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कांशीराम की विरासत पर दावा, क्या मायावती का विकल्प बन पाएँगे चंद्रशेखर?

भीम आर्मी के संस्थापक चंद्रशेखर आज़ाद ने राजनीति में क़दम रख रख दिया है और अपनी नई पार्टी का एलान कर दिया है। दलितों के मसीहा कांशीराम के जन्मदिन 15 मार्च यानी रविवार को नई पार्टी की घोषणा करके चंद्रशेखर ने उनकी राजनीतिक विरासत पर अपना दावा ठोक दिया है।

पिछले साल हुए लोकसभा चुनाव के दौरान भी यह चर्चा थी कि भीम आर्मी प्रमुख चंद्रशेखर ख़ुद चुनाव लड़ सकते हैं। चर्चा तो यहाँ तक थी कि चंद्रशेखर वाराणसी से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ख़िलाफ़ चुनाव लड़ेंगे तब चंद्रशेखर ने मायावती को दलितों की एकमात्र नेता मानते हुए उन्हीं को अपना समर्थन देने का एलान किया था। लोकसभा चुनाव में बीसपी को दस सीटें मिली थीं। लेकिन इसके बाद मायावती सड़क पर राजनीतिक संघर्ष भूल गईं। लोकसभा चुनाव के बाद से किसी भी मुद्दे पर उन्होंने बीएसपी को सड़कों पर नहीं उतारा। इसके उलट चंद्रशेखर ने दलित और मुसलिम समाज से जुड़े मुद्दों पर आक्रामक राजनीति करके बीएसपी के इस मज़बूत वोट बैंक में सेंध लगाने की पूरी कोशिश की है।

चंद्रशेखर से पहले भी कई लोगों ने कांशीराम और मायावती का विकल्प बनने की कोशिश की है लेकिन उन्हें इसमें कामयाबी नहीं मिल पाई।

साल 2003 में उदित राज ने बाबा साहब भीमराव आंबेडकर की तर्ज़ पर दिल्ली के रामलीला मैदान में एक बड़ी रैली बुलाकर हिंदू धर्म त्याग कर बौद्ध धर्म अपनाने का एलान किया था। कुछ दिन बाद ही वह 'इंडियन जस्टिस पार्टी' बनाकर चुनाव राजनीति में कूदे थे। उदित राज ख़ुद को कांशीराम का विकल्प मानते थे और मायावती के विकल्प के तौर पर उन्होंने सारिका चौधरी नाम की एक युवा नेता को आगे बढ़ाने की भरपूर कोशिश की थी। कई चुनावों में कड़ी मेहनत करने के बाद भी उन्हें और उनकी पार्टी को कोई सफलता नहीं मिली।

2009 में उदित राज ने बिजनौर ज़िले की नगीना लोकसभा सीट से चुनाव लड़ा लेकिन 5000 वोट भी नहीं पा सके। उन्हीं की पार्टी की सारिका चौधरी ने 2012 में बिजनौर की नहटौर विधानसभा सीट से चुनाव लड़ा। तब पीस पार्टी के साथ गठबंधन के सहारे वह 18000 वोट पाने में कामयाब रही थीं। चुनाव में लगातार नाकामी से हारकर उदित राज ने 2014 में बीजेपी में अपनी पार्टी का विलय कर दिया और दिल्ली की उत्तर पश्चिम सीट से सांसद बन गए। 2019 में जब उन्हें यह भनक लगी कि बीजेपी उन्हें टिकट नहीं दे रही है तो उन्होंने कांग्रेस का दामन थाम लिया।

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भाई तेज़ सिंह ने बनाई थी आंबेडकर समाज पार्टी

उदित राज की ही तरह भाई तेज सिंह ने आईएएस अफ़सर की नौकरी छोड़कर 'आंबेडकर समाज पार्टी' नाम से एक राजनीतिक दल बनाया था। उन्होंने भी पश्चिम उत्तर प्रदेश में ख़ुद को कांशीराम और मायावती का विकल्प बनाकर दलितों के बीच पेश किया। लेकिन उन्हें न तो दलित समाज से समर्थन मिल पाया और न ही मुसलिम समाज से। चुनावों में मिली नाकामी के बाद भाई तेज सिंह और उनकी आंबेडकर समाज पार्टी गुमनामी के अंधेरे में खो कर रह गए हैं।

उदित राज और भाई तेज सिंह का पिछला रिकॉर्ड देखते हुए चंद्रशेखर की राह और भी मुश्किल लगती है। चंद्रशेखर को यह फ़ायदा ज़रूर है कि वह उसी जाति से आते हैं जिस जाति से मायावती आती हैं।

