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मोदी युग में आपातकाल की आहट

इतिहास ख़ुद को दोहराता नहीं, सिर्फ़ उसकी प्रतिध्वनि सुनाई देती है। और 44 साल पहले लगाए गए आपातकाल की मौजूदा प्रतिध्वनि वाक़ई भयावह है। भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलनों से पैदा उथल-पुथल और अपनी सरकार की विश्वसनीयता धूल में मिल जाने से बौखलाई इंदिरा गाँधी ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के उन्हें अपदस्थ करने के फ़ैसले के बाद 25 जून, 1975 को देश में आपातकाल लगा दिया था। इसके तहत सांविधानिक अधिकारों को मुल्तवी कर दिया गया था। सख़्त प्रेस सेंसरशिप के ज़रिए संपादकों को सरकार की मर्ज़ी के आगे नतमस्तक होने पर मजबूर कर दिया गया था। प्रधानमंत्री ने संविधान के 42वें संशोधन के तहत असीमित अधिकार हथिया लिए थे। सरकार की अलोकतांत्रिक नीतियों का विरोध करने वाले हज़ारों लोगों को क़ैदखानों में डाल दिया गया था।

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इंदिरा का आपातकाल

इंदिरा गाँधी की सत्ता के अपने हाथों में केन्द्रीकरण की मुहिम 1974 तक चरम पर पहुँच चुकी थी। यहाँ तक कि उनके वफ़ादार कांग्रेस अध्यक्ष, देवकांत बरुआ ने ‘इंदिरा और इंडिया’ को एक-दूसरे का पर्याय बता दिया था। ‘ग़रीबी हटाओ’ जैसे लुभावने नारों ने इंदिरा गाँधी को एक करिश्माई छवि दी थी। वर्ष 1971 की बांग्लादेश की लड़ाई के बाद युद्धोन्माद के माहौल में उनकी ऐसी आंधी चली कि सिंडिकेट के नाम से मशहूर कांग्रेस (ओ) के दिग्गजों के पाँव उखड़ गए। संसद में अभूतपूर्व बहुमत ने इंदिरा गाँधी को और अधिक अधिनायकवादी बना दिया। सांसद उनके चापलूसों की फ़ौज में तब्दील हो गए। लेकिन सिर्फ़ नारों से कोई कितने समय तक लोकप्रिय बना रह सकता है? इंदिरा गाँधी का करिश्मा घटने लगा और उनकी सरकार को ख़ास तौर से छात्रों के लोकप्रिय आंदोलन का सामना करना पड़ा। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने इंदिरा गाँधी के कोई भी सांविधानिक पद संभालने पर रोक लगा दी थी। उसके इस फ़ैसले की उच्चतम न्यायालय से पुष्टि की संभावना के बीच उन्होंने आपातकाल की घोषणा कर दी।

इंदिरा गाँधी के आपातकाल से समूचे देश में मौत का सन्नाटा छा गया। विरोध की आवाज़ों को कुचल दिया गया। अदालतों में सरकार के प्यादे न्यायाधीशों को भरा जाने लगा जिसके विरोध में उच्चतम न्यायालय के ज़मीर वाले जजों ने इस्तीफ़ा दे दिया।

मोदी का कार्यकाल

2014 में नरेन्द्र मोदी विकास के नाम पर प्रचंड बहुमत हासिल कर भारतीय जनता पार्टी के अनेक वरिष्ठ नेताओं को दरकिनार करते हुए देश के एकमात्र नेता के तौर पर उभरे। उनका पिछला कार्यकाल लोकतंत्र और देश की लोकतांत्रिक संस्थाओं के लिए गंभीर ख़तरा साबित हुआ है। जैसा कि ऊपर कहा गया है, इतिहास ख़ुद को नहीं दोहराता मगर मोदी शासन के पिछले कार्यकाल में एक अघोषित आपातकाल की आहट साफ़-साफ़ सुनी जा सकती थी। 2019 के चुनाव में मोदी के और प्रचंड बहुमत से सत्ता में आने पर आपातकाल की आहट और भयावह हो गयी है, ख़ासकर अल्पसंख्यकों तथा दलित और आदिवासियों के लिए। झारखंड में ‘जय श्रीराम’ के नारों के साथ तबरेज़ अंसारी की हत्या एक नयी चेतावनी है।

