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कोरोना और कराहती अर्थव्यवस्था के बावजूद जनता उफ़ क्यों नहीं करती? 

दक्षिणपन्थ अपने आप में कोई विचारधारा है ही नहीं। यह ‘इललिबरल्स’ का जमावड़ा है। यह कम्युनिस्टों और सोशलिस्टों की क्रान्तियों से पनपने वाले बदलावों को फिर से प्राचीन, रूढ़िवादी, जातिवादी, नस्लवादी और शोषण-मूलक व्यवस्था में  धकेलने की सोच है। 
मुकेश कुमार सिंह

मौजूदा राजनीतिक दौर में बुद्धिजीवियों की ओर से ‘इललिबरल रिवोल्युशन’ (Illiberal Revolution) नामक एक नया जुमला देखने में आ रहा है। इसका शाब्दिक अनुवाद ‘संकुचित क्रान्ति’ या ‘सीमित इंकलाब’ हो सकता है। सवाल यह है कि आख़िर ‘संकुचित क्रान्ति’ वाले जुमले का भावार्थ या मतलब क्या है? इसकी परिभाषा या व्याख्या क्या है? 
इसे कैसे समझें? बुनियादी तौर पर ‘इललिबरल’ का मतलब है जो लिबरल यानी उदार या समावेशी नहीं हो यानी जिसके वैचारिक सोच का दायरा संकुचित रहता हो। ‘रिवोल्युशन’ यानी क्रान्ति शब्द का मतलब है, ‘इंक़लाब, बड़ा बदलाव, आमूलचूल परिवर्तन, व्यापक रद्दोबदल’।

‘इललिबरल रिवोल्युशन’ नामक जुमले के शब्दार्थ और भावार्थ की मीमांसा को लेकर बुनियादी द्वन्द भी है। मसलन, जो रिवोल्युशन है वो संकुचित कैसे हो सकता है और यदि ऐसी कोई राजनीतिक या समाज शास्त्रीय दशा मुमकिन है तो फिर ‘इललिबरल रिवोल्युशन’ नामक जुमला क्या परस्पर विरोधाभासी या विपरीतार्थक यानी ‘सेल्फ कंट्राडिक्ट्री’ नहीं हो जाएगा?
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क्या है 'इललिबरल रिवोल्युशन'?

ऐसे तो कल को ‘गुड रिवोल्युशन’ और ‘बैड रिवोल्युशन’ जैसे शब्द भी गढ़ लिये जाएँगे। इससे तो ‘रिवोल्युशन’ में अन्तर्निहित व्यापक सकारात्मकता का भाव ही मिट जाएगा। ये तर्क पोपले नहीं हैं। इसीलिए यदि हम 21वीं सदी की सियासी दुनिया को समझना चाहते हैं तो फिर हमें ‘इललिबरल रिवोल्युशन’ की व्याख्या को भी संजीदगी से समझना पड़ेगा।
दरअसल, 21 वीं सदी को दक्षिणपन्थियों का काल बताया जा रहा है, क्योंकि आज दुनिया भर में ऐसे लोगों की ही हुक़ूमत का दबदबा है। इससे भी रोचक बात यह है कि दक्षिणपन्थी अपने आप में कोई विचारधारा है ही नहीं। यह ‘इललिबरल्स’ का जमावड़ा है। यह कम्युनिस्टों और सोशलिस्टों की क्रान्तियों से पनपने वाले बदलावों को फिर से प्राचीन, रूढ़िवादी, जातिवादी, नस्लवादी और शोषण-मूलक व्यवस्था में  धकेलने की सोच है।
पूरी दुनिया में दक्षिणपंथ का कोई वैचारिक इतिहास नहीं है। इसका कोई नियम, उद्देश्य, तरीका, साहित्य या दर्शन नहीं है।

