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आरटीआई क़ानून पर लगाम क्यों लगाना चाहती है मोदी सरकार?

राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी ने 29, जनवरी 1925 को 'यंग इंडिया' में लिखा था- 'वास्तविक स्वराज कुछ लोगों के द्वारा सत्ता की शक्ति हासिल कर लेने से नहीं आएगा, बल्कि वास्तविक स्वराज सारी जनता द्वारा वह शक्ति हासिल करने से आएगा जिसके द्वारा वह सत्ता की शक्ति का दुरुपयोग होने का विरोध कर सके और उसे रोक भी सके। स्वराज के लिए जनता को शिक्षित करना होगा, ताकि वह सत्ताधीशों को नियंत्रित करने की अपनी ताक़त को पहचान ले।'

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संविधान में सूचना के अधिकार की अहमियत

1.आर्टिकल 19- हर नागरिक को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार है, परन्तु भारत की एकता, अखंडता और सुरक्षा, शांति व्यवस्था, नैतिकता, अपराध के लिए उकसाना, विदेशों से संबंध और अदालत के अपमान के मामलों में राज्य कुछ तार्किक प्रतिबन्ध लगा सकता है।

2. आर्टिकल 22- यदि किसी व्यक्ति को गिरफ्तार किया जाता है तो उसे जल्द से जल्द उसकी गिरफ्तारी के कारणों के बारे में सूचित किया जाना आवश्यक है।

3. आर्टिकल 21- बिना किसी क़ानूनी प्रक्रिया के किसी व्यक्ति को उसके जीवन या व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता।

सूचना का अधिकार क़ानून -2005, मुख्य रूप से आर्टिकल 19 और 21 को और प्रखर बनाने की दिशा में एक प्रयास है।

सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा था? 

उत्तर प्रदेश बनाम राज नारायण (AIR 1975 SC 865) के फ़ैसले में उच्चतम न्यायालय ने कहा था “इस देश के लोगों को हर उस काम के बारे में जानने का अधिकार है, जिसे जन प्रतिनिधि जनता के लिए करते हैं। उन्हें हर सार्वजनिक काम का विवरण जानने का अधिकार है।” सूचना के अधिकार के लिए क़ानून बनाने की प्रक्रिया में तेज़ी तब आयी, जब भारतीय विधि आयोग ने अपनी 179वीं रिपोर्ट, 2001 में पेश करते हुए इसकी ज़रूरत पर बल दिया। इसके बाद सूचना का स्वतंत्रता अधिनियम 2002 बनाया गया, जिसके तहत नागरिकों को यह अधिकार दिया गया कि वे सरकारी अधिकारियों से उनके काम से संबंधित जानकारियाँ माँग सकते हैं। साफ़ तौर पर उद्देश्य यही था कि सरकार के कामों में पारदर्शिता आ सके और अधिकारियों की जिम्मेदारी सुनिश्चित हो सके।

इसके बाद एक जन आन्दोलन चला जिसके द्वारा 12 अक्टूबर 2005 को इस क़ानून की कुछ खामियों और विसंगतियों को दूर करके और सशक्त क़ानून, सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 बनाया गया। इस नए क़ानून में सरकार और सरकारी अधिकारियों की कार्यशैली को और पारदर्शी बनाने के लिए निम्न नियम बनाए गए -

1. सशक्त केंद्रीय सूचना आयोग का गठन, जो इस अधिनियम के अंतर्गत अपील की सुनवाई भी कर सकता है।

2. माँगी गयी सूचना नियत समय (30 दिन) के अन्दर न देने पर दंड का प्रावधान। 

3. बहुत कम और अत्यंत आवश्यक मामलों को छोड़कर बाकी सभी मामलों और सरकारी कार्यालयों की सूचनाओं को इसके अंतर्गत लाया गया। 

हालाँकि, इसी अधिनियम की धारा 8 के अनुसार कुछ सूचनाएँ अभी भी नहीं माँगी जा सकती हैं, जैसे कि - 

1. देश की एकता, अखंडता, सुरक्षा, विदेशी मामलों की जानकारी।  

2. अदालत द्वारा प्रतिबंधित सूचनाएं। 

3. ऐसी सूचनाएँ जिससे संसद या विधानसभाओं के विशेषाधिकार प्रभावित होते हों।  

4. मंत्रिमंडल के दस्तावेज़ इत्यादि। 

मोदी सरकार का प्रहार दर प्रहार

2005 में तत्कालीन कांग्रेस नीत गठबंधन सरकार द्वारा बनाये गए इस क़ानून पर मोदी सरकार की हमेशा ही टेढ़ी नज़र रही है, तभी तो अपने पिछले कार्यकाल के दौरान जुलाई 2018 में इस क़ानून को संशोधित करने का ड्राफ्ट विधेयक वितरित कराया गया लेकिन उस समय ज़बरदस्त विरोध के चलते इसे वापस ले लिया गया। 

