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हाहाकार के बीच दिल्ली के सांसद कहाँ हैं? 

देश के तमाम हिस्सों की तरह देश की राजधानी दिल्ली में भी कोरोना के कहर से हाहाकार मचा हुआ है। टेस्ट कराने वाला हर तीसरा आदमी कोरोना वायरस से संक्रमित निकल रहा है। देश के दूसरे किसी भी राज्य के मुक़ाबले संक्रमण की दर और मरने वालों की संख्या भी दिल्ली में ज़्यादा है। दो करोड़ की आबादी वाले इस महानगर और केंद्र शासित राज्य में रोजाना 23 से 30 हज़ार तक संक्रमण के नए मामले सामने आ रहे हैं और 200 से 350 तक लोगों की मौत हो रही है। संक्रमित लोग अस्पताल में जगह पाने के लिए मारे-मारे फिर रहे हैं। जिनके परिजनों की मौत हो गई है, वे अंतिम संस्कार के लिए श्मशान घाटों पर कतार में खड़े हैं। ऑक्सीजन के अभाव में कई अस्पतालों से मरीजों के मरने की ख़बरें आ रही हैं।

इस पूरे सूरत-ए-हाल के लिए लगभग सभी टीवी चैनल और अख़बार दिल्ली सरकार और उसके मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को कठघरे में खड़ा कर रहे हैं। सोशल मीडिया के ज़रिए अफ़वाहें फैलाने और किसी का भी चरित्र हनन के लिए कुख्यात भारतीय जनता पार्टी के आईटी सेल और उसकी ट्रोल आर्मी ने भी दिल्ली सरकार, मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और उनकी आम आदमी पार्टी के ख़िलाफ़ अभियान छेड़ रखा है।

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बीजेपी का आईटी सेल जो कर रहा है, उसमें हैरानी की कोई बात नहीं है, क्योंकि वह वही काम कर रहा है, जो उसे करना चाहिए। लेकिन टीवी चैनल और अख़बार जिस शातिराना अंदाज़ में सिर्फ़ दिल्ली सरकार को निशाना बना रहे हैं, वह हैरान करने वाला है। 

यह सच है कि दिल्ली में भारी-भरकम बहुमत से निर्वाचित आम आदमी पार्टी की सरकार है, इस नाते वह दिल्ली के मौजूदा हालात को लेकर अपनी नैतिक ज़िम्मेदारी से बरी नहीं हो सकती। लेकिन यह भी सच है कि वह लगभग नख-दंत विहीन सरकार है। पिछले महीने संसद में केंद्र सरकार ने क़ानून बनाकर दिल्ली की चुनी हुई सरकार से सारे अधिकार छीन कर वास्तविक अर्थों में दिल्ली के उप राज्यपाल यानी एक रिटायर नौकरशाह को 'दिल्ली सरकार’ बना दिया है, जो सीधे केंद्रीय गृह मंत्रालय के अधीन काम करता है।

दिल्ली की सत्ता पर वैध और लोकतांत्रिक तरीक़े से काबिज होने की लड़ाई में लगातार दो बार मात खा चुके केंद्र सरकार के नेतृत्व की इस अलोकतांत्रिक कारगुजारी के बावजूद दिल्ली सरकार तो फिर भी कुछ न कुछ करती दिख रही है, लेकिन उप राज्यपाल के ज़रिए दिल्ली की सत्ता के वास्तविक सूत्र अपने हाथों में रखने वाला केंद्रीय गृह मंत्रालय क्या कर रहा है, किसी को नहीं मालूम। 
और तो और ऐसी भीषण संकटकालीन स्थिति में दिल्ली के निर्वाचित सातों सांसदों का भी कोई अता-पता नहीं है। दिल्ली की जनता को नहीं मालूम कि वे कहाँ है और क्या कर हैं?

दिल्ली के एक सांसद मनोज तिवारी हैं, जो दिल्ली में रह रहे पूर्वांचलियों के नेता माने जाते हैं। वे प्रदेश बीजेपी के अध्यक्ष भी रहे हैं। मौजूदा समय में जब मुख्यमंत्री की अपील के बावजूद प्रवासी मज़दूरों का पलायन नहीं रुक रहा है; ज़्यादातर प्रवासी मजदूर पूर्वांचल के ही हैं, इसलिए मनोज तिवारी उन्हें समझाने और भरोसा दिलाने का काम प्रभावी तरीक़े से कर सकते थे। लेकिन पूरे कोरोना काल में वे लोगों के बीच नहीं दिखे और इस बार लॉकडाउन लागू होने और आपात स्थिति बनने के बाद भी उनका अता-पता नहीं है। 

