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मनुष्यों से संक्रमण पर तो सचेत हैं; मेडिकल कचरे से कोरोना फैलने से कौन रोकेगा?

ऐसे दौर में जबकि कोरोना ज्वार अपने चरम की ओर बढ़ रहा है, 'कॉन्टैक्ट' चैन को निरंतर तोड़ने की कोशिश में जुटी केंद्रीय और राज्य सरकारों का ध्यान सिर्फ़ मनुष्यों से होने वाले संक्रमण तक ही सीमित है। बायो मेडिकल कचरे और इसके सुरक्षित निबटान की ओर उनका ध्यान उस गंभीरता से नहीं है जैसा कि होना चाहिए।
अनिल शुक्ल

गुज़रे रविवार डीएमके अध्यक्ष एमके स्टालिन ने तमिलनाडु के मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर कोविड-19 सम्बन्धी बायो मेडिकल कचरे के निबटान का विवरण माँगा है। उनका कहना है कि कचरे का निबटान ठीक से नहीं हो पा रहा है। ऐसे दौर में जबकि प्रदेश में कोविड-19 संक्रमण अपने चरम की तरफ़ बढ़ रहा है, यह एक विपक्षी नेता के पर्यावरण और स्वास्थ्य संबंधी चेतना को भी गहरे में दर्ज कराता है। यद्यपि पत्र के मीडिया में आ जाने के बावजूद अभी तक मुख्यमंत्री कार्यालय की ओर से कोई स्पष्टीकरण नहीं आया है। दक्षिण के महाराष्ट्र सहित उत्तर भारत के दूसरे राज्यों के विपक्षी नेताओं की इस मुद्दे पर किसी सरकार की कोई प्रतिक्रिया का न मिलना क्या यह माना जाए कि इन नेताओं में इस क़िस्म की पर्यावरण और स्वास्थ्य संबंधी चेतना नहीं है अथवा इन राज्यों की स्थिति संतोषजनक है? सुप्रसिद्ध पर्यावरणविद सुनीता नारायण की प्रतिक्रिया मिली जुली है। उनका मानना है कि देश में कहीं यह संतोषजनक है लेकिन ज़्यादातर जगहों पर स्थितियाँ अच्छी नहीं हैं।

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24 मार्च को, लॉकडाउन लागू होने के दिन से 'सीपीसीबी (केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड) ने 'बायो मेडिकल कचरा प्रबंधन नियम 2016 के सम्बन्ध में कोविड-19 सम्बन्धी नई गाइडलाइन जारी की। इन दिशा-निर्देशों में एक ओर जहाँ मेडिकल कचरा भट्टियों (इनसेनेरेटर) को 'अपग्रेड' किये जाने और सभी प्रमुख शहरों में, एक केंद्रीकृत भट्टी के निर्माण किए जाने के निर्देश थे, वहीं दूसरी ओर 'होम क़्वॉरंटीन' सम्बन्धी कचरे के निबटान पर विशेष ध्यान दिए जाने पर ज़ोर दिया गया था।

कोविड-19 मेडिकल कचरे में मोटे तौर पर पीपीई किट, बूट, फ़ेस (एन- 95) मास्क, फ़ेस शीट, ग्लव्स, रोगियों द्वारा उपयोग में लाई गयी नैपकिन्स व अन्य सामग्री आते हैं। इनके अलावा यदि अस्थायी टेंट में अस्पताल, आइसोलेशन सेंटर अथवा क़्वॉरंटीन सेंटरों का निर्माण किया गया है तो उनके टेंट आदि भी इसी मेडिकल कचरे में आते हैं। कोविड-19 वार्डों में इस्तेमाल किये गए बैग, कंटेनर, ट्रॉली आदि के नियमित रूप से विसंक्रमित किये जाने के निर्देश हैं। इन दिशा-निर्देशों में 'भारतीय चिकित्सा अनुसन्धान परिषद्' (आईसीएमआर) और सीपीसीबी ने संयुक्त रूप से संक्रमित और विसंक्रमित कचरे की विभाजन श्रेणियों का निर्धारण भी किया है। यही निर्देश जाँच कलेक्शन सेंटर, लेबोरेटरीज़ और कोविड-19 सम्बन्धी प्रयोगशालाओं पर भी लागू होंगे। यह सारी कार्रवाई सम्बंधित राज्य प्रदूषण बोर्डों की नियमित देखरेख में होगी।