वामपंथ के चेहरे

दरअसल, वामपन्थ के दो चेहरे हैं - सोशलिज्म (समाजवाद) और कम्युनिज्म (साम्यवाद यानी बराबरी-वाद)। वामपंथ की बातों के विरोध या प्रतिक्रिया में जो कुछ भी कहा या किया जा सकता है, उसका समुच्चय ही है दक्षिणपन्थ। 
सत्ता और ताक़त वाले जिस शासक वर्ग के ख़िलाफ़ शोषितों, मज़दूरों और किसानों के हितों में वामपन्थ खड़ा हुआ था, उसकी प्रतिक्रिया में अपना प्रभुत्व, सम्पत्ति, पेशा और जान बचाने के लिए दूसरी ओर जो तबका लामबन्द हुआ, वही दक्षिणपंथी कहलाया। इनकी मंशा अपना पुराना राज और पुरानी व्यवस्था कायम रखने की थी।

प्रभुत्व कायम रखने की बातें

इसीलिए, दक्षिणपंथियों ने राजा या तानाशाह के समर्थन में खड़े होकर उसे ही देश बताने का रास्ता चुना। राजा की मुख़ालफ़त करने वालों को देशद्रोही और गद्दार कहा गया। संस्कृति को बचाने की दुहाई देकर इन्होंने अपने पुराने प्रभुत्व को क़ायम रखने की बातें की। इसके तहत, धर्म, जाति और नस्ल के नाम पर बाँटने के तर्क गढ़े गये।

16 वीं और 17 वीं सदी की औद्योगिक क्रान्ति ने जिस साम्राज्यवाद को जन्म दिया, उसकी दमनकारी प्रवृत्तियों के ख़िलाफ़ 20 वीं सदी में वामपंथ खड़ा हुआ। दरअसल, साम्राज्यवाद इतना व्यापक और शक्तिशाली था कि इसका प्रतिकार ही क्रान्ति कहलाया।
इस क्रान्ति से ऐसे लिबरल्स पैदा हुए जिनका नारा था ‘इंकलाब ज़िन्दाबाद’ और ‘साम्राज्यवाद का नाश हो’ यानी ‘लॉन्ग लिव रिवोल्युशन’ और ‘डाउन विद इम्पीरियलिज्म’। इस क्रान्ति से साम्राज्यवादी शासकों के अलावा पंडितों, मुल्लों, पादरियों, ज़मींदारों, सामन्तों और पूँजीवादियों वाला ताक़तवर और कुलीन तबका ऐसा हलकान हुआ कि प्रति-क्रान्ति के रूप में यही दक्षिणपंथ के प्रवर्तक और समर्थक बने और ‘इललिबरल’ कहलाये। ये जैसी ‘क्रान्ति’ की पैरोकारी करते हैं वही ‘इललिबरल रिवोल्युशन’ है।

धार्मिक प्रतीकों का महिमा मंडन क्यों?

भारत में ये महात्मा गाँधी, सरदार पटेल, सुभाष चन्द्र बोस, भगत सिंह, चन्द्रशेखर आज़ाद, अश्फ़ाक उल्लाह, सुखदेव, राजगुरु जैसों इंक़लाबियों के योगदान को हथियाना चाहते हैं, क्योंकि सारी दुनिया की तरह भारत में भी दक्षिणपन्थियों के पास कोई महापुरुष नहीं है।
ये काल्पनिक धार्मिक प्रतीकों का महिमामंडन करके अपना सियासी उल्लू सीधा करते हैं। इसीलिए इनका कोई मौलिक चिन्तन, विचार, साहित्य वग़ैरह नहीं होता।
दक्षिणपन्थी साँचे के मुताबिक ही अँग्रेज़ों ने हमारे स्वतंत्रता सेनानियों को सत्ता-तंत्र के विरोधी यानी बाग़ी की तरह नहीं बल्कि राजद्रोहियों और जघन्य अपराधियों की तरह परिभाषित किया था।

क्रान्ति का मतलब है ऐसा व्यवस्था परिवर्तन जिसका सपना सबको बराबरी की तरह ले जाने का हो, अन्याय, ऊँच-नीच और हर तरह के भेदभाव का समूल नाश करके समतामूलक समाज को स्थापित करने का हो। जबकि ‘इललिबरल रिवोल्युशन’ का व्यावहारिक अर्थ कुछ ऐसा है कि इसमें मन्दिर, मसजिद, चर्च, मक़बरे वग़ैरह को तो शायद ध्वस्त नहीं किया जाए, लेकिन पूर्ववर्ती युग-पुरुषों की मूर्तियों  को नहीं बख़्शा जाएगा। ऐसे बुतों को तोड़ दिया जाएगा या चौराहों से हटाकर कहीं और रखवा दिया जाएगा।

