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पूरी तरह ग़लत और अमानवीय है देशव्यापी लॉकडाउन

लॉकडाउन के कारण देश के दिहाड़ी मजदूरों को भयंकर मुसीबतों का सामना करना पड़ रहा है और उनके भुखमरी से मरने का ख़तरा है। अगर इस अमानवीय लॉकडाउन को तुरंत नहीं ख़त्म किया गया तो जल्द ही बड़े पैमाने पर भुखमरी के कारण खाद्य दंगे होंगे और कानून व्यवस्था की समस्या पैदा हो जाएगी। 
जस्टिस मार्कंडेय काटजू

मैंने 'nayadaur.tv' में एक लेख लिखा था, जिसका शीर्षक था - ‘कोरोना वायरस का ख़तरा बहुत बढ़ा-चढ़ा कर प्रस्तुत किया गया है।’ उस लेख में मैंने कहा है कि कोरोना की तुलना में टीबी, मलेरिया, फ्लू, डेंगू आदि संक्रामक रोगों और अन्य बीमारियों जैसे मधुमेह, दिल के दौरे आदि से अधिक लोग मरते हैं या कार दुर्घटनाओं आदि से मरते हैं जबकि कोरोना वायरस से संक्रमित होने वाले लोगों में से केवल 2% ही इससे मरते हैं, बाकी सब ठीक हो जाते हैं।

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इसके अलावा, भारत में अब तक 1300 और पाकिस्तान में 450 से ज़्यादा लोगों की मौत कोरोना वायरस से हुई है। इसके विपरीत, भारत की एक तिहाई आबादी वाला देश होने के बावजूद संयुक्त राज्य अमेरिका में कोरोना की वजह से 67,000 से अधिक मौतें हो चुकी हैं। 

इससे यह संकेत मिलता है कि भारतीय उपमहाद्वीप के लोगों की अमेरिकियों या यूरोपीय लोगों की तुलना में, इस रोग से लड़ने की प्रतिरोधक क्षमता अधिक है और भारतीय उपमहाद्वीप में कोरोना के ख़तरे को बहुत बढ़ा-चढ़ा कर प्रस्तुत किया गया है।

मैं यह बताना चाहता हूं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की 24 मार्च को रात 8.30 बजे की यह घोषणा कि उसी दिन आधी रात से पूरे देश में लॉकडाउन प्रभावी होगा, वैज्ञानिक और प्रशासनिक विशेषज्ञों के साथ व्यापक परामर्श के बिना और लोगों को पर्याप्त अग्रिम नोटिस दिये बिना, जल्दबाज़ी में लिया गया एक ग़लत निर्णय था। 

पहली बार में देशभर में लॉकडाउन 3 सप्ताह के लिए घोषित किया गया था, जिसे एक बार फिर तक़रीबन 3 सप्ताह और बढ़ाया गया और अब 17 मई तक एक बार और 2 सप्ताह तक इसे बढ़ाया गया है। अभी हमें नहीं पता कि 17 मई के बाद क्या होगा।

ज़ोन में बांटना अव्यावहारिक 

भारत सरकार का नवीनतम आदेश देश भर के जिलों को तीन कैटेगरी- रेड, ऑरेंज और ग्रीन ज़ोन में विभाजित करता है। रेड ज़ोन, जिसमें कोरोना के मामलों की एक बड़ी संख्या है, में पूर्ण लॉकडाउन प्रभावी होगा, जबकि ऑरेंज ज़ोन, जिसमें कोरोना का थोड़ा कम प्रभाव है, उसमें कुछ प्रतिबंध हटा दिए जाएंगे, जबकि ग्रीन ज़ोन जिसमें बहुत कम या कोई मामले नहीं हैं, बिलकुल कम प्रतिबंध होंगे। मेरी राय है कि इस तरह देश को रेड, ऑरेंज और ग्रीन ज़ोन में बांटना अव्यावहारिक है।

Punjabtoday.in में प्रकाशित मेरे लेख 'End this lockdown' में मैंने कहा कि 80-90% भारतीय मजदूर और कामगार (यानी 40-45 करोड़ लोग) हमारी अर्थव्यवस्था के अनौपचारिक/असंगठित क्षेत्र में हैं। ये दैनिक काम करने वाले, प्रवासी मज़दूर आदि हैं जो हर दिन कमाते और खाते हैं। काम के बिना वे और उनके परिवार भूखे रहेंगे। इस लॉकडाउन ने उन्हें उनकी आजीविका से वंचित कर दिया है। 

शहरों में कई प्रवासियों (जिनके पास कोई काम नहीं है) ने अपने परिवारों के साथ सैकड़ों किलोमीटर दूर अपने गाँवों तक पैदल यात्रा शुरू की क्योंकि तब वहाँ जाने के लिए कोई ट्रेन या बसें नहीं चल रही थीं।

दम तोड़ रहे हैं लोग

कई लोगों ने रास्ते में ही दम तोड़ दिया। कई और लोग मर रहे हैं और निश्चित रूप से इस अमानवीय लॉकडाउन के कारण बहुत से लोग मारे जाएंगे। रेड ज़ोन में रह रहे कई लोग निश्चित रूप से जीवित रहने के लिए ग्रीन या ऑरेंज ज़ोन में जाने की कोशिश करेंगे। इसलिए इस ज़ोनिंग के तरीक़े को सख्ती से लागू नहीं किया जा सकता है, यह अव्यावहारिक है।

मेरा अनुमान है कि अगर इस अमानवीय लॉकडाउन को तुरंत नहीं ख़त्म किया गया तो जल्द ही बड़े पैमाने पर भुखमरी के कारण खाद्य दंगे होंगे और कानून व्यवस्था की घोर समस्या होगी।

मुझे 1789 की फ्रांसीसी क्रांति की याद आती है, जिसका एक बड़ा कारण रोटी की कमी का होना था या 1917 में रूस की फरवरी क्रांति, जिसका कारण सेंट पीटर्सबर्ग की सड़कों पर अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर महिलाओं द्वारा भोजन के लिए प्रदर्शन करना या 1943 का बंगाल का अकाल जिसमें लाखों लोग भूख के कारण मारे गए।

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मैं पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान के उस बयान से सहमत हूं जिसमें उन्होंने कहा कि पूर्ण लॉकडाउन करने से पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था चौपट हो जाएगी और लाखों लोग ग़रीबी और भुखमरी से मर जाएंगे।  

यदि लॉकडाउन लागू नहीं किया जाए तो हजारों लोगों के कोरोना वायरस के संक्रमण से मरने की सम्भावना है लेकिन लम्बे समय तक लॉकडाउन होने से लाखों लोग निश्चित रूप से भुखमरी से मर जाएंगे।

मेरे विचार से लॉकडाउन बिलकुल ग़लत और अमानवीय है और इसे तुरंत हटा दिया जाना चाहिए। 

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जस्टिस मार्कंडेय काटजू
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