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पूर्व सीजेआई गोगोई के सांसद चुने जाने से न्यायपालिका की छवि को तगड़ा झटका

प्रेमचंद की कहानी पंच परमेश्वर में संवाद है- बिगाड़ के डर से ईमान की बात न कहोगे? न्याय के आसन पर बैठे व्यक्ति में ईश्वर देखने वाले निष्पक्ष और निडर न्यायशास्त्र के बुनियादी सिद्धांत की इससे सरल प्रस्तुति नहीं हो सकती है। प्रेमचंद ने उस कहानी के दो प्रमुख पात्रों अलगू चौधरी और जुम्मन शेख के ज़रिये न्याय करते समय व्यवहार में ज़रूरी तथ्यपरकता और ‘ना काहू से दोस्ती, ना काहू से बैर’ के बुनियादी न्यायिक सिद्धांत को बहुत रोचक तरीक़े से स्थापित किया है।
अमिताभ

शब को मय ख़ूब सी पी सुब्ह को तौबा कर ली

रिंद के रिंद रहे हाथ से जन्नत न गई

पूर्व मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई की दास्तान पर यह शेर सटीक बैठता है।

सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश रहे जस्टिस रंजन गोगोई को रिटायर होने के सिर्फ़ चार महीने बाद ही राज्यसभा का सांसद मनोनीत करने के मामले ने न्यायपालिका की बेदाग़ छवि और सरकार से उसके रिश्तों को लेकर नये सिरे से तीखी बहस छेड़ दी है। हालाँकि जस्टिस रंजन गोगोई न्यायपालिका के इतिहास में पहले चीफ़ जस्टिस नहीं हैं जिन्होंने अदालत से रिटायर होने के बाद सियासत के गलियारे में क़दम रखा हो। उनसे पहले कई न्यायाधीश जज की कुर्सी छोड़ने के बाद राजनीति की पारी खेल चुके हैं। लेकिन जस्टिस गोगोई का नाम भारतीय न्यायपालिका के इतिहास में हुई एक क्रांतिकारी घटना से जुड़ा हुआ है जिसके चलते उनकी अलग छवि बनी थी और उनसे अलग व्यवहार की अपेक्षा थी।

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जस्टिस गोगोई ने जनवरी 2018 में अपने तीन तत्कालीन वरिष्ठतम साथी जजों के साथ प्रेस कॉन्फ़्रेंस करके आम जनता से न्यायपालिका को बचाने की अपील की थी। उस समय के चीफ़ जस्टिस दीपक मिश्रा के कामकाज पर सवाल उठाने के लिए सुप्रीम कोर्ट के चार जजों का मीडिया से सीधे मुख़ातिब होना भारतीय न्यायपालिका के इतिहास की अभूतपूर्व घटना थी और अब भी है। सुप्रीम कोर्ट के चार सबसे वरिष्ठ न्यायाधीशों के बाग़ी तेवरों को उस समय न्यायपालिका के साथ-साथ केंद्र की मोदी सरकार के तौर-तरीक़ों के ख़िलाफ़ आक्रोश की तरह भी देखा गया था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आलोचकों ने तब इस घटना को संवैधानिक संस्थाओं पर केंद्र के नियंत्रण की कोशिशों के ख़िलाफ़ उबाल क़रार दिया था। उस प्रेस कॉन्फ़्रेंस में अगुआई जस्टिस जस्ती चेलमेश्वर ने की थी। उनके साथ जस्टिस रंजन गोगोई, जस्टिस कुरियन जोसेफ़ और जस्टिस मदन बी लोकुर थे।

रंजन गोगोई की मौजूदगी की अहमियत इसलिए सबसे अलग मानी जा रही थी कि उनका नाम वरिष्ठता क्रम में तब अगले चीफ़ जस्टिस के तौर पर लिया जा रहा था। ऐसा लग रहा था कि उस बग़ावत की वजह से रंजन गोगोई का मुख्य न्यायाधीश बनना शायद संभव न हो।

