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सरकारों की प्राथमिकताओं से लगातार दूर क्यों हो रहा है किसान?

बीते बीस-पच्चीस वर्षों में किसान और खेतिहर मजदूर हमारे लोकजीवन की  चर्चाओं और सरकारों की प्राथमिकताओं से लगातार दूर क्यों है? मुझे ऐसा कोई स्पष्ट कारण नहीं दिख रहा है कि आखिर इस मुल्क का अन्नदाता इस देश के राजनीतिक वर्ग और उसकी उसकी प्राथमिकताओं से लगातार गायब क्यों हो जा रहा है या कर दिया जा रहा है। 
मनोज झा

समकालीन दौर आधुनिक भारतीय राजनीति का एक ऐसा दौर है जहाँ निगाहें जाती हैं, दूर तलक गुबार ही गुबार है। लोकतंत्र सामूहिकता के उत्सव से फिसल कर कब व्यक्ति के आभामंडल की विषय वस्तु बन बैठा, हमें ठीक से पता ही नहीं चलाI ठीक ऐसे वक़्त यह आवश्यक है कि गुबार और धुंध के बादलों के बीच समकालीन राजनीति की उन प्राथमिकताओं को लोकजीवन में वापस लाया जाएँ जिन्हें बिसरा देने की सफल कोशिश लगातार हो रही है I संभवतः छह दशक पूर्व राष्ट्र कवि दिनकर जी ने लिखा था:

बैलों के ये बंधु वर्ष भर न जाने कैसे जीते हैं।

बंधी जीभ आँखे विषम ग़म खा शायद आंसू पीते हैं।।

चुनाव ख़त्म, सरोकार ग़ुम

इन छह-सात दशकों में हमारे कृषक और खेतिहर समाज की ज़िंदगी में शायद ही कोई ऐसा बदलाव आया है, जिसे हम अपनी उपलब्धि बता और गिना सकें। इसके ठीक विपरीत पिछले वर्षों में किसान हमारे समाज का एक ऐसा हिस्सा बनकर उभरा है, जिसे चुनाव पूर्व हर रंग के घोषणापत्र में एक अति महत्वपूर्ण स्थान दिया जाता है, बड़ी-बड़ी बातें होती हैं। स्वामीनाथन आयोग की हज़ार बार कसमें खाई जाती हैं और हमारे निर्दोष अन्नदाता इन कपोल कथाओं को सत्य और निष्ठा की ईमानदार तक़रीर समझ भरोसा कर बैठते हैं। अब तक की हकीक़त तो यही रही है कि चुनाव ख़त्म होते ही किसानों की चर्चा और उनके सरोकार गुम हो जाते हैं और गुमशुदगी की रपट तक लिखाने को कोई तैयार नहीं होता। 

दक्षिण भारत के किसान दिल्ली में विरोध प्रदर्शन करते कर लौट गए, सरकार के कानों पर जू न रेंगी (फ़ाइल फ़ोटो)

तीन लाख आत्महत्याएँ

आंकड़ों की ज़ुबानी कहूँ तो बीते दो दशकों में लगभग तीन लाख से ज़्यादा किसानों ने आत्महत्या कर ली है, लेकिन हमारी सरकार और हमारे समाज के लिए उनकी आत्महत्याएँ एक सांखियिकी आंकड़े से ज़्यादा कुछ नहीं। आत्महत्या का रास्ता ना अख़्तियार करने वाले किसान अगर सरकारी नीतियों के खिलाफ सड़क पर उतरें तो मंदसौर जैसी वारदात का जन्म होता है, सड़कों पर खून बहता है और बहस मौलिक प्रश्नों से दूर जाकर इस बात पर होने लगती है कि इन्हें भड़काने वाले तत्व कौन हैं। उनके प्रतिरोध के मौलिक सवाल जिसका ताल्लुक़ खेती और खेतिहर समाज में वर्षों से अपेक्षित संरचनागत बदलाव से है, वह इन बहसों के गुबार में खो जाते हैं।
हम यह भूल जाते हैं कि आज भी हमारी आधी आबादी से अधिक अपने जीवनयापन के लिए किसी न किसी रूप में कृषि पर निर्भर हैं। आधी आबादी के लिए संवेदना का घोर अभाव चाहे सरकार का हो या समाज का, अपने आप में हमारी प्राथमिकताओं की परतें उधेड़ कर रख देता है।

क्या होगा एमएसपी बढ़ाने से?

