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पीएम मोदी, पुतिन और शी जिनपिंग

बहुध्रुवीयता : तानाशाही का नया मूलमंत्र

बहुध्रुवीयता अंतर्राष्ट्रीय संबंधों की वामपंथी समझ को दिशा देने वाला कम्पास है। भारत और वैश्विक वामपंथ की सभी धाराओं ने लम्बे समय से साम्राज्यवादी अमेरिकी वर्चस्व वाली 'एकध्रुवीय' दुनिया की अवधारणा के खिलाफ 'बहुध्रुवीय' विश्व की वकालत की है। दूसरी ओर, 'बहुध्रुवीयता' वैश्विक फासीवाद और तानाशाही की साझी भाषा का मूल आधार बन गई है। यह निरंकुश शासकों के लिए एकजुटता का ऐसा आह्वान है, जो लोकतंत्र पर उनके हमले को साम्राज्यवाद के खिलाफ जंग की शक्ल में पेश करती है।  अंतर्राष्ट्रीय संबंधों के साम्राज्यवाद-विरोधी लोकतंत्रीकरण के नाम पर बहुध्रुवीयता को वैश्विक वामपंथ के गुंजायमान समर्थन ने, निरंकुशता का भेस बदलने और उसे वैधता दिलाने के लिए 'बहुध्रुवीयता' के इस्तेमाल को असीमित शक्ति प्रदान कर दी है। 

राष्ट्र राज्यों के आतंरिक अथवा आपसी राजनैतिक टकरावों पर रुख तय करने लिए कितने आधार उपलब्ध हैं? इस प्रश्न के जवाब में वामपन्थ सिर्फ़ दो विकल्पों - या तो "बहुध्रुवीयता" या "एकध्रुवीयता" - को प्रस्तुत करती है। अगर आपने "बहुध्रुवीयता" को अपना मूल आधार नहीं बनाया तो वामपन्थ मानेगी कि आप ज़रूर अमेरिका/नाटो की दादागिरी वाले "एकध्रुवीयता" के पक्ष में हैं। पर "बहुध्रुवीयता" या "एकध्रुवीयता" के बीच यह कल्पित बाईनरी हमेशा भ्रामक थी. लेकिन आज "बहुध्रुवीयता" बनाम  "एकध्रुवीयता" के बीच संघर्ष की मनगढ़ंत कहानी भ्रामक ही नहीं, खतरनाक है क्योंकि इस कहानी में फासीवादी और तानाशाह नेताओं को "बहुध्रुवीयता" बनाए रखने वाले नायकों का पात्र दिया गया है।

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मूल्य-मुक्त/नैतिकता-मुक्त "बहुध्रुवीयता" की धारणा के प्रति वामपंथी प्रतिबद्धता की दुर्भाग्यपूर्ण परिणतियाँ, यूक्रेन पर रूसी हमले के बारे में उसकी प्रतिक्रिया के मामले में बेहद स्पष्ट नजर आई हैं। वैश्विक तथा भारतीय वामपंथ के विभिन्न धड़ों ने रूस द्वारा यूक्रेन पर हमले और क़ब्ज़े के बावजूद, रूस को अमेरिकी नेतृत्व वाले साम्राज्यवाद के लिए एक बहुध्रुवीय चुनौती बताकर पुतिन के दुष्प्रचार और फ़ासीवादी विमर्श (कम या बेशी मात्रा में) को वैधता दी है।   

फासीवादी होने की आज़ादी

30 सितम्बर को चार यूक्रेनी सूबों के अवैध कब्जे की घोषणा करते हुए रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने साफ कर दिया कि उनके विचारधारात्मक ढांचे में "बहुध्रुवीयता" और लोकतंत्र का अर्थ क्या है। उन्होंने लोकतंत्र और मानवाधिकार के सार्वभौमिक मान्यता-प्राप्त मूल्यों को पश्चिमी ताक़तों द्वारा थोपा हुआ "साम्राज्यवादी" और "एकध्रुवीय" छल बताया। यानी, उनके अनुसार लोकतंत्र और मानवाधिकार पश्चिमी कुलीनों के ‘विकृत’ मूल्य हैं; अमेरिका के नेतृत्व वाले पश्चिमी "ध्रुव" ने इन "पराए" मूल्यों को सार्वभौमिक बताकर दुनिया पर थोपा है। पुतिन के इस विमर्श में "बहुध्रुवीयता" का अर्थ है, लोकतंत्र और मानवाधिकार के मूल्यों के प्रति प्रतिबद्धता से महाशक्तियों की आज़ादी। पुतिन के अनुसार "बहुध्रुवीय" दुनिया का मतलब: ऐसी दुनिया जिसमें हर "ध्रुव" (महाशक्ति) सार्वभौम नियमों से निरंकुश होकर मनमर्ज़ी कर सकती है। इस दुनिया में जिसकी लाठी उसकी भैंस। जिसकी जितनी ताक़त, उस हद तक वह तानाशाही करने के लिए आज़ाद है. हर "ध्रुव" (महाशक्ति) देश के भीतर तानाशाही और दमन के साथ अन्य देशों पर हमले कर सकती है - और इस पर UN जैसी संस्था या कोई अन्य देश को सवाल करने या अंकुश लगाने का कोई अधिकार नहीं होगा।

