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पुण्यतिथि - हबीब तनवीर जैसे नाटककार अब नहीं पैदा होते! 

अपने नाटकों के ज़रिए अवाम को हमेशा गंगा-जमुनी तहजीब से जोड़े रहने वाले हबीब तनवीर की आज पुण्यतिथि है।

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में 1 सितम्बर, 1923 को जन्मे हबीब तनवीर, रंगमंच में अपने आगाज से लेकर अंत तक उन सांस्कृतिक मूल्यों-रंगों को बचाने में लगे रहे जिनसे हमारे मुल्क की मुकम्मल तसवीर बनती है। उर्दू शायर नजीर अकबरावादी के फलसफे और ज़िंदगी पर बना नाटक ‘आगरा बाज़ार’ हो या फिर शूद्रक के संस्कृत नाटक ‘मृच्छकटिकम’ पर आधारित ‘मिट्टी की गाड़ी’, हबीब तनवीर अपने नाटकों के ज़रिए अवाम को हमेशा गंगा-जमुनी तहजीब से जोड़े रहे।

लोक परंपराओं में तनवीर का गहरा यक़ीन था। उनके नाटकों में हमें जो ऊर्जा दिखाई देती है, वह दरअसल लोक से ही अर्जित है। वे सही मायनों में एक लोकधर्मी आधुनिक नाटककार थे। उन्होंने जिस महारत से आधुनिक रंगमंच में लोक का इस्तेमाल किया, वह विरलों के ही बस की बात है। उनका मानना था, ‘पश्चिमी देशों से उधार लिए गए या की जा रही नकल वाले शहरी थियेटर का स्वरूप पूर्णतः अपूर्ण एवं अपर्याप्त है तथा सामाजिक अपेक्षाएँ पूरी करने, जीवन के ढंग, सांस्कृतिक चलन को प्रदर्शित करने तथा तत्कालीन भारत की मूलभूत समस्याओं के निराकरण में अक्षम हैं। भारतीय संस्कृति के बहुआयामी पक्षों का सच्चा व स्पष्ट प्रतिबिम्ब लोक नाटकों में ही देखा व पाया जा सकता है।’

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हबीब तनवीर ने जब रंगमंच में पदार्पण किया तब लोक सामायिक रंगमंचीय गतिविधियों की केन्द्रीय चिंताओं में कहीं नहीं था। सभी नामचीन नाटककार और नाट्य निर्देशक पश्चिम का अंधानुकरण कर रहे थे। दरअसल, लोक संस्कृति को लेकर उनका नज़रिया अपने समकालीनों से बिल्कुल जुदा था। लोक के जानिब तनवीर का यह नज़रिया वामपंथी सांस्कृतिक आंदोलन से जुड़े रहने की वजह से बना था। अपने शुरुआती दौर में उन्होंने भारतीय जन नाट्य संघ यानी इप्टा और प्रगतिशील लेखक संघ में सक्रिय रूप से भागीदारी की थी। हबीब तनवीर भी आज़ादी की जद्दोजहद के उस दौर में इप्टा के अभिन्न हिस्सा थे। जन आंदोलन के दौरान साथियों की गिरफ्तारी के बाद, कुछ ऐसे हालात बने कि इप्टा की सारी ज़िम्मेदारी उनके ऊपर आ गई। 

साल 1948-50 के बीच उन्होंने नाटक लिखने के साथ-साथ उनका निर्देशन भी किया। अपने आत्मकथ्य ‘ए लाईफ इन थियेटर’ में हबीब तनवीर लिखते हैं, ‘दरअसल निर्देशन मुझ पर आरोपित किया गया। वह मेरा चुनाव नहीं था, मेरा चुनाव तो अभिनय था।’

हबीब अहमद ख़ान की शुरुआती तालीम रायपुर में हुई। शायरी से लगाव के चलते, उन्होंने ‘तनवीर’ अपना तखल्लुस चुना। नाटक में पूरी तरह उतर जाने के बाद, शायरी तो उनसे काफ़ी पीछे छूट गई। अलबत्ता ‘तनवीर’ उनके नाम के आगे हमेशा के लिए जुड़ा रहा।

हबीब तनवीर को बचपन से ही नाटक और फ़िल्मों का शौक था। महज बारह साल की उम्र में उन्होंने शेक्सपियर के मशहूर नाटक ‘किंग जॉन’ में प्रिंस ऑर्थर का किरदार निभाया।

