भी उगलवाए और मामले का पर्दाफ़ाश कर गुंडों को सामने लाए। लेकिन यहां तो पुलिस आराम से पहले आरोपियों को जाँच में शामिल होने का नोटिस भेज रही है।

जेएनयू में 2016 में जब देशद्रोही नारे लगाने का मामला सामने आया था तब जमकर हंगामा हुआ था। तब जेएनयू छात्र संघ के तत्कालीन अध्यक्ष कन्हैया कुमार को पुलिस ने तत्काल गिरफ़्तार किया था। उस दौरान कन्हैया की दिल्ली की पटियाला हाउस कोर्ट में पेशी के दौरान बीजेपी विधायक ओपी शर्मा और उनके समर्थकों ने कोर्ट परिसर में ही एक युवक को बुरी तरह पीट दिया था। लेकिन पुलिस ने इस मामले में विधायक को गिरफ़्तार कर थाने से ही जमानत पर छोड़ दिया गया था। तब पुलिस ने विधायक को छोड़ने में बहुत तेज़ी दिखाई थी लेकिन इस बार पुलिस स्टिंग ऑपरेशन में, सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो में चेहरे दिखने के बाद भी आरोपियों को गिरफ़्तार करने में इतनी देरी क्यों कर रही है?
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पुलिस ने सर्वर रूम में तोड़फोड़ की शिकायत तुरंत दर्ज कर ली लेकिन इस घटना में घायल हुई और जिसके सिर में 16 से ज़्यादा टांके आए हैं, उस आइशी घोष की शिकायत पर उसने अभी तक एफ़आईआर दर्ज नहीं की है। 

क्या दबाव में है दिल्ली पुलिस?

ऐसे में सवाल यही है कि पुलिस क्यों इतनी हीला-हवाली कर रही है। वह इतने बड़े कांड के आरोपियों को ऐसे बुला रही है कि मानो कोई बहुत छोटी घटना हो और जिसका ख़ुलासा होने या न होने से बहुत फर्क नहीं पड़ता हो। लेकिन वह ऐसा क्यों कर रही है। वह आरोपियों को सामने लाने के लिए तेज़ी से काम क्यों नहीं कर रही है। वह क्यों नहीं चाहती कि टीचर्स और बच्चों के हाथ-पाँव तोड़ने वालों के चेहरे बेनक़ाब हों और दुनिया भी उनके बारे में जान सके। क्या वह किसी दबाव में है, क्या उस पर वामपंथी छात्र संगठनों का नाम खुलकर लेने, इन संगठनों से जुड़े लोगों के नाम लेने और एबीवीपी का नाम न लेने और उसके कार्यकर्ताओं के ख़िलाफ़ कार्रवाई न करके का दबाव है। पुलिस की पिछले 8 दिनों की कार्यप्रणाली से शक ज़रूर पैदा होता है। 

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