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दिल्ली: लगातार पस्त हो रही कांग्रेस; अध्यक्ष चुनने में भी नाकाम

दिल्ली विधानसभा चुनाव में लगातार दूसरी बार खाता खोलने में नाकाम रही कांग्रेस के सामने राष्ट्रीय स्तर पर पहाड़ जैसी चुनौतियां खड़ी हैं। इन चुनौतियों से निपटने के बारे में चिंतन करने के बजाय कांग्रेस दिल्ली के चुनाव नतीजे आने के बाद फिलहाल पिछले दो सालों में बीजेपी की लगातार छह राज्यों में हुई हार का जश्न मना रही है। कांग्रेस के कई बड़े नेताओं ने दिल्ली में बीजेपी के ख़राब प्रदर्शन और आम आदमी पार्टी की जीत पर ख़ुशी का इज़हार किया है। लेकिन दिल्ली के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के रसातल में चले जाने पर किसी भी बड़े कांग्रेसी नेता ने मुंह नहीं खोला है। दिल्ली में कांग्रेस की ख़स्ता हुई हालत पर पार्टी के भीतर ही सिर फुटव्वल हो रही है। 

दिल्ली में कांग्रेस की हालत इतनी ख़राब हो गई है कि उसे एक सीट मिलना तो दूर की बात है, वह एक भी सीट पर दूसरे नंबर पर भी नहीं आई। 66 में से 63 सीटों पर उसके उम्मीदवारों की ज़मानत ज़ब्त हो गई है।
दिल्ली में पिछले 6 साल में कांग्रेस लगातार तीसरा विधानसभा चुनाव हारी है। लगातार तीन विधानसभा चुनाव जीतकर 15 साल तक दिल्ली में सरकार चलाने वाली कांग्रेस इस चुनाव में महज 4.26% वोट ही हासिल कर पाई है। इसी के साथ दिल्ली का नाम उन राज्यों में शुमार हो गया है जहां कांग्रेस एक बार हारने के बाद फिर कभी सत्ता में वापसी नहीं कर पाई जैसे - पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश, बिहार और गुजरात।  
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इस डर ने कांग्रेस की धड़कनें बढ़ा दी हैं। कांग्रेस के सामने यह संकट भी पैदा हो गया है कि कहीं अन्य राज्यों में भी केजरीवाल ने पैर पसार लिए तो? कांग्रेस के बड़े नेताओं के आम आदमी पार्टी की जीत पर ख़ुश होने को लेकर पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी की बेटी और दिल्ली प्रदेश महिला कांग्रेस की अध्यक्ष शर्मिष्ठा मुखर्जी ने पार्टी के वरिष्ठ नेताओं से सीधा और तीख़ा सवाल पूछा है कि बीजेपी की हार और आम आदमी पार्टी की जीत का जश्न मनाने के बजाय अपनी पार्टी को मजबूत बनाने की तरफ़ पार्टी नेताओं का ध्यान क्यों नहीं है?

कांग्रेस आज की तारीख़ में एक दिशाहीन पार्टी है। कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह तय करना है कि पार्टी का अध्यक्ष कौन होगा और किसके नेतृत्व में वह आगे की चुनौतियों से निपटेगी।

मई, 2019 में लोकसभा चुनाव के नतीजे आने के बाद पार्टी की बुरी हार की जिम्मेदारी लेते हुए राहुल गाँधी ने अध्यक्ष पद से इस्तीफ़ा दे दिया था। तब उन्होंने पार्टी के सामने शर्त रखी थी कि उनके परिवार से किसी व्यक्ति को कांग्रेस अध्यक्ष ना बनाया जाए लेकिन कांग्रेस गांधी-नेहरू परिवार के बाहर किसी को अध्यक्ष चुनने में नाकाम रही और उसने सोनिया गांधी को अंतरिम अध्यक्ष बनाया था। अपने स्वास्थ्य की वजह से सोनिया गांधी इतनी सक्रिय नहीं हैं जितनी वह पूर्णकालिक अध्यक्ष के तौर पर हुआ करती थीं।

राहुल के बयानों से नाराज़गी

पार्टी में चर्चा थी कि झारखंड चुनाव के बाद और दिल्ली के चुनाव से पहले राहुल गांधी को फिर से अध्यक्ष बनाया जाएगा। लेकिन इस बीच राहुल गांधी के कुछ बयानों पर इतना बवाल हुआ कि कांग्रेस ने उन्हें अध्यक्ष बनाने का रिस्क लेना मुनासिब नहीं समझा। कांग्रेस के तमाम वरिष्ठ नेता राहुल गांधी के कुछ ग़ैर-ज़िम्मेदाराना बयानों को लेकर नाराज़ हैं। 

हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को बेरोज़गारी पर घेरते हुए राहुल ने बयान दिया था कि हिंदुस्तान के युवा इसको ऐसा डंडा मारेंगे, इसको समझा देंगे कि हिंदुस्तान के युवा को रोज़गार दिये बिना ये देश आगे नहीं बढ़ सकता है। इस बयान को लेकर पार्टी के नेताओं की अच्छी राय नहीं है। सभी को लगता है कि इस तरह के बयान कम से कम कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष रहे व्यक्ति या भविष्य में अध्यक्ष बनने वाले व्यक्ति को नहीं देने चाहिए। 

प्रियंका अध्यक्ष बनने के लिये तैयार नहीं 

पार्टी में तमाम वरिष्ठ नेता राहुल गांधी को फिर से अध्यक्ष बनाना चाहते हैं। लेकिन राहुल गांधी इस बारे में कोई ठोस फ़ैसला नहीं ले पा रहे हैं। राहुल के राजी नहीं होने की स्थिति में ज्यादातर नेता प्रियंका गांधी वाड्रा को पार्टी अध्यक्ष बनाए जाने के पक्ष में हैं। प्रियंका फिलहाल पूरा ध्यान उत्तर प्रदेश पर केंद्रित कर रही हैं और वह पार्टी अध्यक्ष की ज़िम्मेदारी लेने के लिये तैयार नहीं हैं। वह पहले भी कई बार इसके लिये साफ तौर पर मना कर चुकी हैं। राहुल गांधी पहले ही कह चुके हैं कि नया अध्यक्ष उनके परिवार से बाहर का व्यक्ति होना चाहिए। 

कांग्रेस में अध्यक्ष पद पर ठोस फ़ैसला न होने की वजह से ऊपर से लेकर नीचे तक का संगठन लुंज-पुंज स्थिति में है। इसीलिए न राज्यों के विधानसभा चुनाव के लिये ढंग से रणनीति बन रही है और ना ही कार्यकर्ताओं में कोई जोश भरा जा रहा है।

कांग्रेस नेताओं को डर है कि अगर पार्टी में इसी तरह अनिर्णय की स्थिति बनी रही तो पार्टी के ज़्यादातर नेता अपना भविष्य तलाशने के लिए दूसरी पार्टियों का रुख कर सकते हैं। झारखंड के चुनाव से ठीक पहले झारखंड कांग्रेस के अध्यक्ष रहे डॉ. अजय कुमार ने आलाकमान की अनिर्णय की क्षमता से तंग आकर आम आदमी पार्टी का दामन थाम लिया था और वर्तमान में वह आम आदमी पार्टी के प्रवक्ता हैं। 

कांग्रेस के लिए ख़तरा है आप

आम आदमी पार्टी ने दिल्ली में यह साबित कर दिया है कि बीजेपी के तमाम दुष्प्रचार के बावजूद वह उसे पटकनी दे सकती है। अरविंद केजरीवाल की राष्ट्र निर्माण से जुड़ने की अपील पर दिल्ली के चुनावी नतीजे आने के 24 घंटे के भीतर देशभर में 11 लाख लोगों ने उनकी पार्टी से जुड़ने की इच्छा जताई है। कांग्रेस के लिए यह सबसे बड़ी ख़तरे की घंटी है। 

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आत्मचिंतन की परंपरा ख़त्म 

कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता ने कहा कि कांग्रेस में आत्मचिंतन और निष्पक्ष रूप से हार के कारणों पर चर्चा की परंपरा ख़त्म सी हो गई है। जब तक पार्टी अपने प्रदर्शन को लेकर खुले दिल और दिमाग से चर्चा नहीं करेगी तब तक उसकी हालत नहीं सुधर सकती। 1997 में कांग्रेस का पहला चिंतन शिविर मध्य प्रदेश के पचमढ़ी में लगा था। इसमें कांग्रेस ने तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे बड़े राज्यों में राज्य स्तर पर गठबंधन करने लेकिन लोकसभा का चुनाव अकेले लड़ने का फ़ैसला किया था। उसके बाद 2003 में शिमला में कांग्रेस का दूसरा चिंतन शिविर हुआ था जिसमें पार्टी ने लोकसभा के चुनाव में अन्य दलों के साथ गठबंधन करने का फ़ैसला किया था। 2013 में पार्टी ने चिंतन शिविर के नाम पर एक सम्मेलन जयपुर में ज़रूर किया था लेकिन इसमें चिंतन की बजाय सिर्फ राहुल गांधी को उपाध्यक्ष बनाने का फ़ैसला हुआ था।

पार्टी नेताओं को अब लगता है कि केंद्र में मोदी और दिल्ली में केजरीवाल के अविजित बन जाने  के बाद खुले दिल और दिमाग से चर्चा करने के लिए पचमढ़ी और शिमला जैसे चिंतन शिविर की ज़रूरत है। लेकिन अहम सवाल यह है कि यह फ़ैसला कौन लेगा। जब तक पार्टी यह तय नहीं करती कि उसका अगला अध्यक्ष कौन होगा तब तक पार्टी की न दिशा तय होगी ना कोई कारगर रणनीति बनेगी और साफ़ है कि न ही पार्टी की दशा बदलेगी।

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यूसुफ़ अंसारी
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