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दिल्ली में मेट्रो स्टेशन के बाहर सोए लोग। (फ़ाइल फ़ोटो)फ़ोटो साभार: ट्विटर/अंजनी शाही

ठंड नहीं, व्यवस्था की काहिली से हो रही मौतें, सरकार क्यों नहीं लेती ज़िम्मेदारी?

नया साल शुरू हो चुका है और उससे पहले शुरू हो गई कंपकपा देने वाली सर्दी। इस समय भी देश के विभिन्न इलाक़ों में शीत लहर कहर बरपा रही है, जिससे लोगों के मरने की ख़बरें भी आ रही हैं। अब तक अकेले उत्तर प्रदेश में ही 200 से ज़्यादा लोग सर्दी की ठिठुरन से मौत की नींद सो चुके हैं। देश के अन्य इलाक़ों से भी भीषण सर्दी की वजह से लोगों के मरने की ख़बरें आ रही हैं। वैसे इस तरह की ख़बरें आना कोई नई बात नहीं है। कहीं भूख और कुपोषण से होने वाली मौतें तो कहीं ग़रीबी और क़र्ज़ के बोझ से त्रस्त किसानों की ख़ुदकुशी के जारी सिलसिले के बीच हर साल ही सर्दी की ठिठुरन, गर्म लू के थपेड़ों और बारिश-बाढ़ से भी लोग मरते हैं।

मौसम की अति के चलते असमय होने वाली ये मौतें हमारे उस भारत की नग्न सच्चाइयाँ हैं जिसके बारे में दावा किया जाता है कि वह तेज़ी से विकास कर रहा है और जल्द ही दुनिया की एक आर्थिक महाशक्ति बन जाएगा। ये सच्चाइयाँ सिर्फ़ हमारी सरकारों के 'शाइनिंग इंडिया’, 'भारत निर्माण’ 'न्यू इंडिया’ 'स्टार्टअप इंडिया’, 'स्टैंडअप इंडिया’ 'मेक इन इंडिया’ जैसे हवा-हवाई कार्यक्रमों और पाँच ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था हो जाने जैसे गुलाबी दावों की ही खिल्ली नहीं उड़ाती हैं, बल्कि व्यवस्था पर काबिज लोगों की नालायकी और संवेदनहीनता को भी उजागर करती हैं।

ताज़ा ख़बरें

दुनिया में संभवत: भारत ही ऐसा देश है, जहाँ हर मौसम की अति होने पर लोगों के मरने की ख़बरें आने लगती हैं। लेकिन हक़ीक़त यह है कि लोग मौसम की अति से नहीं मरते हैं, वे मरते हैं अपनी ग़रीबी से, अपनी साधनहीनता से और व्यवस्था तंत्र की नाकामी या लापरवाही की वजह से। यूरोप के देशों में सरकारें मौसम की अति का मुक़ाबला करने के लिए चाकचौबंद इंतज़ाम करती हैं, इसलिए वहाँ लोग हर मौसम का तरह-तरह से लुत्फ उठाते हैं। हमारे देश में भी खाया-अघाया तबक़ा ऐसा ही करता है, जिसके पास हर मौसम की अति का सामना करने और उसका लुत्फ उठाने के पर्याप्त साधन उपलब्ध हैं।

हर साल जब हिमालय पर्वतमाला पर बर्फ़ गिरती है तो पहाड़ी प्रदेशों और मैदानी इलाक़ों में शीत लहर चलने लगती है। लेकिन अभी जो शीत लहर जारी है, वह सिर्फ़ हिमालयी प्रदेशों और गंगा-यमुना के मैदानों तक ही सीमित नहीं है। राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली, पंजाब, हरियाणा और रेगिस्तानी राजस्थान के साथ ही महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और सुदूर छत्तीसगढ़ तथा ओडिशा तक ठंड से ठिठुर रहे हैं। सभी जगह न्यूनतम तापमान के पुराने रिकॉर्ड टूट रहे हैं। कई जगह तापमान शून्य डिग्री से नीचे चला गया है। 

बड़े शहरों से निकलने वाले समाचार पत्रों में अब सर्दी से होने वाली मौतों की ख़बरों को जगह मिलनी लगभग बंद हो गई है। कुछ साल पहले तक ऐसा नहीं था। तब अख़बारों में नियमित ख़बरें छपती थीं और हाई कोर्ट तथा सुप्रीम कोर्ट उन ख़बरों का संज्ञान लेकर संबंधित राज्य सरकारों और स्थानीय निकायों से जवाब-तलब करते थे, उन्हें साधनहीन लोगों के उचित इंतज़ाम करने के निर्देश देते थे। लेकिन अब सरकारों का मीडिया प्रबंधन तंत्र ऐसी ख़बरों को छपने से रोकने में सफल होने लगा है। टेलीविज़न चैनल तो सुबह से रात तक हिंदू-मुसलमान करने में ही व्यस्त रहते हैं। अगर थोड़ी फ़ुर्सत मिलती भी है तो उनके लिए अपने दर्शकों को यह बताना ज़्यादा ज़रूरी होता है कि फलाँ अभिनेत्री कब शादी करने वाली है या फलाँ अभिनेत्री कब माँ बनने वाली है, या फिर वे यह बताते हैं कि लोग सर्दी का लुत्फ लेने के लिए क्या-क्या कर रहे हैं और कहाँ-कहाँ जा रहे हैं। 