लेकिन, मई 2019 में लोकसभा में प्रचंड बहुमत मिलते ही मोदी सरकार का पहला हमला इसी क़ानून पर हुआ, जब सरकार ने जुलाई 2019 में सूचना का अधिकार (संशोधन) विधेयक 2019 लोकसभा में पेश किया, वहां से पास होकर यह राज्य सभा में पास हुआ और अंततः इसे 1 अगस्त 2019 को राष्ट्रपति की स्वीकृति भी मिल गयी। 

संवैधानिक दर्ज़ा देने से पीछे हटी सरकार 

2005 में पारित मूल विधेयक में राज्यों के सूचना आयुक्त और केंद्रीय मुख्य सूचना आयुक्त का दर्ज़ा संवैधानिक स्तर का करके इसे चुनाव आयोग जैसी स्वायत्तता देने की बात कही गयी थी, वहीं संशोधित क़ानून के द्वारा केंद्रीय सूचना आयोग का दर्ज़ा अब मात्र वैधानिक होगा।

सूचना आयुक्तों को सरकारी मुलाजिम बनाने का प्रयास 

2005 में पारित मूल विधेयक की धारा 13 और 16 को संशोधित करके सूचना आयुक्तों और केंद्रीय मुख्य सूचना आयुक्त के कार्यकाल और वेतन निर्धारण का अधिकार सरकार को दे दिया गया और यही वह बिंदु है जिसके कारण ये संस्थाएं कमज़ोर होंगी और नागरिकों के अधिकारों पर लगाम लग सकती है। यदि ये बातें सरकार और उनके अधिकारियों के हाथ में रहेंगी तो ज़ाहिर है कि वे सूचना आयोग पर दबाव बनाने की स्थिति में होंगे और राष्ट्रपिता के सच्चे स्वराज की परिकल्पना को धक्का लगेगा।

मूल प्रश्न 

1. आखिर क्यों सरकार सूचना अधिकार विधेयक पर अपनी लगाम चाहती है?

2. ऐसा क्या है, जो नागरिकों से छुपाने का प्रयास हो रहा है?

3. सूचना का आदान-प्रदान और खुला संवाद लोकतंत्र की सांस है, इसे घोंटने का प्रयास क्यों?

विचार से ख़ास

उच्चतम न्यायालय ने दिखाई राह 

इसी सप्ताह उच्चतम न्यायालय ने निर्णय दिया है कि अब से देश के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) का कार्यालय भी सूचना के अधिकार विधेयक के दायरे में होगा। इसका मतलब यह हुआ कि अब नागरिक देश के सर्वोच्च न्यायाधीश से भी सूचना मांग सकते हैं। लेकिन अफ़सोस है कि सरकार सूचना आयोग की शक्तियों पर लगाम लगा रही है।

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इतिहास से लें सबक 

आपातकाल के बाद हुए चुनावों में इंदिरा गाँधी की बुरी तरह पराजय होने के बाद प्रसिद्ध लेखक और पत्रकार खुशवंत सिंह ने उनका साक्षात्कार लिया और पूछा कि उनके जैसी कुशल नेत्री से जनता की नब्ज़ पहचानने में ग़लती कैसे हो गयी? इंदिरा जी का उत्तर था कि जनता क्या सोच रही है, यह जानने के लिए उनके पास कोई स्वतंत्र व्यवस्था नहीं रह गयी थी, क्योंकि आपातकाल में सब कुछ अधिकारियों के भरोसे था और वे उन्हें वही बताते थे, जो वह सुनना चाहती थीं।

वर्तमान सरकार को यह समझना चाहिए कि जनता का पूछने और जानने का स्वतंत्र अधिकार एक ऐसी व्यवस्था है जो सरकार को यह भी बताता है कि जनता क्या सोच रही है। इस स्वतंत्र व्यवस्था पर लगाम लगाकर सरकार राष्ट्रपिता के पूर्ण स्वराज के सपने को धूल-धूसरित करते हुए शायद अपने राजनीतिक भविष्य पर ही लगाम लगाना चाहती है। जनता को अब यह फ़ैसला करना है कि हम अपने लिए सशक्त लोकतंत्र चाहते हैं या नेताओं और अधिकारियों की गिरफ्त में जकड़ा हुआ सिसकता लोकतंत्र? 

रमेश मोहन श्रीवास्तव
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