दक्षिणपंथ में हागिया सोफ़िया

इसमें मुसलिम शासकों या अँग्रेज़ों के दिये सभी नामों को नहीं बल्कि चुनिन्दा को ही बदला जाएगा। इसी तरह किसी धर्म या वर्ग विशेष का अपराधी रॉबिनहुड होगा तो कोई देशद्रोही। सच्चे-झूठे अपराधों को भी मज़हबी चश्मों से ही देखा जाएगा। 
जैसे 1400 साल पुरानी तुर्की की हगिया सोफ़िया चर्च को संग्रहालय से वापस चर्च में नहीं, बल्कि मसजिद में तब्दील किया जाएगा, क्योंकि दक्षिणपन्थी कट्टरवादियों को इसके सिर्फ़ पिछले जन्म से मतलब होगा, उसके भी पिछले जन्म से नहीं।

दक्षिणपंथ में अयोध्या विवाद

‘इललिबरल रिवोल्युशन’ में ही अयोध्या विवाद का निपटारा धार्मिक आस्था के आधार पर होगा, ऐतिहासिक और क़ानूनी तथ्यों के आधार पर नहीं। इसमें हर बात पर नेहरू को कोसना भी उतना ही ज़रूरी है जैसे चीन और अमेरिका की मौजूदा तनातनी के लिए ट्रम्प प्रशासन राष्ट्रपति निक्सन (1969-74) को कोस रहा है क्योंकि उन्होंने चीन यात्रा की थी। 21 वीं सदी पर हावी दक्षिणपन्थी ताक़तें ऐसी मिसालें दुनिया भर में बना रही हैं क्योंकि इन्हें वर्तमान की चुनौतियों से ज़्यादा चिन्ता अतीत के प्रतीकों की होती है। 

प्रति क्रांति

दक्षिणपन्थी मानसिकता की वजह से बीती सदी में हुई क्रान्तियों और औपनिवेशवाद के पतन से पैदा हुई शासन व्यवस्था के बुनियादी सिद्धान्तों, ख़ासकर धर्मनिरपेक्षता के सिद्धान्तों, का प्रतिकार किया जा रहा है।
इसीलिए प्राचीन को श्रेष्ठ बताने की होड़ लगी है। यह सारा परिवेश और चिन्तन ही ‘इललिबरल’ है। क्योंकि पिछले ‘रिवोल्युशन’ ने जो लिबरल पैदा किये थे, ये उन्हें ही पलटने की प्रति-क्रान्ति’ है।

कैसे बना 'इललिबरल' शब्द?

चूँकि क्रान्ति का उल्टा शब्द ‘प्रति-क्रान्ति’ हो ही नहीं सकता और ‘लिबरल’ के विलोम के रूप में ‘इललिबरल’ शब्द मौजूद है, लिहाज़ा ‘इललिबरल’ से बात बना ली गयी। इसीलिए लिबरल यदि उदार है तो ‘इललिबरल’ का मतलब अनुदार, संकुचित, असहिष्णु है।
चूँकि ‘लिबरल’ और ‘इललिबरल’ दोनों ही विशेषण है, इसीलिए जब इन्हें क्रान्ति रूपी संज्ञा के साथ जोड़ा जाएगा तो ज़ाहिर है कि ये विशेषण या तो संज्ञा के गुणों को बढ़ाएँगे या घटाएँगे। यहाँ ग़ौरतलब यह भी है कि बेशक, ‘क्रान्ति’ का मतलब सकारात्मकता या बेहतरी के लिए होने वाला बदलाव है। लेकिन इसमें हिंसा जैसे नकारात्मक तत्व का अंश भी हो सकता है। युद्ध की तरह क्रान्ति की हिंसा भी भले ही वीभत्स हो, लेकिन इन्हें कुत्सित नहीं समझा जाता। दोनों में यही सबसे बड़ा फ़र्क़ है।

