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ज्योतिबा फुले: जीवन भर दी ब्राह्मणवाद को चुनौती

महामना ज्योतिबा फुले (11 अप्रैल, 1827- 28 नवंबर, 1890) हिन्दू धर्म के पाखंडवाद के आलोचक और शूद्रों-अतिशूद्रों-स्त्रियों को आधुनिक शिक्षा देने वाले पहले शिक्षक माने जाते हैं। उनके लेखन और संघर्ष से प्रभावित बाबा साहब डॉ. आंबेडकर ने बुद्ध और कबीर के बाद ज्योतिबा फुले को अपना तीसरा गुरू माना है। हिन्दू धर्म में ईश्वरवाद और वर्णवाद की तीखी आलोचना करते हुए ज्योतिबा फुले ने शूद्रों की गुलामी के इतिहास की बारीक विवेचना की है। इस लिहाज से ज्योतिबा फुले आधुनिक भारत के पहले शूद्र इतिहासकार हैं। 

ब्राह्मणों और औपनिवेशिक इतिहासकारों द्वारा लिखित इतिहास को महामना ज्योतिबा फुले ने खारिज कर दिया। उनका आरोप है कि इस इतिहास में शूद्रों-अतिशूद्रों के शोषण को दर्ज नहीं किया गया।

इतिहास को बताया अधूरा

मुख्यतः गुलामगिरी (1873), किसान का कोड़ा (1883) और अछूतों की कैफियत (1885) किताबों में ज्योतिबा फुले की इतिहास दृष्टि और लेखन को देखा जा सकता है। उन्होंने शूद्रों-अतिशूद्रों की गुलामी, ब्राह्मणों के पाखंडवाद, मुसलिम शासन और औपनिवेशिक व्यवस्था का विश्लेषण किया है। वे पूर्व लिखित इतिहास को एकांगी और आधा-अधूरा मानते हैं। जिस इतिहास में एक बड़े समाज की आवाज़ और उसका दर्द ना हो, वह मुकम्मल इतिहास नहीं हो सकता।

'अछूतों की कैफियत' में उन्होंने व्यंग्यात्मक ढंग से लिखा है, "बड़े-बड़े लोगों ने, विद्वानों ने हिन्दुस्तान का इतिहास लिखा है, उसमें उन्होंने हमारे पुराने विवरण की अधूरी हकीकत लिखी है।" यह सिर्फ विदेशी आक्रमणकारियों का इतिहास है। इसमें भारत के मूल निवासियों की आवाज़ नहीं है। इसके उलट, इस इतिहास में शूद्रों पर होने वाले अन्याय और अत्याचार को न्यायसम्मत ठहराया गया है।

आज के बहुजन विमर्श का आधार 'मूल निवासी' अवधारणा है। ऐतिहासिक दृष्टिकोण से शूद्रों-अतिशूद्रों की मूल निवासी पहचान को सबसे पहले ज्योतिबा फुले ने स्थापित किया। उन्होंने लिखा, “हम लोग यहाँ के मूल निवासी (आदिवासी) हैं, यह बात इतिहाससिद्ध है।"

आर्य और मूल निवासी 

ज्योतिबा फुले ने मूल निवासी शूद्रों-अतिशूद्रों के दमन और पराधीनता के इतिहास का विश्लेषण किया। उनके अनुसार, विदेशी आर्यों ने आक्रमण करके मूल निवासियों को अपने अधीन बनाया। दरअसल, मूल निवासी सहिष्णु और सरल थे। लड़ाई में कमजोर होने के कारण वे आर्यों का प्रतिरोध नहीं कर सके। आर्यों ने मूल निवासियों को पराजित किया। इसके बाद उन्होंने सांस्कृतिक वर्चस्व कायम करके मूल निवासियों को पूरी तरह से अपने अधीन बना लिया। शूद्रों-अतिशूद्रों को शिक्षा और सैन्य सेवा से बिल्कुल दूर रखा गया। खेती-किसानी और दस्तकारी के काम को हीन बना दिया गया। वर्ण व्यवस्था में शूद्रों-अतिशूद्रों को सबसे निम्न दर्जा दिया गया। ब्राह्मणों ने शूद्रों को सैकड़ों जातियों में विभाजित किया।

