वेबसाइट के अनुसार, "मल्हार झटका मटन और चिकन विक्रेताओं के लिए एक प्रमाणित मंच है। यह सुनिश्चित करता है कि बकरी और भेड़ का मांस हिंदू धार्मिक परंपराओं के अनुसार बलि देकर तैयार किया जाए, जो ताजा, स्वच्छ, लार से मुक्त और किसी अन्य जानवर के मांस से मिश्रित न हो। यह मांस केवल हिंदू खटीक समुदाय के विक्रेताओं के माध्यम से उपलब्ध है।" वहीं, हलाल प्रक्रिया में पहले जानवर का खून निकाला जाता है।
नितेश राणे ने इसे हिंदू समुदाय के लिए बड़ा कदम बताते हुए कहा, "हमने महाराष्ट्र में हिंदू समुदाय के लिए एक महत्वपूर्ण कदम उठाया है। मल्हार सर्टिफिकेशन शुरू किया गया है। इसके जरिए हमें अपनी मटन की दुकानें मिलेंगी, जहां 100 प्रतिशत हिंदू समुदाय की मौजूदगी होगी और मांस बेचने वाला भी हिंदू होगा। कहीं भी मटन में मिलावट नहीं मिलेगी। इससे हिंदू समुदाय के युवाओं को आर्थिक रूप से सशक्त बनाने में मदद मिलेगी।" राणे ने आगे कहा, "मल्हार सर्टिफिकेशन का अधिक से अधिक इस्तेमाल होना चाहिए और हिंदुओं को बिना मल्हार सर्टिफिकेशन वाली दुकानों से मटन नहीं खरीदना चाहिए। मैं लोगों से यह अपील करता हूं। जय श्री राम।"
हलाल के खिलाफ संगठित अभियान
पिछले कुछ वर्षों में बीजेपी शासित कई राज्यों में दक्षिणपंथी समूहों ने हलाल मांस के खिलाफ अभियान चलाया है। पिछले साल सावरकर राष्ट्रीय स्मारक के अध्यक्ष रंजीत सावरकर, जो विनायक दामोदर सावरकर के पौत्र हैं, ने कहा था, "आज हलाल सर्टिफिकेशन के जरिए धार्मिक प्रभाव बढ़ाने की कोशिश की जा रही है।" इसके जवाब में स्मारक ने 'ओम सर्टिफिकेशन' शुरू किया था, जो मंदिरों के आसपास व्यापार करने वाले हिंदू व्यापारियों के लिए आवश्यक बताया गया। यूपी में योगी सरकार ने हलाल प्रमाणित वस्तुओं के खिलाफ अभियान छेड़ा था।
नाकामियों को छिपाने का बहानाः विपक्ष ने इस मुद्दे को बीजेपी की नाकामियों को छिपाने की कोशिश करार दिया है। एनसीपी (एसपी) नेता और पूर्व मंत्री डॉ. जितेंद्र आव्हाड ने तंज कसते हुए कहा, "बजट फ्लॉप हो गया है, इसलिए अब वे इस तरह के मुद्दे लेकर आए हैं। यह बस बचकाना है।"
सियासत या समाज का ध्रुवीकरण?
मल्हार सर्टिफिकेशन और हलाल मांस को लेकर यह बहस महाराष्ट्र में सामाजिक और सियासी ध्रुवीकरण को और गहरा कर सकती है। जहां बीजेपी इसे हिंदू समुदाय के सशक्तिकरण से जोड़ रही है, वहीं विपक्ष इसे जनता का ध्यान भटकाने की रणनीति बता रहा है। सवाल यह है कि क्या यह वास्तव में समुदाय के हित में है या सिर्फ वोटों की राजनीति का नया हथियार?
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