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प्रेमचंद- 140, पाँचवीं कड़ी : धार्मिकता के संगठित पक्ष से पवित्रता नहीं हिंसा का जन्म होता है?

पवित्रता, पाकीज़गी का धर्म से क्या रिश्ता है? क्या धार्मिक भाव अनिवार्यतः पवित्रता से जुड़ा हुआ है? या धार्मिकता का जो सामाजिक रूप है या संगठित पक्ष है, उससे पवित्रता नहीं हिंसा का जन्म होता है? क्या ऐसा होना अनिवार्य है? ...प्रेमचंद के 140 साल पूरे होने पर सत्य हिन्दी की विशेष श्रृंखला की पाँचवीं कड़ी। 

अपूर्वानंद

‘ईदगाह’ बच्चों के लिए लिखी गई कहानी है या बड़ों के लिए? इस कहानी को पढ़ते हुए जो पीढ़ियाँ गुज़री हैं, उनमें इस सवाल पर एक राय नहीं है। हिंदी के पाठक इस कहानी के साथ-साथ बड़े होते हैं। इसलिए कि यह स्कूल में और फिर आगे की कक्षाओं में भी पाठ्यपुस्तकों के लिए आदर्श कहानी मानी जाती है। बच्चों को उनकी ज़िम्मेदारी की शिक्षा इस कहानी से मिलती है, यह बहुतों का खयाल है तो यह भी कि यह एक ऐसी व्यवस्था की कहानी है जहाँ हामिद जैसे बच्चों का बचपन छिन जाता है।

कहानी के कई स्तर हैं और वह अलग-अलग वक़्त अलग-अलग ढंग से पढ़ी जा सकती है। कहानी का केंद्र हामिद ज़रूर है, लेकिन ईद के पर्व और नमाज़ के वर्णन को मात्र आनुषंगिक मान लेना भूल होगी।

कहानी का प्रत्येक अंश एक जैसा ही महत्त्वपूर्ण है। ईद की सुबह का वर्णन हो या ईदगाह जाने की अफ़रातफ़री में लगे ग्रामीण या मेले का वर्णन या फिर जिसे मैं इस कहानी का ही नहीं, हिंदी कथा साहित्य का हासिल मानता हूँ, यानी नमाज़ का वर्णन।

मानो  नमाज़ को देखते हुए वाचक, लेखक भाव विभोर हो उठा है। उसे पढ़ते हुए आप कह नहीं सकते कि यह कहानी एक मुसलमान ने नहीं लिखी है।

लड़ी में पिरोई आत्माएँ 

ईद की इस नमाज़ का वर्णन सहज ही सरोजिनी नायडू के इसलाम पर दिए व्याख्यान की याद दिला देता है। 1917 में तब के मद्रास में ‘यंग मेन्स मुसलिम एसोसिएशन’ के सदस्यों के समक्ष सरोजिनी बोल रही हैं, 

हालाँकि मैं आपके क़रीब एक काफ़िर के तौर पर खड़ी हूँ, मैं आपके सारे सपनों में आपकी साथी हूँ। मैं आपके सपनों और तमन्नाओं के सफ़र में आपकी बग़लगीर हूँ क्योंकि इसलाम के आदर्श इतने बुनियादी …मानवीय मूल्य हैं कि कोई भी शख़्स जो प्रगति चाहता है, इन मूल्यों से रिश्ता महसूस किए बिना रह ही नहीं सकता।’

आगे वे कहती हैं,

यह वह पहला धर्म है जिसने जम्हूरियत का ऐलान किया और उस पर अमल किया क्योंकि जब मसजिद की मीनारों से अजान दी जाती है और सारे इबादत करनेवाले इकट्ठा होते हैं तो इसलाम की जम्हूरियत दिन में पाँच दफ़ा मूर्तिमान होती है जब एक किसान और एक बादशाह आजू-बाजू दोजानूँ होकर ‘अल्लाहो अकबर’ का नारा बुलंद करते हैं।

 … मैं बार बार इसलाम में अंतर्निहित इस अविभाज्य एकता के भाव से चकित रह जाती हूँ जो इंसान को खूब ब खुद एक बिरादर में तब्दील कर देता है। जब आप एक मिस्री, एक अल्जीरियाई, एक भारतीय, एक तुर्क से लंदन में मिलते हैं तो इससे क्या फ़र्क़ पड़ता है कि मिस्र एक की मातृभूमि है और भारत एक दूसरे की?’