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'किसान का कोड़ा' किताब 

'किसान का कोड़ा' किताब में जातियों के विभाजन का समाजशास्त्र समझाते हुए ज्योतिबा फुले लिखते हैं, "आज के किसानों में तीन प्रकार के किसान दिखाई देते हैं- केवल किसान या कुनबी, माली और धनगर। अब यह तीन प्रकार होने के कारणों को खोजने से पता चलता है कि प्रारंभ में जो लोग कृषि पर अपना जीविका चलाते रहे थे, वे कुलवाड़ी या कुनबी हुए। जो लोग अपना कृषि काम संभाल करके बागबानी करने लगे वे माली हुए और जो लोग दोनों प्रकार के काम करके भेड़-बकरियों के झुंड पालने लगे, वे धनगर (गड़रिया) हो गए। इस तरह...अब तीन अलग-अलग जाति मानी जाती हैं। इनमें आज आपस में बेटी-व्यवहार नहीं होता। लेकिन पहले रोटी-व्यवहार होता था। इससे सिद्ध होता है कि ये (कुनबी, माली और धनगर) पहले एक ही शूद्र किसान जाति के होने चाहिए।" वास्तव में संगठित प्रतिरोध के डर से ब्राह्मणों ने शूद्रों को अनेक जातियों में विभाजित किया। 
कालांतर में विदेशी आर्य हिन्दू कहलाए। वर्ण और जाति आधारित भेदभावपरक ब्राह्मणवादी व्यवस्था हिन्दू धर्म की स्थाई विशेषता बनी रही। इस व्यवस्था में शूद्रों और अतिशूद्रों का निरंतर शोषण होता रहा।

हिन्दू धर्म की वर्ण व्यवस्था 

ज्योतिबा फुले ने हिन्दू धर्म की वर्ण व्यवस्था और ब्राह्मणवाद की चक्की में पिसते शूद्रों-अतिशूद्रों के इतिहास को दर्ज करते हुए 'अछूतों की कैफियत' में लिखा है, "क्या थी हमारी हालत! एक तरह से हम लोग पशु ही थे। हम लोगों को गांव के अंदर रहने की इजाजत नहीं थी। इसका मतलब, अपने राज्य कर्ताओं की दृष्टि में हम नीच और जानवरों के समान थे, क्या यह सिद्ध नहीं होता? क्या काम करने के बाद जानवरों को पेट भर खाना नहीं मिलता? तब क्या हमारा स्थान पशु से भी नीचे स्तर का था? मर-मरकर काम करना और अंत में रूखी-सूखी रोटी पर पेट भरने लायक पैसे या अनाज मिलना और चिथड़ा पहनकर अपना निर्वाह करना - क्या है हालत! जानवर हम लोगों से अच्छे! हमको तो इतना नीच समझा जाता है कि- हमारी छाँह भी ब्राह्मणों को छू जाए तो वह अपने आपको अपवित्र मानते हैं। उन्होंने हम लोगों से बचने के लिए हम लोगों को काला धागा बांधने का नियम बनाया। ब्राह्मणों पर हमारी छाँह न पड़े, इसलिए हम लोगों को रास्ते से चलते समय उनको देखकर उनके वहां से गुजर जाने तक नीचे बैठ जाना पड़ता था। इससे सिद्ध होता है कि हमारा स्थान जानवरों से भी गया-गुजरा था।" 

शूद्र-अतिशूद्र क्या हिन्दू हैं? 

