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मुसलमानों पर हमला, फिर ख़ामोश करने की क्रूरता, क्या जनतंत्र को मिटाने की क़वायद?

मुसलमानों का यक़ीन भारत की पुलिस पर हो, इसकी कोई वजह नहीं रह गई है। उत्तर पूर्वी दिल्ली की हिंसा के दौरान भी एकाध अपवाद को छोड़ भी दें तो उसका रुख़ बहुत साफ़ था। यही सिख 1984 में देख चुके हैं। 2018 की 2 अप्रैल को हुए भारत बंद में दलित इस पुलिस को झेल चुके हैं।
अपूर्वानंद

मालूम हुआ कि इस घोर आपदा काल में भी दिल्ली पुलिस अपना असल काम न भूले, यह उसे गृह मंत्रालय ने चेताया। वह काम क्या है? पिछले महीने दिल्ली के उत्तर पूर्वी इलाक़े में जो हिंसा हुई, उसके गुनहगारों को पहचानने और पकड़ने का। ‘इंडियन एक्सप्रेस’ की एक ख़बर के मुताबिक़ पुलिस पूरी चुस्ती के साथ एक-एक कर उन्हें पकड़ रही है। लेकिन वह तालाबंदी या लॉकडाउन के सारे नियमों का बाक़ायदगी से पालन करती है। उन्हें नक़ाब पहनवाती है, सैनिटाइज़र से कीटाणु मुक्त करती है और फिर मैजिस्ट्रेट के सामने पेश करती है।

उत्तर पूर्वी दिल्ली में हुई हिंसा के पीछे एक साज़िश थी, यह पुलिस की पूर्व धारणा है। कौन कौन थे इसके पीछे? अभी दो रोज़ पहले उसने जामिया मिल्लिया इस्लामिया की एम फ़िल की छात्रा सफ़ूरा ज़रगार को गिरफ़्तार किया। उनपर पुलिस का इल्ज़ाम यह है कि जाफ़राबाद में उन्होंने औरतों को प्रदर्शन के लिए और पुलिस पर हमला करने के लिए उकसाया था। सफ़ूरा के पहले जामिया के ही एक दूसरे छात्र मीरान अहमद को गिरफ़्तार किया गया। उनपर भी यही आरोप है कि उन्होंने हिंसा भड़काई।

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इनके पहले ‘यूनाइटेड अगेन्स्ट हेट’ के सदस्य ख़ालिद सैफ़ी और कांग्रेस की इशरत को पुलिस खुरेजी में हिंसा भड़काने के आरोप में गिरफ़्तार कर चुकी है। गिरफ़्तारियों में एक योजना है। वह यह साबित करना कि उत्तर पूर्वी दिल्ली की हिंसा उसके पहले से पूरी दिल्ली में नए नागरिकता क़ानून और राष्ट्रीय नागरिक सूची के ख़िलाफ़ चल रहे विरोध प्रदर्शनों से जुड़ी हुई है। इसलिए वह एक एक करके इनसे जुड़े लोगों को पकड़ रही है।

क्या आप पुलिस की इस कार्रवाई की आलोचना कर सकते हैं? वह कहेगी, जाँच में उसे जो मिल रहा है, उसके आधार पर वह काम कर रही है। लेकिन आँखों के आगे हो यह रहा है कि हिंसा मुसलमानों को निशाना बनाते हुए की गई और गिरफ़्तारी भी मुसलमानों की ही हो रही है!

उसमें भी वे नौजवान पकड़े जा रहे हैं जो पढ़े लिखे हैं और जनतांत्रिक राजनीति की भाषा के अभ्यासी हैं। इनमें से किसी ने छिपकर साज़िशी तरीक़े से काम नहीं किया। मुसलमान हैरान हैं। घर, दुकानें उनकी बर्बाद हों, मारे वे जाएँ और जेल भी उन्हें ही भेजा जाए!