अपने भाषण में पुतिन उपनिवेशवाद, साम्राज्यवाद, आक्रमण, अधिग्रहण, जनसंहार और तख्तापलट समेत पश्चिमी देशों के अपराधों की लम्बी लिस्ट रखकर इन पर दुनिया के बड़े हिस्से के पूरी तरह से उचित रोष को लोगों के सामने रखते हैं। चूँकि यह रोष उचित है, ऐसे में यह भूल जाना आसान है कि इन अपराधों को गिनाकर पूतिन इनके लिए न्याय की मांग नहीं कर रहे हैं। पश्चिम के इन अपराधों को गिनाकर पुतिन खुद ऐसे अपराधों को निरंकुश होकर करने का दावा कर रहे हैं। पुतिन कहते हैं कि इन अपराधों से जिन पश्चिमी ताक़तों के हाथ रंगे हों उन्हें “लोकतंत्र के बारे में एक भी शब्द कहने का कोई नैतिक अधिकार” नहीं है। मान लिया कि पश्चिमी ताक़तों को लोकतंत्र के बहाने दुनिया की पहरेदारी करने का अधिकार नहीं है। पर क्या यह सच नहीं कि हर देश की जनता, लोकतंत्र और मानवाधिकार की आकांक्षा रखती हैं? इन्हें साकार करने के लिए अपनी सरकारों के ख़िलाफ़ आंदोलन करती हैं?
आख़िर यह औपनिवेशिक देशों की जनता है जिसने आज़ादी के लिए लड़ाई लड़ी और लगातार लड़ रही है। साम्राज्यवादी देशों की जनता लोकतंत्र और न्याय की मांग के लिए और खुद की सरकारों द्वारा किये जाने वाले नस्लवाद, युद्धों, हमलों तथा कब्जों के खिलाफ सड़कों पर उतरी है और अब भी उतरती है। लेकिन पुतिन इस जनता का समर्थन बिलकुल नहीं कर रहे हैं। 

उलटे पुतिन ने दुनिया भर में ‘अपने जैसी’ ताकतों – चरम-दक्षिणपंथी, श्वेत श्रेष्ठतावादी, नस्लवादी, नारीवाद-विरोधी, होमोफोबिक, और ट्रांस्फोबिक राजनैतिक ताक़तों – का स्वागत करते हैं और इन्हें भी "कुलीनों द्वारा थोपे गए" लोकतंत्र और मानवाधिकार के मूल्यों के ख़िलाफ़ "आज़ादी का आंदोलन" बताते हैं।  लोकतंत्र और मानवाधिकार के सार्वभौम मूल्यों को उलटने की पुतिन की "बहुध्रुवीयता"  परियोजना, दुनिया भर के चरम-दक्षिणपंथी और तानाशाही ताक़तों के लिए लाभकारी है। और पूतिन अपने भाषण में इन सभी को एकजुट होने का आह्वान कर रहे हैं। यूक्रेन पर रूस का हमला इसी परियोजना का पहला कदम है - इसमें पुतिन को अगर किसी भी मात्रा में सफलता मिलती है, तो दुनिया के सभी लोकतंत्र-विरोधी ताक़तों का मनोबल बढ़ेगा, और इनमें लोकतंत्र के अंतर्राष्ट्रीय नियमों को उलटने की पुतिन की योजना की विश्वसनीयता स्थापित होगी।  