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क्या इस अंश को पढ़ते हुए आपको ईदगाह में नमाज़ का यह वर्णन याद नहीं आ जाता?

यहाँ कोई धन और पद नहीं देखता। इसलाम की निगाह में सब बराबर हैं। इन ग्रामीणों ने भी वजू किया और पिछली पंक्ति में खड़े हो गए। कितना सुन्दर संचालन है, कितनी सुन्दर व्यवस्था! लाखों सिर एक साथ सिजदे में झुक जाते हैं, फिर सबके सब एक साथ खड़े हो जाते हैं, एक साथ झुकते हैं और एक साथ घुटनों के बल बैठ जाते हैं। कई बार यही क्रिया होती है, जैसे बिजली की लाखों बत्तियाँ एक साथ प्रदीप्त हों और एक साथ बुझ जाएँ, और यही क्रम चलता रहे। कितना अपूर्व दृश्य था, जिसकी सामूहिक क्रियाएँ, विस्तार और अनंतता हृदय को श्रद्धा, गर्व और आत्मानंद से भर देती थीं, मानो भ्रातृत्व का एक सूत्र इन समस्त आत्माओं को एक लड़ी में पिरोए हुए है।’

पवित्रता के भाव की अभिव्यक्ति

पवित्रता के भाव की ऐसी अभिव्यक्ति प्रयासपूर्वक या किसी सामाजिक या राजनीतिक दीक्षा के बल पर नहीं हासिल की जा सकती। वह चाहे सरोजिनी नायडू की उदात्त भाषा हो या प्रेमचंद की काव्यात्मक भाषा, दोनों में ही एक अलग धर्म के अनुभव में साझेदारी का उत्साह व्यक्त होता है। यह उस दौर की ख़ासियत भी है। हिंदू लेखक इस्लामी चरित्रों और घटनाओं पर लिखते हैं और उनमें ‘अन्य’ के पवित्र को अपने पाठकों के लिए हासिल करते हैं।

इसे भारतीय जीवन पर गांधी का प्रभाव कहा जा सकता है। मैं अच्छा हिंदू तभी हूँ जब मुसलमान हूँ और ईसाई भी या अच्छा हिंदू होकर यह सब हो सकता हूँ, यह गांंधी उन उत्साही मुसलमानों और ईसाइयों को कहते थे जो उन्हें सच्चे दीन की राह पर लाने को उद्यत थे। गांधी के पहले ऐसा नहीं है कि इस देश में यह परंपरा थी ही नहीं। 

निकट अतीत की बात करें तो रामकृष्ण परमहंस के पवित्रता के प्रयोग याद आ जाते हैं। खुद सामान्य जनता भी, जामिद जैसी, ‘धर्मनिरपेक्ष’ पवित्रता की हामी थी। तबलीग और शुद्धि के उन्मादियों की प्रेरणा पवित्रता या पाकीज़गी के तजुर्बे को विस्तृत करना नहीं, बल्कि अपने जैसे लोगों की तादाद बढ़ाना भर है।
मंदिर हो या मसजिद, मज़ार हो या गिरजाघर, सबके हृदय में श्रद्धा का संचार करते हैं। वह निगाह और है जो मसजिद को देखकर द्वेष से भर उठती है या जिसके लिए मंदिर नापाक जगह है। 
कुछ उत्साही इसका स्रोत प्रेमचंद की ‘धर्मनिरपेक्ष’ दृष्टि को बता सकते हैं। लेकिन यह वास्तव में पवित्र या पावन के ईमानदार अनुभव के लिए अनिवार्य एक अविभाजित दृष्टि है, जिसके बिना ‘ईदगाह’ लिखना तो संभव नहीं ही था।

‘हिंसा परमो धर्म:’ कहानी भी इस अविभाजित दृष्टि के बग़ैर नहीं लिखी जा सकती थी। ’जिहाद’ और ‘मंदिर-मसजिद’ भी नहीं। एक अलग क़िस्म की कहानी है ‘मंत्र' जो इस धार्मिक प्रचार के भीतर के बेमानीपन का क़िस्सा कहती है। जो मुसलमान के लिए पवित्र है, क्या हिंदू के लिए नहीं हो सकता? क्या पाकीज़गी के अहसास का साझापन मुमकिन ही नहीं है?

