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फ़ोटो साभार/डीडी/वीडियो ग्रैब

अयोध्या की रामलीला: कमज़ोर, उबाऊ प्रस्तुति रामलीला का अपमान! 

दिलचस्प बात यह है कि जैसे-जैसे दूरदर्शन पर धार्मिक खंडकाव्यों के प्रसारण ने ज़ोर पकड़ा, शहरों और क़स्बों में होने वाली रामलीलाओं पर साम्प्रदायिकता की राजनीति हावी होने लग गई। बीते 30 वर्षों का युग सांस्कृतिक परचम के सांप्रदायिक राजनीति की ध्वजा में परिवर्तित होते चले जाने का युग है जिसकी चरम परिणति ‘अयोध्या की रामलीला’ है।
अनिल शुक्ल

दूरदर्शन के राष्ट्रीय चैनल पर इन दिनों सरयू नगरी से 'अयोध्या की रामलीला' का लाइव प्रसारण चल रहा है। 17 अक्टूबर से शुरू होकर 9 दिनों के लिए प्रसारित होने वाली इस 'अयोध्या की रामलीला' को एक दिन (अवधि 3 घंटा प्रतिदिन) भी बर्दाश्त कर पाना उन दर्शकों के लिए टेढ़ी खीर साबित हो रहा है जो दूरदर्शन और अन्य टीवी चैनलों की गुज़री रामलीलाओं को देख चुके हैं। करोड़ों रुपये की फ़ीस के सरकारी भुगतान अदायगी और एक दर्ज़न से ज़्यादा टीवी कैमरा ('मल्टी कैम') यूनिट (जिनके लगभग 30 टेक्नीशियनों और कर्मचारियों के टीए/डीए पर अतिरिक्त लाखों रुपये व्यय किये गए होंगे) के कुल ख़र्चों की सहायता से 27 घंटों का यह प्रसारण दूरदर्शन की अब तक की सबसे कमज़ोर और उबाऊ प्रस्तुतियों के रूप में दर्ज़ होगा जिसकी झोली में विज्ञापन भी इक्का-दुक्का ही थे।

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भारतीय दर्शकों के लिए रामलीलाओं के मंचन को देखना नाटकीयता की 'मेलोड्रामा' पद्धति का जम कर रसास्वादन करना रहा है। भारतीय इतिहास के उत्तर मध्यकाल में विकसित नाट्य प्रस्तुतियों की यह 'पद्धति' नाटक और कलाकारों के भाव और अभिव्यक्ति के अतिरेक को प्रस्तुत करती है और इस 'मेलोड्रामाई' के चरम और सर्वश्रेष्ठ स्वरूप का प्रतिनिधित्व करती आई हैं रामलीलाएँ। भड़कीला मेकअप, चेहरे की लाऊड भंगिमाएँ, लंबे-लंबे डग भरते अभिनेता,  दूर-दूर तक जाते हाथों से बिम्ब, अत्यधिक ऊँचे स्वर में संवाद अदायगी- गाँवों से लेकर छोटे शहरों और महानगरों तक, सर्वत्र होने वाली रामलीलाओं के ये सब आवश्यक नाटकीय निवेश हैं, उत्तर भारतीय दर्शक जिनकी अपेक्षा पीढ़ियों से करता चला आ रहा है।

'अयोध्या की रामलीला' की बात अलग है। यहाँ तो दर्शक अपने घर में बैठ, हाथ में रिमोट पकड़े टीवी के उस परदे पर उसे देख रहा है जहाँ वह इससे पहले रामानंद सागर की रामलीला, बीआर चोपड़ा की महाभारत और अब 'नेटफ़्लिक्स' के तकनीकी तौर पर कसी प्रस्तुतियों को देखने का आदी हो चुका है।

2 साल पहले तैयार दूरदर्शन के अपने मूल विचार में ही (जबकि कोविड महामारी का दूर-दूर तक कोई ज़िक्र नहीं था) इसे एक 'वर्चुअल' प्रस्तुति के रूप में परिकल्पित किया गया था।