पुतिन रूस (और साथ में चीन, भारत इत्यादि) को “सभ्यता-राष्ट्र” कहते हैं - जिन्हें वे आधुनिक "राष्ट्र-राज्यों" से श्रेष्ठ बताते हैं क्योंकि उनके अनुसार ये प्राचीन समय से ही सभ्यता और राष्ट्र के रूप में चले आ रहे हैं।  रूस के इस श्रेष्ठतावादी संस्करण को शक्ति देने के लिए पुतिन अपने मनगढ़ंत “ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य” का प्रयोग करते हैं, जिसके अनुसार दसवीं सदी में किसी "व्लादिमीर" नाम के राजा ने उसी धरती पर ईसाई धर्म को अपनाया था, जहां आज यूक्रेन खड़ा है। पुतिन के अनुसार, यह "इतिहास" इस बात का सबूत है कि ईश्वर यूक्रेन को रूस का हिस्सा मानते हैं, और ईश्वर ने व्लादिमीर पूतिन को रूस पर राज करने के लिए चुना है, ताकि वे उस प्राचीन "व्लादिमीर" के काम को पूरा कर सकते है। 
एक साझी भाषाः ‘बहुध्रुवीयता’ और ‘साम्राज्यवाद-विरोध’ को "लोकतंत्र विरोध" के रूप में परिभाषित करने वाली भाषा की अनुगूंज चीन के बहुसंख्यकवादी और सर्वसत्तावादी निज़ाम में भी दिखाई देती है। यूक्रेन पर रूसी हमले के लगभग तीन सप्ताह पहले, 4 फरवरी 2022 को पुतिन और शी ने संयुक्त बयान जारी किया जिसमें, यह कहा गया कि हर "ध्रुव" - यानी हर निज़ाम - को अपनी संस्कृति और सभ्यता की अवधारणा के अनुसार "लोकतंत्र" को परिभाषित करने का अधिकार है। अमेरिकी और पश्चिम वाला "ध्रुव" अपनी परिभाषा को "सार्वभौम" बताकर अन्य "ध्रुवों" पर न थोपें। इस बयान में लिखा है: “कोई देश लोकतंत्र को अमल में लाने के लिए उन तौर-तरीकों का चुनाव कर सकता है जो ज्यादा अनुकूल हों उसकी परम्पराओं और ख़ास सांस्कृतिक स्वभाव के लिए केवल उस देश की जनता ही यह निर्णय कर सकती है कि उनका राज्य लोकतांत्रिक है या नहीं।
इस बयान से स्पष्ट है कि शी जिनपिंग और पुतिन दोनों की नज़र में "बहुध्रुवीयता" का मतलब है लोकतंत्र, बराबरी, मानवाधिकार के निष्पक्ष मानकों का निषेध, और इनकी जगह “बहुध्रुवीय" निज़ामों को खुली छूट कि वे "संस्कृति/परम्परा" के बहाने अपने स्वार्थ को साधने के लिए लोकतंत्र आदि के सापेक्ष मापदंड धोषित करें, और फिर खुद अपने निज़ाम को उसी के द्वारा स्वघोषित मानकों को पूरा करने का "सर्टिफ़िकेट" दें!  चीन की सरकार ने "शी जिनपिंग थॉट" (शी विचारधारा) में शी के लेखों और भाषणों को संकलित किया है। शी के शब्दों में “आज़ादी, लोकतंत्र और मानवाधिकार के ‘सार्वभौमिक मूल्य’ सोवियत यूनियन के विघटन, पूर्वी यूरोप में भीषण परिवर्तनों, ‘कलर रिवोल्यूशन’ और ‘अरब स्प्रिंग’ का कारण बने, ये सभी अमेरिका और पश्चिम के हस्तक्षेप के परिणाम थे।” शी की नज़र में कोई भी जन आन्दोलन जो व्यापक तौर पर स्वीकृत मानवाधिकारों और लोकतंत्र की मांग करता है उसे सहज रूप से नाजायज़ साम्राज्यवादी "कलर रिवोल्यूशन" के तौर पर देखा जा रहा है।  