हालाँकि बाद में गोगोई चीफ़ जस्टिस बन गए यानी न्यायपालिका के सर्वोच्च आसन पर भी बैठे और जनमानस में उस प्रेस कॉन्फ़्रेंस की स्मृति और उससे निर्मित छवि के चलते हीरो भी बने रहे।

अब तो राज्यसभा की सांसदी भी मिल गई है पूर्व सीजेआई गोगोई ने। यानी न्यायपालिका से सीधे संसद के गलियारे में प्रवेश। कहावत की भाषा में कहें तो दोनों हाथों में लड्डू।

जस्टिस रंजन गोगोई ने साल 2018 की उस ऐतिहासिक प्रेस कॉन्फ़्रेंस में भागीदारी से बटोरी तारीफ़ों में इज़ाफ़ा किया इंडियन एक्सप्रेस समूह के रामनाथ गोयनका स्मारक व्याख्यान से। एक अत्यंत प्रतिष्ठित और सत्ता के आलोचक छवि वाले मीडिया संस्थान के मंच से अपने भाषण में जस्टिस गोगोई ने तब बड़ी चतुराई से न्यायपालिका के मुखर होने और प्रेस की आज़ादी को जोड़कर देश के लिए ज़रूरी बताया था। उन्होंने कहा था कि मौजूदा दौर में कभी-कभार शोर मचानेवाले जजों और आज़ाद पत्रकारों की ज़रूरत है।

ख़ूब तालियाँ बजी थीं तब उनके भाषण पर। मीडिया की सुर्ख़ियाँ बन गई थीं उनकी बातें।

ऐसी छवि का मनोहारी तिलिस्म टूटा

लेकिन संविधान के रक्षक और एक निडर, निष्पक्ष, दबंग न्यायपालिका की साख क़ायम करने वाली उनकी इस छवि का मनोहारी तिलिस्म जल्द ही ख़ुद उनके फ़ैसलों से टूटने लगा था। अनुच्छेद 370, तीन तलाक़, रफ़ाल सौदे, सीबीआई निदेशक आलोक वर्मा के मामले और अयोध्या विवाद पर जस्टिस रंजन गोगोई की अध्यक्षता में दिए गए फ़ैसलों से सरकार को किस्त दर किस्त राहतें भी मिलीं और अपनी छवि बनाने और अपने राजनीतिक एजेंडे को मज़बूती से लागू करने की राह भी।

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ईनाम!

राज्यसभा के लिए मनोनयन को उसी के ईनाम की तरह देखा जा रहा है।

एक बार के असामान्य नायकत्व और आदर्शवाद के सार्वजनिक प्रदर्शन के बाद सामान्य आदमी के खोल में वापस जाकर निजी लाभ के लिए समझौतों के साथ जीने की कोशिश करने वालों पर समाज की स्वाभाविक प्रतिक्रिया हैरानी और नाराज़गी की होती है। विपक्ष तो आलोचना कर ही रहा है लेकिन रंजन गोगोई की ऐतिहासिक प्रेस कॉन्फ़्रेंस के दो पूर्व साथी जजों जस्टिस मदन बी लोकुर और जस्टिस कुरियन ने भी तीखी प्रतिक्रिया जताई है। बीजेपी उनके बचाव में खुलकर मैदान में है और पूर्व चीफ़ जस्टिस रंगनाथ मिश्र की राज्यसभा सदस्यता का हवाला देकर कांग्रेस पर हमलावर हो रही है।

क़ानून के दायरे में ग़लत न होते हुए भी इस मामले में अनैतिकता के पहलू को अनदेखा नहीं किया जा सकता है। बीजेपी जानबूझकर याद नहीं करना चाहती कि उसके वरिष्ठ नेता अरुण जेटली ने विपक्ष में रहते हुए 2012 में कहा था कि रिटायरमेंट के दो साल बाद ही कोई नियुक्ति होनी चाहिए वर्ना सरकार अदालतों को प्रभावित कर सकती है। जेटली ने तब जजों के बारे में अपनी तीखी व्यंग्यात्मक टिप्पणी में यह भी कहा था कि रिटायरमेंट से पहले लिए गए फ़ैसले रिटायरमेंट के बाद की नौकरी की आशा से प्रभावित होते हैं।