वैसे तो मेडिकल कचरे के निबटान की उपेक्षा लम्बे समय से होती रही है लेकिन लॉकडाउन लागू होने और 'केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड' के विशेष दिशा-निर्देशों के जारी होने के बाद उम्मीद की जाती थी कि अब इसे ऐसे गंभीरता से लिया जाएगा लेकिन ऐसा हुआ नहीं।

शहरों, विशेषकर, छोटे शहरों में यह अत्यंत शोचनीय हालत में अभी भी है। बीते दिनों पीपीई को लेकर सड़क पर खेलते-कूदते बच्चों की तसवीर के वायरल हो जाने से देश को इसकी भयावह तसवीर का अंदाज़ा हो सका था।

केंद्रीकृत भट्टी का निर्माण राज्यों में लम्बे समय से विवाद का विषय रहा है। दिल्ली और मुंबई आदि महानगरों की छोड़ दें तो ज़्यादातर प्रदेशों की राजधानियों में बड़े निजी और सरकारी अस्पतालों की विकेन्द्रीकृत निजी भटिटयाँ हैं। उदाहरण के तौर पर लखनऊ में संजय गाँधी पीजीआई संस्थान (सरकारी) के अलावा, मेदांता हॉस्पिटल, चंदन हॉस्पिटल और सहारा हॉस्पिटल (सभी निजी) में स्थापित भट्टियाँ अपग्रेडेड श्रेणी में आती हैं लेकिन केजीएमसी मेडिकल यूनिवर्सिटी जैसे प्रतिष्ठपूर्ण संस्थान के पास अपनी अपग्रेडेड भट्टी नहीं है। इसी तरह राजधानी में केन्द्रीभूत भट्टी का भी अभाव है। सुप्रसिद्ध पर्यावरणविद और 'सेंटर फॉर साइंस एन्ड एनवायरमेंट' की निदेशक सुनीता नारायण कहती हैं कि ‘मेरठ, हापुड़, नोएडा और ग्रेटर नोएडा आदि को छोड़ दें तो प्रदेश के ज़्यादातर शहरों में या तो भट्टियाँ अपग्रेडेड नहीं हुई हैं या कागज़ों में खानापूर्ति मात्र की गयी है।’ 

इसी तरह दिल्ली, गुरुग्राम और चंडीगढ़ में भट्टियों को अपग्रेड किया गया है लेकिन हरियाणा और पंजाब के बाक़ी शहरों की दशा काफ़ी ख़राब है। मुंबई में यूँ तो कई अपग्रेडेड भट्टियाँ कार्यरत हैं लेकिन केंद्रीकृत भट्टी का यहाँ भी अभाव है। महाराष्ट्र के बाक़ी शहरों की दशा काफ़ी शोचनीय है। अनेक शहरों में तो भट्टियाँ भी नहीं हैं। इस मामले में केरल की स्थिति बहुत अच्छी मानी जाती है।