फ़िल्मों का शौक उन्हें आख़िरकार मुंबई ले आया। मुंबई में पैर जमाने के लिए उन्होंने जमकर संघर्ष किया। प्रगतिशील लेखक संघ के संस्थापक सज्जाद जहीर के घर होने वाली साप्ताहिक बैठकों में वह नियमित तौर पर जाते। इन साहित्यिक बैठकों में तनवीर अपनी पुरकशिश आवाज़ में शायरी पढ़ते, जो बहुत पसंद की जाती। 

फ़िल्मी दुनिया से हबीब तनवीर का मोह भंग जल्दी ही हो गया। दिल्ली आकर उन्होंने अपना नाटक ‘शतरंज के मोहरे’ दोबारा लिखा और इसमें खालिस लखनवी उर्दू ज़बान का इस्तेमाल किया। नाटक इस बार ज़्यादा कामयाब साबित हुआ।

साल 1954 में लिखा ‘आगरा बाज़ार’ वह नाटक था, जिसने हबीब तनवीर को शोहरत की बुलंदियों पर पहुँचा दिया। अठारहवीं सदी के मशहूर अवामी शायर नजीर अकबरावादी की ज़िंदगी और रचनाओं पर आधारित नाटक ‘आगरा बाज़ार’ में उन्होंने आम आदमी की ज़िंदगी और उसके रोज़मर्रा के सरोकारों को अपना विषय बनाया। यह वह दौर था जब हिंदुस्तानी रंगमंच में हिंदुस्तानी, अपनी मिट्टी से जुड़ाव एवं शैली का डंका पीटने वाले नारे और मुहावरे ईजाद नहीं हुए थे। आलोचक इक़बाल नियाजी ने ‘आगरा बाज़ार’ का मूल्यांकन करते हुए लिखा है, ‘आगरा बाज़ार जैसे नाटक की प्रस्तुति ने हिंदुस्तानी नाटककारों के सामने ये मिसाल पेश की कि किस तरह यथार्थवादी ढाँचों को पसंद करके पश्चिमी और पूर्वी ड्रामा रिवायतों से जुड़कर, एक नये तरह की तर्ज पर ड्रामों को प्रस्तुत किया जा सकता है। जिसमें लोक नाटक के फ़ॉर्म को और उसके असर को जान-बूझकर ठूंसा नहीं गया है फिर भी नाटक के डायलॉग से लोक नाटक की अदाकारी व कारीगरी के रंग फूटते हुए महसूस होते हैं।’ 

‘आगरा बाज़ार’ की जबरदस्त कामयाबी

‘आगरा बाज़ार’ की जबरदस्त कामयाबी के बाद हबीब तनवीर पेशेवर थियेटर की अपनी योजना को साकार करने में जुट गए। थियेटर के लिए ज़रूरी स्क्रिप्ट बैंक और पैसों को जुटाने की ज़िम्मेदारी बेगम कुदसिया जैदी ने अपने ज़िम्मे ले ली। इस तरह साल 1955 में दिल्ली का पहला व्यावसायिक थियेटर ‘हिंदुस्तानी थियेटर’ अस्तित्व में आया। ‘हिंदुस्तानी थियेटर’ के लिए तनवीर कोई नाटक निर्देशित करते, इससे पहले थियेटर की आला तालीम हासिल करने के इरादे से लंदन पहुँच गए। 

हिंदुस्तान वापसी पर तनवीर की पहली प्रस्तुति हिंदुस्तानी थियेटर के बैनर पर हुई। शूद्रक के संस्कृत नाटक ‘मृच्छकटिकम’ के हिन्दी अनुवाद ‘मिट्टी की गाड़ी’ को उन्होंने छत्तीसगढ़ के लोक कलाकारों के साथ रंगमंच पर उतारा।

