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‘लव जिहाद’: मुसलिम नहीं, हिन्दू महिलाओं के ख़िलाफ़

‘लव जिहाद’ पर विधानसभा के शीतकालीन सत्र का इंतज़ार किए बिना अध्यादेश लाकर क़ानून लाने के प्रयास को अब राज्यपाल की मंजूरी भी मिल गयी और बरेली में लव जिहाद को लेकर पहला मामला भी दर्ज कर लिया गया। यूपी की बीजेपी शासित राज्य सरकार के पक्षधर इसे हिन्दू महिलाओं के लिए संरक्षण का क़ानून दिखा कर वाहवाही लूटने में लगे हैं। लेकिन अगर इस अध्यादेश का बारीकी से अध्यनन किया जाये तो यह अध्यादेश न केवल हिन्दू महिलाओं की स्वतंत्रता पर प्रहार है बल्कि संविधान, सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के पूर्व में दिए गये फ़ैसलों के विपरीत भी है।

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हिन्दू महिलाओं की स्वतंत्रता पर रोक

लव जिहाद पर लाया गया यूपी सरकार का अध्यादेश कहता है कि कोई भी शख्स जो अपनी असली पहचान छुपाकर, गुमराह कर के धोखे से किसी महिला से शादी कर लेता है उसे 1 से 10 साल तक की सज़ा के प्रावधान के तहत गिरफ्तार किया जाएगा। संविधान ने भारत के प्रत्येक नागरिक को कुछ मौलिक अधिकार दिए हैं। अनुच्छेद 14, अनुच्छेद 21 और अनुच्छेद 25 संविधान के वे प्रावधान हैं जो पुरुष हो या महिला, सबको बराबरी का हक देते हैं। संविधान के अनुच्छेद 21 में यह कहा गया है कि भारत में क़ानून द्वारा स्थापित किसी भी प्रक्रिया के अलावा कोई भी व्यक्ति किसी अन्य व्यक्ति को उसके जीवित रहने के अधिकार और निजी स्वतंत्रता से वंचित नहीं कर सकता है।

संविधान में प्रावधान होने के बावजूद लव जिहाद को लेकर आये क़ानून में तर्क दिया जा रहा है कि अगर हिन्दू महिलाओं को दूसरे धर्म का युवक बहला-फुसला कर, गुमराह कर शादी कर लेता है तो यह क़ानूनन जुर्म होगा। 

यह तर्क दरअसल हिन्दू महिलाओं की बौद्धिक और मानसिक क्षमता के विरुद्ध दिया गया है जो मानता है कि हिन्दू महिलाओं को इतनी समझ नहीं है कि वो जिस पुरुष के साथ वैवाहिक रिश्ते में बंधने जा रही हैं, उसके धोखे और फ़रेब को समझ सकें।

स्वंयवर की व्यवस्था थी पहले

हिन्दू धर्म में स्वयंवर की व्यवस्था थी जिसमें हिन्दू लड़की अपनी पसंद का वर चुनती थी और उससे विवाह करती थी। लव जिहाद को लेकर लाये गये क़ानून में तो अपनी पसंद और समझ के साथ किसी भी हिन्दू महिला को ग़ैर हिन्दू लड़के के साथ शादी करने की स्वतंत्रता पर बैरियर लगा दिया गया है। मान लीजिए कि किसी वयस्क हिन्दू महिला ने अपनी मर्जी से पूरी सोच-समझ के साथ ग़ैर हिन्दू लड़के से विवाह कर लिया तो नये क़ानून के मुताबिक़ उसके पति को बिना वारंट गिरफ्तार किया जाएगा। साथ ही इस अपराध को ग़ैर ज़मानती बनाया गया है, मतलब जब तक मामला अदालत में चलेगा उसको जेल में रहना होगा। साफ़ है कि यह उस हिन्दू महिला के ख़िलाफ़ बनाया गया क़ानून है जो कि अपनी सोच, समझ, विवेक से शादी करना चाहती है।

क्या हिन्दू महिलाओं की समझ कम?