साहित्य से और ख़बरें

पाकीज़गी और धर्म 

पवित्रता, पाकीज़गी का धर्म से क्या रिश्ता है? क्या धार्मिक भाव अनिवार्यतः पवित्रता से जुड़ा हुआ है? या धार्मिकता का जो सामाजिक रूप है या संगठित पक्ष है, उससे पवित्रता नहीं हिंसा का जन्म होता है? क्या ऐसा होना अनिवार्य है? ‘हिंसा परमो धर्म:’ कहानी प्रेमचंदीय सरलता के साथ यह सवाल पूछती है। इस कहानी का मुख्य पात्र जामिद बौड़म है:

‘बिल्कुल बेफ़िक्र, न किसी से दोस्ती, न किसी से दुश्मनी। जो ज़रा हँसकर बोला, उसका बेदाम का ग़ुलाम हो गया। बे-काम का काम करने में उसे मज़ा आता था। गाँव में कोई बीमार पड़े, वह रोगी की सेवा-शुश्रुषा के लिए हाज़िर है। कहिए, तो आधी रात हकीम के घर चला जाए; किसी जड़ी-बूटी की तलाश में जंगलों की ख़ाक छान आए। मुमकिन न था कि किसी ग़रीब पर अत्याचार होते देखे और चुप रह जाए। फिर चाहे कोई उसे मार ही डाले, वह हिमायत करने से बाज न आता था। ऐसे सैकड़ों ही मौके उसके सामने आ चुके थे। कांस्टेबिल से आए दिन ही उसकी छेड़-छाड़ होती रहती थी। इसलिए लोग उसे बौड़म समझते थे। और बात भी यही थी। जो आदमी किसी का बोझ भारी देखकर, उससे छीन कर, अपने सिर ले ले, किसी का छप्पर उठाने या आग बुझाने के लिए कोसों दौड़ा चला जाए, उसे समझदार कौन कहेगा।’

बौड़मपन प्रेमचंद के कई पात्रों में है। एक कहानी ही इस नाम से है। जामिद मियाँ इस मूर्खता के लिए जब बहुत दुत्कार सुन चुके तो उन्होंने शहर का रुख़ किया। शहर में जिस चीज़ ने पहले उनका ध्यान खींचा, वह थी धर्म की प्रधानता: 

.’..मसजिदों और मन्दिरों की संख्या अगर मकानों से अधिक न थी, तो कम भी नहीं। देहात में न तो कोई मसजिद थी, न कोई मन्दिर। मुसलमान लोग एक चबूतरे पर नमाज़ पढ़ लेते थे। हिन्दू एक वृक्ष के नीचे पानी चढ़ा दिया करते थे। नगर में धर्म का यह माहात्म्य देखकर देखकर जामिद को बड़ा कुतूहल और आनन्द हुआ। उसकी दृष्टि में मज़हब का जितना सम्मान था उतना और किसी सांसारिक वस्तु का नहीं।’

ज़रूर शहर के लोग धार्मिक होंगे, तभी तो इतने धर्म स्थल हैं! इन 6 वाक्यों में प्रेमचंद ‘पवित्र’ और ‘धार्मिक’ के बीच के फ़र्क़ की तरफ़ इशारा करते हैं।
और इस वाक्य में छिपे व्यंग्य से आप कैसे अछूते रह सकते हैं: ‘नगर में धर्म का यह माहात्म्य देखकर देखकर जामिद को बड़ा कुतूहल और आनन्द हुआ।’ जामिद थककर एक विशाल मंदिर के चबूतरे पर जा बैठता है। 