आगे वे शूद्रों-अतिशूद्रों को हिन्दू मानने के विचार को खारिज करते हुए लिखते हैं, "हम लोग हिंदुस्तान में पैदा हुए हैं, इसलिए हम लोगों को हिंदू की संज्ञा दी गई और हम लोग हिंदू धर्म के अनुसार बर्ताव करते हैं। यह भी सभी को जानना ही चाहिए और सच, उसके अनुसार हम लोग अपना बर्ताव करते भी हैं, लेकिन हम लोगों को अन्य हिंदुओं के साथ किसी भी प्रकार के संबंध स्थापित करने की इजाजत नहीं है। और धर्म के संबंध में हम लोग किसी एक जगह इकट्ठे हो भी नहीं सकते। मतलब, हम लोगों को अन्य हिंदुओं जैसे कोई अधिकार प्राप्त नहीं है। फिर हम कैसे हिंदू हो सकते हैं?" 

देखिए, दलित राजनीति पर चर्चा- 

दक्षिणपंथी विचारकों का प्रयास

आज दक्षिणपंथी विचारक इतिहास के पुनर्लेखन पर जोर दे रहे हैं। उनका कहना है कि मार्क्सवादी और राष्ट्रवादी इतिहास लेखन एकांगी है। दरअसल, दक्षिणपंथी विचारक ब्राह्मणवादी अन्याय और शोषण को इतिहास के पन्नों से मिटाना चाहते हैं। वी. डी.सावरकर से लेकर वर्तमान आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत बार-बार आर्यों के विदेशी होने से इनकार करते हैं। वे वर्ण व्यवस्था को उचित ठहराते हैं और शूद्रों-अतिशूद्रों पर अत्याचार को भी मार्क्सवादी इतिहासकारों का प्रपंच कहते हैं। 

दक्षिणपंथी विचारक पुराणों से लेकर मनुस्मृति और अन्य स्मृतियों में लिखित सामाजिक व्यवस्था और कानून का बचाव करते हुए शूद्रों-अतिशूद्रों की दुर्दशा का कारण मध्यकालीन मुसलिम राज्य को बताते हैं। जबकि ज्योतिबा फुले ने बहुत वस्तुनिष्ठ ढंग से दक्षिणपंथी विचारकों के इस छद्म का पर्दाफाश किया है। उनका कहना है कि शूद्रों-अतिशूद्रों पर ब्राह्मणवादी अत्याचार अनवरत जारी रहे। 

वे यह भी दर्ज करते हैं कि मध्यकाल में मुसलिम शासकों ने भी उनकी पराधीनता को मिटाने में कोई खास रूचि नहीं दिखाई। इसका कारण भी ब्राह्मण हैं। वर्ण व्यवस्था के संचालक ब्राह्मण मुसलिम शासन सत्ता में शामिल हो गए थे। इसलिए मुसलिम शासकों ने अपने राजकीय कर्मचारियों के ख़िलाफ़ कोई कदम नहीं उठाया। उन्होंने शूद्रों-अछूतों की दुर्दशा पर सिर्फ अफसोस किया। 

मुसलिमों को तो हमारी पीड़ा और कठिनाइयों के बारे में कोई ज्ञान था ही नहीं। वे कभी कभार अपने दीवानजी से ' हिन्दू धर्म बड़ा बुरा है। देखिए दीवानजी, उन लोगों में कैसे जात बनायेले है, ओ चाहये सो फत्तरकु पुजते, और उनों में कैसी दिवानों के माफक जिस जात का काम उस जात से करवाते।'


ज्योतिबा फुले

ज्योतिबा फुले कहते हैं कि मुसलिम शासकों की दिलचस्पी अपना राज कायम करने में थी। इसलिए उन्होंने हिन्दुओं की सामाजिक व्यवस्था में कोई हस्तक्षेप नहीं किया। 

ज्योतिबा फुले के शब्दों में, "मुसलिम लोगों की राजनीति हिन्दुओं की राजनीति से एकदम अलग थी। हिन्दू राजनीति में हाथ डालना मुसलिमों को बहुत ही भयंकर लगा और उन्होंने ब्राह्मणों को अपने शास्त्रों के नियमों और रिवाज के अनुसार आचरण करने की इजाजत दे दी।" क्या दक्षिणपंथी हिन्दुत्ववादी विचारक इस सच को स्वीकार करेंगे?