चीनी सरकार द्वारा समर्थित सांस्कृतिक सापेक्षतावादी मानकों पर ध्यान दें तो “ज़ीरो कोविड” के नाम पर हुए दमन के खिलाफ उभरे चीन-व्यापी आंदोलन में प्रदर्शनकारियों द्वारा सार्वभौमिक मानदंडों को पूरा करने वाले लोकतंत्र की मांग काफी महत्वपूर्ण हो जाती है। “लोकतंत्र, आज़ादी और मानवाधिकार पर चीनी दृष्टिकोण” नाम का 2021 में चीन सरकार द्वारा जारी एक श्वेतपत्र, लोकतंत्र को "सुशासन" और मानवाधिकार को सरकारी कल्याणकारी योजनाओं और फायदों से मिली “खुशहाली” के तौर पर परिभाषित करता है। यह परिभाषा " मानवाधिकार" के नाम पर नागरिक को सिर्फ़ "लाभार्थी" होने का अधिकार मानती है; बेलगाम सरकारी शक्ति से व्यक्ति के अधिकारों की सुरक्षा को नहीं. लोकतंत्र को सरकार से सवाल-जवाब करने, असहमत होने, संगठित होने की आज़ादी जैसे अधिकारों को नहीं, बल्कि "सुशासन" के रूप में परिभाषित करती है।
“विशिष्ट चीनी प्रजाति के” लोकतंत्र को “सुशासन” और मानवाधिकारों को “खुशहाली” के रूप में परिभाषित करना, शी को उनकी सरकार द्वारा उइग़र मुस्लिमों के दमन को न्यायसंगत ठहराने का मौका देता है। भारत के हिन्दू श्रेष्ठतावादी नेतृत्व में भी ऐसी “बहुध्रुवीय दुनिया” के फासीवादी और सत्तावादी विमर्श की मजबूत अनुगूँजें मौजूद हैं – जिसमें सभ्यतागत शक्तियां अपने प्राचीन साम्राज्यवादी गौरव को हासिल करने के लिए पुनः उठेंगी और उदारवादी लोकतंत्र का प्रभुत्व ढलकर साम्प्रदायिक "राष्ट्रवाद" के लिए रास्ता देगा।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने प्रशंसापरक ढंग से कहा है कि अमेरिका को चुनौती देने वाली “एक बहुध्रुवीय दुनिया में…चीन का उदय हो चुका है। उसे अब इसकी फ़िक्र नहीं कि दुनिया उसके बारे में क्या सोचती है। वह अपना लक्ष्य साध रहा है... उसके प्राचीन सम्राटों के विस्तारवाद की ओर लौट रहा है।” उसी तरह भागवत कहते हैं कि “इस बहुध्रुवीय दुनिया में अब रूस अपनी बाजी खेल रहा है। पश्चिम को दबाकर वह आगे बढ़ने की कोशिश कर रहा है।”
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी कई बार भारत विरोधी बताकर मानवाधिकार कार्यकर्ताओं पर हमले किये हैं। साथ में उनकी घोषणा है कि भारत “लोकतंत्र की जननी” है. लोकतंत्र के संवैधानिक परिभाषा को “पश्चिमी” बताया जा रहा है और इसकी जगह भारतीय लोकतंत्र को उसे “सभ्यतागत चरित्र” का अंग मानकर देखने को कहा जा रहा है। सरकार द्वारा पढ़े जाने के लिए 26 नवम्बर 2022 (संविधान दिवस) को वितरित "भारत: लोकतंत्र की जननी" के नाम से एक लेख भारतीय लोकतंत्र को “हिन्दू संस्कृति और सभ्यता”, “हिन्दू राजनैतिक सिद्धांत”, “हिन्दू राज्य” तथा पारंपरिक खाप/जाति पंचायतों से जोड़ता है, जो दलितों, महिलाओं पर शोषणकारी नियमों को थोपते हैं।
ऐसे विचार अति-दक्षिणपंथी और तानाशाही ताकतों के वैश्विक गिरोह में हिन्दू श्रेष्ठतावादियों को शामिल करने की कोशिशों को भी प्रतिबिंबित करते हैं. रूसी फासीवादी विचारक अलेक्ज़ान्द्र दूगिन (जो पुतिन के 'रासपूतिन' कहलाते हैं) ने लिखा है कि “बहुध्रुवीयता [...]प्रत्येक गैर पश्चिमी सभ्यता के सभ्यतागत बुनियादों की ओर वापसी और उदारवादी लोकतंत्र तथा मानवाधिकारों की विचारधारा (के नकार) की वकालत करती है.” यह प्रभाव दोतरफा है. एक सामाजिक मॉडल के रूप में दूगिन जाति पदानुक्रम (ऊँच-नीच की व्यवस्था) का समर्थन करते हैं। 
अंतर्राष्ट्रीय फासीवाद में ब्राह्मणवादी मनुस्मृति के मूल्यों को प्रत्यक्षतः समाहित करते हुए दूगिन “मानवाधिकार, पदानुक्रम-विरोध और पोलिटिकल करेक्टनेस” के वर्चस्व वाली “मौजूदा व्यवस्था” को “कलियुग” कहते हैं. भारतीय प्रयोग में "कलियुग" एक ऐसी आफत/अनर्थ है जो अपने साथ "वर्णसंकर" (जाति का सम्मिश्रण, नस्लों का मिलावट जो औरतों की आजादी से संभव होती है) लाती है और जातिगत पदानुक्रम को सर के बल खड़ा करती है. दूगिन ने मोदी की चुनावी सफलता को “बहुध्रुवीयता” की जीत, “भारतीय मूल्यों” की स्वीकार्यता, "भारत की धार्मिक, सांस्कृतिक और भू-राजनैतिक महानता” की समझ, तथा “उदारवादी लोकतंत्र और मानवाधिकार विचारधारा” के वर्चस्व की हार के प्रतीक के रूप में देखा है.और तब भी वामपंथ “बहुध्रुवीयता” का प्रयोग कर रहा है, इसकी हलकी सी भी जागरूकता जाहिर किये बिना कि फासीवादी और तानाशाह भी अपने लक्ष्य को इसी भाषा में व्यक्त कर रहे हैं। 
वाम और दक्षिण की मिलन भूमिः यह अजीब है कि वामपंथ ने "ध्रुवीयता" की भाषा को अपना लिया. भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी मार्क्सवादी-लेनिनवादी (भाकपा माले) के महासचिव दीपंकर भट्टाचार्य के एक ताजे लेख में लिखा है कि “प्रतियोगी वैश्विक शक्तियों का आतंरिक चरित्र चाहे जो भी हो, नवउदारवादी नीतियों के परिवर्तन, सामाजिक बदलावों और राजनैतिक प्रगति के लिए प्रयासरत दुनिया भर की प्रगतिशील ताकतों और आंदोलनों के लिए एक बहुध्रुवीय दुनिया निश्चय ही अधिक लाभकारी होगी.”