आततायी क़ानून

लिबरल क्रान्ति का मतलब है कि इसमें आततायी से भी आततायी तरीक़े से पेश नहीं आया जाएगा, क्योंकि इसमें क़ानून का राज मिटता नहीं है। इसीलिए, अँग्रेज़ों की अदालतों में उनका आततायी क़ानून लागू होता था। कमोबेश, यही भाव लोकतांत्रिक या व्यवस्था परिवर्तन वाली क्रान्ति के दौरान भी बना रहता है। जबकि ‘इललिबरल रिवोल्युशन’ के दौरान प्रवर्तन निदेशालय, केन्द्रीय जाँच ब्यूरो, राष्ट्रीय जाँच एजेंसी, आयकर विभाग जैसी लोकतांत्रिक संस्थाएँ भी आततायी बन जाती हैं।
‘इललिबरल रिवोल्युशन’ की दशा में राजनीतिक बदले की भावना को क़ानून-सम्मत बना दिया जाता है। इसमें अदालतें भी वैसे फ़ैसले ही देती हैं, जैसा सरकारें चाहती हैं। इसमें कल तक जिसे पतित बताया जाता था, उसे नीतीश या सिन्धिया की तरह नहला-धुलाकर पवित्र बना लिया जाता है। लेकिन ऐसा महबूबा मुफ़्ती और उद्धव ठाकरे ही नहीं असदउद्दीन ओवैसी के साथ भी हो सकता है।
दूसरे शब्दों में हम यह भी कह सकते हैं कि ‘इललिबरल रिवोल्युशन’ की पैरोकारी मध्यमार्गी काँग्रेसी और समाजवादी तथा वामपन्थी कम्युनिस्ट की विचारधारा ज़रा छोटे स्तर पर करती है, जबकि दक्षिणपन्थी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ इसे डंके की चोट पर तथा वीर रस की भाव-भंगिमा के साथ करते हैं।

झूठ को सच साबित करने की रणनीति

‘इललिबरल रिवोल्युशन’ में एक और बेजोड़ बात होती है। इसमें झूठ को इतनी बार दोहराया जाता है कि लोग उसे ही सच समझने लगें। इसीलिए इसे झूठ और अफ़वाहों के महिमामंडन का स्वर्णकाल भी कह सकते हैं। 
इसीलिए, लद्दाख जाकर बोला जाता है कि ‘भारत ने कभी किसी दूसरे देश पर हमला नहीं किया, किसी की भी एक इंच ज़मीन नहीं क़ब्ज़ायी।’ ऐसे बयान देने वाले जानबूझकर गोवा, दमन-दीव और पुद्दुचेरी के इतिहास से अनभिज्ञ बने रहते हैं। 
इसी तरह, आप चाहें तो ‘न कोई सीमा पार करके आया था, न आया है और ना आएगा’ वाले और महाभारत के 18 दिन की तुलना 21 दिन के कोरोना युद्ध से होता देखते हैं। इसमें युद्ध से पहले ही ख़ुद को चिर-विजेता घोषित कर दिया जाता है।

तकलीफ़ नज़रअंदाज

इसीलिए, जनता जब नोटबन्दी के दौरान ‘मुझे 50 दिन दीजिए’ की बातों की हक़ीक़त जानने के बावजूद अपनी तकलीफ़ों को नज़रअन्दाज़ करना सीख जाती है तो फिर उसे महज साढ़े तीन घंटे की मोहलत वाले कठोरतम लॉकडाउन की सौगात दे दी जाती है।
इसीलिए अभी जब कोरोना को लेकर भारत रोज़ाना कीर्तिमान बना रहा है, अर्थव्यवस्था बुरी तरह से कराह रही है, तब भी आपको ग़रीब की उफ़ तक सुनायी नहीं देती, क्योंकि आप तो पहले ही जनता से अपनी प्रशंसा में ताली-थाली वादन, दीया-पटाखा और पुष्प वर्षा का जश्न मना चुके होते हैं। कुल मिलाकर, असंख्य विरोधाभासों को जन्म देने वाली विचारधारा-विहीन चिन्तन को भी ‘इललिबरल रिवोल्युशन’ की तरह देखा जा सकता है।

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मुकेश कुमार सिंह
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