दक्षिणपंथी इतिहास लेखन अंग्रेजों के विभाजनकारी इतिहास लेखन पर ही आधारित है। अंग्रेजों ने भारत में साम्राज्य स्थापित करने के लिए भारत की हिन्दू-मुसलिम सामूहिक ताकत को धर्म के आधार पर विभाजित किया।

जे. एस. मिल ने भारत के इतिहास को हिन्दू काल, मुसलिम काल और आधुनिक काल में विभाजित किया। दरअसल, अंग्रेजों ने मुसलमानों को विदेशी आक्रमणकारी साबित करते हुए कहा कि हिन्दुओं को मुसलमानों ने गुलाम बनाया। विलियम जोंस, गोबेन्यू और मैक्समूलर जैसे यूरोपीय विद्वानों ने 'आर्य भाषा थ्योरी' के आधार पर उच्च वर्णी भारतीयों और यूरोपीय लोगों के बीच खून का रिश्ता स्थापित कर दिया। इस थ्योरी का ही असर था कि नवजागरण कालीन प्रसिद्ध समाज सुधारक केशव चन्द्र सेन ने अंग्रेजों के प्रति आत्मीयता दिखाते हुए, यहाँ तक कहा कि 'अंग्रेज हमारे बिछुड़े हुए भाई हैं।' अंग्रेजी पढ़े-लिखे कुछ अभिजात पुरुषों ने अंग्रेजों से अधिक गहरा रिश्ता कायम करने के लिए हिन्दू धर्म छोड़कर ईसाई धर्म अपनाया। माइकल मधुसूदन दत्त इसका सटीक उदाहरण हैं। 

Jyotirao Govindrao Phule a social reformer   - Satya Hindi

मुख्तसर, अंग्रेजों की विभाजनकारी राजनीति में इतिहास की बड़ी भूमिका है। आज के दक्षिणपंथी विचारक और इतिहासकार मुसलमानों को शूद्रों-अतिशूद्रों का दुश्मन साबित कर रहे हैं। खासकर दलितों और स्त्रियों की हीन सामाजिक स्थिति के लिए मध्यकालीन मुसलिम शासन को उत्तरदायी बताया जा रहा है। 

मसलन, अस्पृश्यता और मैला ढोने की प्रथा को सल्तनत और मुगल कालीन सिद्ध किया जा रहा है। जबकि ज्योतिबा फुले ने बहुत पहले ही इस सच को नंगा कर दिया था। 

ब्राह्मणवादी षडयंत्र का पर्दाफाश 

फुले ने 'अछूतों की कैफियत' में ब्राह्मणवादी षडयंत्र का पर्दाफाश करते हुए लिखा था, "हम ईश्वरी क्रोध से (ब्राह्मणों के अनुसार) जिस जाति में पैदा हुए उन सभी को किस प्रकार के नीच काम दिए होंगे, इसकी कल्पना करने में हमको बहुत देर नहीं लगनी चाहिए। जितने भी गंदे और बुरे काम हैं, वे सभी हमारे हिस्से में आ गए। कहा गया हम लोगों को शूद्रों के काम में कुछ सहायता करनी चाहिए। हमें गाँव मुहल्लों की गलियाँ, पाखाने और लोगों के बरामदे, सायबान आदि बुहार करके साफ रखना चाहिए।" यह स्थिति अनवरत जारी रही। 