यह क़ानून संविधान के अनुच्छेद 14 के भी विपरीत दिखता है। अनुच्छेद 14 कहता है कि भारत राज्य, राज्य क्षेत्र में किसी व्यक्ति को क़ानून के समक्ष समता से या क़ानून के समान संरक्षण से वंचित नहीं करेगा। इसका मतलब यह है कि भारत सरकार क़ानूनन किसी भी व्यक्ति के साथ भेदभाव नहीं कर सकती। अनुच्छेद 14 के साथ अनुच्छेद 15 जुड़ा है। इसमें कहा गया है, ‘राज्य किसी नागरिक के ख़िलाफ़ धर्म, मूल, वंश, जाति, लिंग, जन्मस्थान या इनमें से किसी के आधार पर कोई भेद नहीं करेगा।’

जब राज्य हिन्दू महिलाओं के मामले में यह मानता है कि उसमें यह समझ नहीं है कि वह किसी सच्चे शख्स से विवाह कर सके तो इसका मतलब है कि यह क़ानून हिन्दू पुरुष और हिन्दू महिला के बीच फर्क करता है।

धर्म अपनाने पर अंकुश क्यों?

नये क़ानून के मुताबिक़ धर्म परिवर्तन के लिए 2 महीने पहले ज़िला अधिकारी के दफ्तर में अर्जी देनी होगी। ज़िला अधिकारी यह देखेगा कि इस धर्म परिवर्तन का मक़सद क्या है और यह धर्म परिवर्तन क्यों किया जा रहा है। संविधान का अनुच्छेद 25 कहता है कि भारत में प्रत्येक व्यक्ति को किसी भी धर्म को मानने की, आचरण करने की तथा धर्म का प्रचार करने की स्वतंत्रता है।

जब पहले से ही संविधान में मौलिक अधिकारों के अंतर्गत धर्म को मानने की स्वतंत्रता मिली हुई है तो राज्य यह कैसे तय कर सकता है कि क्यों कोई व्यक्ति किसी भी धर्म को मानने या न मानने का कारण सरकार या अधिकारी या किसी भी शख़्स को बताये।

अंतरजातीय विवाह के ख़िलाफ़ है क़ानून

भारत जैसे देश में धार्मिक और जातीय संघर्षों, कुरीतियों को ख़त्म करने के लिए अंतरजातीय विवाहों को बढ़ावा दिया गया है। कई धार्मिक और सामाजिक संगठन सामूहिक विवाह कार्यक्रम का आयोजन भी करते हैं जहाँ धर्म और जाति से परे होकर पुरुष और महिला वैवाहिक संबंधों में बंधते हैं। कथित लव जिहाद के नये क़ानून से पूरे अंतरजातीय विवाह के मक़सद को गहरी चोट पहुँचेगी। 

जानकार मानते हैं कि हिन्दू हो या दूसरे धर्म के लोग, दोनों तरफ़ से धार्मिक गुरु इस बात से ख़ुश होंगे कि अंतरजातीय विवाहों को हतोत्साहित किया जा जाए। ‘इंडियन एक्सप्रेस’ की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ साल 2013 की रिपोर्ट के मुताबिक़ देश में साल 2005 से हुई शादियों में 2.21 फ़ीसदी शादियाँ अंतरजातीय विवाह थे जिनमें सबसे ज़्यादा ईसाई धर्म के लोगों ने की जबकि सबसे कम हिंदू धर्म के लोगों ने की। अब नये क़ानून के बाद अंतरजातीय विवाह को देख तो लोग हतोत्साहित होकर ऐसे विवाहों से बचेंगे।

वीडियो में देखिए, क्या लव जिहाद चुनावी पैंतरा है? 

अदालतों ने भी लव जिहाद को नकारा है

केरल लव जिहाद के नाम से मशहूर हादिया केस में सुप्रीम कोर्ट ने बालिग हादिया को उसके मुसलिम धर्म के पति के साथ रहने की इजाज़त देते हुए साफ़ कहा कि बालिग हादिया अपने मन पसंद वर को चुनने और साथ रहने के लिए स्वतंत्र है। जबकि इसी मामले में लव जिहाद के एंगल की जाँच के लिए एनआईए जैसी जाँच एजेंसी को लगाया गया था जिसे जाँच में कुछ नहीं मिला। इसके साथ इलाहाबाद हाईकोर्ट की सिंगल बेंच के फ़ैसले को पलटते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कथित लव जिहाद की पूरी चर्चा को ही ख़त्म कर दिया। हाईकोर्ट ने कहा था कि बालिग लड़का या लड़की अपनी पसंद के किसी भी शख्स, किसी भी धर्म के व्यक्ति के साथ शादी करने के लिए पूर्ण रूप से स्वतंत्र है और उसे कथित लव जिहाद के नाम पर परेशान नहीं किया जा सकता।

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विप्लव अवस्थी
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