हक़ीक़त यह है कि अगर समूचे भारत के आँकड़े इकट्ठे किए जाएँ तो हर साल सर्दी से मरने वालों की संख्या हज़ारों में पहुँचती है। ज़्यादातर मौतें बड़े शहरों और महानगरों में होती हैं। जो मरते हैं, उनमें से ज़्यादातर बेघर होते हैं।

ऐसे लोग काम की तलाश में दूरदराज के इलाक़ों से अपने ही राज्य में या दूसरे राज्यों के बड़े शहरों या महानगरों में जाते हैं, ताकि मेहनत-मज़दूरी कर अपने परिवार के ज़िंदा रह सकने लायक कुछ कमा सकें। इनमें कोई साईकिल रिक्शा चलाते हैं, कोई रेस्त्राओं और ढाबों में काम करते हैं तो कोई किसी और काम में लग जाते हैं। 

लेकिन चूँकि ऐसे लोगों के पास रहने के लिए अपना कोई ठिकाना नहीं होता है, इसलिए खुले आसमान के नीचे रात गुज़ारना उनकी मजबूरी होती है। अगर वे सर्दी जनित किसी बीमारी की चपेट में आ जाते हैं तो उनके पास इतने पैसे नहीं होते हैं कि वे अपना इलाज करा सकें। सवाल है कि अगर इन लोगों के सामने साधनहीनता एक लाचारी है तो कल्याणकारी मूल्यों पर चलने का दावा करने वाली सरकारों की क्या ज़िम्मेदारी बनती है? 

सरकारी व्यवस्थाओं की पोल खुली

मौसम कोई भी हो, जब भी उसकी अति दरवाज़े पर दस्तक देती है तो हमारी सारी व्यवस्थाओं की पोल का पिटारा खुलने लगता है। बारिश का मौसम ख़त्म होते ही मौसम विभाग की ओर से हमें बताया गया था कि इस बार सर्दी कम पड़ेगी। जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग की चर्चाओं के बीच इस भविष्यवाणी पर किसी को भी हैरानी नहीं हुई। लेकिन जैसे ही सर्दी ने अपने तेवर दिखाने शुरू कर दिए तो फिर मौसम विभाग की ओर से बताया गया कि यह कड़ाके की ठंड चंद दिनों की ही मेहमान है, जल्द ही मौजूदा उत्तर पश्चिमी हवाओं का रुख़ बदलेगा और तापमान सामान्य के क़रीब पहुँच जाएगा। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। सर्दी के तेवर और तीखे हुए तो शीत लहर के एक चक्र की घोषणा हो गई। सिर्फ़ मौसम विभाग ही नहीं, बाक़ी सरकारी महकमों का भी यही हाल है। फुटपाथों, रेलवे स्टेशनों और भूमिगत पारपथों पर रात गुज़ारने वाले बेघर लोगों के लिए रैन बसेरों की व्यवस्था अभी भी कई जगह अधूरी है या बिल्कुल ही नहीं है, जबकि सुप्रीम कोर्ट कई बार इस मामले में राज्य सरकारों को फटकार लगाते हुए पुख्ता बंदोबस्त करने के निर्देश दे चुका है। जहाँ रैन बसेरों की व्यवस्था करना संभव नहीं है, वहाँ अलाव जलाने के लिए लकड़ी मुहैया कराई जाती है, लेकिन यह भी नहीं हो पा रहा है।

विचार से ख़ास

दरअसल ठंड से लोगों के मरने के पीछे सबसे बड़ी वजह है शहरी नियोजन में सरकारी तंत्र की अदूरदर्शिता। जब से आवासीय कॉलोनियों की बसाहट के मामले में विकास प्राधिकरणों और गृह निर्माण मंडलों के बजाय निजी भवन निर्माताओं और कॉलोनाइजरों का दखल बढ़ा है, तब से ‘रोज़ कमाकर रोज़ खाने वालों’ और बेघर लोगों के लिए आवासीय योजनाएँ हाशिए पर खिसकती गई हैं। करोड़ों लोग आज भी फुटपाथों, रेलवे स्टेशनों और बस अड्डों पर या टाट और प्लास्टिक आदि से बनी झोपड़ियों में रात बिताते हैं। बहुत से लोगों के पास तो पहनने को गर्म कपड़े या ओढ़ने को रजाई-कंबल तो दूर तापने को सूखी लकड़ियाँ तक उपलब्ध नहीं हैं। 

अदालतें हर साल सरकारों और स्थानीय निकायों को लताड़ती रहती हैं, लेकिन सरकारी तंत्र की मोटी चमड़ी पर ऐसी लताड़ों का कोई असर नहीं होता।

शीत लहर, बाढ़ और भीषण गर्मी जैसी प्राकृतिक आपदाओं को तो रोका नहीं जा सकता। रोका जा सकता है तो इनसे होने वाली जान-माल की तबाही को, जो सिर्फ़ राजनीतिक और प्रशासनिक तंत्र की ईमानदार इच्छा शक्ति से ही संभव है। ताज़ा शीत लहर और उससे होने वाली मौतें हमें बता रही हैं कि जब मौसम के हल्के से विचलन का सामना करने की हमारी तैयारी नहीं है और हमारी व्यवस्थाएँ पंगु बनी हुई हैं, तो जब ग्लोबल वार्मिंग जैसी चुनौती हमारे सामने होगी तो उसका मुक़ाबला हम कैसे करेंगे?

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अनिल जैन
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