‘ग़रीबी हटाओ’ और ‘भ्रष्टाचार मिटाओ’

इंदिरा गाँधी का राजनीतिक उदय अकालों और सामाजिक अशांति के कारण बढ़ती ग़रीबी और आर्थिक विपत्ति की स्थिति में हुआ। ‘ग़रीबी हटाओ’ के लुभावने नारे और युद्धोन्माद के अलावा प्रिवी पर्स ख़त्म करने और बैंकों के राष्ट्रीयकरण की जनपक्षीय नीतियों ने भी उन्हें ज़बर्दस्त लोकप्रियता दी थी। दूसरी ओर मोदी के राजनीतिक उदय का रास्ता भ्रष्टाचार में लिपटी कांग्रेस के कुशासन और उसकी जन-विरोधी नीतियों तथा उसके राष्ट्रीय विकल्प के अभाव की स्थिति में खुला। भारतीय जनता पार्टी ने अपनी चुनावी सफलता के लिए साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण का सहारा लिया जिसके तहत बड़े पैमाने पर जनसंहारों, सामूहिक बलात्कारों और अल्पसंख्यकों को उनके घरों से बेदखल करने के अभियानों को अंज़ाम दिया गया। पिछले लोकसभा चुनावों से पहले मुज़फ़्फ़रनगर-शामली जैसे साम्प्रदायिक ख़ूनख़राबे नहीं कराए गए होते तो तथाकथित विकास पुरुष को अभूतपूर्व सफलता मिलना असंभव था। इस बार पुलवामा में आत्मघाती, आतंकवादी हमला तथा बालाकोट हवाई हमले की पृष्ठभूमि में राष्ट्रवाद की हवा में मोदी को अभूतपूर्व बहुमत प्राप्त हुआ।

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क्या बदलाव आए?

मोदी ने अपने पिछले शासनकाल में योजना आयोग जैसी संस्थाओं को सरकार का चाकर बना दिया। भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद, भारतीय फ़िल्म एवं टेलीविजन संस्थान तथा राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद जैसी संस्थाओं में संदिग्ध योग्यता वाले संघ परिवार समर्थकों को भर दिया गया। सरकार भूमि अधिग्रहण, श्रम क़ानूनों में बदलाव तथा अन्य अध्यादेश-विधेयकों के ज़रिए मज़दूर-किसानों को तबाह करने में लगी है। शिक्षा का बजटीय अनुदान घटा कर तथा केन्द्रीय विश्वविद्यालय क़ानून और प्रस्तावित नयी शिक्षा नीति के माध्यम से उच्च शिक्षा को नष्ट करने पर तुली है।

विरोध की आवाज़ को दबाने की कोशिश

साम्प्रदायिक तनाव फैलाने और अल्पसंख्यकों को डरा-धमकाकर उनके घरों से बेदख़ल करने के नये-नये हथकंडे अपनाए जा रहे हैं। जेएनयू तथा हैदराबाद विश्वविद्यालयों से शुरू छात्रों और शिक्षकों के आंदोलनों का दमन व्यापक होता जा रहा है। पत्रकारों पर हमलों की कार्रवाई की घटनाएँ दिखाती हैं कि सरकार आलोचना और विरोध की आवाज़ को खामोश करने पर आमादा है। क्रांतिकारी सांस्कृतिक संगठनों पर संघ परिवार के हमले गंभीर चिंता का विषय हैं। असंतोष और अपनी तानाशाही नीतियों के विरोध को कुचलने के लिए इंदिरा गाँधी के पास सिर्फ़ दमनकारी सरकारी तंत्र था। मगर मोदी के पास सरकारी दमनतंत्र के अलावा विश्व हिंदू परिषद और बजरंग जैसे गिरोह भी हैं।

ईश मिश्र
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