पेशवा काल 

पेशवाओं के काल में शूद्रों-अछूतों का जीवन और भी जटिल हो गया। अंग्रेजों के आने के बाद इस स्थिति में जरूर बदलाव हुआ। लेकिन शूद्र-अछूत आधुनिक शिक्षा से अब भी बेदखल थे। 'गुलामगिरी' में ज्योतिबा फुले लिखते हैं, "इस देश में अंग्रेज सरकार आने की वजह से शूद्रादि-अतिशूद्रों की जिंदगी में एक नई रोशनी आई। ये लोग ब्राह्मणों की गुलामी से मुक्त हुए, यह कहने में किसी प्रकार का संकोच नहीं है। फिर भी हमको यह कहने में बड़ा दर्द होता है कि अभी भी हमारी इस दयालु सरकार के शूद्रादि-अतिशूद्रों को शिक्षित बनाने की दिशा में, गैर-जिम्मेदारीपूर्ण रवैया अख्तियार करने की वजह से ये लोग अनपढ़ के अनपढ़ ही रहे।" 

मार्क्सवादी और राष्ट्रवादी इतिहासकारों ने सम्राट अशोक और मुगल बादशाह अकबर को महान सिद्ध किया है। जबकि दक्षिणपंथी इतिहासकार और हिन्दुत्ववादी विचारक मध्यकाल को मुसलमानों के आतंक का पर्याय मानते हैं।

इतिहास बिगाड़ने की साज़िश!

उनकी नजर में मुहम्मद बिन कासिम, महमूद गजनबी, अलाउद्दीन खिलजी से लेकर बाबर और औरंगजेब सभी 'जिहादी' मुसलिम हैं। उन्होंने हिन्दू धर्म और उनके अनुयाइयों को अपमानित किया है। हिन्दुत्ववादी अकबर को विधर्मी शासक और राणा प्रताप को महान देशभक्त कहते हैं। यह इतिहास को विकृत करके धार्मिक रंग देने की साजिश है। 

यह सर्वविदित है कि राणा प्रताप 'भारत भूमि' के लिए नहीं बल्कि अपने राज्य के लिए संघर्ष कर रहे थे। भारतीय इतिहास में राणा प्रताप की महत्ता यह है कि उन्होंने दूसरे राजपूत राजाओं की तरह अकबर के सामने समर्पण नहीं किया। अकबर और राणा प्रताप के बीच दुश्मनी का कारण हिन्दू-मुसलिम नहीं था। इसके पीछे कोई राष्ट्रीय भावना भी नहीं थी। अगर ऐसा माना जाए तो अकबर के सहयोगी तमाम राजपूत राजाओं और राजकार्य में लगे बीरबल जैसे ब्राह्मणों को देशद्रोही और गद्दार घोषित करना पड़ेगा। 

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दरअसल, यह इतिहास की दृष्टि अतार्किक और दुराग्रही है। आज मराठा शासक वीर शिवाजी को हिन्दुत्व के प्रतीक के रूप में दिखाया जाता है। मुगल बादशाह औरंगजेब से जूझने और अपना स्वतंत्र राज स्थापित करने वाले शिवाजी का राजतिलक मराठी ब्राह्मणों ने करने से इनकार कर दिया था। इसके बाद बनारस से गंगा भट्ट नामक ब्राह्मण को बहुत सारा धन देकर बुलाया गया। उसने अपने बाएं पैर के अंगूठे से शिवाजी का राजतिलक किया। इसका कारण शिवाजी का निचली जाति से होना है। 
कुर्मी जाति के शिवाजी को पेशवाई दौर में भुला दिया गया। उनके इतिहास को गायब करने की कोशिश की गई। लेकिन ज्योतिबा फुले ने शिवाजी की समाधि को खोजा और उनकी जयंती मनाने की शुरुआत की। इसकी प्रतिक्रिया में ही बालगंगाधर तिलक ने गणेश उत्सव और शिवाजी उत्सव शुरू किए तथा इनका राजनीतिक इस्तेमाल किया।