हिंदी, उर्दू और अंग्रेज़ी सहित 14 भारतीय भाषाओं में अनूदित होकर दूरदर्शन, यूट्यूब और केबल सहित अन्य डिजिटल प्लेटफार्मों के ज़रिये प्रसारित की जाने वाली इस अति महत्वाकांक्षी 'अंतरराष्ट्रीय परियोजना’ को लेकर जो सपने संजोये गए थे, प्रस्तुति को देखते हुए वे मुंगेरीलाल के हसीन सपनों से ज़्यादा कुछ नहीं साबित हो सके। इसकी टेलीविज़न की कलात्मक श्रेष्ठता की बात तो छोड़ ही दी जाए, यह तो शहरों में होने वाली रामलीलाओं का वीडियो प्रसारण मात्र बन कर रह गई है।

रामलीला के आयोजक कौन?

दिल्ली की मॉडल टाउन में 4 वर्ष पहले अस्तित्व में आई रामलीला का आयोजन करने वाली 'मां फ़ाउंडेशन' को 'अयोध्या की रामलीला' का ठेका मिला है। 'मां फ़ाउंडेशन' के संचालक सुभाष मलिक 'बॉबी' हैं। मलिक का मॉडल टाउन से पहले का रामलीला संचालन के ज्ञात इतिहास की कोई जानकारी नहीं, यद्यपि 'लीला' शुरू होने से सप्ताह भर पहले दिल्ली में की गयी प्रेस कॉन्फ्रेंस में उनके 'लीलाओं' के 18 साल के अनुभवों का दावा किया गया था। ये अनुभव किस शहर, मोहल्ले या गाँव के हैं इसे बताने की न तो उन्होंने कोई ज़रूरत महसूस की और न सुनने वाले संवाददाताओं ने पूछने का कोई उपक्रम किया। ‘अयोध्या की रामलीला' की दूसरी आयोजक 'मेरी रामलीला' नामक संस्था है। इस संस्था के रामलीला आयोजन सम्बन्धी अनुभवों की भी किसी को जानकारी नहीं, अलबत्ता इतना ही पता है कि पश्चिमी दिल्ली के बीजेपी सांसद प्रवेश वर्मा इसके मुख्य कर्ताधर्ता हैं। श्री वर्मा की लोकसभा की बायोप्रोफ़ाइल साइट 'मेंटिनेंस' के चलते बंद है और उनके बारे में प्राप्त अन्य स्रोतों से भी उनके 'रामलीला' के संचालन या निर्देशन के अनुभव का कोई पता नहीं चलता।

'अयोध्या की रामलीला' के 3 दिन के प्रसारण को देखने के बाद इस निष्कर्ष पर पहुँचा जा सकता है कि वे तमाम त्रुटियाँ इसमें भी मौजूद हैं जो किसी छोटे शहर में होने वाली रामलीला में होती हैं। कुछेक अपवादों को छोड़ कर अधिकाँश अभिनेताओं के चेहरे भावहीन हैं।

पुत्रों के जन्म पर उन्हें गोद में खिलाते दशरथ के भाव हीन और रुआंसे चेहरे से जश्न मनाने का अभिनय करते देखना पुराने युग के फ़िल्मी हीरो राजेंद्र कुमार की बरबस याद आती है। अभिनेता और अभिनेत्रियों की 'लेट एंट्री' और बाक़ी अभिनेतागण की कनमनिया आँखों से उनकी प्रतीक्षा करते हुए नज़र आना बड़ा खलता है। अगर संवाद रिकॉर्डेड हैं तो एक्शन और 'लिपसिंक' की गड़बड़ी है और यदि लाइव हैं तो अभिनेताओं का भूलना साफ़ परिलक्षित होता है।