इन गिरफ़्तारियों से यह साबित करने की कोशिश भी की जा रही है कि दिल्ली और देश भर में जो प्रमुखतः मुसलमान औरतों का प्रतिरोध था, वह हिंसा की साज़िश की आड़ थी। ये विरोध प्रदर्शन कोई दो महीने से चल रहे थे। पूरी तरह से खुले हुए। इनके कार्यकर्ता कोई पोशीदा तरीक़े से काम नहीं कर रहे थे। सारे भाषण, वक्तव्य सार्वजनिक थे। पुलिस लगातार इनकी निगरानी कर रही थी बल्कि कुछ जगहों पर उसने इन प्रदर्शनों को तोड़ने की कोशिश भी की। इस विरोध की पूरी अवधि में कहीं हिंसा नहीं हुई।

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हिंसा 23 फ़रवरी के बाद शुरू हुई। उसकी आड़ में पुलिस ने एक एक कर इन विरोध प्रदर्शनों को भी उखाड़ना शुरू कर दिया। इस हिंसा में बाहरी लोग हमलावर थे, यह चश्मदीद गवाह बताते हैं। उसके पहले भारतीय जनता पार्टी के नेता खुलेआम हिंसा की धमकी देते हैं। इन धमकियों के बाद हिंसा शुरू होती है। इसकी जाँच करने की जगह पुलिस शासक दल के सिद्धांत पर अमल करने लगती है कि शांतिपूर्ण दीखने वाले इन विरोध प्रदर्शनों के बीच हिंसा की तैयारी हो रही थी। और वह मुसलमान ही कर रहे थे।

शिक्षित नौजवान मुसलमानों को इस कार्रवाई के ज़रिए धमकाया जा रहा है कि बहले बच्चों की तरह पढ़ लिख कर नौकरी-क़ारोबार करने की जगह अगर वे राजनीति करेंगे तो उनका हश्र यही होगा। इससे उन्हें क्या निष्कर्ष निकालना चाहिए?

दिल्ली पुलिस का नेतृत्व शायद कभी आत्मावलोकन करे, सेवानिवृत्ति के बाद उसका अवसर होता है कि वह बहुसंख्यकवाद के इस दौर में क्या कर रहा था।

कभी शायद वह सोच पाए कि क्यों कन्हैया, उमर ख़ालिद, अनिर्बान के ख़िलाफ़ उसने झूठा मामला बनाया, क्यों जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में नक़ाबपोशों की हिंसा में वह हमलावरों को पहचान न सका और क्यों उनके ख़िलाफ़ कार्रवाई में उसकी कोई दिलचस्पी नहीं है! कभी शायद ऐसा हो कि इनमें से किसी की आत्मा जगे।

उसके पहले नुक़सान बहुत हो चुका होगा। मुसलमानों का यक़ीन भारत की पुलिस पर हो, इसकी कोई वजह नहीं रह गई है। उत्तर पूर्वी दिल्ली की हिंसा के दौरान भी एकाध अपवाद को छोड़ भी दें तो उसका रुख़ बहुत साफ़ था। यही सिख 1984 में देख चुके हैं। 2018 की 2 अप्रैल को हुए भारत बंद में दलित इस पुलिस को झेल चुके हैं। इन पंक्तियों के लिखते वक़्त मुझे बार बार यह ख़याल आ रहा है कि आनंद तेलतंबड़े और गौतम नवलखा को हमारी सबसे ऊँची अदालत जेल भेजने पर आमादा है। भीमा कोरेगाँव में हिंसा के आरम्भिक आरोपी मज़े से बाहर टहल रहे हैं।

मुसलमानों पर हमला और उनके मुखर तबक़े को ख़ामोश करने की क्रूरता जनतंत्र को ख़त्म करने की क़वायद का हिस्सा ही है। ख़ालिद, इशरत, सरूफ़ा और मीरान के ख़िलाफ़ अन्याय के विरुद्ध आवाज़ सिर्फ़ मुसलमानों की उठे यह हम सबके लिए शर्म की बात होगी।

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