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क़र्ज़माफ़ी से रुकेगी किसानों की आत्महत्या?

पहले भी क़र्ज़ माफ़ किए गए थे, लेकिन उसके बाद कृषि क्षेत्र में नया निवेश नहीं हुआ। क़र्ज़माफ़ी स्कीम से संस्थागत क्षेत्र से किसानों को पैसे मिलने की संभावना कम हो जाती है क्योंकि उन्होंने खुद लिया गया क़र्ज़ नहीं चुकाया होता है और इस तरह वे साहूकारों पर पहले से अधिक निर्भर हो जाते हैं।
प्रमोद मल्लिक

एक महत्वपूर्ण सवाल यह उठता है कि किसानों की आत्महत्या रोकने के लिए क्या किया जाए? क्या क़र्ज़माफ़ी से यह लक्ष्य हासिल हो जाएगा? क्या अलग-अलग राज्य सरकारों की स्कीमों और उनके राहत पैकेज से किसान कम से कम खुदकुशी न करें, ऐसा हो जाएगा? क्या भूमंडलीकरण और निजीकरण से इस समस्या का समाधान हो जाएगा?

एक साधारण से दिखने वाले सवाल का उत्तर इनमें से किसी में नहीं है। 

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60 हज़ार करोड़ की क़र्ज़माफ़ी

तत्कालीन वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने 2008-09 का बजट लोकसभा में पेश करते हुए किसानों की क़र्ज़माफ़ी की महत्वाकांक्षी योजना पेश की थी। 

इसके तहत 31 मार्च, 2007 तक लघु व सीमान्त किसानों के क़र्ज़ माफ़ करने का प्रस्ताव था। लगभग तीन करोड़ किसानों के क़र्ज़ माफ़ कर दिए गए और लगभग एक करोड़ अतिरिक्त किसानों का एकमुश्त निपटान (वन टाइम सेटलमेंट) हो गया या कम से कम सरकार ने यह दावा किया। इसके लिए सरकार ने लगभग 50,000 करोड़ रुपए दिए। 

इसके लिए यह तय किया गया कि एक हेक्टेअर तक की ज़मीन वाले को सीमांत किसान और 1-2 हेक्टेअर की ज़मीन वाले को छोटा किसान माना जाए। 

'वन टाइम सेटलमेंट स्कीम' के तहत दूसरे किसानों से कहा गया कि वे यदि 75 प्रतिशत क़र्ज़ चुका दें तो उनका 25 प्रतिशत क़र्ज़ माफ़ कर दिया जाएगा। इसके लिए 10 हज़ार करोड़ रुपए अलग से रखा गया।

यानी मनमोहन सिंह सरकार ने किसानों की क़र्ज़माफ़ी के लिए बैंकों को 60 हज़ार करोड़ रुपए चुकाने की योजना पेश कर दी।

ऋण-मुक्त हो गए किसान?

यह समझा गया कि इससे लगभग सभी किसान पूरी तरह ऋण-मुक्त हो जाएंगे। एक तो उनके ऊपर का बोझ हट जाएगा, दूसरे, उसके बैंक उन्हें नया क़र्ज़ दे सकेंगे। लेकिन बाद में पाया गया कि ऐसा नहीं हो सका।

जिस महाराष्ट्र में सबसे ज़्यादा आत्महत्याएँ हुईं, वहीं के लोगों को मनमोहन सिंह सरकार की क़र्ज़माफ़ी स्कीम से अधिक लाभ नहीं हुआ।

किसानों के क़र्ज़ क्यों नहीं हुए माफ़?