ख़ुद जस्टिस रंजन गोगोई ने रिटायर होने से पहले पिछले साल एक टिप्पणी में रिटायरमेंट के बाद होनेवाली नियुक्तियों को न्यायपालिका की आज़ादी पर धब्बा बताया था।

लेकिन आज वही जस्टिस रंजन गोगोई राज्यसभा सदस्यता ठुकराने की तमाम अपीलों को नज़रअंदाज़ करते हुए अपनी राज्यसभा सदस्यता के बचाव में कह रहे हैं कि न्यायपालिका और विधायिका को राष्ट्र निर्माण के लिए मिलकर काम करने की ज़रूरत है।

जस्टिस रंजन गोगोई ने कहा है कि राज्यसभा में अपनी मौजूदगी के ज़रिये वह न्यायपालिका के मुद्दों को असरदार तरीक़े से उठा सकेंगे।

कैसी विडंबना है कि सरकार को कटघरे में खड़ा करने वाले दिल्ली हाईकोर्ट के जस्टिस मुरलीधर को रातों-रात तबादले का आदेश थमा दिया जाता है और सरकार के मनभावन फ़ैसले देने वाले सुप्रीम कोर्ट के पूर्व चीफ़ जस्टिस रंजन गोगोई राज्यसभा पहुँच जाते हैं।

प्रेमचंद की कहानी पंच परमेश्वर में संवाद है- बिगाड़ के डर से ईमान की बात न कहोगे?

न्याय के आसन पर बैठे व्यक्ति में ईश्वर देखने वाले निष्पक्ष और निडर न्यायशास्त्र के बुनियादी सिद्धांत की इससे सरल प्रस्तुति नहीं हो सकती है।

विचार से ख़ास

प्रेमचंद ने उस कहानी के दो प्रमुख पात्रों अलगू चौधरी और जुम्मन शेख के ज़रिये न्याय करते समय व्यवहार में ज़रूरी तथ्यपरकता और ‘ना काहू से दोस्ती, ना काहू से बैर’ के बुनियादी न्यायिक सिद्धांत को बहुत रोचक तरीक़े से स्थापित किया है।

जुम्मन शेख का यह संवाद ग़ौर करने लायक है- आज मुझे ज्ञात हुआ कि पंच के पद पर बैठ कर न कोई किसी का दोस्त है, न दुश्मन। न्याय के सिवा उसे और कुछ नहीं सूझता। आज मुझे विश्वास हो गया कि पंच की ज़ुबान से ख़ुदा बोलता है।

सुप्रीम कोर्ट की एक कर्मचारी ने जस्टिस रंजन गोगोई पर यौन उत्पीड़न के आरोप लगाए थे। जिस तरह से उस मामले का निपटारा हुआ, उसने जस्टिस रंजन गोगोई पर बहुत गंभीर सवाल खड़े किये।

इस बदलती हुई दुनिया का ख़ुदा कोई नहीं

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न्यायपालिका की छवि को निस्संदेह तगड़ा झटका लगा है और पूर्व न्यायाधीश जस्टिस मदन बी लोकुर की यह आशंका सही साबित होती लग रही है कि लोकतंत्र का आख़िरी क़िला भी ढह गया है। आम आदमी का भरोसा डगमगाया है लेकिन विकल्प क्या है? न्याय व्यवस्था में उच्च पदों पर बैठे लोगों के लिए निजी शुचिता पर कड़ाई से अमल के सिवाय क्या रास्ता हो सकता है?

हालाँकि जैसा दौर है, उसके चलन के हिसाब से तो जस्टिस गोगोई की सद्गति के बाद प्रधानमंत्री की तारीफ करने वाले जस्टिस अरुण मिश्रा का हौसला और उम्मीदें अपने सुखद भविष्य को लेकर बढ़ गई हों तो कोई ताज्जुब नहीं होना चाहिए।

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