उदित राज पासी बिरादरी से आते हैं जिसकी संख्या उत्तर प्रदेश में बहुत ही कम है। वहीं भाई तेज सिंह भी दलित समाज की ऐसी जाति से आते हैं जिसकी संख्या बहुत कम है। इसीलिए जाटव जाति से न होने की वजह से इन दोनों को दलित समाज में पहचान और वो रुतबा नहीं मिल पाया जो मायावती को हासिल है। चंद्रशेखर को इस बात का भी फ़ायदा मिल सकता है कि पार्टी बनाने से पहले उन्होंने कई साल भीम आर्मी बनाकर सड़कों पर राजनीतिक संघर्ष किया है। जबकि इससे पहले उदित राज और भाई तेज सिंह ने ऐसा कोई संघर्ष नहीं किया था।

बसपा की ताक़त क्या?

आज कई नेता ख़ुद को कांशीराम और मायावती के विकल्प के रूप में पेश तो करते हैं,  लेकिन वह बीएसपी की आज की ताक़त के पीछे कांशीराम और मायावती के बेजोड़ संघर्ष को भूल जाते हैं या उसे नज़रअंदाज़ करते हैं। मायावती को एक नेता के रूप में कांशीराम जैसे राजनीति के मंझे हुए खिलाड़ी और विचारक ने तराशा था। बाद में मायावती ने भी अपने दम पर बीएसपी को सत्ता में लाकर कांशीराम के सपने को पूरा किया। कांशीराम ने बीएसपी की नींव तो 1984 में ही रख दी थी लेकिन उत्तर प्रदेश में पूर्ण बहुमत पाने में बीएसपी को पूरे 23 साल लगे। इस बीच कांशीराम और मायावती ने कई बार हार का मुँह देखा तो कई बार चुनावी गठबंधन भी किए।

कांशीराम ने पहले 1993 में समाजवादी पार्टी से गठबंधन करके बीएसपी को सत्ता में हिस्सेदारी दिलवाई और बाद में बीजेपी से हाथ मिलाकर कई बार मायवाती को मुख्यमंत्री बनवाया। तब कहीं जाकर मायावती के नेतृत्व में बीएसपी को 2007 में उत्तर प्रदेश में पूर्ण बहुमत मिल पाया। उसके  बाद से बीएसपी का ग्राफ़ लगातार गिर रहा है। मायावती के नेतृत्व पर सवाल उठ रहे हैं। चंद्रशेखर दलितों के बीच ख़ुद को मायावती के विकल्प बनाकर पेश कर रहे हैं।

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पेशे से वकील हैं चंद्रशेखर 

चंद्रशेखर आज़ाद पेशे से वकील हैं। उनका जन्म उत्तर प्रदेश के सहारनपुर में 6 नवंबर 1986 को हुआ। उन्होंने अपनी शुरुआती पढ़ाई सरकारी स्कूल से की और लखनऊ विश्वविद्यालय से उन्होंने वकालत की डिग्री हासिल की। चंद्रशेखर आज़ाद के पिता एक व्यापारी हैं और माँ साधारण गृहणी हैं। चंद्रशेखर आज़ाद ने क़रीब 8 साल पहले साल 2012 में विनय रतन नाम के साथ मिलकर भीम आर्मी का गठन किया था। भीम आर्मी ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश में दलितों को एकजुट करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

सहारनपुर हिंसा के बाद आए थे चर्चा में

चंद्रशेखर आज़ाद सहारनपुर हिंसा के दौरान पहली बार सुर्खियों में आए थे। सहारनपुर में साल 2017 में राजपूतों और दलितों के बीच हिंसक संघर्ष हुआ था। इसमें चंद्रशेखर आज़ाद को मुख्य आरोपी बनाया गया था। इस हिंसा के बाद दिल्ली के जंतर-मंतर पर भीम आर्मी ने प्रदर्शन किया था। यहाँ से चंद्रशेखर पूरे देश की नज़रों में आए। भीम आर्मी के प्रदर्शन में उत्तर प्रदेश के अलावा बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान समेत देश के कई हिस्सों से दलित प्रदर्शनकारी दिल्ली पहुँचे थे। बाद में 2 अक्टूबर 2018 को उन्होंने दलित आरक्षण पर सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के बाद भारत बंद किया था। उसमें कई जगहों पर हिंसक झड़प हुई थी। हाल ही में 23 फ़रवरी को भी उन्होंने प्रमोशन में आरक्षण पर आए सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के बाद भारत बंद किया था।

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