दीपंकर के इस सूत्रीकरण का मतलब है कि वामपन्थ को, दुनिया में बहुध्रुवीय संतुलन बनाए रखने के लिए ऐसे गैर-पश्चिमी महाशक्तियों में निज़ामों के बचे रहने और ताक़त बनाए रखने के पक्ष में होना चाहिए, भले ही ये निज़ाम तानाशाही, चरम-दक्षिणपंथी, या फ़ासीवादी क्यों न हो. इस सूत्रीकरण के अनुसार वामपन्थ ऐसे निज़ामों के दुष्कर्मों के ख़िलाफ़ जन-आंदोलनों या बचाव में जनयुद्ध की जीत का तहेदिल से साथ नहीं दे सकते, क्योंकि इन निज़ामों की हार से कहीं दुनिया एक-ध्रुवीय न बन जाए. याद करें कि पूतिन, शी जिनपिंग, मोदी, दूगिन और मोहन भागवत जैसे नेता/विचारक “बहुध्रुवीयता” के प्रतिनिधि होने के बहाने लोकतंत्र और मानवाधिकार के मूल्यों, इन मूल्यों की चाहत रखने वाली जनता, और उनके निरंकुश निज़ामों के ख़िलाफ़ जनआंदोलनों और जन-युद्धों को अमेरिकी/पश्चिमी साज़िश बता कर अवैध और देश-विरोधी करार देते हैं. "बहुध्रुवीयता" के पक्ष में साथी दीपंकर का वामपंथी सूत्रीकरण, "बहुध्रुवीयता" की तानाशाही/फ़ासीवादी अवधारणा को ज़रा भी चुनौती नहीं देती.   बल्कि ऐसा सूत्रीकरण, ऐसे निज़ामों और विचारकों को वामपंथी वैधता का जामा पहनाता है।  

ध्रुवीयता के विमर्श को अपनाने का यूक्रेन के प्रति वामपन्थ के रवैये क्या असर है?  आज मुझे आश्चर्य होता है, जब प्रमुख वामपंथी नेता और साथी, यूक्रेन पर अपनी राय को मज़बूत करने के लिए किसिंजर जैसे साम्राज्यवादी  का सहारा लेते हैं, वामपंथी मानते हैं कि किसिंजर चूँकि अमेरिकी साम्राज्यवाद के प्रवक्ता हैं, उनके लिए रूस के साथ युद्ध चलाने के पक्ष में होना स्वाभाविक होता. पर अगर आख़िर अमेरिका के सबसे शातिर और चालाक प्रवक्ता किसिंजर तक रूस के ख़िलाफ़ यूक्रेन का पक्ष नहीं ले रहे हैं, बल्कि "समझौते" के पक्ष में हैं, तब युद्ध में यूक्रेन का पक्ष सिर्फ़ सरफिरे अदूरदर्शा लोग ही ले सकते हैं.  किसिंजर साम्राज्यवाद के प्रवक्ता हैं, सिर्फ़ अमेरिका के "हित" या "स्वार्थ" के नहीं. डॉनल्ड ट्रम्प ने भी यूक्रेन पर हमला के लिए पुतिन को "जीनियस" कहा और यह भी कहा कि पुतिन ने बड़े ही स्मार्ट तरीक़े से हमले के लिए यूक्रेन के रूसी भाषी क्षेत्रों को "आज़ाद करने" का बहाना लिया; “मैं भी ऐसा ही करता". 

पुतिन की ऐसी प्रशंसा के बाद, ट्रम्प अब "पुतिन और यूक्रेन के बीच जंग" रोकने के लिए "वार्ता" और "समझौता" की वकालत कर रहे हैं. पुतिन और साम्राज्यवाद का हर पक्षधर, लोकतंत्र का हर दुश्मन, हमलावर महाशक्ति रूस और हमले के बचाव में अपनी आज़ादी को बचाने के लिए लड़ने वाले यूक्रेन दोनों को एक ही तराज़ू पर तौलने का दिखावा पर रहे हैं.