इस नाटक में उन्होंने पूरी तरह से लोक रंगमंच की पारंपरिक शैली और तकनीक का प्रयोग किया। लेकिन संस्कृत के पंडितों ने इस पर काफ़ी एतराज़ किया। संस्कृत विद्वानों का यह एतराज़, खास तौर पर नाटक की शैली पर था। नाटक लोकधर्मी शैली में खेला गया था और उनका कहना था कि नाटक क्लासिकी शैली में ही किया जाना चाहिए। हबीब तनवीर इन आलोचनाओं से बिल्कुल नहीं घबराए। संस्कृत नाट्य पंडितों के उलट तनवीर का मानना था कि लोक परंपराओं की मदद से ही संस्कृत नाटकों की शैली तक आसानी से पहुँचा जा सकता है। लाख आलोचनाओं के बावजूद नाटक ‘मिट्टी की गाड़ी’ ने ही आधुनिक रंगमंच में संस्कृत नाटकों को प्रस्तुत करने का वह सहज और सरल रास्ता सुझाया जो ठेठ हिंदुस्तानी था।

पाठकों के विचार से और

बेगम जैदी और उनके ‘हिंदुस्तानी थियेटर’ से हबीब तनवीर का साथ ज़्यादा लंबा नहीं चला। बेगम जैदी से वैचारिक मतभेद के चलते, उन्होंने हिंदुस्तानी थियेटर छोड़ दिया और इस तरह साल 1959 में ‘नया थियेटर’ की नींव पड़ी। अदाकारा और निर्देशक मोनिका मिश्रा जो आगे चलकर तनवीर की ज़िंदगी की शरीके हयात बनीं समेत नौ लोगों ने ‘नया थियेटर’ की बक़ायदा शुरुआत कर दी। ‘सात पैसे’, ‘रुस्तम सोहराब’, मोलियर का ‘द बुर्जुआ जेंटलमैन’, ‘मेरे बाद’ वगैरह ‘नया थियेटर’ के शुरुआती नाटक थे। 

नाटक ‘चरनदास चोर’ तक आते-आते हबीर तनवीर ने अपनी एक अलग पहचान बना ली थी। उनके नाटक खालिस छत्तीसगढ़ी मुहावरे में खेले जाते। 1975 में ‘चरनदास चोर’ के साथ ही तनवीर की शैली और प्रस्तुति ने अपनी पूर्णता पा ली। इसके बाद उन्होंने अपनी शैली को बिल्कुल नहीं बदला और आख़िर तक इसी शैली में नाटक खेलते रहे।

साल 1982 में एडिनबरा के विश्व ड्रामा फ़ेस्टिवल में बावन मुल्कों के ड्रामों के बीच ‘चरनदास चोर’ की कामयाबी ने हबीर तनवीर और नया थियेटर को दुनियावी स्तर पर मक़बूल कर दिया। ‘चरनदास चोर’ के ज़रिए तनवीर ने यह साबित कर दिखाया कि लोक परंपराओं के मेल और देशज रंगपद्धति से कैसे आधुनिक नाटक खेला जा सकता है।

नाटक ‘आगरा बाज़ार’ में भाषा और अदब के जानिब कुलीन और जनवादी नज़रियों के बीच कशमकश है, तो ‘चरनदास चोर’ सत्ता, प्रशासन और व्यवस्था पर सवाल उठाता है। ‘हिरमा की अमर कहानी’ और स्टीफन ज्वाईंग की कहानी पर आधारित ‘देख रहे हैं नयन’ सियासी नाटक हैं जो हर दौर में सामायिक रहेंगे। ‘बहादुर कलारिन’ में वे सामंतवाद पर वार करते हैं। नाटक ‘जिन लाहौर नहीं देख्या, वो जन्मा ही नईं’ हिन्दू-मुसलिम सौहार्द पर और ‘पांगा पंडित’ समाज में व्याप्त छुआ-छूत को उजागर करता है। ‘मिट्टी की गाड़ी’ में वे समाज को लोकसत्ता से जोड़ने की ठोस कोशिश करते हैं। साल 2009 ‘नया थियेटर’ का गोल्डन जुबली साल था। 

हबीब तनवीर की ख्वाहिश थी कि ‘नया थियेटर’ की गोल्डन जुबली धूम-धाम से मनाई जाये। यही नहीं, वह अपने आख़िरी दिनों में आत्मकथा लिखने में भी मशरूफ थे। आत्मकथा का एक भाग पूरा हो चुका था और गोया कि दूसरे पर काम जारी था, लेकिन उनकी ये ख्वाहिशें अधूरी ही रह गईं। 8 जून, 2009 को हबीब तनवीर दास्तान सुनाते-सुनाते ख़ुद ही सो गये।

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जाहिद ख़ान
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