विदर्भ जन आन्दोलन समिति के अध्यक्ष किशोर तिवारी ने बिज़नेस स्टैंडर्ड से कहा था कि जिस विदर्भ से सबसे ज़्यादा आत्महत्या की ख़बरें आईं, वहां बैंकों से ऋण लेने वालों में अधिकतर लोगों के पास दो एकड़ से अधिक ज़मीन थी। लिहाज़ा, उन्हें इस स्कीम का फ़ायदा नहीं मिला, उनके क़र्ज़ माफ़ नहीं हुए। 

विदर्भ में हर किसान परिवार के पास औसत 7.5 एकड़ ज़मीन थी। 

farmers protest : farm loan or farm laws behind farmers suicide2 - Satya Hindi

इसी तरह महाराष्ट्र के ही यवतमाल ज़िले में 54 प्रतिशत लोगों को पी चिदंबरम की स्कीम से कोई फ़ायदा नहीं हुआ। लेकिन राज्य सरकार ने अख़बारों में विज्ञापन देकर दावा किया 33 लाख किसानों के 9,310 करोड़ रुपए के क़र्ज़ माफ़ कर दिए गए। 

महाराष्ट्र में इस स्कीम में कई तरह की विसंगतियाँ भी देखी गईं। ड्रिप इरिगेशन प्रोजेक्ट वाले 2 एकड़ ज़मीन के मालिक़ाना हक़ वाले किसानों को 20 लाख रुपए तक की छूट मिल गई, लेकिन 7 एकड़ ज़मीन वाले कपास किसानों का 30 हज़ार रुपया भी माफ़ नहीं हुआ। 

पर्यवेक्षकों की राय थी कि महाराष्ट्र, ख़ास कर, विदर्भ में आत्महत्या करने वाले किसान मोटे तौर पर खाते-पीते घरों के थे, 2 एकड़ से अधिक ज़मीन वाले थे, लेकिन उनकी फ़सल चौपट हो गई, वे लिया गया क़र्ज़ नहीं चुका पाए और उन्होंने तनाव ग्रस्त होकर मौत का रास्ता चुन लिया।

साहूकारों से लिया था क़र्ज़

एक अध्ययन यह भी दर्शाता है कि महाराष्ट्र में क़र्ज़ लेने वाले किसानों में से 65 से 75 प्रतिशत किसानों ने स्थानीय साहूकारों और गाँव के सूदखोरों से पैसे ले रखे थे। उन्हें सरकार की स्कीम का कोई फ़ायदा नहीं मिला। 

इसे इससे समझा जा सकता है कि विदर्भ के 17.6 लाख किसानों में से सिर्फ 25.3 प्रतिशत ने ही संस्थागत ऋण ले रखा था, यानी बैंकों या किसी सरकारी संस्था से क़र्ज़ लिया था, बाकी ने साहूकारों से पैसे लिए थे।

योजना आयोग ने मई 2006 में अपनी रिपोर्ट में कहा था कि विदर्भ के 32 लाख कपास किसानों में से 28 लाख किसानों ने बैंकों से जो क़र्ज़ लिए थे, वह नहीं चुकाया था, लिहाज़ा उन्हें नया क़र्ज़ नहीं मिल सकता था। उनके पास साहूकारों के पास जाने के अलावा कोई चारा नहीं था।

छोटा क़र्ज़, बड़ी मुसीबत

वे इस तरह क़र्ज़ के जाल में फँस गए। सवाल यह है कि यदि इसके बाद कपास की खेती खराब हो जाए या कीमतें गिर जाएं तो किसान क्या करेगा?

इंदिरा गांधी इंस्टीच्यूट ऑफ़ डेवलपमेंट रिसर्च ने 2006 में एक अध्ययन में पाया था कि आत्महत्या करने वाले किसानों में से 86 प्रतिशत के ऊपर औसत क़र्ज़ सिर्फ 38,444 रुपए था। 

1,200 करोड़ का पैकेज

इसके पहले महाराष्ट्र सरकार ने 1,200 करोड़ रुपए के राहत पैकेज का एलान किया था, लेकिन किसानों की स्थिति पर उसका कोई असर नहीं पड़ा। 

देश भर के किसानों ने 2018 में दिल्ली में एक बड़ा प्रदर्शन किया था। उसके बाद 11 राज्य सरकारों ने छोटे किसानों के क़र्ज़ माफ़ कर देने की योजना बनाई थीं। वे राज्य थे- मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक, तमिलनाडु, पंजाब, छत्तीसगढ़, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, असम व राजस्थान। 

क़र्ज़माफ़ी से फ़ायदा क्यों नहीं?