शिवाजी के 'हिन्दू धर्म रक्षक' होने का सच यह है कि उन्हें ब्राह्मणों ने क्षत्रिय का दर्जा नहीं दिया। इसलिए शिवाजी को अपनी सेना गठित करने में बहुत कठिनाई हुई। एक कुर्मी राजा की सेना में क्षत्रिय क्योंकर शामिल हो सकते हैं! तब शिवाजी ने अपनी सेना में मुसलमानों को भर्ती किया। उनके तोपखाने का मुखिया इब्राहिम खान और गुप्तचर मामलों का सचिव मौलाना हैदर अली था। शिवाजी की माँ जीजाबाई ने मजबूत कदकाठी के महारों को सेना में भर्ती किया। शिवाजी की जीत में इन सैनिकों की भी अहम भूमिका थी। 

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महार रेजीमेंट 

विदित है कि आगे चलकर अंग्रेजों ने भी एक महार रेजीमेंट बनाई थी। अंग्रेजों ने पाँच सौ महार सैनिकों का मोर्चा बनाकर पेशवाओं को पराजित किया था।1 जनवरी 1818 की यह घटना भीमा कोरे गाँव की लड़ाई के रूप में विख्यात है। इस लड़ाई में शहीद हुए महार सैनिकों की स्मृति में अंग्रेजों ने एक स्मारक बनाया था। दलितों के स्वाभिमान के प्रतीक इस स्मारक पर प्रति वर्ष एक बड़ा उत्सव होता है।

शिवाजी को हिन्दुत्व का प्रतीक मानने वाले शायद नहीं जानते कि हिन्दुत्व के संस्थापक विचारक वी. डी. सावरकर शिवाजी की आलोचना करते थे।

शिवाजी का राजनीतिक इस्तेमाल!

दरअसल, शिवाजी ने पराजित मुगल सैनिकों की बंधक बनाकर लाई गईं पत्नियों को ससम्मान वापस भेज दिया था। सावरकर का कहना था कि इन औरतों को यौन दासियाँ बनाकर रखना चाहिए था। आरएसएस और हिन्दुत्ववादी विचारक शिवाजी जैसे निचली जाति के नायकों को हिन्दू धर्म रक्षक के तौर पर इसलिए पेश करते हैं ताकि दलित और पिछड़े समाज को अपना मोहरा बनाकर मुसलमानों के ख़िलाफ़ इस्तेमाल करके सत्ता प्राप्त की जा सके। जबकि ज्योतिबा फुले ने शिवाजी को एक शूद्र शासक के रूप में रेखांकित किया है। हालांकि वे यह भी कहते हैं कि शिवाजी के राज में भी शूद्रों-अछूतों की मुक्ति नहीं हुई क्योंकि उनके राजकाज में भी ब्राह्मण शामिल थे।

भारत में सबाल्टर्न इतिहास लेखन की शुरुआत बीसवीं शताब्दी के आठवें दशक में होती है। लेकिन ज्योतिबा फुले को पढ़ते हुए ऐसा लगता है कि उनके यहाँ यह दृष्टि मौजूद है। यह दृष्टि स्वानुभूति से उपजी है। ज्योतिबा फुले का लेखन अकादमिक नहीं है। लेकिन गुलामगिरी की प्रस्तावना में ज्योतिबा फुले ने दुनिया भर में फैली दासता और उसके दर्द का बहुत सघन विश्लेषण किया है।

