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क्या मुसलमान आधुनिक नहीं हैं?

लोगों की खीझ यह है कि मुसलमान मर्द जहाँ देखिए दाढ़ी बढ़ाए और ख़ास क़िस्म की टोपी चिपकाए दिख जाते हैं और मुसलमान औरतों में बुर्क़े का चलन बेतरह बढ़ा है। इसके मायने यह निकलते हैं कि उनमें दक़ियानूसी भी उसी अनुपात में बढ़ी है। इसका क्या उत्तर है कि सरकारी अस्पतालों में मुसलमान बड़ी संख्या में आते हैं? 
अपूर्वानंद

ज़फ़र आग़ा ने मुसलमानों में सामाजिक क्रांति की ज़रूरत पर ज़ोर दिया है। उनके मुताबिक़ मुसलमानों पर मौलवियों का असर बहुत ज़्यादा है और वे उनकी तरक़्क़ी के रास्ते में रुकावट बन गए हैं। तरक़्क़ी और आधुनिकता का सीधा रिश्ता माना जाता है। मुसलमान आधुनिक नहीं हैं और इसका एक बड़ा कारण उनमें आधुनिक शिक्षा का अभाव है, ऐसा ज़फ़र साहब का कहना है। इस कारण वे समाज में पिछड़ गए हैं।

ज़फ़र साहब मानते हैं कि यह मुसलमानों का पतन है। यानी पहले ऐसे हालात न थे, ‘यह भी कहना ग़लत होगा कि भारतीय मुसलमान सदा ही पिछड़े रहे हैं, स्वयं भारत का इतिहास साक्षी है कि लगभग 800 वर्ष तक भारत पर मुसलिम वर्ग का वर्चस्व रहा। भारत में सदियों तक शान से शासक वर्ग की स्थिति में रहने के पश्चात यह समाज ऐसे पतन का शिकार हुआ कि अब तक नहीं उबर सका।’

फिर वह कहते हैं कि ‘दुखद बात यह है कि इस समाज में अभी भी परिवर्तन की कोई ललक नहीं नज़र आती। यह किसी भी समाज की सबसे बड़ी त्रासदी है कि वह अपने पतन की चिंता छोड़, हाथ पर हाथ धरे बैठ जाए।’

इस अफ़सोस के पीछे जो अतीत की समझ है, उसपर बात होनी चाहिए। विडंबना यह है कि ठीक यही बात मुसलमान विरोधी भी कहते आए हैं कि 800 सालों तक मुसलमानों ने भारत पर हुकूमत की। 

मुग़लों या उन अन्य शासकों के राज को, जिनका धर्म इसलाम था, मुसलमान समुदाय का प्रभुत्व मान लेना कितना ठीक है? और उस वक़्त भी जिसे आज भारत कहते हैं उसके बड़े हिस्से में क्या निरंतर मुसलमान शासकों का ही राज रहा और क्या यह अबाधित था?

पूरी दुनिया में भी मुसलमानों की शान और उनके पतन की कहानी को इसी तरह कहने में समस्या है।

फिर पतनवाली कहानी भी ज़रा कमज़ोर है। ‘वर्चस्व’ समाप्त हुआ अंग्रेज़ों के आने के बाद, जैसा ज़फ़र साहब की बात में निहित है। और उसके बाद मुसलमान ख़ुद में बंद होते चले गए। उन्होंने धर्म का दामन पकड़ लिया और शिक्षा की ओर से मुँह मोड़ लिया। इस तरह के दावे में यह समझ है कि मुसलमान एक ही तरह के होते हैं और एक ही तरह से निर्णय करते हैं। यह भी कि उसके पहले तक तो हालात सारे मुसलमानों के लिए ख़ासे पुरसुकून थे। शिक्षा में भी उनका प्रवेश आज से बेहतर रहा होगा। लेकिन शिक्षा से जो तात्पर्य ज़फ़र साहब का है, क्या उसी अर्थ में शिक्षा और तरक़्क़ी पहले थी?

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तरक़्क़ी की चिंता किसे?

