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हरिद्वार धर्म संसद में हेट स्पीच का आरोपी नरसिंहानंद। फाइल फोटो।

मी लॉर्ड! हेट स्पीच पर चुप्पी 'नपुंसकता' नहीं अपराध है!

सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में नफ़रती भाषणों पर महाराष्ट्र सरकार की चुप्पी से जुड़े एक मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि “राज्य नपुसंक हैं। वे समय पर काम नहीं करते। जब राज्य ऐसे मसलों पर चुप्पी साध लेंगे तो फिर उनके होने का मतलब क्या है?” जस्टिस के.एम.जोसेफ़ और जस्टिस बी.वी.नागरत्ना की बेंच ने कहा कि “अदालत ने कहा कि जिस वक्त राजनीति और धर्म से अलग हो जाएँगे और नेता राजनीति में धर्म का उपयोग बंद कर देंगे, ऐसे भाषण समाप्त हो जाएँगे। हम अपने हालिया फ़ैसलों में भी कह चुके हैं कि पॉलिटिक्स को राजनीति के साथ मिलाना लोकतंत्र के लिए ख़तरनाक है।”
माननीय न्यायधीशों की नीयत चाहे जितनी अच्छी रही हो, फ़ैसले में ‘नपुसंक’ शब्द चौंकाने वाला है। ख़ासतौर पर जब हाल के दिनों में समलैंगिकता समेत तमाम मुद्दों पर सुप्रीमकोर्ट एक प्रगतिशील रुख़ लेता दिखाई दिया है। पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट में एक समलैंगिक जज की नियुक्ति को लेकर सुप्रीमकोर्ट के सकारात्मक स्टैंड की दुनिया भर में सराहना हुई थी। 2014 में ट्रांसजेडर की मान्यता लेकर दिये गये अपने महत्वपूर्ण फ़ैसले में भी सुप्रीम कोर्ट कह चुका है कि ‘तीसरे लिंग के रूप में ट्रांसजेंडर की मान्यता सामाजिक या चिकित्सा का नहीं बल्कि मानवाधिकार का मुद्दा है।’
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सभ्यता की कसौटी पर अब किसी को ‘मोटा’  कहना भी ‘बॉडी शेमिंग’ के दायरे में आता है, शारीरिक समस्या को चिन्हित करना तो दूर की बात है। सुप्रीम कोर्ट ने जिस अंदाज़ में राज्य को ‘नपुसंक’ कहा है वह एक मर्दवादी समाज में ‘पौरुष से जुड़े पूर्वाग्रह’ का नतीजा जहाँ संतान पैदा करने की काबलियत दूसरी हर बात से ऊपर समझी जाती है। वैसे नपुंसक व्यक्ति भी राज्य के दायित्वों का निर्वहन अच्छी तरह कर सकता है। मिसाल के तौर पर हम सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी के मशहूर ‘नपुंसक’ कमांडर  मलिक काफ़ूर की याद कर सकते हैं जिसने 1306 में न सिर्फ़ मंगोल आक्रमणकारियों को पराजित किया था बल्कि अगले दस सालों तक दक्षिण भारत में दिल्ली सल्तनत का बड़े पैमाने पर विस्तार भी किया था।