वह लिखते हैं, "दक्षिण अमेरिका और अफ्रीका जैसे पृथ्वी के इन दो बड़े हिस्सों में सैकड़ों साल से अन्य देशों से लोगों को पकड़-पकड़कर यहां उन्हें गुलाम बनाया जाता था। यह दासों को खरीदने-बेचने की प्रथा यूरोप और तमाम प्रगतिशील कहलाने वाले राष्ट्रों के लिए बड़ी लज्जा की बात थी। उस कलंक को दूर करने के लिए अंग्रेज, अमेरिकी आदि उदार लोगों ने बड़ी-बड़ी लड़ाइयां लड़कर अपने नुकसान की बात तो दरकिनार, उन्होंने अपनी जान की परवाह नहीं की और गुलामी की मुक्ति के लिए लड़ते रहे। यह गुलामी-प्रथा कई सालों से चली आ रही थी।"

दास प्रथा ख़त्म करने पर सराहा

महत्वपूर्ण यह है कि ज्योतिबा फुले ने दास प्रथा समाप्त करने के लिए अंग्रेजों-अमेरिकियों की प्रशंसा की है। वे आगे लिखते हैं, "इस अमानवीय गुलामी प्रथा को समूल नष्ट कर देने के लिए और असंख्य गुलामों को उनके परम प्रिय माता-पिता से, भाई-बहनों से, बीवी-बच्चों से, दोस्त-मित्रों से जुदा कर देने की वजह से जो यातनाएं सहनी पड़ीं, उससे उन्हें मुक्त करने के लिए उन्होंने संघर्ष किया। उन्होंने जो गुलाम एक-दूसरे से जुदा कर दिए थे, उन्हें एक दूसरे के साथ मिला दिया। वाह! अमेरिका आदि सदाचारी लोगों ने कितना अच्छा काम किया है!” ज्योतिबा फुले ने गुलामगिरी 'नीग्रो लोगों को आजाद करने वाले इन्हीं अमेरिकियों को समर्पित की है।

विचार से और ख़बरें

भारत के शूद्रों-अतिशूद्रों की गुलामी नीग्रो लोगों की गुलामी से ज्यादा जटिल है। यह सामाजिक और मानसिक गुलामी है। ब्राह्मणों ने ईश्वर के नाम पर पाखंड फैलाकर शूद्रों पर गुलामी लादी है। ईश्वर और देवताओं का प्रपंच मानसिक गुलामी को मजबूत करता है। 

ज्योतिबा फुले ने पौराणिक आख्यानों की समाजशास्त्रीय व्याख्या करते हुए सुर और असुर के छद्म का पर्दाफाश किया है। उन्होंने प्रमाणित किया है कि शूद्र राजाओं को ब्राह्मणों के साहित्य और इतिहास में राक्षस के रूप में चित्रित किया गया। मूल निवासी राजाओं की हत्या को पौराणिक आख्यान में बदल दिया गया। इस पर धर्म और आस्था का लेबल चस्पा कर दिया गया। शूद्रों-अतिशूद्रों के नायकों का पैशाचीकरण करके ब्राह्मणों ने शूद्र समाज में भी इनके प्रति त्याज्य की भावना पैदा कर दी। इसका परिणाम यह हुआ कि फिर कोई शूद्र ब्राह्मणवादी व्यवस्था से टकराने लायक ना हो सका। 

ज्योतिबा फुले अपने नायकों पर जमी हुई ब्राह्मणवादी धूल को साफ करते हैं। उन पर हुए अन्याय, अत्याचार और छल-कपट की दास्तान को यथार्थपरक ढंग से लिखते हैं। इन नायकों में राजा बलि, हिरणकश्यप और महिषासुर प्रमुख हैं।
गौरतलब है कि आज के बहुजन विमर्श में इन नायकों को दलितों, पिछड़ों और आदिवासियों के पुरखों के रूप में चित्रित किया जाता है। शूद्र समाज के इन नायकों की सच्चाई अब सामने आ रही है। इनके उत्सव मनाए जा रहे हैं। ऐसे में एक सवाल पूछना प्रासंगिक है। इन नायकों को सामने लाने वाले ज्योतिबा फुले को एक इतिहासकार और विमर्शकार के रूप में क्या अकादमिक जगत स्वीकार करेगा?
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रविकान्त
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