तरक़्क़ी या उन्नति की चिंता 19वीं सदी के हिन्दुओं और मुसलामानों में बराबरी से पाई जाती है। हिंदू मर्द और मुसलमान मर्द तक़रीबन एक तरीक़े से अपने धर्म को उन्नति की राह पर बढ़ते देखने को बेचैन हैं। लेकिन औरतों के बारे में उनके और ख़ुद स्त्रियों के रवैये में फ़र्क है। निरंतर संस्था की ओर से पूर्वा भारद्वाज के शोध में खोजे गए आज से एक सदी से भी ज़्यादा पहले की मुसलमान औरतों के लेखों से ज़ाहिर होता है कि ख़ुद उनकी आत्मछवि वैसी नहीं है जैसी उनके हितचिन्तक गढ़ना चाहते रहे थे। 1905 में मद्रास से छपे इंडियन लेडीज़ जर्नल में रुकैया सखावत हुसैन की अंग्रेज़ी की रचना ‘सुल्तानाज़ ड्रीम’ में औरतों की दुनिया का जो सपना देखा गया है, वह पिछड़ेपन की कहानी में कहाँ बैठता है?

आधुनिक शिक्षा के सहारे उपयोगी स्त्री गढ़ने का ख्याल हिंदू सुधारकों का भी है और मुसलमान पुरुष सुधारकों का भी। इसी वक़्त एक तरफ़ पंडिता रमाबाई का द्वंद्व तिलक और विवेकानंद से होता है, दूसरी ओर फ़ातिमा शेख के भाई उस्मान शेख अपना घर सावित्री बाई फुले को स्कूल शुरू करने के लिए देते हैं। फ़ातिमा सावित्री के साथ स्कूल में पढ़ाना शुरू करती हैं। हिन्दुओं की बिरादरी उनकी मददगार नहीं साबित होती है।

इन क़िस्सों से यही समझ में आता है कि उन्नति, तरक़्क़ी, प्रगति, शिक्षा और आधुनिकता का सफ़र कुछ जाने हुए संघर्षों के रास्ते ही बढ़ा है और वे मुसलमानों के लिए प्रायः वही रहे हैं जो और धर्मावलम्बियों के लिए।

लेकिन अभी भी शिकायत मुसलमानों के आधुनिक न होने से है। इस बात पर जब एक राजनीतिशास्त्री की राय जानना चाही तो उन्होंने कहा कि यह तो सच है कि मुसलमानों में धार्मिकता बहुत बढ़ी है और यह अच्छी बात नहीं। वह खुद भी मुसलमान हैं।

ऐसे लोगों की खीझ यह है कि मुसलमान मर्द जहाँ देखिए दाढ़ी बढ़ाए और ख़ास क़िस्म की टोपी चिपकाए दिख जाते हैं और मुसलमान औरतों में बुर्क़े का चलन बेतरह बढ़ा है। वे पहले के मुक़ाबले अधिक नमाज़ी हो गए हैं। इसके मायने यह निकलते हैं कि उनमें पिछड़ापन और दक़ियानूसी भी उसी अनुपात में बढ़ी है।

हाथ मिलाना प्रगतिशीलता, बुर्क़ा पिछड़ापन?

सुनकर याद आया, अभी इस साल की चाँद रात को, यानी ईद की पूर्व संध्या को जामा मसजिद के सामने गली में धक्के खाते हुए अचानक एक बुर्क़ापोश लड़की ने रोका। मेरी अचकचाहट देख उसने अपने चेहरे से पर्दा हटाया और तपाक से हाथ मिलाने के लिए उसने अपना हाथ बढ़ाया। अपरिचय की सकपकाहट देखकर उसने कहा, ‘आपकी स्टूडेंट रही हूँ। आपको याद नहीं।’ और फिर हँसते हुए आगे बढ़ गई। मैं उसके पर्दे और उसकी हँसी के बीच क्यों एक फाँक देख रहा था? क्या वह हाथ मिलाना प्रगतिशीलता थी और बुर्क़ा पिछड़ापन?

फिर पूर्वा भारद्वाज के मुसलमान औरतों की शिक्षा के शोध का एक क़िस्सा याद आया। मुसलमान लड़कियों के एक मदरसे का जिसकी किलेबंदी देखकर यह अंदाज़ा करना मुश्किल था कि भीतर मैदान में मुसलमान लड़कियाँ बास्केटबॉल खेलती होंगी। क्या पिछड़ेपन के दुर्ग में आधुनिकता पल रही है?