स्थान-स्थान पर होने वाले हवन में जलती डिजिटल अग्नि का रंग चाहे जो भी हो लेकिन लाल या नारंगी नहीं होता, इस बात का पता निर्देशक को नहीं है। नाटकीय परंपरा में अभिनेता रहित मंच का खाली दिखना सबसे अक्षम्य त्रुटि मानी जाती है। अयोध्या की रामलीला में यह हर दिन में कई-कई बार होता है।

असरानी, रज़ा मुराद, मनोज तिवारी और रविकिशन जैसे मुंबई और भोजपुरी फ़िल्मों के अभिनेताओं को शोकेसी भूमिका में रखकर हिंदी और आंचलिक सिनेमा के 'बी' या 'सी' श्रेणी के अभिनेता और अभिनेत्रियों को 'रामलीला' में ठंसा कर इसे बॉलीवुड ग्लैमर सरीखी रंगत देने की नाकाम कोशिश की गई है। गीत और भजनों के अधिकांश गायक बेसुरे हैं। उठान के समय से ही कानों को खलते हैं। अनूप जलोटा, पंकज उधास और जगजीत सिंह के हिट भजनों के चुराए गए संगीत 'कम्पोज़िशन' का कर्णप्रिय होना स्वाभाविक है।

एकल या सामूहिक गीतों पर होने वाले नृत्य न तो किसी शास्त्रीय नृत्यों की श्रेणी में आते हैं, न लोकनृत्यों की श्रेणी में और न ये बॉलीवुड जैसे नयनाभिराम नृत्य हैं। ये वस्तुतः किसी क़स्बाई ‘प्राथमिक कन्या विद्यालय’ की लड़कियों के डांस की याद ताज़ा कर देते हैं। सोचकर आश्चर्य होता है कि 'अंतरराष्ट्रीय संरचना' की प्रस्तुति के दावों के बरअक्स संगीत गायन और नृत्य ही ठीक ठाक हो जाता तो दर्शक अभिनय की प्रबल खामियों के दर्द पर इनका मलहम लगा लेता।

25 x 17 फ़ीट के मंच की पृष्ठभूमि 'वर्चुअल' होने के बावजूद मंच बड़े बेतरतीब विन्यासों और अभिनेताओं के ऊटपटांग मूवमेंट से अटे पड़े हैं। दृश्यबंध अजीब घालमेल पैदा करते हैं। मसलन, राक्षसों के नरसंहार के लिए जंगल से चलकर विश्वामित्र की कुटिया तक पहुँचने के लिए राम-लक्ष्मण को दशरथ दरबार के बीच से होकर गुज़ारना पड़ता है। ऐसा एक नहीं, अनेक स्थानों पर होता है और तब लगता है कि 'लीला' के निर्देशक और कला निर्देशक के बीच कोई तालमेल नहीं।

'रामलीला' को यूपी के पर्यटन विभाग ने 4 करोड़ रुपये का भुगतान किया है। केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय से मिलने वाला अनुदान इससे अलग है और साथ ही इसके प्रसारण की रॉयल्टी के रूप में दूरदर्शन, यूट्यूब और दूसरी डिजिटल एजेंसियाँ इनका अलग से भुगतान करेंगी। अनुमान किया जा रहा है कि लगभग 1 करोड़ रुपये की प्रतिदिन कमाई करने वाली इस रामलीला के आयोजकों के अच्छे दिन आए हैं।

क्या यह 'पब्लिक एक्सचेकर' के बूते बीजेपी के धर्म को दूरदर्शन की शोकेसिंग में डालने की कोशिश है? तो क्या यह माना जाए कि दूरदर्शन की थाली में हिन्दू धर्म परोसने की परंपरा की 'शेफ़' बीजेपी है?