मेडिकल कचरा निबटान का कार्य अधिकांशतः निजी कंपनियों के हाथों में है। विसंक्रमित श्रेणी वाले कचरे का उपयोग रीसाइक्लिंग उद्योग में होता है अतः यह दोहरी आय का साधन बनता है। यही कारण है कि निजी कंपनियों को ठेके का आवंटन हर राज्य में किसी न किसी राजनीतिक विवाद का विषय बनता रहा है। अपने पत्र में डीएमके नेता स्टालिन ने मुख्यमंत्रीई के पलानिस्वामी पर आरोप लगाते हुए कहा कि मेडिकल कचरा निबटान के लिए स्वीकृत 13 कंपनियों में सिर्फ़ 3 ही हैं जो संगठित क्षेत्र की हैं और पेशेवर हैं बाक़ी 10 कम्पनियाँ बेनामी हैं और उनके रिश्तों के तार सत्तारूढ़ एडीएमके से जुड़े हैं। उत्तर प्रदेश का उदाहरण लें तो सपा और बसपा के कार्यकाल में विपक्षी दल बीजेपी सत्ता दल पर मिलीभगत का आरोप लगाती रही थी जिसकी वजह से तमाम शहरों में केंद्रीकृत भट्टियों की स्थापना नहीं हो सकी। इंदौर जैसे शहर में जहाँ कोविड-19 संक्रमण विकराल रूप ग्रहण कर चुका है, केंद्रीकृत भट्टी का अभी भी अभाव है। बीजेपी के शासनकाल में महाराष्ट्र में शरद पवार समय-समय पर मेडिकल कचरे के निबटान में होने वाले ‘गोरखधंधे’ पर सवाल उठाते रहे हैं। 

सुनीता नारायण देश में मेडिकल कचरे के निबटान की स्थिति को लेकर बेहद चिंतित हैं। उनका कहना है कि फ़िलहाल उनके पास सीपीसीबी द्वारा उपलब्ध आँकड़े ही हैं जो बहुत कमज़ोर हैं। ये कई जगहों पर तो संतोषजनक स्थितियाँ बताते हैं लेकिन बाक़ी जगहों पर चिंतित होने का कारण बनते हैं।

भट्टियों के अपग्रेडिंग के सवाल पूछे जाने पर वह कहती हैं कि ‘अपग्रेडिंग से बड़ी चिंता यह है कि ज़्यादातर शहरों में इनसेनेरेटर (भट्टियाँ) हैं ही नहीं और वहाँ कचरे को खोद कर गाड़ दिया जाता है जबकि सीपीसीबी के स्पष्ट दिशा-निर्देश हैं कि यह सिर्फ़ ग्रामीण अंचलों के दूर-दराज़ क्षेत्रों में ही किया जा सकता है।’ उनका यह भी कहना है कि सबसे बड़ी चिंता का सबब घरों में होने वाले क़्वॉरंटीन और अस्थायी आइसोलेशन वार्डों से निकलने वाले कचरे की उपेक्षा का है। क़ायदे से इनके 'डोर टू डोर कलेक्शन' के लिए पेशेवर वाहनों और कर्मचारियों को लगाया जाना चाहिए लेकिन ऐसा कम ही जगहों पर होता है, छोटे शहरों और गाँवों में तो बिलकुल नहीं हो रहा जो बहुत घातक और ख़तरनाक है। नारायण कहती जाती हैं कि सीपीसीबी के आँकड़े भरोसेमंद नहीं हैं इसीलिये उनका संगठन मेडिकल कचरा निबटान का स्वतंत्र रूप से अध्ययन कर रहा है। बहुत जल्द वह रिपोर्ट जारी करेंगे। 

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ऐसे दौर में जबकि कोरोना ज्वार अपने चरम की ओर बढ़ रहा है, 'कॉन्टैक्ट' चैन को निरंतर तोड़ने की कोशिश में जुटी केंद्रीय और राज्य सरकारों का ध्यान सिर्फ़ मनुष्यों से होने वाले संक्रमण तक ही सीमित है। बायो मेडिकल कचरे और इसके सुरक्षित निबटान की ओर उनका ध्यान उस गंभीरता से नहीं है जैसा कि होना चाहिए। वस्तुतः मनुष्यों से जनित यह कचरा भी संक्रमण का उतना ही ख़तरनाक कारक है जितना कि मनुष्य स्वयं। यदि मनुष्य में कोविड-19 के प्राण बसते हैं तो मेडिकल कचरे में बसती है उसकी आत्मा। प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों को भी यह समझ लेना चाहिए कि कोविड-19 वायरस से लड़ने में जितनी अहम भूमिका चिकित्सकों और उनके सहायकों की है, उससे रत्ती भर भी कम भूमिका उनकी नहीं।

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