यह सवाल करने पर कि धार्मिकता के चंगुल के कारण मुसलमान पतन की गर्त में हैं, कुमार राणा ग़ुस्से से उबल पड़ते हैं। उन्होंने अपने मित्रों के साथ बंगाल में मुसलमान समाज की हालत पर शोध किया है। वह पूछते हैं, बताइए, इसकी क्या वजह है कि मुर्शिदाबाद और मालदा जैसे मुसलमान बहुल इलाक़ों में स्कूलों में दाख़िले का प्रतिशत दूसरे इलाक़ों के मुक़ाबले कहीं ज़्यादा है? क्या इन इलाक़ों के मुसलमान बाक़ी जगहों की तुलना में कम धार्मिक हैं?

इसका क्या उत्तर है कि सरकारी अस्पतालों में मुसलमान बड़ी संख्या में आते हैं? अगर वे दक़ियानूस हैं तो आधुनिक चिकित्सा में क्योंकर उनका यक़ीन हो?

ये सारे सवाल सिर्फ़ इस तरफ़ इशारा करते हैं कि आधुनिकता, शिक्षा, तरक़्क़ी आदि इतने सरल प्रत्यय नहीं हैं। न्यूयॉर्क के मेरे मित्र ने अपनी दो बेटियों की तसवीर दिखलाई। एक ने अबाया पहन रखा था और दूसरी खुले सर थी। एक ही स्कूल में एक ही शिक्षा लेनेवाली दो बहनों में कौन अधिक आधुनिक है और कौन पिछड़ रही है?

ज़फर साहब जब यह कहते हैं कि एक तो मुसलमान पतन की गर्त में हैं, दूसरे वे हाथ पर हाथ धरे बैठे हैं। कई सर सैय्यद चाहिए, ऐसा उनका ही नहीं दूसरों का भी मानना है।

कुमार बताते हैं कि कलकत्ते में ‘अल अमीन मिशन’ जैसी संस्थाएँ मुसलमानों के मेडिकल और इंजीनियरिंग में दाख़िले के लिए ही उन्हें प्रशिक्षित करती हैं और कामयाब युवाओं की संख्या हर साल सैंकड़ों में रहती है।

बड़ोदा में प्रोफ़ेसर बंदूकवाला अपने साथियों के सहयोग से हर साल तक़रीबन एक करोड़ रुपया इकट्ठा करते हैं और छात्रवृत्ति देते हैं। भारत और बाहर रहनेवाले जाने कितने ही मुसलमान डॉक्टर और दूसरे पेशों में लगे लोग आधुनिक शिक्षा उनके समुदाय के बच्चों को मिल सके, इसके लिए स्कूल और कॉलेज चलाते हैं।

क्या मुसलमान का पिछड़ापन ऐच्छिक है?

क्या अपने बच्चों को आधुनिक बनाने के लिए ऐसे ही प्रयास हिंदू भी कर रहे हैं या उनके लिए इसकी ज़रूरत ही नहीं है? और नहीं, तो क्यों? क्या इसके लिए सच्चर समिति या कुमार राणा की संस्था ‘प्रतीची’ की रिपोर्ट नहीं पढ़नी चाहिए? क्या मुसलमान का पिछड़ापन ऐच्छिक है? और क्या राज्य की पहलक़दमी के अभाव में वे हाथ पर हाथ धरे बैठे हैं?  

आधुनिकता के इन रास्तों से निकल कर जब मुसलमान दिल्ली या मुंबई में कॉस्मोपॉलिटन अहसास लेना चाहते हैं तो उन्हें ‘आधुनिक’ बस्तियों में रहने को मकान नहीं मिलते और वे ‘पिछड़े’ इलाक़ों में रहने को बाध्य कर दिए जाते हैं।

ज़फ़र आग़ा साहब की फ़िक्र के दर्द को समझना चाहिए, लेकिन मुसलमानों के आधुनिकता के स्रोतों से दूर रहने के लिए उन्हीं पर हमला करना कुछ ज़्यादती है।

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