उनका ऐसा करना समझ आता है. पर वामपन्थ क्यों खुद को किसिंजर और ट्रम्प के ख़ेमे से जोड़ना चाहता है? वामपन्थ के यूक्रेन के मामले में इस रवैये के चार उदाहरण प्रस्तुत हैं: 1) नोम चॉम्स्की ने यूक्रेन पर "समझौते" की बात करने के लिए ट्रम्प को दुनिया का एकमात्र "राजनेता" बताते हुए तारीफ़ की. इसी बात पर ट्रम्प की वाहवाही, दुनिया के कई चरम दक्षिणपंथी तानाशाह भी कर रहे हैं.  2) बहुध्रुवीयता पर वैश्विक वामपंथ के प्रमुख समर्थकों और हिमायतियों में से एक, विजय प्रसाद सहमतिपरक ढंग से पाते हैं कि “रूस और चीन संप्रभुता चाहते हैं, न कि विश्व शक्ति बनना.” वो ये नहीं बताते कि किस तरह ये शक्तियां संप्रभुता को लोकतंत्र, मानवाधिकार और समानता के आम-समझदारी वाले मानकों के प्रति जवाबदेही से आज़ादी के रूप में व्याख्यायित करती हैं. 

प्रसाद ने यूक्रेन पर रूसी हमले के शुरुआती महीनों में ट्वीट किया था कि जिस तरह से रूस की बर्फीली सर्दी ने नेपोलीयन और हिटलर द्वारा रूस पर हमले को पराजित किया, इस बार भी वही बर्फ़ और सर्दी NATO द्वारा रूस पर हमले को पराजित करेगा. पर सच्चाई तो ये है, कि यूक्रेन (जो NATO का हिस्सा नहीं है) पर रूस ने हमला किया, NATO और यूक्रेन ने रूस पर हमला नहीं किया! अब, जबकि यूक्रेन के पराजय की आस में मज़ा लेने वाले विजय प्रसाद ना-उम्मीद हुए हैं, वे "शांति" के पक्ष में बोल रहे हैं, जो कि "समझौते" से ही हो सकता है. पर यह सच नहीं है. युद्ध उसी दिन रुक जाएगा जब रूस हमले और क़ब्ज़े की कोशिश बंद करेगा और यूक्रेन के ज़मीन से अपनी सेना को वापस बुला लेगा. 

इसी तरह विजय प्रसाद ने कुछ महीनों पहले कहा कि अमेरिका जैसे साम्राज्यवादी देशों को “लोकतंत्र शब्द का (रूस, चीन आदि के संदर्भ में) इस्तेमाल करने का ज़रा भी नैतिक अधिकार नहीं है.”यह बिलकुल सही है कि अमेरिका और उसके सहयोगी साम्राज्यवादी देशों को किसी अन्य देश को "लोकतंत्र" का पाठ पढ़ाने का अधिकार नहीं है; पर सवाल प्रसाद से यह है कि आख़िर आप और हम जैसे वामपंथियों को रूस, चीन, ईरान आदि के निज़ामों द्वारा लोकतंत्र पर हमले को लेकर सवाल उठाने का अधिकार है क्या ? तब आप रूसी साम्राज्यवादी युद्ध, रूस और चीन द्वारा लोकतंत्र और मानवाधिकार पर हमले पर क्यों नहीं बोलते हैं?

        

3) माकपा के पत्रिका पीपल्ज़ डिमॉक्रेसी में यूक्रेन पर ज़्यादातर लेख, जिसमें विजय प्रसाद का भी एक लेख शामिल है, यही कहते हैं कि भले ही रूस ने यूक्रेन पर हमला अंतर्राष्ट्रीय क़ानूनों का उल्लंघन है, पर यह टकराव, अमेरिका/NATO द्वारा यूक्रेन के बहाने रूस के नेतृत्व में उभरते "यूरेशिया" पर हमला है. पर माकपा महासचिव सीताराम येचुरी का लेख बाक़ी लेखों से काफ़ी अलग है. उन्होंने लेख के शीर्षक में ही रूस के हमले को "आक्रमण" कहा है. इसके साथ उन्होंने पूतिन द्वारा यूक्रेन पर अपने "ऐतिहासिक" अधिकार जताने और उसके राष्ट्र होने को ही नकारने की कोशिश का विस्तार से विरोध किया है. पर इस सब के बावजूद, ये भी NATO की भूमिका पर ज़ोर देते हुए, न सिर्फ़ "वार्ता" के ज़रिए युद्ध के अंत की माँग करते हैं, बल्कि रूस और यूक्रेन के अलावा, अमेरिका और NATO को भी वार्ता में शामिल करने की माँग करते हैं. पर अमेरिका और NATO को वार्ता में शामिल करने की माँग करना, अपने आप में यूक्रेन की संप्रभुता को कमज़ोर करता है. रूस द्वारा ईसाई संप्रदायिकता के नाम पर यूक्रेन के राष्ट्र के रूप में अस्तित्व को ख़त्म करने की कोशिश में हमले को कुछ हद तक रूस और अमेरिका/NATO में टकराव बताकर सच्चाई और न्याय को धूमिल करता है.    