‘मंदिर के ऊपर ‘सुनहला कलश चमक रहा था, …संगमरमर के चौके जड़े हुए थे; मगर आँगन में जगह-जगह गोबर और कूड़ा पड़ा था।’

जामिद से यह गंदगी देखी नहीं जाती। पवित्र स्थान को स्वच्छ भी होना चाहिए। झाड़ू न मिलने पर वह दामन से ही सफ़ाई शुरू कर देता है। हिंदू हैरान हैं कि एक मुसलमान आख़िर क्यों मंदिर की सफ़ाई कर रहा है! पहले तो शक होता है, आपस  में राय ठहरती है कि देहाती बौड़म है, अच्छा फँसा है, इसे हिंदू बना लेना चाहिए।

जामिद को गला ख़ुदा ने दिया है और भजन उसे खूब याद हैं। वह मंदिर में कीर्तन करता। ऐसे बुद्धू मुसलमान को चंगुल में पाकर हिंदू लेकिन अलग खिचड़ी पकाने लगे। एक दिन उसका धर्म परिवर्तन या शुद्धि कर ही दी जाती है:

एक दिन मंदिर में बहुत-से आदमी जमा हुए। आँगन में फ़र्श बिछाया गया। जामिद का सर मुड़ा दिया गया। नए कपड़े पहनाए। हवन हुआ। जामिद के हाथों से मिठाई बाँटी गई। वह अपने आश्रयदाताओं की उदारता और धर्मनिष्ठा का और भी कायल हो गया। ये लोग कितने सज्जन हैं, मुझ जैसे फटेहाल परदेशी की इतनी खातिर। इसी को सच्चा धर्म कहते हैं।’

भजन तो वह गाँव में भी करता था, लेकिन यह सम्मान वहाँ कहाँ था! उसे खबर न थी कि वह अशुद्ध से शुद्ध किया गया है। अब तक वह इनकी निगाह में अपवित्र था, अब पवित्र कर दिया गया है। 

न्याय भावना

पाँसा लेकिन एक दिन पलट जाता है। अपने धर्म भाइयों के साथ धर्म चर्चा करते हुए वह देखता है कि एक जनेऊधारी जवान एक बूढ़े को मार रहा है तो अपने स्वभाव के मुताबिक़ वह युवक से उलझ पड़ता है:

‘बुड्ढे को क्यों मारते हो, भाई? तुम्हें इस पर ज़रा भी दया नहीं आती? 

युवक - मैं मारते-मारते इसकी हड्डियाँ तोड़ दूँगा। 

जामिद - आख़िर इसने क्या कसूर किया है? कुछ मालूम भी तो हो। 

युवक - इसकी मुर्गी हमारे घर में घुस गई थी और सारा घर गंदा कर आई।

 

जामिद - तो क्या इसने मुर्गी को सिखा दिया था कि तुम्हारा घर गंदा कर आए? 

बुड्ढा - ख़ुदाबंद मैं उसे बराबर खाँचे में ढाँके रहता हूँ। आज गफ़लत हो गई। कहता हूँ, महाराज, कुसूर माफ़ करो, मगर नहीं मानते। हुजूर, मारते-मारते अधमरा कर दिया। 

महाराज, कुसूर माफ़ करो, मगर नहीं मानते। हुजूर, मारते-मारते अधमरा कर दिया। 

युवक - अभी नहीं मारा है, अब मारूँगा, खोद कर गाड़ दूँगा। 

जामिद - खोद कर गाड़ दोगे, भाई साहब, तो तुम भी यों खड़े न रहोगे। समझ गए? अगर फिर हाथ उठाया, तो अच्छा न होगा।’

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जामिद की न्याय भावना को उसकी नई धार्मिक पहचान धूमिल नहीं कर सकी थी। लेकिन उसके नए धर्म भाई यह देखकर निराश होते हैं कि वह स्वधर्मी का साथ न देकर एक विधर्मी की तरफ़ से लड़ रहा है:

‘..भक्तों का समुदाय, जो अब तक मंदिर में बैठा तमाशा देख रहा था, लपक पड़ा और जामिद पर चारों तरफ से चोटें पड़ने लगीं। जामिद की समझ में न आता था कि लोग मुझे क्यों मार रहे हैं। कोई कुछ नहीं पूछता। तिलकधारी जवान को कोई कुछ नहीं कहता। बस, जो आता है, मुझ ही पर हाथ साफ़ करता है। आखिर वह बेदम होकर गिर पड़ा। तब लोगों में बातें होने लगीं। 

- दगा दे गया। 

- धत् तेरी जात की! कभी म्लेच्छों से भलाई की आशा न रखनी चाहिए। कौआ कौओं के साथ मिलेगा। कमीना जब करेगा कमीनापन, इसे कोई पूछता न था, मंदिर में झाड़ू लगा रहा था। देह पर कपड़े का तार भी न था, हमने इसका सम्मान किया, पशु से आदमी बना दिया, फिर भी अपना न हुआ। 

- इनके धर्म का तो मूल ही यही है।’

उधर मुसलमानों को उसमें सच्चा मुसलमान दिखलाई पड़ा क्योंकि वह एक हममजहब की तरफ़दारी में लड़ पड़ा था। जिस बूढ़े की जान जामिद ने बचाई थी, वह भी यही माने बैठा है कि जामिद ने मुसलमान होने के चलते उसका साथ दिया। कोई यह नहीं समझ सकता कि जामिद की सहज न्याय भावना हिंदू और मुसलमान का भेद नहीं देखती। क़ाज़ी साहब भी उसकी पीठ ठोंकते हैं, 

‘... वल्लाह! तुम्हें आँखें ढूंढ़ रही थीं। तुमने अकेले इतने काफ़िरों के दाँत खट्टे कर दिए। क्यों न हो, मोमिन का ख़ून है। काफ़िरों की हक़ीकत क्या? सुना, सब-के-सब तुम्हारी शुद्धि करने जा रहे थे, मगर तुमने उनके सारे मनसूबे पलट दिए। इसलाम को ऐसे ही ख़ादिमों की ज़रूरत है। तुम जैसे दीनदारों से इसलाम का नाम रौशन है। ग़लती यही हुई कि तुमने एक महीने तक सब्र नहीं किया। शादी हो जाने देते, तब मज़ा आता। एक नाजनीन साथ लाते और दौलत मुफ़्त। वल्लाह! तुमने उज्लत कर दी।’

जामिद ने मंदिर में पुराण पढ़ना रोककर एक बूढ़े पर हुए अत्याचार का विरोध किया। क़ाज़ी साहब के यहाँ उसने क़ुरान पढ़ना शुरू किया। एक रात एक हिंदू औरत बहका कर लाई गई, जिसे मुसलमान बनाया जाना है। क़ाज़ी साहब जामिद को उससे निकाह का लालच दे रहे हैं। यह मुसलमान होने का ईनाम है! जामिद फिर वही बौड़मपन करता है, 

‘... ज्यों ही स्त्री दरवाज़े की तरफ चली और काज़ी साहब ने उसका हाथ पकड़कर खींचा, जामिद ने तुरंत दरवाज़ा खोल दिया और काज़ी साहब से बोला - इन्हें छोड़ दीजिए। 

काज़ी - क्या बकता है ? 

जामिद - कुछ नहीं। ख़ैरियत इसी में है इन्हें छोड़ दीजिए। 

लेकिन जब काज़ी साहब ने उस महिला का हाथ न छोड़ा और ताँगे वाला भी उसे पकड़ने के लिए बढ़ा, तो जामिद ने एक धक्का देकर काज़ी साहब को धकेल दिया और उस स्त्री का हाथ पकड़े हुए कमरे से बाहर निकल गया। ताँगे वाला पीछे लपका, मगर जामिद ने उसे इतनी जोर से धक्का दिया कि वह औंधे मुँह जा गिरा। एक क्षण में जामिद और स्त्री दोनों सड़क पर थे। 

जामिद - आपका घर किस मोहल्ले में है? 