निश्चित ही सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी राज्य की ओर से किये जा रहे एक गंभीर अपराध को चिन्हित करती है। ‘नपुसंक’ कहना इस अपराध को कम करके दिखाना है क्योंकि नपुसंकता के कई स्तर होते हैं जिनमें कई बार इलाज से समस्या दूर हो सकती है। जबकि नफ़रत फैला कर किसी प्रदेश का माहौल बिगाड़ने वालों के प्रति आँख मूँदना बीमारी नहीं, जानबूझकर किया गया अपराध है। और यह अपराध ऐसा है जिसे लेकर दुनिया भर में भारत की प्रतिष्ठा गिर रही है। कहा जा रहा है कि भारत में नरसंहारों की पूर्व भूमिका रची जा रही है।
याद कीजिए 29 नवंबर 2021 को यूएस हॉलोकास्ट म्यूज़ियम ने भारत को उन देशों की सूची में रखा था जहाँ निकट भविष्य में नरसंहार हो सकते हैं। 12 जनवरी 2022 को ‘जेनोसाइड वॉच’ के संस्थापक और चेयरमैन ग्रेगरी स्टेंटन ने यूएस कांग्रेस के सामने रखी अपनी रिपोर्ट में भी ऐसी ही चेतावनी दी थी। रवाँडा में हुए नरसंहारों को लेकर दुनिया को सफलतापूर्वक आगाह कर चुके स्टेंटन ने  भारत के विभिन्न शहरों में हिंदुत्ववादी संगठनों के मंच से अल्पसंख्यकों के ख़िलाफ़ होने वाले तमाम नफ़रती भाषणों का हवाला देते हुए कहा था कि नरसंहार कोई घटना नहीं बल्कि एक प्रक्रिया है जो धीरे-धीरे विकसित होती है। बाद में उन्होंने भारत के प्रसिद्ध पत्रकार करण थापर को दिये अपने एक इटंरव्यू में भारत सरकार की चुप्पी पर हैरानी जतायी थी। उन्होंने कहा था, “जेनोसाइड कन्वेंशन के तहत नरसंहार के लिए लोगों को उकसाना एक अपराध है। भारत में भी कानून है कि नरसंहार गैरकानूनी है। इस कानून को लागू करना चाहिए। इसके अलावा भी भारत में अन्य कानून हैं जिनका इस्तेमाल भड़काने वाले नेताओं के खिलाफ किया जा सकता है, लेकिन अभी तक प्रधानमंत्री मोदी ने इस पर एक शब्द भी नहीं बोला है।“
सितंबर 2020 में संयुक्त राष्ट्र संघ ने ‘हेट स्पीच’ से निपटने के लिए बाक़ायदा ‘गाइडलाइन’ जारी की थीं। इसके तहत कहा गया था कि अल्पसंख्यक धार्मिक समूह के ख़िलाफ़ नफ़रत रोकने की प्राथमिक ज़िम्मेदारी राज्य की है। संयुक्त राष्ट्र संघ महासचिव एंतोनियो गुतरेस की ओर से इस संबंध में जारी ‘एक्शन प्लान’ में सरकारों को सिविल सोसायटी, मीडिया और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल करके नफ़रत के माहौल को ख़त्म करने की सलाह दी गयी थी। लेकिन भारत की स्थिति ये है कि मीडिया और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म नफ़रत फैलाने के मुख्य स्रोत बने हुए हैं और सिविल सोसायटी के जो चेहरे नफ़रत की राजनीति के ख़िलाफ़ सक्रिय रहा करते थे, ‘देशद्रोही’ घोषित किये जा चुके हैं। विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र बतौर संयुक्त राष्ट्र संघ की चिंताओं से भारत की मौजूदा सत्ता का इस तरह पीठ खड़ा करके खड़ा होना पूरी मानवता के लिए चिंता की बात है।
सुप्रीम कोर्ट ने जवाहर लाल नेहरू और अटल बिहारी वाजपेयी के भाषणों का ज़िक्र किया है जो सद्भावना का संदेश देते थे। जिन्हें लोग दूर-दूर से सुनने आते थे। सुप्रीम कोर्ट के माननीय जज ऐसा कह के क्या यह नहीं कह रहे हैं कि मौजूदा प्रधानमंत्री इस कसौटी पर खरे नहीं उतर रहे हैं! ज़ाहिर है, यह एक सुचिंतित फ़ैसला है। धर्म और राज्य का मेल अपने आप नहीं हुआ है जिस पर सुप्रीम कोर्ट चिंतित है। दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी ने तय किया है कि वह धर्म के नाम पर मुसलमानों और ईसाईयों के ख़िलाफ़ नफ़रत की अपनी वैचारिक स्थिति को हिंदू समाज के ‘कॉमनसेंस’ में बदलेगी। हिंदुत्व के इस प्रोजेक्ट से भारत नाम के विचार का नाश हो तो हो, लेकिन उसके सपनों का भारत तो वही है जिसमें अल्पसंख्यक दोयम दर्जे के नागरिक हों।

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‘मी लॉर्ड’ को समझना चाहिए कि आयडिया ऑफ़ इंडिया के साथ किया जाने वाला यह घातक खिलवाड़ एक मर्दवादी और सांप्रदायिक पौरुषगाथा रचने की हुड़क का नतीजा है न कि ‘नपुंसकता’ का। इसे रोका न गया तो न न्यायपालिका बचेगी और न लोकतंत्र!

(लेखक कांग्रेस से जुड़े है)
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