4) भाकपा माले महासचिव साथी दीपंकर ने उपरोक्त लेख में पूतिन द्वारा हमले की निंदा की है, यूक्रेन की आज़ादी और संप्रभुता के बचने की आशा करते हैं, मानते हैं कि NATO रूस द्वारा हमले का कारण नहीं है. पर इसके बाद वे कहते हैं कि "यह तो निर्विवाद तथ्य है कि जहां युक्रेन और रूस, दोनों इस युद्ध में अपना खून बहा रहे हैं और दुनिया के बड़े हिस्से को इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ रही है, वहीं युद्ध में सीधी भागीदारी के बगैर ही अमेरिका सबसे ज्यादा फायदा बटोर रहा है.” पर जैसा कि यूक्रेन के एक वामपंथी पत्रकार मित्र ने मुझसे कहा, “पर यह तो झूठ है कि यूक्रेन और रूस दोनों खून बहा रहे हैं! रूस आक्रमण करके यूक्रेन के सैनिकों का ही नहीं, उसके असैनिक लोगों का भी खून बहा रहा है. 

रूस के सैनिकों का खून उस दिन बहना बंद हो जाएगा जब वह अपना आक्रमण बंद कर लें और यूक्रेन के जितने ज़मीन पर उसने क़ब्ज़ा किया है, उसे आज़ाद कर दें! यूक्रेन के लोग तो अपनी राष्ट्रीय पहचान और आज़ादी को बचाने के लिए और रूस द्वारा जनसंहार से बचने के लिए लड़ते हुए अपनी शहादत दे रहे हैं. आपके न्यायपसंद, वामपंथी साथी इस तरह दोनों की ऐसी तुलना कैसे कर रहे हैं? अमेरिका को फ़ायदा मिल ही सकता है; पर घुटना न टेक कर यूक्रेन को ज़िंदा रहने का "फ़ायदा" मिल रहा है, जिसके लिए वह हक़ से अमेरिकाऔर NATO और पूरी दुनिया से सैन्य मदद माँग रहा है।

"राष्ट्रीय प्राथमिकता" और अंतर्राष्ट्रीय एकजुटता में अंतरविरोध खड़ा करना कितना जायज़ है?   साथी दीपंकर उपरोक्त लेख में कहते हैं कि भारतीय वामपन्थ को सतर्क रहना चाहिए, ताकि यूक्रेन के साथ उसकी अंतर्राष्ट्रीय एकजुटता, भारत में फासीवाद से लड़ने की उसकी राष्ट्रीय प्राथमिकता को गुमराह न कर दें.   लेकिन भारत में फासीवाद से लड़ाई एक फासीवादी हमले के खिलाफ यूक्रेन के साथ दृढ़ एकजुटता से असंगत कैसे है? . ". बर्तोल्त ब्रेख्त ने लिखा था, "उत्पीड़ित का उत्पीड़ित के लिए साझीदारी अपरिहार्य है: यह दुनिया की एक मात्र आशा का किरण है.” भारत के उत्पीड़ित, चीन या यूक्रेन या ईरान या फ़िलिस्तीन के उत्पीडितों के साथ अपनी साझीदारी को "अपने राष्ट्रीय हित" या "बहुध्रुवीयता"  के गणित के हिसाब से नाप-तौल कर, कंजूसी करके देंगे, तो दुनिया के इस आशा के किरण की लौ के बुझने का ख़तरा पैदा करते हैं.  