औरत - अहियागंज में। 

जामिद - चलिए, मैं आपको पहुँचा आऊँ।’

पवित्रता में बँटवारा न हो 

जामिद उस हिंदू महिला इंदिरा को उसके पति पंडित राजकुमार के पास पहुँचा आता है। पंडितजी उसका अहसान कैसे चुकाएँ, समझ नहीं पा रहे:

‘एक ही मिनट बाद बाहर आकर जामिद से बोले - भाईसाहब, शायद आप बनावट समझें, पर मुझे आपके रूप में इस समय इष्टदेव के दर्शन हो रहे हैं। मेरी जबान में इतनी ताकत नहीं कि आपका शुक्रिया अदा कर सकूँ। आइए, बैठ जाइए। 

जामिद - जी नहीं, अब मुझे इजाज़त दीजिए। 

पंडित - मैं आपकी इस नेकी का क्या बदला चुका सकता हूँ? 

जामिद - इसका बदला यही है कि इस शरारत का बदला किसी ग़रीब मुसलमान से न लीजिएगा, मेरी आपसे यही दरख़्वास्त है।’

जामिद का वाक्य सुनकर अगर आपको अज्ञेय की कहानी ‘शरणदाता’ के अंत की याद आ जाए। बँटवारे के वक़्त की कहानी है। एक हिंदू देविंदरलाल को एक मुसलमान शेखउल्लाह पनाह देता है और धोखे से उसकी जान लेना चाहता है। लेकिन उसकी बेटी जैबू उसकी जान बचाकर उसे भगा देती है। दिल्ली पहुँचकर जब वे अपने परिवार की खोज कर रहे हैं तो उन्हें लाहौर की मुहरवाली एक चिट्ठी मिलती है, 

‘आप बचकर चले गये, इसके लिए खुदा का लाख-लाख शुक्र है। मैं मनाती हूँ कि रेडियो पर जिनके नाम आपने अपील की है, वे सब सलामती से आपके पास पहुँच जाएँ। अब्बा ने जो किया या करना चाहा, उसके लिए मैं माफ़ी माँगती हूँ और यह भी याद शायद दिलाती हूँ कि उसकी काट मैंने ही कर दी थी। अहसान नहीं जताती - मेरा कोई अहसान आप पर नहीं है - सिर्फ़ यह इल्तजा करती हूँ कि आपके मुल्क में अक़लियत का कोई मज़लूम हो तो याद कर लीजिएगा। इसलिए नहीं कि वह मुसलमान है, इसलिए कि आप इनसान हैं। खुदा हाफिज़!’

अज्ञेय का पात्र इस चिट्ठी को छोटी-सी गोली बनाकर उड़ा देता है। प्रेमचंद की कहानी का अंत इतना कलात्मक नहीं है, 

‘यह कहकर जामिद चल खड़ा हुआ और उस अँधेरी रात के सन्नाटे में शहर से बाहर निकल गया। उस शहर की विषाक्त वायु में साँस लेते हुए उसका दम घुटता था। वह जल्द-से-जल्द शहर से भागकर अपने गाँव में पहुँचना चाहता था, जहाँ मजहब का नाम सहानुभूति, प्रेम और सौहार्द्र था। धर्म और धार्मिक लोगों से उसे घृणा हो गई थी।’

अज्ञेय और प्रेमचंद के पात्र जैबू और जामिद ने देविंदरलाल और पंडित राजकुमार को जो कहा था, वह क्या सिर्फ़ उन्हीं दोनों को कहा गया था या सारे हिंदुओं को?
जैबू इंसानियत की दुहाई देती है, जामिद धर्म और धार्मिक लोगों से दूर भागकर जल्दी गाँव पहुँच जाना चाहता है जहाँ पवित्रता में बँटवारा नहीं है। लेकिन क्या सचमुच वह ऐसे गाँव में पहुँच पाएगा? क्या धर्म का रिश्ता सहानुभूति, प्रेम और सौहार्द्र से बना रह पाएगा?
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