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क्या विवेकानंद की देशभक्ति की परिभाषा संघ पचा पाएगा?

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और बीजेपी के साथ सबसे बड़ी समस्या यह है कि उनके पास अपना कोई ऐसा नायक नहीं है, जिसकी उनके संगठन के बाहर कोई स्वीकार्यता हो। उनके अपने जो नायक हैं, उनका भी वह एक सीमा से ज़्यादा इस्तेमाल नहीं कर सकते, क्योंकि ऐसा करने पर राष्ट्रीय आंदोलन के दौरान किए गए उनके कार्यों का पिटारा खुलने लगता है। इसीलिए उसने पिछले कुछ दशकों से भारत के महापुरुषों और राष्ट्र-नायकों का 'अपहरण’ कर उन्हें अपनी विचार-परंपरा का वाहक बताने का अभियान चला रखा है। 

इस सिलसिले में महात्मा गाँधी, सुभाषचंद्र बोस, शहीद भगतसिंह, डॉ. भीमराव आम्बेडकर, लोकमान्य तिलक, सरदार वल्लभभाई पटेल आदि कई नाम हैं, जिनका वह समय-समय पर अपनी ज़रूरत के मुताबिक़ इस्तेमाल करता रहता है। स्वामी विवेकानंद का नाम भी ऐसे ही महानायकों में शुमार है। 1960-70 के दशक के दौरान संघ के तत्कालीन सरसंघचालक एमएस गोलवलकर ने विवेकानंद को अपनी हिंदुत्ववादी विचारधारा का आइकॉन बनाने की जो कोशिश शुरू की थी, वह आज भी जारी है।

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126 वर्ष पहले 11 सितंबर 1893 को शिकागो (अमेरिका) में हुए धर्म सम्मेलन में स्वामी विवेकानंद ने अपने ऐतिहासिक वक्तव्य के माध्यम से भारत की एक वैश्विक सोच को सामने रखते हुए हिंदू धर्म का उदारवादी चेहरा दुनिया के सामने रखा था। पूरी दुनिया ने उनके भाषण को सराहा था।

दरअसल, स्वामी विवेकानंद विशुद्ध रूप से आध्यात्मिक व्यक्ति थे और भारतीयता के क्रांतिकारी अग्रदूत भी। उनका हिंदुत्व पाखंड और कर्मकांड विरोधी होने के साथ ही दलित और श्रमिक जातियों को सामाजिक न्याय दिलाने वाला सर्वसमावेशी था। उसमें भारत की आध्यात्मिकता और भौतिक विकास की ललक थी। उसमें सांप्रदायिक और जातीय नफ़रत की कोई जगह नहीं थी। यद्यपि वे समकालीन राजनीति से दूर रहते थे, लेकिन उनका धर्म सामाजिक सत्ता के सवालों से लगातार टकराता था। यही कारण है कि राजनीति के प्रति विरक्ति का भाव रखने वाले विवेकानंद कई राजनीति करने वालों के लिए प्रेरणास्रोत बनते रहे।

विवेकानंद की देशभक्ति के मायने

इसी वजह से धर्म की आड़ में समाज-सत्ता को बनाए रखने का इरादा रखने वाली ताक़तें बेशर्मी के साथ इस योद्धा-संन्यासी को अपनी विचार-परंपरा का पुरखा बताकर उसे हथियाने की फूहड़ कोशिशें करती रही हैं और अब भी कर रही हैं, ताकि उसकी प्रखर सामाजिक चेतना का छद्म सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के पक्ष में इस्तेमाल किया जा सके। चूँकि इस ख़तरे का अंदाज़ा विवेकानंद को भी था, लिहाज़ा उन्होंने अपने प्रसिद्ध व्याख्यान 'कास्ट, कल्चर एंड सोशलिज़्म’ में कहा था- ‘कुछ लोग देशभक्ति की बातें तो बहुत करते हैं, लेकिन मुख्य बात है- हृदय की भावना। यह देखकर आपके मन में क्या भाव आता है कि न जाने कितने समय से देवों और ऋषियों के वंशज पशुओं जैसा जीवन बिता रहे हैं? देश पर छाया अज्ञान का अंधकार क्या आपको सचमुच बेचैन करता है? ...यह बेचैनी ही आपकी देशभक्ति का पहला प्रमाण है।’

चूँकि विवेकानंद राजनेता नहीं बल्कि संन्यासी थे- समाज विज्ञानी संन्यासी, लिहाज़ा वह हिंदू समाज की ख़ूबियों और ख़ामियों से भलीभाँति परिचित थे। वे योद्धा संन्यासी थे, इसलिए हिंदू समाज में व्याप्त बुराइयों और जड़ता पर निर्ममता से प्रहार करते थे।