‘पब्लिक ब्रॉडकास्टर’ के रूप में भारत जैसे लोकतान्त्रिक और धर्मनिरपेक्ष देश में किसी धर्म विशेष का प्रचार-प्रसार करने का दूरदर्शन का सिलसिला ताज़ा नहीं है। 'प्रसार भारती' के पूर्व प्रमुख कार्यकारी जवाहर सरकार ने बीते अगस्त में 'इंडियन एक्सप्रेस' में लिखा था-

‘एक विदेशी प्रसारण से जुड़े पत्रकार ने मुझसे पूछा- प्रसार भारती के पूर्व प्रमुख की हैसियत से आपको दूरदर्शन के अयोध्या के राममंदिर शिलान्यास के लाइव प्रसारण की तैयारियों की बाबत सुनकर कैसा लगा? मैंने टालमटोल सा जवाब दे दिया, प्रशासनिक नौकरी ने मुझे किसका अभ्यस्त बना दिया था, लेकिन सचमुच एक निष्पक्ष और धर्मनिरपेक्ष पब्लिक ब्रॉडकास्टर के लिए धर्म  का महिमामंडन करने वाली घटना की कवरेज सचमुच चिड़चिड़ा बना देती है।’ 

सरकार आगे लिखते हैं कि-

‘गणतंत्र दिवस परेड में 50 कैमरों की मल्टी कैम कवरेज से दूरदर्शन हुनरबंदी का अपना सिक्का गाड़ चुका है। जबकि आकाशवाणी और दूरदर्शन के स्थानीय स्टेशन बहुत से ऐसे धार्मिक उत्सव, जिनमें से कई राष्ट्रीय महत्व के हैं, की लाइव कवरेज शानदार तरीक़े से कर डालते हैं। जनादेश के चलते दूरदर्शन बहुत सजग रहता है। तब भी वह पुरी की जगन्नाथ रथ यात्रा और अनेक कुंभ मेलों जैसे लाइव कार्यक्रम विशाल मानवीय समागम के रूप में करता है न कि धार्मिक ख़ुशी में पगला जाने की नियत से। तब हम बमुश्किल ग़ौर कर पाते हैं कि क्यों यही दूरदर्शन है जो अयोध्या की जंग को हरी झंडी दिखाता है अनजाने में या अन्यथा।’

"हम में से बहुतों को याद नहीं कि 31 अक्टूबर 1984 को हुई श्रीमती गाँधी की हत्या के बाद हुए चुनावों में कांग्रेस को ज़बरदस्त जीत दिलाने वाला यही पब्लिक ब्रॉडकास्टर दूरदर्शन था जिसने श्रीमती गाँधी की अंतिम यात्रा के ह्रदय विदारक दृश्यों को जम कर प्रसारित किया था। सन 86 के अंत में जबकि बोफोर्स तोपों की ख़रीद में राजीव गाँधी की बड़ी थुक्का फ़ज़ीहत हुई थी। तब उनके सूचना-प्रसारण मंत्री अजित पांजा के टेलीविज़न पर धर्म सवार हो गया था। यद्यपि यह खुल्लमखुल्ला धर्मनिरपेक्ष सरकार थी लेकिन 25 जनवरी 1987 को दूरदर्शन ने रामायण धारावाहिक का प्रसारण शुरू किया। 31 जुलाई 1988 को जब रामायण के 78 एपिसोड समाप्त हुए और धर्म की तेज़ हवा बह चली, तब धर्मनिरपेक्षता की तराजू को हाथ में लेकर चलने का दवा करने वाली कांग्रेस ने बिना इस सोचा विचारी के कि उसके हाथों ने कैसे अंधड़ को जन्म दे दिया है, 2 अक्टूबर 1988 से बीआर चोपड़ा को 'महाभारत' पेश करने का न्यौता दे दिया।“ 

दिलचस्प बात यह है कि जैसे-जैसे दूरदर्शन पर धार्मिक खंडकाव्यों के प्रसारण ने ज़ोर पकड़ा, शहरों और क़स्बों में होने वाली रामलीलाओं पर साम्प्रदायिकता की राजनीति हावी होने लग गई। बीते 30 वर्षों का युग सांस्कृतिक परचम के सांप्रदायिक राजनीति की ध्वजा में परिवर्तित होते चले जाने का युग है जिसकी चरम परिणति ‘अयोध्या की रामलीला’ है।

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