अलबत्ता दो सप्ताह पहले तक वे पश्चिम बंगाल में चुनाव प्रचार के दौरान हाथ रिक्शा खींचने की नौटंकी करते ज़रूर दिखे थे। इसके अलावा टेलीविजन पर दो शो में भी वे दिखाई दे रहे हैं। एक में अपराध कथा से जुड़े धारावाहिक में सूत्रधार की भूमिका निभा रहे हैं और दूसरे संगीत के एक कार्यक्रम में जज की भूमिका में दिख रहे हैं। दोनों कार्यक्रम उनके धंधे से जुड़े हैं। लेकिन सोचने वाली बात है कि जिस समय पूरी दिल्ली महामारी की चपेट में है, उस समय उसके एक सांसद का चेहरा टेलीविजन पर धारावाहिक और रियलिटी शो में दिखाई दे तो इसे क्या कहा जाये?

oxygen and hospital bed shortage in delhi as covid surges mps out of reach - Satya Hindi

एक दूसरे सांसद हैं पूर्वी दिल्ली से निर्वाचित गौतम गंभीर, जो इन दिनों अपने क्षेत्र और राज्य की जनता को छोड़ कर क्रिकेट के आईपीएल तमाशे में व्यस्त हैं। वे आईपीएल मैचों में विशेषज्ञ बन कर टिप्पणी करते दिख रहे हैं। गौतम गंभीर का भी यह काम उनके पेशे से जुड़ा है। ऐसे ही तीसरे सांसद हैं हंसराज हंस, जो उत्तर-पश्चिमी दिल्ली से निर्वाचित हैं। वे हालाँकि अपनी किसी व्यावसायिक गतिविधि में सक्रिय नहीं दिखे हैं लेकिन अपने क्षेत्र और प्रदेश की जनता के बीच भी नहीं दिख रहे हैं। 

हालाँकि ऐसा नहीं है कि फ़िल्मी कलाकार से सांसद बने मनोज तिवारी, क्रिकेटर से सांसद बने गौतम गंभीर और गायक कलाकार हंसराज हंस ही अपने क्षेत्र से नदारद हैं, जो अन्य सांसद मूलत: राजनीतिक कार्यकर्ता या राजनीतिक परिवार से हैं, वे भी अपने निर्वाचन क्षेत्र के पीड़ित लोगों की मदद के लिए सामने नहीं आ रहे हैं। ऐसे सांसदों में पश्चिमी दिल्ली से निर्वाचित और पूर्व मुख्यमंत्री साहिब सिंह वर्मा के बेटे परवेश वर्मा भी हैं, जो पिछले साल दिल्ली के शाहीन बाग़ में नागरिकता क़ानून के ख़िलाफ़ ऐतिहासिक धरने पर बैठी महिलाओं के ख़िलाफ़ अभद्र टिप्पणियाँ करते देखे गये थे।

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इसके अलावा नई दिल्ली से निर्वाचित मीनाक्षी लेखी और दक्षिण दिल्ली से निर्वाचित रमेश विधूड़ी भी जनता के बीच नहीं दिख रहे हैं। चांदनी चौक क्षेत्र के सांसद डॉ. हर्षवर्धन चूँकि केंद्र सरकार में स्वास्थ्य मंत्री हैं, इस नाते वे ज़रूर कभी-कभार टीवी चैनलों पर अपनी सरकार की नाकामियों पर पर्दा डालते हुए दिख जाते हैं, लेकिन अपने क्षेत्र की जनता से वे भी 'सामाजिक दूरी’ बनाए हुए हैं। इन पंक्तियों के लेखक ने भी इन सभी सांसदों से इस बारे में चर्चा करने के लिए संपर्क करने की कोशिश की लेकिन किसी से संपर्क नहीं हो सका। 

हालत यह है कि दिल्ली के आम लोग ही नहीं, बल्कि बीजेपी के स्थानीय नेता और कार्यकर्ता भी ज़रूरी मदद के लिए युवक कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्रीनिवास बीवी और आम आदमी पार्टी के विधायक दिलीप पांडेय से मदद की गुहार लगा रहे हैं।

ये दोनों नेता उनकी भी मदद कर रहे हैं, लेकिन मीडिया में इस बात का भी कहीं ज़िक्र नहीं हो रहा है। पिछले सप्ताह ही दिल्ली के दिवंगत पूर्व मुख्यमंत्री मदनलाल खुराना के बेटे और बीजेपी के वरिष्ठ नेता हरीश खुराना ने युवक कांग्रेस के अध्यक्ष श्रीनिवास को उनके ट्विटर हैंडल 'श्रीनिवासआईवाईसी’ पर टैग करके एक मरीज के लिए मदद मांगी और चार घंटे के भीतर श्रीनिवास ने मदद उपलब्ध कराई।

यह सोशल मीडिया का जमाना है और कहीं भी कोई नेता, अभिनेता, कारोबारी या कोई आम आदमी किसी की मदद करता है तो वह सोशल मीडिया में तुरंत चर्चा में आ जाता है। लेकिन सोशल मीडिया के प्लेटफॉर्म पर भी दिल्ली के सातों लोकसभा सदस्य नहीं दिखाई दे रहे हैं। इन सांसदों की ज़िम्मेदारी को लेकर कोई टीवी चैनल या अख़बार सवाल नहीं उठा रहा है।

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अनिल जैन
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