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नयी ऊँचाई पर विमानन क्षेत्र तो जेट एयरवेज़ गर्त में क्यों?

जेट एयरवेज़ ऐसे गंभीर संकट में क्यों है? भारत की कोई भी एयरलाइन कंपनी मुनाफ़े में क्यों नहीं है? सरकारी कंपनी एयर इंडिया पर भी क़रीब 50 हज़ार करोड़ रुपये का कर्ज़ है। ऐसा क्यों है जब सरकार विमानन क्षेत्र को नयी ऊँचाइयाँ देने के दावे किए जा रही है? ऐसा तब है जब भारत में हवाई यात्रा करने वालों की तादाद तेज़ी से बढ़ रही है। क्या जेट एयरवेज़ जैसी कंपनियों का संकट हमारे विमानन उद्योग की असफलता की कहानी नहीं बयान करते हैं? यदि ऐसा नहीं है तो जेट एयरवेज़ के साथ दिक्कत क्या है?

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पैसे की तंगी के कारण जेट एयरवेज़ के सिर्फ़ पाँच विमान ही सेवा में हैं। सभी अंतरराष्ट्रीय उड़ानें 18 अप्रैल तक बंद करनी पड़ी हैं। 400 करोड़ रुपये का आपात फ़ंड तुरंत नहीं मिला तो इसकी सभी उड़ाने बंद हो जाएँगी। 16000 कर्मचारियों को जनवरी से वेतन नहीं मिला है। एयरलाइन पर 8500 करोड़ का कर्ज़ है। कंपनी को उबारने के लिए उधार देने वाले बैंकों से साफ़ संकेत भी नहीं मिला है। तो क्या जेट एयरवेज़ दिवालिया होने के कगार पर है? 

वेतन नहीं मिलने से ख़फ़ा कंपनी के पायलटों के संगठन नेशनल एविएशन गिल्ड दिवालिया क़ानून के तहत समाधान करने की माँग कर रहा है। जेट के संकट की गंभीरता का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि प्रधानमंत्री कार्यालय को आपात बैठक बुलानी पड़ गई थी।

बता दें कि जेट के सीईओ विनय दुबे ने स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया के सामने माँग रखी कि जेट एयरवेज़ को बचाने के लिए तुरंत 400 करोड़ रुपये की ज़रूरत है। विनय दुबे का कहना है कि जेट को बचाना है तो पैसा तुरंत चाहिए। कंपनी ने बैंकों से फ़ंड जारी करने का निवेदन किया है। इस पर बैंकों ने अब तक फ़ैसला नहीं लिया है। इधर, नागरिक उड्डयन सचिव प्रदीप सिंह खरोला ने भी कहा है कि जेट एयरवेज़ ने उधार देने वाले बैंकों से चार सौ करोड़ रुपये के आपात फ़ंड की माँग की है। अनिश्चितताओं के बीच एयरलाइन के शेयर की क़ीमतों में भारी गिरावट आयी है। मंगलवार को इसके शेयर क़रीब 19 फ़ीसदी की गिरावट आयी और बुधवार को भी इसमें गिरावट बरकरार रही।

तो क्या कंपनी ने कुछ भी प्रयास नहीं किया?

जेट एयरवेज का यह संकट कोई अचानक नहीं खड़ा हुआ है। दरअसल, जेट एयरवेज़ प्रबंधन को काफ़ी पहले से अंदाज़ा हो गया था कि कंपनी की आर्थिक स्थिति डावाँडोल है। इसीलिए जेट एयरवेज के बोर्ड ने 25 मार्च को कर्ज़ से उबरने की योजना मंज़ूर की। इसके तहत कंपनी को उधार देने वाले बैंकों से 1500 करोड़ रुपये के आपात फ़ंड दिये जाने का ज़िक्र है और इसके बदले में जेट एयरवेज़ में उन बैंकों को अधिकतर हिस्सेदारी देने की बात कही गयी है। लेकिन अब तक इन बैंकों से जेट एयरवेज़ को 300 करोड़ रुपये ही मिले हैं और वह भी छोटे-छोटे टुकड़ों में। बताया जाता है कि कई प्रक्रियाओं को पूरा करने में देरी हुई। इस कारण एयरलाइन न तो कर्मियों को वेतन दे पायी है और न ही विमान के पट्टाधारकों का भुगतान चुकता कर पायी है। यही कारण है कि कंपनी को अपने अधिकतर विमान की उड़ानें रोकनी पड़ीं। अंतरराष्ट्रीय उड़ानें तो 18 अप्रैल तक के लिए बंद करनी पड़ी हैं।

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संस्थापक नरेश गोयल ने दिया था इस्तीफ़ा

कंपनी की ख़राब आर्थिक हालत के बारे में रिपोर्टें फ़रवरी 2019 में ही आने लगी थीं। इन्हीं परिस्थितियों में एयरलाइन के संस्थापक और अध्यक्ष नरेश गोयल ने इस्तीफ़ा दे दिया था। बाद में कंपनी की इतनी हालत ख़राब हो गयी कि अप्रैल आते-आते इसे अपनी अधिकतर उड़ानें स्थगित करनी पड़ गयीं। इन उड़ानों के स्थगन से पहले मार्च महीने तक कंपनी के 115 विमान सेवा में थे। पिछले साल ही कंपनी ने 227 और विमानों को लगाने के लिए क़रार किया था, लेकिन अब लगता है कि यह सौदा शायद न हो पाये।

बता दें कि 1992 में जेट एयरवेज से गठित यह एक भारत की निजी कंपनी है। इसके अगले साल 1993 में इसने एयर टैक्सी की उड़ानों के साथ शुरुआत की थी। बाद में इसने एयर सहारा को ख़रीद लिया और 2010 में यह सबसे बड़ी एयरलाइन कंपनी बन गयी थी। 2017 में यह इंडिगो के बाद दूसरी सबसे बड़ी एयरलाइन कंपनी थी। लेकिन अब इसकी हालत ख़राब है।

यदि जेट एयरवेज़ को बैंकों का समूह संकट से उबारता भी है तब भी इस बात की उम्मीद बहुत कम है कि कंपनी फिर से खड़ी हो पाएगी। ऐसी फ़ौरी मदद कोई स्थायी समाधान नहीं देती है। नागरिक उड्डयन मंत्रालय को दूरदर्शिता दिखाने की ज़रूरत है।

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