कुछ अर्थशास्त्रियों ने इसका विरोध तीन कारणों से किया था।

  1. एक, पहले भी क़र्ज़ माफ़ किए गए थे, लेकिन उसके बाद कृषि क्षेत्र में नया निवेश नहीं हुआ।
  2. दो, क़र्ज़माफ़ी स्कीम से संस्थागत क्षेत्र से किसानों को पैसे मिलने की संभावना कम हो जाती है क्योंकि उन्होंने खुद लिया गया क़र्ज़ नहीं चुकाया होता है और इस तरह वे साहूकारों पर पहले से अधिक निर्भर हो जाते हैं।
  3. तीसरा, क़र्ज़माफ़ी से वित्तीय अनुशासन ख़राब होता है, यानी लोग क़र्ज़ नहीं चुकाना चाहते हैं और उम्मीद में रहते हैं कि देर-सवेर सरकार उनका क़र्ज़ माफ़ कर देगी। 

दूरगामी लाभ नहीं, तात्कालिक राहत

मुंबई स्थित इंदिरा गांधी इंस्टीच्यूट ऑफ़ डेवलपमेंट रिसर्च ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि कृषि क़र्ज़माफ़ी स्कीमों से लंबी अवधि में कोई फ़ायदा नहीं होता है, बस किसानों को तात्कालिक राहत मिल जाती है। 

इसने 1987 से अब तक की चुनिंदा क़र्ज़माफी स्कीमों का अध्ययन करने के बाद यह निष्कर्ष निकाला है। 

केंद्र सरकार 2006 की योजना के बाद 2008 में एक नई  स्कीम लेकर आई। कृषि ऋण माफ़ी व ऋण राहत योजना (एग्रीकल्चर डेट वेबर एंड डेट रिलीफ़ स्कीम, 2008) के तहत सरकार ने 36 लाख किसानों के 653 करोड़ रुपए के क़र्ज़ चुकाए। लेकिन इसमें किसान क्रेडिट कार्ड से लिए गए क़र्ज़ भी शामिल थे। 

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देश की चुनिंदा क़र्जमाफ़ी स्कीमों का संक्षिप्त अध्ययनइंदिरा गांधी इंस्टीच्यूट ऑफ़ डेवलपमेंट रिसर्च
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मनी लेन्डिंग रेगुलेशन एक्ट

राज्य सरकारों के स्तर पर भी कई राहत स्कीमें लागू की गईं। महाराष्ट्र सरकार ने 2006 में ही वसंतराव नाइक शेती स्वालंबन मिशन शुरू किया। राज्य सरकार ने 2008 में मनी लेन्डिंग रेगुलेशन एक्ट पारित किया, जिसके तहत निजी क्षेत्र में भी ब्याज की उच्चतम दर तय कर दी गई। 

महाराष्ट्र सरकार ने 2010 में रिलीफ़ पैकेज का एलान किया, जिसके तहत कृषि बीमा पर आधा प्रीमियम सरकार ने देने का एलान किया। इसके अलावा सामुदायिक लग्न स्कीम के तहत किसानों को बेटी की शादी के लिए मदद दी गई। 

इसी तरह केरल और दूसरे राज्य सरकारों ने भी किसानों को राहत देने का एलान किया। 

इन तमाम कोशिशों के बावजूद देश के अलग-अलग हिस्सों में किसानों की आत्महत्याओं का सिलसिला नहीं थम रहा है। सवाल है, किसानों को क़र्ज़ से कैसे राहत दिलाई जाए। 

कृषि ऋण माफ़ करने की केंद्र व राज्य सरकारों की तमाम योजनाएँ व राहत योजनाएँ नाकाम रही हैं। किसान न तो क़र्ज़ के जाल से निकल पाया है न ही वह इस स्थिति में होता है कि वह सभी क़र्ज़ चुका दे और क़र्ज़ नहीं ले। 

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