कृषि के क्षेत्र में न्यूनतम समर्थन मूल्य के निर्धारण या उसमें तब्दीली को पिछले वर्षों में ऐसे प्रस्तुत किया जाता है मानो एक नयी कृषि क्रांति का आगाज़ हो रहा हो। इस न्यूनतम समर्थन मूल्य के प्रचार-प्रसार में खर्च की गयी राशि को देखने से इनके निहितार्थ का पता मिलता है। हमें खेतिहर समाज के चश्मे से देखते हुए इस बात के लिए चिंतित ज़रूर होना चाहिए कि आखिर क्यों न्यूनतम समर्थन मूल्य का निर्धारण दिल्ली में बैठे हुए ऐसे नौकरशाह करते हैं जिनका खेती और विभिन्न फसलों के पैदावार में लगे वास्तविक खर्च का कोई अनुभव नहीं है। 

क्या यह माँग अतिश्योक्ति होगी कि न्यूनतम समर्थन मूल्य तय करने वाले लोगों का कम से कम दो वर्ष का किसानी का अनुभव होना चाहिए? क्या यह घोर विडंबना नहीं है कि एमएसपी के निर्धारण में किसानों के श्रम, उनके परिवार का श्रम और ख़ास तौर पर महिलाओं के श्रम की कोई गणना नहीं होती है?

पूरा खर्च नहीं जोड़ते

बाज़ार से खाद बीज, कीटनाशक, डीज़ल आदि लाने में परिवहन पर आए ख़र्च तक नहीं जोड़ा जाता है। स्वनिर्मित या घरेलू खाद का जो उपयोग किसान करता है उसे भी शामिल नहीं किया जाता है। साथ ही इसमें जमीन के रेंट को शामिल करने का भी कोई प्रावधान नहीं है।
सबसे दुर्भाग्यपूर्ण यह तथ्य है कि चाहे न्यूनतम समर्थन कुछ भी तय हो, इसका लाभ किसानों को नहीं मिलता है। आंकड़े बताते हैं कि कुल उपज के सिर्फ़ सात से नौ प्रतिशत ही ख़रीद हो पाती है। बिहार जैसे कई पिछड़े राज्यों में तो सरकारी ख़रीद न के बराबर होती है।
फ़सल कटने के बाद न्यूनतम समर्थन मूल्य और ख़रीद का सरकारी व्याकरण किसानों की बेसब्री और परेशानहाली से बिलकुल बेख़बर है। किसान को फ़सल कटने के बाद उसे तुरंत ही ख़रीद की व्यवस्था चाहिए होती है। छोटे-मंझोले किसानों को अगली फ़सल की व्यवस्था करनी होती है, लेकिन इतनी सी बात हमारे सत्ता प्रतिष्ठान को बीते 70 वर्ष में समझ में नहीं आई। 

नव-उदारवादी बाज़ारवाद 

बिचौलियों के साथ सरकारी तंत्र की साँठ-गाँठ के कारण किसानों को औने-पौने दाम पर उनके हाथ ही बेच देना पड़ता है। नव-उदारवादी बाज़ारवाद के तर्कों के आगे हम सज़दे में झुक जाते हैं और भूल जाते हैं कि राज्य के संरक्षण के बिना बाज़ार अपने मूल हिंसक चरित्र के अनुसार ही प्राथमिकताएँ तय करेगा। इससे विलग सरकारी तंत्र और बाज़ार के गठजोड़ की कार्यशैली से परेशान हमारे कृषक समाज के लोग प्रतिरोध में अपनी सब्जियां फसलें सड़को पर बिखेर देते है। टीवी और अखबारों में हजारों क्विंटल लाल-लाल टमाटर, प्याज़, आलू और मक्के को सड़क पर बिखरा देख हम स्तब्ध होते हैं, चंद मिनट रुक कर ग़ौर से देख लेते है और फिर अगला दिन हमारे लिए एक नया दिन होता है। हम अपनी ज़िंदगियों में फिर से मसरूफ़ हो जाते हैं, हमारी अपनी चिंताएं होती हैं और हमारे अन्नदाता की अवस्थिति यूँ ही बनी रहती है। 

प्राथमिकता में क्यों नहीं किसान?

मुआफ़ी के साथ यह कहना चाहूँगा कि इस अद्यतन स्थिति के लिए मैं सिर्फ़़ आज की सरकार को दोषी नहीं ठहराना चाहता क्योंकि हम गवाह हैं कि बीते बीस-पच्चीस वर्षों में किसान और खेतिहर मजदूर हमारे लोकजीवन की  चर्चाओं से और सरकारों की प्राथमिकताओं से लगातार दूर क्यों है। मुझे ऐसा कोई स्पष्ट कारण नहीं दिख रहा है कि आखिर इस मुल्क का अन्नदाता इस देश के राजनीतिक वर्ग और उसकी उसकी प्राथमिकताओं से लगातार गायब क्यूँ हो जा रहा है या कर दिया जा रहा है। तकरीबन दो वर्ष पूर्व हमने बापू की चंपारण यात्रा और वहां के निलहे किसानों की गौरवशाली जीत की सौंवी वर्षगांठ मनाई है।आज तो पूरा मुल्क ही चंपारण हो रहा है। किस बापू को याद करें? क्योंकि यहाँ तो कोई सुनता ही नहीं। बकौल ग़ालिब 

कोई उम्मीद बर नहीं आती, कोई सूरत नज़र नहीं आती।

मनोज झा
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