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मार्टिन लूथर किंग जूनियर के शब्दों में “अन्याय कहीं भी हो हर जगह न्याय के लिए एक खतरा है.” इसी उसूल पर क़ायम होते हुए, किंग ने वियतनाम युद्ध का विरोध किया, जबकि उनके सभी सलाहकारों ने उनसे कहा था कि इस आलोकप्रिय और विवादाग्रस्त पज़िशन को लेना, अफ़्रिकाइ अमेरिकन लोगों के लिए न्याय की उनकी लड़ाई की "राष्ट्रीय प्राथमिकता" को कमजोर करेगी. हम दूसरों के संघर्षों को देखने के लिए एक विकृत खेमेबंदी वाले चश्मे को चुनते हैं, तो हम अपने ही लोकतांत्रिक संघर्षों को कमजोर करते हैं. अंतर्राष्ट्रीय जगत में हमें एकध्रुवीयता और बहुध्रुवीयता - इन दो विकल्पों में से किसी एक को चुनना है, यह एक ग़लत अवधारणा है. हर हालत में, हमारे सामने विकल्प स्पष्ट हैं: या तो हम उत्पीड़ितों के संघर्ष और अस्तित्व का समर्थन कर सकते हैं – या फिर हम (बहुध्रुवीयता के अमूर्त और भ्रामक लक्ष्य के बहाने) उत्पीड़क के अस्तित्व और सत्ता के बने रहने की चिंता कर सकते हैं. देश में और देश से बाहर, हमें उत्पीड़ित लोगों का न्याय और लोकतंत्र के लिए संघर्ष का पक्ष चुनना है; और इस संघर्ष के हर पहलू पर उत्पीडितों के स्वतंत्र निर्णयों  का पक्ष चुनना - इसमें किसी दुविधा के लिए जगह नहीं है.     

 जब दुनिया या भारत के वामपंथ का कोई भी महतपूर्ण धारा, ‘बहुध्रुवीय दुनिया’ के नाम पर रूस, चीन, भारत, ईरान आदि के समर्थन को अपना फ़र्ज़ मान लेता है, तब इन निज़ामों द्वारा किये जा रहे जनसंहार से खुद को बचाने के लिए लड़ रहे लोगों को समर्थन देने के अपने वास्तविक फ़र्ज़ में वह चूक जाता है. ऐसे संघर्षों की माल एवं सैन्य सहायता से अमेरिका को होने वाले किसी भी फायदे की तुलना में संघर्ष कर रहे लोगों को मिलने वाले लाभ में चुनाव सिर्फ़ जनसंहार का मुक़ाबला करने वाले वे लोग ही कर सकते हैं. हमें याद रखना चाहिए कि द्वितीय विश्वयुद्ध में नाज़ी जर्मनी को हराने में सोवियत संघ ने हक़ से अमेरिका (और उपनिवेशवादी ब्रिटेन) से  सहायता माँगी थी, इस सहायता ने उस जीत में काफ़ी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी, पर सोवियत संघ ने जितनी सहायता की उम्मीद की थी, उससे कम ही मिली थी कुछ ऐसी ही माँगे और शिकायतें यूक्रेन आज कर रहा है. पूतिन ने अन्य तानाशाही और चरम-दक्षिणपंथी/फ़ासीवादी ताक़तों के साथ मिलकर दुनिया से लोकतंत्र को जड़ से उखाड़ फेंकने के अपने लक्ष्य की घोषणा की है, और इसे अनसुना करना या मज़ाक़ में उड़ाना बहुत ही बड़ी भूल होगी. पूतिन दुनिया के चरम-दक्षिणपंथी और साम्प्रदायिक तानाशाहों में से सबसे अमीर हैं, और इस अपार धन से वे समान-विचारधारा वालों को फंड कर रहे हैं. उनके इस ख़तरनाक अजेंडा और दुनिया के बीच, यूक्रेन के लोगों की बहादुर लड़ाई ही खड़ी है. उसके समर्थन में दुविधा या कंजूसी की कोई जगह कैसे हो सकती है?    

 निरंकुश व्यवस्थाएं उनसे संघर्ष कर रहे लोगों को दुनिया भर में मिलने वाले समर्थन को अपनी संप्रभुता में विदेशी या साम्राज्यवादी ‘हस्तक्षेप’ के रूप में देखती हैं. जब हम वामपंथी लोग भी यही करते हैं तो हम उन निरंकुशों के सहायक और समर्थक की भूमिका निभाते हैं. जिंदगी और मौत से जूझ रहे लोग हमसे चाहते हैं कि वे कैसी नैतिक/माल/सैन्य सहायता को मांगें/स्वीकारें/नकारें यह तय करने की उनकी स्वायत्तता और संप्रभुता का हम सम्मान करें. वैश्विक और भारतीय वामपंथ के नैतिक कम्पास के बिगड़ने से वह अपनी राह से भटक कर निरंकुशों की भाषा का प्रयोग करने वाले विध्वंसक रास्ते पर पहुँच गया है - इस नैतिक कम्पास को रीसेट करके सुधारने में कोई देर नहीं होनी चाहिए.  

(यह लेख India Forum में छपे अंग्रेज़ी लेख के हिंदी अनुवाद का संपादित अंश है)(अनुवाद - कविता नंदन सूर्य)

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क़मर वहीद नक़वी
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