हिंदू समाज में आज जो कट्टरता व्याप्त है, उसके ख़तरे को विवेकानंद की दी हुई चेतावनी से भी समझा जा सकता है। उन्होंने अपने समय के हिंदू कट्टरपंथियों और पाखंडी धर्माचार्यों को ललकारते हुए 'कास्ट, कल्चर एंड सोशलिज़्म’ में ही कहा है- ‘शूद्रों ने अपने हक माँगने के लिए जब भी मुँह खोला, उनकी जीभें काट दी गईं। उनको जानवरों की तरह चाबुक से पीटा गया। लेकिन अब आप उन्हें उनके अधिकार लौटा दो, वरना जब वे जागेंगे और आप (उच्च वर्ग) के द्वारा किए गए शोषण को समझेंगे, तो अपनी फूँक से आप सब को उड़ा देंगे। यही (शूद्र) वे लोग हैं, जिन्होंने आपको सभ्यता सिखाई है और ये ही आपको नीचे भी गिरा देंगे। सोचिए कि किस तरह शक्तिशाली रोमन सभ्यता गॉलों के हाथों मिट्टी में मिला दी गई।’

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‘इंसानियत को कुचलकर क्या हासिल’

अपने इसी व्याख्यान में भारतीयजनों को आगाह करते हुए विवेकानंद ने कहा- ‘सैकड़ों वर्षों तक अपने सिर पर गहरे अंधविश्वास का बोझ रखकर, केवल इस बात पर चर्चा में अपनी ताक़त लगाकर कि किस भोजन को छूना चाहिए और किसको नहीं, और युगों तक सामाजिक अत्याचारों के तले सारी इंसानियत को कुचलकर आपने क्या हासिल किया और आज आप क्या हैं? ...आओ पहले मनुष्य बनो और उन पंडे-पुजारियों को निकाल बाहर करो जो हमेशा आपकी प्रगति के ख़िलाफ़ रहे हैं, जो कभी अपने को सुधार नहीं सकते और जिनका हृदय कभी भी विशाल नहीं बन सकता। वे सदियों के अंधविश्वास और ज़ुल्मों की उपज हैं। इसलिए पहले पुजारी-प्रपंच का नाश करो, अपने संकीर्ण संस्कारों की कारा तोड़ो, मनुष्य बनो और बाहर की ओर झाँको। देखो कि कैसे दूसरे राष्ट्र आगे बढ़ रहे हैं।’

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उसके आनुषांगिक संगठन धर्मांतरण का भी ख़ूब शोर मचाते हैं। इस बारे में विवेकानंद ने भी स्वीकारा है कि भारत में मुसलिम शासकों के आगमन के बाद देश की आबादी के एक बड़े हिस्से ने इसलाम क़ुबूल कर लिया था, लेकिन साथ ही वह कहते हैं कि यह सब तलवार के ज़ोर से नहीं हुआ था।

विवेकानंद ने कहा है- ‘भारत में मुसलिम विजय ने शोषित, दमित और ग़रीब लोगों को आज़ादी का स्वाद चखाया और इसीलिए देश की आबादी का पाँचवाँ हिस्सा मुसलमान हो गया। यह सोचना पागलपन के सिवाय कुछ नहीं है कि तलवार और ज़ोर-ज़बर्दस्ती के ज़रिए हिंदुओं का इसलाम में धर्मांतरण हुआ। सच तो यह है कि जिन लोगों ने इसलाम अपनाया, वे ज़मींदारों और पुरोहितों के शिकंजे से आज़ाद होना चाहते थे। बंगाल के किसानों में हिंदुओं से ज़्यादा मुसलमानों की तादाद इसलिए है कि बंगाल में बहुत ज़्यादा ज़मींदार थे।’ 

संदर्भ: (Selected Works of Swami Vivekanand, Vol.3, 12th edition, 1979. p.294)

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नफ़रत के ख़िलाफ़ थे विवेकानंद

हिंदू राष्ट्रवाद के झंडाबरदार मुसलमानों के प्रति अपनी नफ़रतभरी विचारधारा को वैधानिकता का जामा पहनाने के लिए स्वामी विवेकानंद के नाम का इस्तेमाल लंबे समय से करते आ रहे हैं, उनके समय में भी करते थे। लेकिन चूँकि ऐसे लोगों की क्षुद्र मानसिकता और मुसलमानों के प्रति उनकी द्वेष-भावना से विवेकानंद भलीभाँति परिचित थे, लिहाज़ा उन्होंने कहा था- ‘इस अराजकता और कलह के बीच भी मेरे मस्तिष्क में संपूर्ण साबूत भारत की जो तसवीर उभरती है, वह शानदार और अद्वितीय है, उसमें वैदिक दिमाग और इसलामिक शरीर होगा।’ इसलामिक शरीर से उनका तात्पर्य वर्ग और जातिविहीन समाज से था।

कहा जा सकता है कि स्वामी विवेकानंद अगर आज ज़िंदा होते तो उनकी नसीहतें सुनकर हिंदू कट्टरता के प्रचारक उन्हें भी सूडो सेकुलर, शहरी नक्सली या हिंदू विरोधी क़रार देकर पाकिस्तान चले जाने की सलाह दे रहे होते। क्योंकि जिस तरह उनके लिए गाँधी, आम्बेडकर, सुभाष, सरदार पटेल को पचाना मुमकिन नहीं है, उसी तरह विवेकानंद को हजम करना भी उनके लिए मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन है।
अनिल जैन
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